प्रवचन—१२

हम सबके अनुभवकी बात है कि यह सब-का-सब दृश्य अदृश्य हो रहा है। यह जो संसार दीख रहा है, यह मिट रहा है। एक क्षण भी इसमें स्थिरता नहीं है। इसमें स्थिरता माननेसे ही राग-द्वेषादि द्वन्द्व होते हैं—

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।

सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥

(गीता ७।२७)

इच्छा (राग) और द्वेषसे ही सब द्वन्द्व पैदा होते हैं। इन द्वन्द्वोंसे मोहित होकर यह जितना भी प्राणी-समुदाय है, यह वास्तविकताको नहीं जानता। इस द्वन्द्वसे ही सम्मोह पैदा होता है। तो इस कारण वह तत्त्वको जान नहीं सकता। अत: राग-द्वेष, हर्ष-शोक पैदा होते हैं—नश्वर शरीर और संसारको स्थिर माननेसे, ‘है’ ऐसा माननेसे। यह सबके अनुभवकी बात है कि ये स्थिर नहीं हैं। संतोंने कहा है—

काची काया मन अथिर, थिर-थिर काम करंत।

ज्यों-ज्यों नर निधड़क फिरै, त्यों-त्यों काल हसंत॥

युधिष्ठिरजी महाराजने कहा है—

अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम्।

शेषा: स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमत: परम्॥

(महा०, वन० ३१३। ११६)

इससे बढ़कर क्या आश्चर्य होगा कि सब-के-सब अदर्शनमें जा रहे हैं, यमराजके घर जा रहे हैं और इच्छा करते हैं स्थिरताकी! जो स्थिरता कभी रहती नहीं और अभी भी स्थिरता है नहीं और कभी भी स्थिरता रहेगी नहीं। यहाँ तो केवल सेवा करनेके लिये आना हुआ है। शरीरसे, मनसे, वाणीसे, पदार्थोंसे, योग्यतासे, पदसे, अधिकारसे औरोंकी सेवा बन जाय, औरोंको सुख हो जाय, औरोंका भला हो जाय, औरोंका हित हो जाय—यह काम हमें करना है। इसमें बाधा होती है—संग्रह कर लें और सुख भोगें अर्थात् संग्रह करनेकी और सुख भोगनेकी आसक्ति। भगवान‍् कहते हैं—

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्।

व्यवसायात्मिका बुद्धि: समाधौ न विधीयते॥

(गीता २।४४)

भोग और संग्रहकी इच्छा होती है कि सुख भोग लूँ, संग्रह कर लूँ। इसी कारण ‘एक परमात्माकी तरफ ही चलना है’ यह निश्चय नहीं होता। इस निश्चयमें जितनी शक्ति है, उतनी किसी साधनमें नहीं है। नाम-जप, कीर्तन, सत्संग, स्वाध्याय, तप, तीर्थ, व्रत आदि साधन बड़े श्रेष्ठ हैं। वास्तवमें यह बात ठीक है। परन्तु भीतरकी जो निश्चयात्मिका बुद्धि है, वह यथार्थ ठीक होती है। उसका बहुत ज्यादा मूल्य होता है। भगवान‍्ने कहा है—

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।

साधुरेव स मन्तव्य: सम्यग्व्यवसितो हि स:॥

(गीता ९।३०)

साधन करनेवाला सदाचारी होता है। पर सुदुराचारी—सांगोपांग दुराचारी भी अन्यका भजन न करके, अन्यका आश्रय न रखकर भजन करता है तो उसे साधु मान लेना चाहिये—‘साधुरेव स मन्तव्य:’—यह भगवान‍्की आज्ञा है। जब भगवान‍् उसे सुदुराचारी स्वीकार करते हैं तो उसे साधु कैसे मानें? तो कहा—‘सम्यग्व्यवसितो हि स:’ अर्थात् उसने निश्चय पक्‍का कर लिया कि केवल परमात्माकी तरफ ही चलना है। यह सम्पूर्ण साधनोंकी मूलभूत साधना है। इससे अपने-आप सब ठीक होगा। जैसे किसीके मनमें निश्चय हो जाय कि मुझे बदरीनारायण जाना है तो कैसे जाना है? रास्ता कैसा है? कितना है? आदि बातें स्वत: पैदा होंगी। स्वत: जिज्ञासा पैदा होगी। खोज करनेपर बतानेवाले और सहायता करनेवाले भी मिल जायँगे। ज्यों-ज्यों चलेगा, त्यों-त्यों आगे चलनेका सामान भी मिलेगा और उपाय भी कर लेगा। सब कुछ हो जायगा। तो एक निश्चय हो जानेसे सब काम बन जाता है। ऐसा निश्चय कब होता है? जब यहाँकी अस्थिरता देखता है। परन्तु भूलसे स्थिरता देखकर यहाँ ही डेरा लगा देता है कि बस, यहाँ ही रहना है। पर अभीतक जितने आये, कोई यहाँ नहीं रहा। अच्छे-अच्छे महात्मा, पीर, औलिया, संत हो गये; वे भी चले गये। भगवान‍्ने भी अवतार लिये पर हमारे इस मृत्युलोकके रिवाजको नहीं तोड़ा। वे भी चले गये। यहाँ रहनेकी रिवाज नहीं है, इसलिये यह जाने-ही-जानेवाला है। अगर यह ठीक जागृति रहे तो बहुत ही लाभ है।

जैसे कार्यालयमें काम करने जाते हैं तो भीतर यह बात बैठी रहती है कि कार्य समाप्त होते ही घर चल देंगे। इस बातको याद नहीं करते, इसका चिन्तन नहीं करते, इसका जप नहीं करते। परन्तु बात भीतर जमी रहती है। इस तरह जो संसारमें रहनेकी बात है, वह बिलकुल उलटी बात है और यहाँ न रहनेकी बात बिलकुल सही बात है। सही बातको मान लें। इसमें कुछ करना नहीं पड़ता। इसे निर्विकल्परूपसे मान लेनेपर फिर यह विचारका विषय नहीं रहता। इस बातको मान लें तो बड़े भारी लाभकी बात है। ये जितने साधन हैं, सब इसके ऊपर आधारित हैं। यह सबकी आधारशिला (नींव) है। आस्तिक हो या नास्तिक, कोई क्यों न हो, यह सबके लिये सही बात है और ठीक अनुभवकी बात है। ऐसा नहीं कि शास्त्रोंमें लिखा है, मान लो; तो जिसकी श्रद्धा होगी, वह मान लेगा और जिसकी श्रद्धा नहीं होगी, वह नहीं मानेगा। इसमें तो श्रद्धाकी भी जरूरत नहीं है। यह तो प्रत्यक्ष और सीधी बात है कि हमारा बालकपना चला गया। उसे ढूँढ़ें तो वह मिलता नहीं। ऐसा ही प्रवाह अभी भी चल रहा है।

एक परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके लिये ही हमारा आना हुआ है। उसीको प्राप्त करना है। पर यह तब होगा, जब इस संसारको अप्राप्त मानें। संसार प्राप्त नहीं हुआ है। हम अचल हैं। ‘नित्य: सर्वगत: स्थाणुरचलोऽयं सनातन:॥’ (गीता २। २४) और यह सब चल है। चलके साथ मिलनेसे अपनेमें अस्थिरता मालूम देती है। स्थिर होते हुए भी अपनी स्थिरताका अनुभव नहीं होता। जैसे,हम गाड़ीमें जा रहे हैं और गाड़ी किसी छोटे स्टेशनपर ठहर गयी; क्योंकि सामनेसे दूसरी गाड़ी आ रही है, वह गाड़ी आकर दूसरी लाइनमें ठहर जाती है हम उस गाड़ीकी तरफ देखते हैं, वह गाड़ी चल पड़ती है तो मालूम होता है कि हम चल रहे हैं, जबकि हमारी गाड़ी स्थिर है, ऐसे ही यह शरीर-संसाररूपी गाड़ी चल रही है और उधर दृष्टि रहनेसे हम देखते हैं कि हम जवान हो रहे हैं, हम बूढ़े हो रहे हैं आदि। ऐसा दीखता है कि हम जा रहे हैं पर जा रहा है शरीर। इस प्रकार शरीर-संसारको तो स्थिर मान लिया और अपनेको जानेवाला मान लिया। शरीर-संसारको स्थिर माननेसे द्वन्द्व पैदा होते हैं और द्वन्द्वोंसे मोह पैदा होता है। इस वास्ते जो द्वन्द्व-मोहसे रहित होते हैं वे दृढ़व्रती होकर भगवान‍्का भजन करते हैं—

‘ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रता:॥’

(गीता ७।२८)

राग-द्वेषादि द्वन्द्वोंसे रहित पुरुष सुखपूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है—

‘निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥’

(गीता ५।३)

‘द्वन्द्वैर्विमुक्ता: सुखदु:खसंज्ञै-

र्गच्छन्त्यमूढा: पदमव्ययं तत्॥’

(गीता १५।५)

इसलिये भगवान‍् आज्ञा देते हैं कि तुम निर्द्वन्द्व हो जाओ—

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।

निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥

(गीता २।४५)

हम निर्द्वन्द्व कब होंगे? जब शरीर-संसारको अस्थिर मानेंगे तब। अस्थिर माननेसे फिर राग-द्वेष नहीं होंगे।

अरबरात मिलिबे को निसिदिन,

मिलेइ रहत मनु कबहुँ मिलै ना।

‘भगवतरसिक’ रसिक की बातैं,

रसिक बिना कोउ समुझि सकै ना॥