प्रवचन—१५ (अ)
हमलोगोंने यह समझ रखा है कि जैसे हमलोगोंमें स्त्री-पुरुषका सम्बन्ध है, वैसे ही भगवान् श्रीकृष्ण और श्रीराधामें सम्बन्ध है; पर ऐसी बात नहीं है। श्रीकृष्ण और श्रीराधाका जो प्रेम है, वह एक विलक्षण तत्त्व है। इसमें भी श्रीराधा प्रेम-तत्त्व है। जिस तरह लोभी मनुष्यके सामने एक तो होता है धन और एक होता है धनकी तरफ खिंचाव; धन प्रिय लगता है, धनमें खिंचाव होता है तो इसको लोभ कहते हैं; इसी तरह एक तो हैं भगवान् और एक है भगवान्की तरफ खिंचाव। भगवान्में जो खिंचाव है, वह श्रीराधा-तत्त्व है और जिसमें वह खिंचाव होता है, वह श्रीकृष्ण-तत्त्व है। लोभमें तो केवल मनुष्यका ही धनमें खिंचाव होता है, धनका मनुष्यमें खिंचाव नहीं होता। परन्तु प्रेममें भगवान् श्रीकृष्णका श्रीराधाजीमें और श्रीराधाजीका भगवान् श्रीकृष्णमें परस्पर खिंचाव होता है।
सामान्य स्त्री-पुरुषका जो खिंचाव होता है, उसमें और श्रीराधाकृष्णके खिंचावमें बड़ा भारी अन्तर है। स्त्री-पुरुषका खिंचाव तो अपने सुखके लिये होता है पर श्रीराधाजी और भगवान् श्रीकृष्णका खिंचाव एक-दूसरेको सुख देनेके लिये होता है, निज सुखके लिये नहीं। जहाँ निज सुखका भाव होता है, वहाँ राग होता है, कामना होती है, जो फँसानेवाली है।
थोड़े अंशमें यह बात ऐसे समझ सकते हैं कि जैसे माँका बालकमें खिंचाव होता है और बालकका भी माँमें खिंचाव होता है। बालक तो अपने लिये ही माँको चाहता है; क्योंकि वह समझता ही नहीं कि माँका हित किसमें है। परन्तु माँ केवल अपने लिये ही बालकको नहीं चाहती, वह बालकका हित भी चाहती है। परन्तु ऐसा होनेपर भी माँकी ऐसी इच्छा रहती है कि बालक बड़ा हो जायगा तो उसका ब्याह करूँगी, बहू आयेगी, सेवा करेगी, पोता होगा आदि। ऐसी उसके भीतर भविष्यके सुखकी आशा रहती है, चाहे वह इस बातको अभी स्पष्ट जाने या न जाने। परन्तु भगवान् और श्रीजीमें ऐसा भाव नहीं रहता कि भविष्यमें सुख होगा। उनको तो एक-दूसरेको सुखी देखनेमात्रसे सुख होता है। अब इस सुखको कैसे बतायें? संसारमें ऐसा कोई सुख है ही नहीं। संसारमें हमारा जो आकर्षण होता है, वह आकर्षण शुद्ध नहीं है, पवित्र नहीं है; क्योंकि वह अपने सुखके लिये, अपने स्वार्थके लिये होता है।
किसी भूखे आदमीका अन्नमें खिंचाव होता है तो इसमें दो बातें होती हैं—एक तो वह भोजन करेगा तो भोजनके पदार्थोंका नाश करेगा और दूसरे, वह भोजनके अधीन होगा अर्थात् परतन्त्र होगा; कारण कि वह भोजनकी जरूरत मानेगा, और मनुष्य जिसकी जरूरत मानता है, उसकी परतन्त्रता हो ही जाती है। धन चाहते हैं तो धनकी परतन्त्रता, कुटुम्ब चाहते हैं तो कुटुम्बकी परतन्त्रता, शरीर रखना चाहते हैं तो शरीरकी परतन्त्रता हो जाती है। चाहनेवाला स्वयं तुच्छ हो जाता है और जिसको चाहता है, उसको बड़ा मान लेता है। संसारको बड़ा मानकर उसका तो नाश करता है और स्वयं उसका गुलाम बन जाता है और अपना पतन कर लेता है।
भगवान् और श्रीजीके सम्बन्धमें उपर्युक्त दोनों ही बातें नहीं हैं। श्रीजी भगवान्की तरफ खिंचती हैं, जिससे भगवान्को आनन्द हो और भगवान् श्रीजीकी तरफ खिंचते हैं जिससे श्रीजीको आनन्द हो। एक-दूसरेके प्रति ऐसा भाव होनेसे एक-एकका प्रेम बढ़ता है। जहाँ सुख लेनेकी इच्छा होती है, वहाँ वैसा प्रेम हो ही नहीं सकता। प्रेम उसे कहते हैं, जो बढ़ता ही रहे, जिसमें मिलनेकी उत्कण्ठा बढ़ती ही रहे। श्यामसुन्दर और श्रीजी सदा मिले ही रहते हैं पर ऐसा लगता है कि मानो कभी मिले ही नहीं, आज ही नया मिलन हुआ है—‘अरबरात मिलिबे को निसिदिन, मिलेइ रहत मनु कबहुँ मिले ना।’
भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही दो रूपसे हो गये—अपने आधे अंगसे श्रीजी बन गये और आधे अंगसे श्रीकृष्ण बन गये। इस प्रकार एक भगवान् ही दोनों स्वरूप बने हैं। वे पहले भी एक हैं और पीछे भी एक हैं; केवल प्रेमका आदान-प्रदान करनेके लिये और दूसरोंको प्रेमका आस्वादन करानेके लिये ही वे दो रूप बने हैं। दो रूप बनकर वे एक-दूसरेको सुख देनेके लिये एक-एककी तरफ खिंचते हैं। वह सुख कैसा है? ‘प्रतिक्षणवर्धमानम्’ प्रतिक्षण बढ़ता ही रहता है। सांसारिक सुखका भोग होता है, वह कभी एकरूप नहीं रहता, घटता ही रहता है और घटते-घटते सर्वथा मिट जाता है। संसारका कोई भी सुख हो, कहीं भी हो, जिस किसीमें हमारी रुचि होती है, हम सुख लेते हैं तो पहले सुखकी इच्छा प्रबल होती है, फिर कम हो जाती है। उसका सेवन करते-करते फिर सुखकी इच्छा नहीं रहती। इतना ही नहीं, उस सुखसे ग्लानि हो जाती है। अत: संसारका कोई सुख ऐसा नहीं है, जो निरन्तर सुख दे सके। पर भगवान्का सुख ऐसा विलक्षण है कि वह निरन्तर बढ़ता ही रहता है, उसकी कभी तृप्ति नहीं होती।
संसारका सुख प्रतिक्षण नष्ट होता है पर श्रीजी और भगवान् श्रीकृष्णका प्रेम प्रतिक्षण बढ़ता रहता है। वह किस रीतिसे बढ़ता है? इस रीतिसे बढ़ता है कि मिले रहते हुए भी मानो कभी मिले ही नहीं। जिसको अत्यन्त भूख होती है, उसको अन्न न मिलनेकी एक उत्कण्ठा रहती है कि अन्न मिल जाय। लोभी व्यक्तिको धन न मिले तो धन मिल जाये—ऐसा एक खिंचाव होता है और धन मिलनेपर खिंचाव कम हो जाता है। परन्तु जब श्रीजी और भगवान् श्रीकृष्णका मिलन होता है तो मिलन होनेपर भी खिंचाव बढ़ता रहता है।
सन्तोंकी वाणीमें आया है—‘लाल प्रियामें भई न चिन्हारी’लाल और प्रियामें अर्थात् भगवान् श्रीकृष्ण और श्रीजीमें अभीतक पहचान ही नहीं हुई कि तुम कौन हो! जबतक धन नहीं मिलता, तबतक धनकी पहचान नहीं होती। परन्तु प्रेममें मिलन होनेपर भी पहचान नहीं होती और फिर मिले, फिर मिले—यह उत्कण्ठा रहती है। इस कारण प्रेमका आनन्द ज्ञानके आनन्दसे भी विलक्षण है। सब जगह एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा परिपूर्ण है; ऐसे परमात्मतत्त्वमें स्थित होनेपर एक अखण्ड आनन्द रहता है। वह आनन्द भी किंचिन्मात्र भी घटता नहीं। अनन्त ब्रह्मा उत्पन्न हो-होकर समाप्त हो जायँ तो भी वह ज्यों-का-त्यों रहता है। परन्तु प्रेमका आनन्द प्रतिक्षण बढ़ता ही रहता है। सन्तोंने कहा है कि चन्द्रमाकी कला बढ़ती है और बढ़ते-बढ़ते पूर्णिमा आ जाती है पर प्रेमके आनन्दमें कभी पूर्णिमा आती ही नहीं—
प्रेम सदा बढ़िबौ करै, ज्यों ससिकला सुबेष।
पै पूनो यामें नहीं, ताते कबहुँ न सेष॥
ऐसा जो प्रतिक्षण वर्धमान प्रेम है, भगवान्के प्रति खिंचाव है, उसका नाम है—श्रीराधा।
यों तो पहले कृष्णजन्माष्टमी आती है और पीछे राधाष्टमी आती है पर पहले वर्षमें श्रीजी प्रकट होती हैं और दूसरे वर्षमें भगवान् श्रीकृष्ण प्रकट होते हैं। इस कारण श्रीजी साढ़े ग्यारह महीने बड़ी हैं और पीछे अवतार लेनेसे भगवान् श्रीकृष्ण छोटे हैं। तात्पर्य यह हुआ कि पहले भगवान्का खिंचाव होता है और पीछे भगवान् प्रकट होते हैं। भक्तलोग भी पहले नाम-जप करते हैं, कीर्तन करते हैं और पीछे उनकी उत्कण्ठा होती है। ऐसे ही सत्संग करते-करते सत्संगमें एक रस पैदा होता है, सत्संगमें खिंचाव होता है, वह भी बढ़ता रहता है। सुबह इतनी जल्दी और वर्षामें भी लोग सत्संगके लिये इकट्ठे हो जाते हैं, यह क्या है? यह उनका सत्संगमें खिंचाव है। सत्संगकी बातें प्रिय लगती हैं और बार-बार खिंचाव होता है। इससे आगे चलकर प्रेमकी प्राप्ति होती है। इसीलिये पहले श्रीजी प्रकट होती हैं और फिर श्रीभगवान् प्रकट होते हैं। रामायणमें आया है—
हरि ब्यापक सर्बत्र समाना।
प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥
(मानस १। १८४। ३)
देवताओंसहित ब्रह्माजी आपसमें विचार करते हैं कि भगवान् कहाँ मिलेंगे तो कोई कहते हैं कि भगवान् क्षीरसागरमें मिलेंगे, कोई कहते हैं कि गोलोकमें मिलेंगे और कोई कहते हैं कि वैकुण्ठमें मिलेंगे। पार्वतीजीको रामायण सुनाते हुए भगवान् शंकर कहते हैं कि उस सभामें मैं भी था तो मैंने यह कहा कि भगवान् श्रीहरि किसी एक जगह ही रहते हों, यह बात नहीं है। वे तो सब जगह समानरूपसे मौजूद हैं पर प्रेम होनेपर ही प्रकट होते हैं। फिर कहा—
अग जगमय सब रहित बिरागी।
प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी॥
(मानस १। १८४। ४)
जैसे दियासलाई-घर्षण करते ही अग्नि प्रकट हो जाती है। दियासलाईमें अग्नि तो पहले भी थी। पहले नहीं होती तो प्रकट कैसे होती? अत: दियासलाईमें अग्नि है पर प्रकट नहीं है। ऐसे ही भगवान् सब जगह हैं और परिपूर्ण हैं पर वे प्रकट नहीं हैं। वे प्रकट कब होते हैं? जैसे दियासलाईको रगड़ लगती है तो उससे अग्नि प्रकट हो जाती है, ऐसे ही जब प्रेमरूप रगड़ लगती है अर्थात् भगवान्का चिन्तन करते-करते प्रेम हो जाता है तो उससे भगवान् प्रकट हो जाते हैं।
आजु जो हरिहिं न सस्त्र गहाऊँ।
तौ लाजौं गंगा जननीको,
सांतनु सुत न कहाऊँ॥
स्यंदन खंडि महारथ खंडौं,
कपिध्वज सहित डुलाऊँ।
इतो न करौं सपथ मोहि हरिकी,
छत्रिय गतिहिं न पाऊँ॥
पांडव-दल सनमुख ह्वै धाऊँ,
सरिता रुधिर बहाऊँ।
सूरदास रनभूमि बिजय बिनु,
जियत न पीठ दिखाऊँ॥