प्रवचन—१३
अन्य न हो, उसको अनन्य कहते हैं। एक तरफ तो संसार है और एक तरफ भगवान् हैं। संसार और भगवान्के बीचमें जीवात्मा है। संसारमें रुचि न रहकर केवल भगवान्में रुचि होनेका नाम अनन्य भक्ति है। संसारमें भी रुचि हो और भगवान्में भी रुचि हो, यह अन्य भक्ति है, अनन्य भक्ति नहीं। संसारको भी चाहता है और भगवान्को भी चाहता है तो। ‘दुविधामें दोनों गये माया मिली न राम’; क्योंकि संसार तो टिकेगा नहीं अर्थात् स्थायीरूपसे रहेगा नहीं और भगवान्को लेते नहीं। जिसको लेते हैं, वह तो रहता नहीं और जो रहता है, उसको लेते नहीं—यह दशा है हमारी! इसलिये जो रहे उसीको ले और जो न रहे उसको न ले—यह अनन्य भक्ति है।
मनुष्य-जन्मका ध्येय महान् आनन्दको प्राप्त कर लेना और दु:खोंसे सर्वथा रहित हो जाना है। दु:ख तो वहाँ कोई पहुँचे नहीं और आनन्द, शान्ति, प्रसन्नता, खुशी आदि कोई बाकी रहे नहीं। इसके लिये गीताके छठे अध्यायका बाईसवाँ श्लोक बहुत कामका है। इसमें दो बातें बतायी गयी हैं—‘यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं तत:।’ जिस लाभकी प्राप्ति होनेके बाद उससे और कोई अधिक लाभ होगा, यह बात उसके माननेमें भी नहीं आती, और ‘यस्मिन्स्थितो न दु:खेन गुरुणापि विचाल्यते।’ वह जिसमें स्थित है, उससे कभी विचलित नहीं होता। बड़े भारी दु:खसे, बड़े भारी सन्तापसे, बड़ी भारी प्रतिकूल परिस्थितिसे वह विचलित नहीं होता। इतना ही नहीं, उसके शरीरके टुकड़े-टुकड़े कर दिये जायँ तो भी वह विचलित नहीं होता, ज्यों-का-त्यों ही मौजूद रहता है। ऐसी स्थिति प्राप्त कर लेना ही मनुष्य-जन्मका ध्येय है और इसी तत्त्वकी प्राप्तिके लिये मनुष्य-शरीर मिला है।
संसारका सुख-दु:ख तो सम्पूर्ण प्राणी भोगते ही हैं। कुत्ते-गधे भी भोगते हैं, वृक्ष भी भोगते हैं अर्थात् सभी प्राणी सुखी-दु:खी होते हैं। अगर मनुष्यने केवल सुखी-दु:खी होनेमें ही समय बिता दिया तो मनुष्य-जन्म सफल नहीं होगा। नफा हो गया, नुकसान हो गया; संयोग हो गया, वियोग हो गया; आज तो मौज हो गयी, आज तो बड़ा दु:ख हो गया; आज तो लाभ हो गया, आज तो हानि हो गयी—ऐसे थपेड़े तो सभी खाते हैं। देवताओंको देख लो, नरकोंके जीवोंको देख लो, चौरासी लाख योनिवाले जीवोंको देख लो, चाहे किसीको देख लो। अगर ऐसे थपेड़े मनुष्य भी खाता रहे तो यह मनुष्य-जन्मकी सफलता नहीं है; क्योंकि यह चीज (सुख-दु:ख आदि) तो कहीं भी, किसी भी योनिमें मिल जायगी। कुत्ता हो जाय चाहे गधा हो जाय, सूअर हो जाय चाहे ऊँट हो जाय, वृक्ष हो जाय चाहे दूब हो जाय, यह चीज सबमें मिल जायगी अर्थात् यह चीज किसी भी योनिमें दुर्लभ नहीं है, सब जगह सुलभ है। दुर्लभ चीज तो यही है कि ऐसा सुख, ऐसा आनन्द प्राप्त हो, जिसमें दु:खका लेश भी न हो और आनन्दमें कोई कमी भी न हो। ऐसे तत्त्वकी प्राप्ति करना ही मनुष्य-जन्मका ध्येय है। इसलिये मनुष्यको सबसे पहले यह पक्का विचार कर लेना चाहिये कि उस तत्त्वको प्राप्त करनेके लिये ही मैं आया हूँ और उसको प्राप्त करना ही मेरा काम है। जो अधूरा हो और नष्ट होनेवाला हो, वह मेरेको नहीं लेना है। धन कमाऊँ तो अधूरा रह जायगा और साथमें नहीं रहेगा। मान-बड़ाई प्राप्त कर लूँ तो वह भी अधूरी रह जायगी और साथमें नहीं रहेगी। विद्या, योग्यता, अधिकार, पद आदि जो कुछ भी मिलेगा, वह सब अधूरा मिलेगा और साथ रहेगा नहीं। ये अधूरी और साथमें न रहनेवाली चीजें मेरेको नहीं चाहिये। ऐसापक्का विचार हो जाय और केवल उस तत्त्वकी प्राप्ति चाहे, इसको अनन्यता कहते हैं।
पहले अपनी अहंता-(मैं-पन-) में अनन्यता होनी चाहिये कि मैं तो केवल उस तत्त्वको ही चाहता हूँ। जब अहंतामें यह चीज हो जायगी, तब अनन्य भक्ति होगी। मनुष्य यही सोचता है कि मैं काम करके कर्ता बनूँगा, भक्ति करके भक्त बनूँगा, ज्ञान प्राप्त करके ज्ञानी बनूँगा। यह बात भी ठीक है; पर ठीक होते हुए भी इसमें एक कमी है। वह कमी यह है कि ‘मैं साधन करके साधक बनूँगा’ फिर सिद्ध बनूँगा तो इसमें देरी लगेगी अर्थात् क्रियाओंके बदलनेसे भी अहंता बदलती है पर इसमें देरी लगेगी। परन्तु मैं साधक हूँ, मेरेको तो केवल उस तत्त्वको ही प्राप्त करना है, दुनिया चाहे उथल-पुथल हो जाय, मेरेको किसीसे कुछ भी मतलब नहीं, मैं तो केवल उसी एक (तत्त्व)-का ही जिज्ञासु हूँ—यह चीज जब अहंतामें आ जायगी अर्थात् जब ऐसा पक्का विचार हो जायगा तो उसकी सब क्रियाएँ अपने-आप बदल जायँगी। फिर वह कभी भी अपने ध्येयसे, उद्देश्यसे विचलित नहीं हो सकेगा। उसको लाखों-करोड़ों रुपये मिल जायँ, बड़ा आदर-सत्कार हो जाय, बड़ी वाह-वाह हो जाय, बड़ा भारी पद मिल जाय, सम्राट् बन जाय तो भी वह विचलित नहीं हो सकेगा; क्योंकि वह यही समझता है कि इनको प्राप्त करना मेरा ध्येय नहीं है। अमुक-अमुक कर्मके करनेसे स्वर्ग मिलेगा, ब्रह्मलोक मिलेगा, बड़ा भारी सुख मिलेगा—ऐसा लालच दिया जाय तो भी वह विचलित नहीं हो सकेगा; क्योंकि वह उसको चाहता ही नहीं।
जैसे आजके जमानेमें जो शुद्ध खान-पानवाले आदमी हैं, उनसे कोई यह कहे कि ‘यह मांस बहुत बढ़िया है’ तो वे यही कहेंगे कि भाई, हमें लेना नहीं है। ‘ये अण्डे बहुत बढ़िया हैं पर हमें लेना नहीं है।’
‘इस जातिकी मछली बहुत बढ़िया है’। ‘अरे! क्यों हल्ला करता है, हमें लेना ही नहीं है।’
ऐसे ही एक निश्चयवाले साधकसे कोई कहे कि ‘भाई! संसारका यह सुख बहुत बढ़िया है, आरामवाली ये चीजें बहुत बढ़िया हैं’ तो वह यही कहेगा कि ‘भाई! हम इस सुख-आरामके ग्राहक नहीं हैं। हमें यह सुख-आराम भोगना ही नहीं है’।
‘तुम ऐसा काम करोगे तो तुम्हें इतना लाभ हो जायगा, तुम्हारे पास इतना संग्रह हो जायगा, इतना रुपया इकट्ठा हो जायगा’।
‘पर हमें संग्रह करना ही नहीं है’।
‘हम तुम्हें इतना रुपया दे देंगे, इतना सोना-चाँदी दे देंगे, इतने हीरे दे देंगे, तुम्हें ऊँचा पद दे देंगे, मिनिस्टर बना देंगे’।
‘कृपा करो बाबा! हमें यह गन्दी चीज लेनी ही नहीं है।’
तात्पर्य है कि बढ़िया-घटिया जो कुछ हो, हमें लेना ही नहीं है। हमें तो एक अलौकिक परमात्मतत्त्वको लेना है। जिसको मुक्ति, कल्याण, प्रेम-प्राप्ति कहते हैं, हमें वह लेना है। जिस तत्त्वको प्राप्त करनेके बाद कुछ भी प्राप्त करना बाकी नहीं रहता और दु:ख वहाँ पहुँचता नहीं, हमें तो वह तत्त्व लेना है। और कुछ हमें लेना है ही नहीं।
‘सब ऐसे कैसे हो सकते हैं?’
ऐसे सब हो सकते हैं; क्योंकि मनुष्यमात्र उस तत्त्वका अधिकारी है। वह किसी वर्णमें हो, किसी आश्रममें हो, किसी सम्प्रदायमें हो, किसी देशमें हो, किसी वेशमें हो, कैसा ही क्यों न हो, वह उस परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिका पूरा अधिकारी है। परन्तु संसारके अधिकारी सब पूरे नहीं हैं, धनके अधिकारी सब पूरे नहीं हैं, मान-बड़ाईके अधिकारी सब पूरे नहीं हैं। हाँ, इनका थोड़ा टुकड़ा-टुकड़ा मिल सकता है पर किसीको भी पूरा नहीं मिलेगा और वह तत्त्व सबको पूरा मिलेगा, उसका टुकड़ा नहीं होगा। अन्य योनियोंमें इस तत्त्वको प्राप्त करनेकी योग्यता नहीं है। मानव-शरीरमें ही भगवान्ने वह योग्यता दी है, जिससे सभी उस तत्त्वको प्राप्त कर सकते हैं। सांसारिक पद, अधिकार आदि दोको भी एक समान नहीं मिलेगा; परन्तु पहले जो शुकदेव मुनि हुए, सनकादि हुए, ब्रह्माजी हुए, भगवान् शंकर हुए, जीवन्मुक्त ऋषि हुए, बड़े-बड़े ज्ञानी महापुरुष हुए, उनको जो तत्त्व मिला है, वही तत्त्व आज हरेक मनुष्यको मिल सकता है, मनुष्यमात्रको मिल सकता है। पर शर्त इतनी ही है कि सांसारिक सुख और संग्रहको नापसन्द कर दे कि हमें सांसारिक सुख और संग्रह लेना नहीं है। सांसारिक सुख आ जाय, संग्रह हो जाय तो क्या करे? जैसे अनजानमें मैलेपर पग चला जाय, टिक जाय और पग मैलेसे भर भी जाय तो क्या करें? तो स्नान करके साफ करो। ऐसे ही संसारका सुख-आराम मिले, रुपये, सोना, हीरे, रत्न मिलें तो समझे कि मैलेपर पग टिक गया। पर उसको हमें लेना नहीं है। हम तो केवल परमात्मतत्त्वको ही चाहते हैं। इसके सिवाय हमें कुछ भी लेना नहीं है—यह अनन्य भक्ति है।
मनुष्य-शरीर प्राप्त करके अगर धन प्राप्त कर लिया, भोग प्राप्त कर लिये, मान-बड़ाई प्राप्त कर ली, तो मनुष्य-शरीर निष्फल है। धन आदिमें ही अटक गये, यहाँकी चीजोंमें ही अटक गये तो क्या मनुष्य हुए? मनुष्यपना क्या हुआ? क्योंकि मनुष्य-शरीर बहुत दुर्लभ है—‘दुर्लभो मानुषो देह:’। सद्ग्रन्थोंमें यह मनुष्य-शरीर देवताओंके लिये भी दुर्लभ बताया है—‘बड़े भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा॥’ ऐसे मनुष्य-शरीरको प्राप्त करके फिर केवल भोग भोग ले, रुपया इकट्ठा कर ले! कितना कर लोगे! अन्तमें सब किया हुआ उद्योग गुड़-गोबर हो जायगा, कुछ भी काम नहीं आयेगा। परन्तु मनुष्य उसीमें राजी हो रहे हैं कि हम यह ले लेंगे, वह ले लेंगे। क्या ले लोगे, यह कोई लेनेकी चीज है? जिसके साथ आप नहीं रह सकते और आपके साथ वह नहीं रह सकती, इसको क्या तो लिया। धोखा हुआ है धोखा! विश्वासघात हुआ और कुछ नहीं हुआ, वह भी जानकर आपने किया। आपने अपने ही पैरोंमें आप ही कुल्हाड़ी मारी। अत: ‘सारं ततो ग्राह्यमपास्य फल्गु’ व्यर्थ छोड़कर उस सार चीजको, उस सत्य-तत्त्वको ग्रहण करना चाहिये, जिसका कभी अभाव नहीं होता। उसको प्राप्त होनेपर महासर्गमें भी पैदा नहीं होते तथा महाप्रलयमें भी व्यथित नहीं होते; सदा मस्ती, सदा मौज-ही-मौज रहती है—‘सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च’ (गीता १४। २)। उस तत्त्वकी प्राप्ति इस शरीरके रहते-रहते थोड़े-से-थोड़े समयमें हो सकती है। उसकी प्राप्तिके लिये न किसी विद्याकी जरूरत है, न किसी योग्यताकी जरूरत है। केवल अपनी चाहनाकी जरूरत है। वह चाहना ऐसी होनी चाहिये कि मेरेको सांसारिक वस्तु आदि कुछ भी मिले, तत्त्वकी प्राप्ति किये बिना मैं उसमें ठहरूँगा नहीं। मेरेको तो वही चाहिये, दूसरा कुछ भी नहीं। अब ऐसी चाहना हो जायगी, ऐसी लगन लग जायगी तो आपको उसकी प्राप्तिकी सामग्री मिल जायगी, ग्रन्थ मिल जायगा, गुरु मिल जायगा, सब मिल जायगा। परमात्माके मौजूद रहते कौन-सी सामग्री बाकी रहेगी? पर सब कुछ होते हुए भी मनुष्यको यह वहम रहता है कि थोड़ा यह काम कर लें, थोड़ा वह काम भी कर लें। यों थोड़ा करते-करते खत्म हो जाओगे भाई, मिलेगा कुछ नहीं।
हमने एक कहानी सुनी थी। एक परिवारमें ब्राह्मण, ब्राह्मणी, बेटा और बहू—ये चार प्राणी थे। लड़का जवान था पर अचानक मर गया। लड़का आँगनमें पड़ा था। लोग इकट्ठे हो गये। पर वह ब्राह्मण देवता उठकर चल दिये। लोगोंने पूछा—‘कहाँ जाते हो?’ उन्होंने कहा—‘मैं साधु होऊँगा और भजन करूँगा।’ लोगोंने कहा—‘अरे! तुम्हें दया नहीं आती इनपर। जवान लड़का मर गया है। घरमें दो स्त्रियाँ हैं बेचारी। उनका पालन-पोषण कौन करेगा।’ उन्होंने कहा—‘पीछे इनका पालन-पोषण कौन करेगा—यह चिन्ता इसने (जवान लड़केने) तो की ही नहीं और सबको छोड़कर चला गया। मैं बूढ़ा क्या चिन्ता करूँ?’ लोगोंने फिर कहा—‘महाराज! इसको उठाओ तो सही!’ वे बोले—‘इस घरमें और श्मशानमें क्या फर्क है? मेरे तो श्मशान ही घर है और घर ही श्मशान है। आप लोग इसको भले ही यहाँ रखो, वहाँ रखो, चाहे कहीं रखो। मैं तो जाता हूँ।’ ऐसा कहकर वे चट चल दिये।
बहुत पुरानी बात है। विक्रम संवत् उन्नीस सौ पचहत्तरकी होगी, ठीक याद नहीं। उस समय ‘वेदान्त-केसरी’ पत्र निकलता था। उसमें एक बात आयी थी कि बम्बईमें समुद्रके किनारे घूमते-घूमते एक आदमी किसी दीवारपर बैठ गया। इतनेमें एक जवान लड़का धोती-लोटा लेकर स्नानके लिये समुद्रके किनारे आया। उसने धोती-लोटा तो किनारेपर रख दिया और स्नानके लिये समुद्रमें उतर गया तो उतर ही गया। वह पीछे आया ही नहीं, डूब गया। लोगोंने ढूँढ़ा तो उसकी लाश मिली। अब जो आदमी दीवारपर बैठा था, उसने यह सब देख लिया। बस वह वहाँसे चल दिया, न घरवालोंसे कहा और न किसीसे कुछ कहा। उसने यही विचार कर लिया कि मरते इतनी देरी लगती है तो इस शरीरका क्या भरोसा? मैं तो भजन करूँगा। उस तत्त्वको प्राप्त करना है मेरेको।
कुछ वर्ष पहले अखबारमें एक बात निकली थी। नागपुरमें चार युवक आपसमें बातचीत कर रहे थे कि ‘कैसे साधु हो जायँ?’ तो उनमेंसे एकने कहा—‘कैसे क्या? ऐसे किया और हुआ।’ तो उन तीनोंने कहा—‘तुम बन जाओ साधु।’ उसने कहा—‘हाँ, हम भी साधु बन जायँगे और भजन करेंगे।’ उन तीनोंने फिर कहा—‘गोपीचन्द जैसे अपनी स्त्रीको ‘माँ’ कहकर भिक्षा ले आये थे, ऐसे ही तुम भी अपनी स्त्रीको ‘माँ’ कहकर भिक्षा लाओगे?’ उसने कहा—‘हाँ’ हम भी भिक्षा ले आयेंगे।’ उसने वैसा ही किया और घर जाकर अपनी स्त्रीसे कहा—‘माई! भिक्षा दो।’ यह कैसे होता है? ऐसे होता है। विचार हो गया, तो हो ही गया। अब इधर-उधर हो ही नहीं सकता। मरनेवाला क्या मुहूर्त पूछकर मरता है? ऐसे ही एक विचार कर ले कि दुनिया भला कहे या बुरा, सुख पाये या दु:ख, धन मिले या चला जाय; चाहे कुछ हो जाय, हमें तो उस तत्त्वको प्राप्त करना ही है। इसीको अनन्यता कहते हैं।
का माँगूॅँ कुछ थिर न रहाई,
देखत नैन चल्या जग जाई॥
इक लख पूत सवा लख नाती,
ता रावन घरि न दिया न बाती॥
लंका सी कोट समंद सी खाई,
ता रावनि की खबरि न पाई॥
आवत संगि न जात संगाती,
कहा भयौ दरि बाँधे हाथी॥
कहै कबीर अंतकी बारी,
हाथ झाड़ि जैसे चले जुवारी॥