प्रवचन—१६

मनुष्य-शरीर विवेक-प्रधान है। विवेकका अर्थ होता है—सार और असारको, कर्तव्य और अकर्तव्यको ठीक-ठीक जानना। उस विवेकको काममें लें। मनुष्य विवेकको काममें नहीं लेता, विवेकका विशेष आदर नहीं करता, इससे मनुष्य दु:ख पाता है। अगर विवेकको ठीक-ठीक मानकर उसके अनुसार चले, तो वह निहाल हो जाय। इस विवेकको जाग्रत् करनेके लिये सत्-शास्त्र हैं, सत्पुरुष हैं, गुरु हैं, माता-पिता आदि हैं। इनके ऊपर जिम्मेवारी है और ये विवेकको जाग्रत् करते हैं। उस विवेकसे जाननेकी एक खास बात है, उसपर आप ध्यान दें।

साधारण दृष्टिसे रुपये बहुत बड़ी चीज दीखते हैं और हैं भी; क्योंकि रुपयोंसे सब चीजें आती हैं। हम बहुत-सी चीजें रुपयोंसे खरीद लेते हैं और उनसे हमारा काम चलता है। इस वास्ते जीवनके लिये रुपये बड़ी चीज दीखते हैं।

हम जो जी रहे हैं, यह जीना हमें बहुत अच्छा लगता है। दु:खी-से-दु:खी प्राणी भी जल्दी मरना नहीं चाहता। अत: जीनेके लिये अन्न, जल, वस्त्र आदि वस्तुएँ उपयोगी हैं। हमारा जीवन-निर्वाह हो जाय, हमारे प्राण बने रहें—इसके लिये वस्तुओंकी आवश्यकता है। उन वस्तुओंके लिये ही रुपयोंकी आवश्यकता है। रुपयोंके लिये वस्तुओंकी आवश्यकता नहीं है। हाँ, वस्तुओंसे रुपये पैदा हो सकते हैं; परन्तु रुपयोंसे वस्तुएँ बहुत ऊँची हैं, जिनसे हमारा जीवन रहता है। वस्तुओंका उपार्जन होता है। रुपये तो अन्न, वस्त्र आदि वस्तुओंके लेन-देनमें काम आते हैं। अत: रुपयोंसे वस्तुएँ बहुत मूल्यवान् हैं।

वस्तुओंसे भी बहुत मूल्यवान् हैं—प्राणी, मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष। ये बहुत कामके हैं। इनके पालनसे ही हमें जीवनोपयोगी वस्तुएँ मिलती हैं। अत: जिनसे जीवन चले, वे जीनेवाले प्राणी श्रेष्ठ हैं। उन प्राणियोंके लिये ही वस्तुएँ हैं। प्राणियोंमें भी मनुष्य श्रेष्ठ है; क्योंकि दूसरे जितने प्राणी हैं, वे अपने पुराने कर्मोंके फल भोगते हैं और फल भोगकर शुद्ध होते हैं। परन्तु मनुष्यमें दो बातें हैं—एक तो पुराने पापों और पुण्योंके फल भोगना और एक आगे अपने उद्धारके लिये काम करना। अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितिका उपभोग करना और उनसे सुखी-दु:खी होना पशुओंमें भी है। सुख पानेका और दु:ख मिटानेका उद्योग पशु भी अपनी बुद्धिके अनुसार करते हैं। परन्तु आगे (भविष्यमें) क्या होगा—इसका ठीक तरहसे विचार करनेमें पशु-पक्षी समर्थ नहीं हैं पर मनुष्य समर्थ है। मनुष्य विवेक-प्रधान है, इस वास्ते हमारा हित किस बातमें है और अहित किस बातमें है? हमारा उत्थान किस बातमें है और पतन किस बातमें है? सार क्या है और असार क्या है? नित्य क्या है और अनित्य क्या है? सत्य क्या है और असत्य क्या है?—इन सब बातोंको जाननेकी योग्यता मनुष्यमें है, पशु-पक्षियोंमें नहीं है। अत: मनुष्योंमें भी विवेक मूल्यवान् है। जो विवेकके अनुसार चलते हैं, वे मनुष्योंमें श्रेष्ठ हैं। विवेक श्रेष्ठ है, इसलिये विवेकका आधार लेकर चलनेवाले भी श्रेष्ठ हैं। विवेक किसलिये है? विवेक इसलिये है कि हितकारक काम करे और अहितकारक काम न करे, सारको ग्रहण करे और असारका त्याग करे, इससे वर्तमानमें और भविष्यमें भी सुख हो, दु:ख न हो—ऐसा काम करे।

जब मनुष्य वस्तुओंका और रुपयोंका आदर ज्यादा करने लग जाते हैं, तब यह विवेक दब जाता है। भगवान‍्ने गीतामें तीन तरहकी बुद्धि बतायी है। जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्तिको, कर्तव्य और अकर्तव्यको ठीक-ठीक जानती है, वह सात्त्विकी होती है (गीता १८। ३०)। जो बुद्धि धर्म और अधर्मको, कर्तव्य और अकर्तव्यको ठीक-ठीक नहीं जानती, वह राजसी होती है (गीता १८। ३१)। जो बुद्धि अधर्मको धर्म मान लेती है और इस प्रकार सब चीजोंको उलटा ही मान लेती है, वह तामसी होती है (गीता १८। ३२)। सात्त्विकी बुद्धि थोड़े मनुष्योंमें ही होती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि दूसरे मनुष्योंमें सात्त्विकी बुद्धि होती ही नहीं। सात्त्विकी बुद्धिको ठीक-ठीक काममें लानेवाले मनुष्य थोड़े हैं। राजसी बुद्धिवाले मनुष्य बहुत हैं। तामसी बुद्धिवाले मनुष्य तो इस कलियुगमें और भी अधिक हैं, जिन्हें उलटा ही दीखता है। उलटा दीखना क्या हुआ? वस्तुओं और प्राणियोंसे भी बढ़कर रुपयोंको मान लिया। वे रुपयोंका ही संग्रह करते हैं। रुपयोंके लिये झूठ, कपट करना पड़े, चोरी करनी पड़े, डाका डालना पड़े, मारपीट करनी पड़े, हत्या करनी पड़े तो वह भी करनेके लिये तैयार हो जाते हैं। रुपये इकट्ठे करनेके लिये गायोंको भी मारने लगते हैं। यह बिलकुल तामसी बुद्धि है। रुपये कमाना और उनकी रक्षा करना तामसी नहीं है, किन्तु सत्-असत् का, नित्य-अनित्यका, हित-अहितका विचार छोड़कर झूठ, कपट, बेईमानी, चोरी आदि करके किसी तरहसे रुपये इकट्ठा करना महान् तामसी बुद्धि है। इससे क्या होगा? रुपयोंका आदर ज्यादा होगा। इससे आगे चलकर रुपये वस्तुओंके लिये नहीं रहते, अपितु संख्या बढ़ानेके लिये हो जाते हैं। हजार हो जाय तो लाख, लाख हो जाय तो करोड़, इस तरह अरबों-खरबों रुपये बढ़ते ही जायँ। वे यह नहीं सोचते और न सोच ही सकते हैं कि इतने रुपये बढ़ाकर क्या करेंगे? न अच्छे आचरणोंकी तरफ विचार है, न व्यक्तियोंकी तरफ विचार है, न वस्तुओंकी तरफ विचार है; बस केवल रुपये कमाना और इकट्ठे करना।

रुपयोंको खर्च करना और रुपयोंकी संख्या बढ़ाना—ये दो भाग हैं। इसमें खर्चका भाग ही अपने और दूसरोंके काम आता है। जो संग्रहका भाग है, वह अपनेमें तो अभिमान बढ़ाता है और दूसरोंमें दरिद्रता फैलाता है। संग्रहसे प्रमाद होते हैं, लड़ाई-दंगे होते हैं। जितने भी दुर्गुण-दुराचार हैं, वे सब-के-सब रुपयोंकी संख्या बढ़ानेकी दृष्टिसे आते हैं। मनुष्य रुपयोंसे बड़ा माना जाता है; परन्तु लोगोंके हृदयमें उसका आदर नहीं होता। हृदयमें सब उसका निरादर और तिरस्कार करते हैं। रुपयोंके कारण दबकर दूसरे मुँहसे कुछ न बोलें, यह बात अलग है पर हृदयमें भाव अच्छा नहीं होता।

विवेकसे भी ऊँचा है—सत्य-तत्त्व। जो सत्य (परमात्मतत्त्व)-की प्राप्तिमें लग जाते हैं, वे सबसे ऊँचे हो जाते हैं। सत्यकी तरफ चलनेवालेका सब आदर करते हैं। साधारण लोग भी आदर करते हैं, धनी लोग भी आदर करते हैं, ऋषि-मुनि, सन्त-महात्मा भी आदर करते हैं। और तो क्या, सत्यकी तरफ चलनेवालेका भगवान‍् भी आदर करते हैं। अत: सत्य सबसे बड़ा हुआ। उस सत्यकी प्राप्तिके लिये ही विवेक है, विवेकके लिये ही मनुष्य है, मनुष्योंके लिये ही वस्तुएँ हैं और वस्तुओंके लिये ही रुपये हैं। रुपये अधिक बढ़नेसे फायदा नहीं है, वस्तुओंके अधिक बढ़नेसे फायदा है।

मनुष्य विवेकप्रधान है। उसके लिये यह विशेषरूपसे उचित है कि वह विवेकका आदर करे और विवेकसे श्रेष्ठ जो सत्य-तत्त्व है, उसकी प्राप्तिमें अपना समय लगाये, बुद्धि लगाये और उसीको प्राप्त करे; तो फिर मरनेके बाद भी दु:ख नहीं होगा। रुपये, वस्तु, व्यक्ति आदि सब यहीं रह जायँगे, साथ नहीं चलेंगे पर सत्य पीछे नहीं रहेगा, उसकी प्राप्ति हो जायगी और सदाके लिये शान्ति हो जायगी।

जो सत्य-तत्त्व है, उसीको परमात्मा कहते हैं। जो सर्वथा सत्य है, जिसका कभी विनाश नहीं होता, ऐसे अविनाशी तत्त्वको प्राप्त करना ही मनुष्यका खास ध्येय है, लक्ष्य है। उसको प्राप्त कर लिया तो मनुष्यजन्म सफल हो गया। अगर उसको प्राप्त नहीं किया तो मनुष्यजन्म सफल नहीं हुआ।

खाना-पीना आदि तो कुत्ते, सूअर और गधे भी करते हैं। इसकी कोई विशेष महिमा नहीं है। विशेष महिमा तो परमात्मतत्त्वको प्राप्त करनेमें ही है, जिसमें हमारा और दुनियाका बड़ा भारी हित है। गोस्वामी तुलसीदासजी-जैसे जो अच्छे-अच्छे महात्मा हो गये हैं, उन्होंने अपना भी कल्याण किया और दुनियाका भी कल्याण किया। उनकी वाणीसे आज भी दुनियाका कल्याण होता है। ऐसे उपकार कोई धनी-से-धनी व्यक्ति भी नहीं कर सकता। अत: सत्यकी प्राप्तिका ही उद्देश्य मुख्य रहना चाहिये। रुपये भी सत्यकी तरफ लगें, वस्तुएँ भी सत्यकी तरफ लगें, मनुष्य भी सत्यकी तरफ लगें और विवेक भी सत्यकी तरफ लगे, तब तो उन्नति है। परन्तु परमात्माकी परवाह न करके नाशवान् पदार्थोंकी परवाह की जाय और पदार्थोंसे भी अधिक रुपयोंको पैदा करने और संग्रह करनेको महत्त्व दिया जाय, तब तो पतन-ही-पतन है।