प्रवचन—१
साधकके लिये खास बात है—पराधीनतासे रहित होना। शरीर, रुपये, व्यक्ति, देश, काल आदिकी आवश्यकताका अनुभव करना ही पराधीनता है। जिसके पास अधिक रुपये, विद्या, बुद्धि, बल आदि हैं, वह संसारकी अधिक सेवा कर सकता है—यह वहम हृदयसे बिलकुल उठा देना चाहिये। साधकके पास जितने रुपये, विद्या, शक्ति आदि हैं, उतनेसे ही वह संसारकी बड़ी-से-बड़ी सेवा कर सकता है। जो अपने पास नहीं है, उसे देनेकी जिम्मेवारी नहीं है। परमात्माकी प्राप्ति वस्तुसे नहीं, त्यागसे होती है।
उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंकी आवश्यकताका अनुभव करना और उनके आश्रयसे अपनी उन्नति मानना महान् भूल है। साधकको कभी स्वप्नमें भी उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंका आश्रय नहीं लेना चाहिये। पासमें जो धन, जमीन, मकान, परिवार आदि हैं, उनके रहते हुए ही अन्त:करणसे उनकी आवश्यकताका मूलोच्छेदन कर देना चाहिये। ऐसा करनेसे साधककी उन्नति स्वत:सिद्ध है।
उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंका आश्रय लेना, उनकी अधीनता स्वीकार करना योगमार्ग, ज्ञानमार्ग और भक्तिमार्ग—तीनों ही मार्गोंमें महान् बाधक है। जीव स्वयं नित्य परिपूर्ण निर्विकार परमात्माका चेतन अंश होते हुए भी यदि उत्पत्ति-विनाशशील जड वस्तुओंकी आवश्यकताका अनुभव करता है तो वह परमात्माको जान ही कैसे सकता है? अत: धनादि जड वस्तुएँ हमारी हैं और हमारे लिये आवश्यक हैं—यह भाव साधकको मनसे ही उठा लेना चाहिये।
मनुष्यके भीतर यह भाव रहता है कि जो वस्तु, परिस्थिति, योग्यता आदि अभी नहीं है, वह मिल जाय तो मेरी उन्नति हो जायगी। वह उत्पत्ति-विनाशशील जड वस्तुओंकी प्राप्तिमें ही अपनी उन्नति मानता है। जैसे, उसके पास धन नहीं है, तो धन कमाकर लखपति-करोड़पति बननेपर वह सोचता है कि मैंने बड़ी भारी उन्नति कर ली है, वह पढ़ा-लिखा नहीं है तो पढ़-लिखकर विद्वान् बन जानेपर सोचता है कि मैंने बड़ी भारी उन्नति कर ली, इत्यादि। वास्तवमें यह उन्नति नहीं है, अपितु महान् अवनति (पतन) है। जो वस्तु पहले नहीं थी, वह बादमें भी नहीं रहेगी। स्वयं नित्य-निरन्तर रहनेवाला होनेपर भी अनित्य वस्तुओंकी प्राप्तिमें अपनी उन्नति मानना अपने साथ महान् धोखा करना है। जो सदासे है और सदा रहेगा, उस अविनाशी परमात्माको प्राप्त करनेमें ही मनुष्यकी वास्तविक उन्नति है। जो वस्तु अभी नहीं है, उसे प्राप्त कर भी लेंगे तो वह कबतक हमारे साथ रहेगी। जो अभी नहीं है, वह अन्तमें भी ‘नहीं’ में ही परिणत होगी। ऐसी उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंको प्राप्त करके अपनेमें बड़प्पनका अनुभव करना ही उनके अधीन (पराधीन) होना है।
दूसरी खास बात यह है कि अपनेमें सद्गुण-सदाचारोंकी कमी दीखनेपर भी साधक ऐसा कभी न माने कि मुझमें सद्गुण-सदाचारोंका अभाव है। सद्गुण-सदाचार ‘सत्’ हैं और दुर्गुण-दुराचार ‘असत्’ हैं। ‘असत्’ की तो सत्ता नहीं होती और ‘सत्’ का कभी अभाव नहीं होता—‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:।’ (गीता २।१६)। उत्पत्ति-विनाशशील असत् का संग करनेके कारण ही सत् प्रकट नहीं होता। अस्वाभाविक असत् (दुर्गुण-दुराचार)-का त्याग कर दें, तो सत् (सद्गुण-सदाचार) स्वत:सिद्ध हैं। सत् से विमुख हुए हैं, उसका अभाव नहीं हुआ है। असत् (दुर्गुण-दुराचारों)-का त्याग करनेका उपाय यह है कि साधक इन्हें अपनेमें कभी न माने। वास्तवमें ये हमारेमें हैं ही नहीं, रह सकते ही नहीं। शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और प्राण भी पहले हमारे साथ नहीं थे और न ही आगे हमारे साथ रहेंगे। कारण कि ये सब उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तुएँ हैं और हम स्वयं अविनाशी परमात्माके अंश हैं—‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५।७)। जड वस्तुएँ बदलती और आती-जाती हैं जबकि स्वयं (आत्मा) कभी नहीं बदलता और सदैव ज्यों-का-त्यों रहता है। केवल प्रकृतिके अंशको पकड़नेसे यह सर्वथा स्वाधीन होते हुए भी पराधीन हो जाता है और जन्म-मरणके बन्धनसे बँध जाता है। गीतामें आया है—
पुरुष: प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥
(गीता १३। २१)
‘प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही प्रकृतिजन्य त्रिगुणात्मक पदार्थोंको भोगता है और इन गुणोंका संग ही इस जीवात्माके अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म लेनेका कारण है।’
तीसरी खास बात यह है कि आध्यात्मिक उन्नतिमें सांसारिक वस्तु, योग्यता आदिकी बिलकुल आवश्यकता नहीं है। धन, सम्पत्ति, वैभव, पद, अधिकार, विद्या आदिकी अधिकता होनेसे आध्यात्मिक उन्नति अधिक होगी और इनकी कमी होनेसे आध्यात्मिक उन्नति कम होगी—ऐसी बात बिलकुल नहीं है; क्योंकि सांसारिक वस्तु चाहे अधिक हो या कम, उससे सम्बन्ध-विच्छेद करना है अर्थात् उसकी कामना और ममताका त्याग करना है। चाहे लाखों-करोड़ों रुपये हों, चाहे पाँच रुपये हों और चाहे कुछ भी न हो, भीतरसे उनकी कामनाका ही त्याग करना है। त्याग करनेमें सभी समान हैं। अमुक व्यक्तिने बहुत त्याग किया और अमुक व्यक्तिने थोड़ा त्याग किया तो इससे त्यागमें क्या फर्क पड़ा? त्याग तो दोनोंका समान ही है। अधिकका त्याग करनेकी अपेक्षा कमका त्याग करनेमें सुगमता भी होगी। बोलने-बोलनेमें फर्क है? पर न बोलनेमें क्या फर्क? सोचने-सोचनेमें फर्क है पर न सोचनेमें क्या फर्क? देखने-देखनेमें फर्क है, पर न देखनेमें क्या फर्क? दो आदमी काम करें तो करनेमें फर्क होगा, पर न करनेमें क्या फर्क? तात्पर्य यह कि सांसारिक वस्तुओंके रहते हुए तो फर्क है पर उनका त्याग करनेमें कोई फर्क नहीं। किसीके पास धन, जमीन, मकान आदि अधिक हैं और किसीके पास ये कम हैं, पर इनसे रहित होनेमें सब बराबर हैं। जीनेमें कई फर्क हैं पर मरनेमें कोई फर्क नहीं, चाहे मनुष्य मरे या पशु-पक्षी। अतएव हमारे पास धन-सम्पत्ति कम है, विद्या कम है, योग्यता कम है, इसलिये हम पारमार्थिक उन्नति नहीं कर सकते—यह धारणा बिलकुल गलत है।
जडतासे सम्बन्ध-विच्छेद करनेपर ही चिन्मयताकी प्राप्ति होती है। वास्तवमें चिन्मयता (परमात्मतत्त्व)-की प्राप्ति सभीको स्वत:सिद्ध है पर जडता (उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओं)-को महत्त्व देनेसे हम चिन्मयतासे विमुख हुए हैं। अत: जडतासे विमुख होकर परमात्माके सम्मुख होना है। हृदयमें धनादि उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंका महत्त्व अंकित होनेके कारण ही ऐसा भाव होता है कि हमारे पास बहुत धन है, इसलिये हम बड़े आदमी हैं अथवा हमारे पास कुछ नहीं है, इसलिये हम छोटे हैं। वास्तवमें चाहे धनवान् हो या निर्धन, मनसे धनकी इच्छाका त्याग करनेपर दोनों समान हैं। अतएव जैसी भी परिस्थिति, योग्यता आदि हमें मिली हुई है, उसीमें साधक परमात्मतत्त्वका अनुभव कर सकता है।
मनुष्य-शरीर मिलनेके बाद मनुष्य सांसारिक पदार्थोंसे निराश हो सकता है, क्योंकि संसारकी कोई भी वस्तु किसीको बराबर मात्रामें और पूर्णरूपसे नहीं मिलती। परंतु सर्वत्र परिपूर्ण परमात्मतत्त्व सभीको समानरूपसे और पूरे-के-पूरे मिलते हैं। इसलिये परमात्म-तत्त्वकी प्राप्तिमें निराश होनेका कोई स्थान नहीं है। मनुष्य-शरीर मिल गया तो परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिका अधिकार भी मिल गया।