प्रवचन—१४

साधक अगर ‘ऐसा होना चाहिये, ऐसा नहीं होना चाहिये’—इन दो बातोंको छोड़ दे और भगवान‍्की आज्ञाके अनुसार कार्य करता रहे तो उसको भगवान‍्की प्राप्ति हो जाय! जिसको मुक्ति कहते हैं, कल्याण कहते हैं, वह हो जाय! रामायणमें आता है—

कबहुँक करि करुना नर देही।

देत ईस बिनु हेतु सनेही॥

(७।४३।३)

बिना हेतु कृपा करनेवाले प्रभु अपनी तरफसे कृपा करके जीवको मनुष्य-शरीर देते हैं। कृपाका तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्य अपना कल्याण कर ले। मनुष्यका कल्याण हो जाय—इस भावसे भगवान‍् मनुष्य-शरीर देते हैं। अत: भगवान‍्की तरफसे तो इसके उद्धारका संकल्प हो गया। परन्तु मनुष्य ‘ऐसा होना चाहिये, ऐसा नहीं होना चाहिये’—इस बातको पकड़ लेता है और इसीसे बन्धनमें पड़ जाता है; और इसीको कामना कहते हैं।

गीताने जो कामना-त्यागकी बात कही है, उसका तात्पर्य है कि ‘ऐसा हो जाय और ऐसा न हो जाय’—ये दोनों छोड़ दें। इस तरह कामनाका त्याग करनेसे मनुष्यका संसारके साथ सम्बन्ध नहीं रहेगा और भगवान‍्की कृपासे, भगवान‍्के संकल्पसे इसका उद्धार हो ही जायगा—यह निश्चित बात है।

प्रभु स्वाभाविक बिना कारण कृपा करते हैं, किसी कारणसे नहीं—‘बिनु हेतु सनेही’। अत: भगवान‍्का यह संकल्प है कि मनुष्य अपना उद्धार कर ले। भगवान‍्का संकल्प सत्य होता है, नित्य होता है और स्वत:सिद्ध होता है। इसलिये मनुष्यको अपने कल्याणके लिये कुछ भी करना नहीं पड़ता। बस, केवल एक बात है कि मनुष्य अपनी आड़ नहीं लगाये अर्थात् ‘ऐसा होना चाहिये और ऐसा नहीं होना चाहिये’—इसको मिटा दे। फिर इसका कल्याण स्वत: हो जायगा।

ऐसा हो जाय और ऐसा न हो जाय—इससे होता कुछ नहीं। कारण कि ‘ऐसा हो जाय’—ऐसा चाहनेसे क्या ऐसा हो जाता है? और ‘ऐसा न हो जाय’—ऐसा चाहनेसे क्या ऐसा नहीं होता? एक-एक भाई-बहन इसपर विचार करके देखें कि जैसा हम चाहें, वैसा हो जाय और जो नहीं चाहें वह नहीं हो—यह बात होती नहीं। अभीतक किसीके भी मनकी बात पूरी नहीं हुई तो अब कैसे हो जायगी? आपलोग अपना-अपना जीवन देख लें कि हमने जैसा चाहा, वैसा हुआ है क्या? जो नहीं चाहा, वह नहीं हुआ है क्या? आपकी उम्रभरका है ऐसा अनुभव? अत: हमारे चाहनेसे क्या होता है? प्रभुकी प्राप्तिमें बाधा लगनेके सिवाय कुछ नहीं होता। जिसको तत्त्व-ज्ञान, जीवन्मुक्ति, भगवत्प्रेम, भगवत्प्राप्ति, कल्याण, उद्धार कहते हैं, केवल उसमें बाधा लगती है और कुछ नहीं होता।

कहते हैं ‘बात तो ठीक है पर मनमें ऐसी कामना हो जाती है, क्या करें?’ इसमें एक बात बताते हैं। जो हो जाता है, वह दोषी नहीं होता, प्रत्युत जो करते हैं वह दोषी होता है। जैसे, वर्षा हो जाय, न हो जाय तो क्या हमें उलाहना मिलता है? क्या इसमें हमारी कोई जिम्मेवारी होती है? जो स्वत: होता है, उसकी हमारेपर कोई जिम्मेवारी नहीं होती, उसका हमें कोई पाप-पुण्य नहीं लगता। अत: मनमें ‘ऐसा हो और ऐसा न हो’—ऐसा आ भी जाय तो उसकी उपेक्षा कर दें कि ‘नहीं, हमें यह कामना नहीं करनी है, हमें यह बात बिलकुल ही नहीं रखनी है।’ इसपर अगर आप दृढ़तासे टिक जायँ तो यह कामना मिट जायगी।

हमारे मनमें तो यही बात रहनी चाहिये कि ‘जैसा भगवान‍् चाहें वैसा होना चाहिये और जैसा भगवान‍् नहीं चाहें, वैसा नहीं होना चाहिये’—

मेरी चाही मत करो, मैं मूरख अज्ञान।

तेरी चाही में प्रभो, है मेरा कल्यान॥

अगर चाह हो भी जाय तो प्रभुसे कह दें कि ‘हे नाथ! मेरी चाही मत करना’। नारदजीने चाहा कि मेरा विवाह हो जाय, तो क्या विवाह हो गया? उन्होंने भगवान‍्से भी माँग लिया, तो भगवान‍्ने कहा कि ‘जैसा तुम्हारा परम हित होगा, वैसा करूँगा।’

जेहि बिधि होइहि परम हित नारद सुनहु तुम्हार।

सोइ हम करब न आन कछु बचन न मृषा हमार॥

(मानस १। १३२)

नारदजीने अपने-आपको भगवान‍्को दे रखा था; अत: उनके माँगनेपर भी भगवान‍्ने नहीं दिया। इसलिये माँगकर अपनी इज्जत क्यों खोयें; क्योंकि प्रभु तो अपनी मरजीसे करेंगे! जब वे अच्छे-से-अच्छे भक्तका कहना भी नहीं करते, तब वे हमारा कहना कैसे करेंगे? तो फिर कहना ही क्यों? कुछ भी नहीं चाहेंगे तो हमारी इज्जत रह जायगी।

जब हनुमान‍्जी सीताजीका पता लगाकर उनका सन्देश लेकर आये, तब भगवान‍्ने उनसे कहा कि ‘मैं तुम्हें क्या दूँ? देनेके लिये मेरे पास कुछ है ही नहीं; अत: मैं तुम्हारा ऋणी हूँ’। इसलिये जो भगवान‍्से कुछ नहीं चाहता, भगवान‍् उसके ऋणी हो जाते हैं। जैसे, आपको यह मालूम हो जाय कि ये महात्मा, ये पण्डितजी कुछ नहीं चाहते तो आपके मनमें भाव होगा कि इनको कुछ दे दूँ। ये हमसे कुछ ले लें—ऐसी आपकी स्वाभाविक एक रुचि होती है। ऐसे ही जो कुछ नहीं चाहता, उसका कल्याण हो जाय—ऐसी प्रभुके मनमें आती है।

एक सन्तने कहा था—यह हमारे काममें ली हुई, अनुभव की हुई बात है कि मनसे पूछे—तेरेको क्या चाहिये? मनसे उत्तर दे—कुछ नहीं। बोल, क्या चाहिये? कुछ नहीं—ऐसे बार-बार मनसे कहो तो चाहना मिट जायगी। हमें कुछ चाहिये ही नहीं; क्योंकि सबके अन्न-जलकी व्यवस्था अपने-आप होती है। हम जी रहे हैं तो जीनेकी सामग्री अपने-आप आयेगी। फिर चाहना क्यों करें? सुख मिले और दु:ख न मिले—ऐसा सब चाहते हैं पर आजतक एक भी प्राणी ऐसा नहीं हुआ, जिसको दु:ख न मिला हो और सुख-ही-सुख मिला हो। इसलिये प्रभुकी मरजीमें अपनी मरजी मिला दें। प्रभु जो कर रहे हैं, उसमें हमारा हित भरा है। ऐसा होना चाहिये और ऐसा नहीं होना चाहिये—यही बंधन है। यह न रहे तो फिर प्रभुका भजन ही होगा।

प्रभुकी मरजीमें अपनी मरजी मिला देना, अपनी कोई अलग चाह न रखना ही पूजा है। अगर अपने मनमें ‘यह हो और यह न हो’ ऐसा रहेगा तो पूजामें बाधा होगी। एक सन्त मिले थे। उन्होंने कहा कि ‘हमारी तो सदा मनचाही होती है’। दुनियामें ऐसा कोई नहीं है, जिसकी सदा मनचाही होती हो। उनसे पूछा कि ‘महाराज! आपकी सदा मनचाही कैसे होती है?’ वे बोले कि ‘हम अपनी कोई चाहना रखते ही नहीं, हमने अपनी चाहना भगवान‍्की चाहनामें मिला दी है। अब वे जो कुछ करें, उसमें हमारी भी यही चाहना है अर्थात् ऐसा हो गया तो हम भी ऐसा ही चाहते हैं; अत: जो होता है, वह हमारी चाहनाके अनुसार ही होता है।’

राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई।

करै अन्यथा अस नहिं कोई॥

(मानस १। १२८)

इसलिये साधक अपनी कोई चाहना न रखे।

ऊधौ! मन माने की बात।

दाख छोहारा छाड़ि अमृतफल,

विषकीरा विष खात॥

जो चकोर को दै कपूर कोउ,

तजि अंगार अघात।

मधुप करत घर कोरे काठ में

बँधत कमल के पात॥

ज्यों पतंग हित जान आपनो

दीपक सों लपटात।

सूरदास जाको मन जासों,

ताको सोइ सुहात॥

कहा कहौं छबि आजुकी भले बने हो नाथ।

तुलसी मस्तक तब नवै धनुष-बान लेउ हाथ॥

मुरली मुकुट दुरायकै नाथ भये रघुनाथ।

लखि अनन्यता भक्तिकी जन को कियो सनाथ॥