प्रवचन—१५ (ब)

सत्संग करते-करते सत्संगमें, भगवन्नाममें, भगवत्सम्बन्धी बातोंमें, भगवद‍्गीता आदि ग्रन्थोंमें एक खिंचाव होता है, प्रियता होती है। तभी तो वर्षामें भी लोग इतनी जल्दी सत्संग करनेके लिये आ जाते हैं। बिना खिंचाव, प्रियताके कोई आ नहीं सकता। हठसे कोई क्रिया ज्यादा देर नहीं की जा सकती। यह जो इस प्रकार मनका खिंचाव है, यह श्रीजीका अवतार है। श्रीजी प्रकट हो जायँगी तो भगवान‍् श्रीकृष्ण भी प्रकट हो जायँगे। भगवान‍्में खिंचाव पहले होता है और पीछे भगवान‍् प्रकट होते हैं।

संसारमें खिंचाव पहले-पहले तो बढ़िया लगता है पर आगे जाकर उसकी पोल निकल जाती है। किसी भोगको भोगते समय पहले तो उसमें खिंचाव होता है पर बादमें कम होते-होते मिट जाता है। जैसे, भोजन करने बैठे तो जबतक भोजन नहीं मिलता, तबतक जैसी प्रियता होती है, भोजन मिलनेपर वैसी प्रियता नहीं रहती। एक-एक ग्रास लेते हैं तो पहले ग्रासमें जो रस आता है, वह रस दूसरे ग्रासमें नहीं आता। ऐसे एक-एक ग्रासमें रस कम होते-होते अन्तमें वह मिट जाता है। एक साधुकी ऐसी ही बात सुनी है। वे शहरके बाहर एकान्तमें रहते थे और भिक्षा माँगकर अपना निर्वाह करते थे। भीतर रागके संस्कार बड़े विलक्षण होते हैं। सब कुछ छोड़कर भजनमें लगनेवालोंमें भी राग रह जाता है। पर ज्यों-ज्यों भगवान‍्में प्रेम बढ़ता है, ज्यों-ज्यों ज्ञान बढ़ता है, त्यों-त्यों वह राग मिटता जाता है। उन साधुको राग बड़ा तंग करने लगा। उनके मनमें आती कि भिक्षामें रूखी-सूखी रोटी मिलती है, साग-दाल भी पूरी नहीं मिलती और खीर तो मिलती ही नहीं।

खीर खानेकी बार-बार मनमें आने लगी तो वे एक श्रद्धालु हलवाईके यहाँ गये। उसकी उनमें बड़ी श्रद्धा-भक्ति थी कि ये सन्त बड़े त्यागी महात्मा हैं। उससे कहा कि ‘भैया! आज हम भिक्षामें केवल खीर लेंगे, आज तो खीर बनाओ। वह बड़ा ही खुश हुआ कि महाराज तो मिठाई देनेपर भी नहीं लेते हैं, दूध भी नहीं लेते हैं, रूखी-सूखी रोटी खाते हैं, आज तो मैं बड़ा भाग्यशाली हूँ! उसने बड़ी खुशीसे बढ़िया खीर बनायी। नौजा, पिस्ता, इलायची और मीठा डालकर खूब औटाकर सुगन्धित खीर बनायी और महाराजसे कहा कि पाओ। बाबाजीने कहा कि इसे ठण्डी कर दो। उसने ठण्डी करके बाबाजीको खप्परमें दे दी। खप्पर काफी बड़ा था, उसे भर दिया।

पहले जो उत्कण्ठा थी कि खीर मिलेगी, अब मिलनेपर उतना खिंचाव नहीं रहा। खीर खाने लगे तो जो उसमें प्रियता थी, वह खाते-खाते कम होने लगी। फिर भी वे खाते ही रहे। अपने मनमें कहने लगे कि आज खूब खीर पी लो, बहुत दिनोंसे खीर खानेकी मनमें आ रही है। ज्यादा खीर पीनेसे उलटी हो गयी तो उसे खप्परमें ही भर लिया। अब उसी उलटीवाली खीरको फिर पी गये तो ऐसी उलटी हुई कि सारी खीर निकल गयी! अब तो उम्रभरके लिये खीरसे अरुचि हो गयी। खीरका नाम लेते ही रोंगटे खड़े हो जाते।

ऐसा कोई भोग है ही नहीं, जिससे अरुचि न होती हो पर भगवान‍्के प्रेममें कभी रुचि कम होती ही नहीं। जबतक भोगोंमें आसक्ति रहती है, तबतक भगवान‍्में रुचि नहीं होती। भगवान‍्में रुचि हो जाती है तो फिर हो ही जाती है। फिर अरुचि कभी हो ही नहीं सकती। लोग कहते हैं कि भगवान‍्में मन नहीं लगता। संसारकी आसक्ति होनेसे ही भगवान‍्में मन नहीं लगता। जब मन भगवान‍्में लग जायगा तो फिर वहाँसे कभी अलग नहीं होगा। जैसे मक्खी हरेक चीजपर बैठ जाती है पर अंगारपर नहीं बैठती। अगर अंगारपर बैठ जाय तो फिर वह उठेगी नहीं। फिर तो धुआँ ही उठेगा! इसी तरह यह मन भगवान‍्में लग जाय तो फिर वहाँसे हटेगा नहीं; क्योंकि ऐसा विलक्षण आनन्द और कहीं है ही नहीं। इससे बढ़कर दूसरा कोई लाभ है ही नहीं—‘यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं तत:’ (गीता ६। २२)।

मीराबाईने कहा है—

अब छोडूँ तो छूटे नाहिं, भई छूँ नागर नट की।

हिरदे में वह बस गयी राणा, लटक मुकुट की।

अब तो लागी गोविन्दासे प्रीत राणा पहले क्यों नहिं अटकी॥

अब श्यामसुन्दरको छोड़ना मेरे वशकी बात नहीं है। छोड़ना चाहूँ तो भी छूटता नहीं। क्यों नहीं छूटता? कारण कि यह परमात्माका अंश है। परमात्माका सुख मिलनेपर कैसे छूट सकता है! वह तो असली अपना है पर यह संसार अपना नहीं है। मैं बहुत बार कहा करता हूँ कि भाई! यह शरीर आपका नहीं है; और संसार आपका नहीं है क्योंकि ये सदा नहीं रहते, पर आप सदा रहते हैं। आप थोड़ी कृपा करें कि इनको अपना मत मानें और अपने लिये मत मानें। यह जो शरीर और संसारकी सामग्री है, यह केवल दूसरोंकी सेवा करनेके लिये मिली है, दूसरोंको सुख पहुँचानेके लिये मिली है। यह अपनी नहीं है और अपने लिये नहीं है। आप चेतन हैं, यह जड आपके लिये कैसे होगा? आप नित्य रहनेवाले हैं, यह अनित्य आपके साथ कैसे रहेगा? न इनके साथ आप रह सकते हैं और न ये आपके साथ रह सकते हैं। भगवान‍् आपसे अलग नहीं हो सकते और आप भगवान‍्से अलग नहीं हो सकते। आप भूलसे संसारके सम्मुख और भगवान‍्से विमुख हो जाते हैं पर फिर भी आप भगवान‍्से अलग नहीं हो सकते।

सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।

जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥

(मानस ५। ४३। १)

भगवान‍्के सम्मुख होनेपर सब पाप-ताप मिट जाते हैं। अब हम भगवान‍्के सम्मुख होने लगे हैं—इसकी पहचान यह है कि सत्संगमें कुछ रस आने लगा है। अगर भगवान‍्में तल्लीन हो जायँ तो भगवान‍्का अलौकिक प्रेम होगा। इस प्रेमका स्वरूप हैं श्रीराधाजी! श्रीराधाजी प्रेमका अवतार हैं।

एक ऐसी कथा सुनी है कि गोपिकाओंसे एक बार श्रीजी कहती हैं कि ‘अरी सखियो! तुम मुझे कन्हैयाके दर्शन करा दो, नन्दनन्दनके दर्शन करा दो।’ गोपिकाएँ समझती हैं कि यह बनावटी बात कह रही हैं; क्योंकि यह तो सदा ही श्यामसुन्दरको देखा करती हैं। गोपिकाओंने विचार किया कि अब जब कभी यह श्यामसुन्दरको देखती हुई मिलेंगी तो जाकर पकड़ लेंगी। एक दिनकी बात है कि श्रीजी जल भरने गयीं तो वहाँ श्यामसुन्दरकी तरफ दृष्टि जाते ही जल भरना भूल गयीं और ज्यों-की-त्यों खड़ी रह गयीं। गोपिकाओंने देखा कि आज श्रीजी और श्यामसुन्दर दोनों ही खड़े हैं तो आपसमें कहने लगीं कि आज श्रीजीको पकड़ो। वे श्रीजीके पास जाकर बोलीं कि ‘आप तो कहती हैं कि मुझे श्यामसुन्दरके दर्शन करा दो तो आज क्या कर रही हो? किसके दर्शन कर रही हो?’ श्रीजी आश्चर्यसे कहने लगीं कि ‘सखी! क्या तुम्हारेको श्यामसुन्दरके दर्शन हुए हैं?’ अब वे सब गोपिकाएँ हँसने लगीं कि ‘तुमने भी तो श्यामसुन्दरको सामने खड़ा देखा था’। श्रीजी बोलीं कि ‘मेरी दृष्टि तो उनके कुण्डलकी झलकपर ही लग गयी, इस कारण प्यारेके दर्शन कर ही नहीं सकी! तुम बड़ी भाग्यशालिनी हो, बड़ी श्रेष्ठ हो, जो तुम्हारेको श्यामसुन्दरके दर्शन हुए हैं’।

प्रेममें प्रेमास्पदके जिस अंगमें दृष्टि लग जाती है, वहाँ लग ही जाती है। श्रीजीकी दृष्टि भगवान‍्के कुण्डलमें लग गयी तो उसे वहाँसे हटाकर मुखकी तरफ ले जाना मुश्किल हो गया! अब कौन देखे उधर! कुण्डलकी आभामात्र देखकर वे वहीं मुग्ध हो गयीं। इस कारण श्रीजी कहती हैं कि ‘श्यामसुन्दरके दर्शन नहीं हो रहे हैं, उनके दर्शन कराओ!’ ऐसी जो भगवद्दर्शनकी उत्कट अभिलाषा है, उसका नाम है श्रीजी। राधाष्टमीके दिन वे हमलोगोंके सामने प्रकट हुई हैं, जिससे हम भी प्रेमका वह विलक्षण सुख ले सकें।

भगवान‍्की कैसी विलक्षण लीला है कि प्रेम-तत्त्वको समझानेके लिये वे स्वयं श्रीकृष्ण और श्रीजीके रूपसे प्रकट हुए। अगर भगवान‍् चाहते तो दो मित्ररूपसे, पुरुषरूपसे प्रकट हो जाते अथवा दो स्त्रीरूपसे प्रकट हो जाते पर इससे लोग प्रेम-तत्त्वको समझ नहीं सकते थे। स्त्रीका पुरुषमें और पुरुषका स्त्रीमें जो आकर्षण होता है, उस आकर्षणको शुद्ध बनानेके लिये भगवान‍् पुरुष—श्रीकृष्ण और स्त्री श्रीराधाके रूपमें प्रकट हुए। हमलोगोंका जो आकर्षण है, वह अशुद्ध है, निकृष्ट है; क्योंकि वह अपने सुखके लिये है और मिटनेवाला है पर यह बात श्रीजी और श्रीकृष्णमें नहीं है।

हमलोगोंकी सत्संगमें, भजन-ध्यानमें जो यत्किंचित् रुचि है, यह उस प्रेमको समझनेका कुछ नमूना है। यह रुचि अधिक बढ़ जायगी तो यह श्रीजीका स्वरूप अर्थात् प्रेमरूप हो जायगी। तब भगवान‍्में ही तल्लीन हो जानेसे प्रेमका विलक्षण आनन्द मिलेगा, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।