प्रवचन—२

दोषोंको मिटानेका अचूक उपाय है—दोषोंको अपनेमें न माने, और दोषजनित गलतीको दुबारा न करे। बारंबार गलती करनेसे ही दोष बने रहते हैं। गुण और दोष दोनों ही उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं और हम स्वयं निरन्तर रहनेवाले हैं। ऐसे ही संसार उत्पन्न और नष्ट होनेवाला है एवं परमात्मा निरन्तर रहनेवाले हैं। अतएव हम स्वयं और परमात्मा तो एक हैं और दोष तथा संसार एक। तात्पर्य यह कि हमारा सम्बन्ध परमात्माके साथ है संसार और दोषोंके साथ नहीं। परन्तु हमने परमात्मासे विमुख होकर संसारसे अपना सम्बन्ध मान लिया, यही गलती हुई। संसार और शरीरसे सम्बन्ध हमने ही माना है, संसार और शरीरने हमसे सम्बन्ध नहीं माना है। हम ही परमात्मासे विमुख हुए हैं, परमात्मा हमसे विमुख नहीं हुए हैं। अतएव संसार और शरीर मेरे नहीं हैं तथा मैं उनका नहीं हूँ, अपितु परमात्मा मेरे हैं और मैं परमात्माका हूँ—ऐसा आज ही मान लें। शरीर संसारका अंश है और हम परमात्माके अंश हैं। शरीरको संसारकी सेवामें अर्पण कर दे और स्वयंको परमात्माके अर्पण कर दे—इतना ही काम साधकको करना है।

संसारको अपना मानते ही मनुष्य फँस जाता है और तरह-तरहके दु:ख भोगता है। वह समझता तो यह है कि शरीर, धन, जमीन, मकान, परिवार आदि मेरे हैं और मैं उनका मालिक हूँ पर वास्तवमें वह उनका गुलाम हो जाता है। वहम तो मालिक बननेका होता है पर बनता है गुलाम—यह बिलकुल सच्ची बात है। मनुष्यको चाहिये कि उन वस्तुओंकी सेवा कर दे और उनसे कोई आशा न रखे, उनमें ममता न करे। शरीरकी भी सेवा कर दे। उसे अन्न, जल आदि दे दे पर उसे अपना न माने। शरीरको सदा रख नहीं सकते, उसे इच्छानुसार बना नहीं सकते, उसमें चाहे जैसा परिवर्तन नहीं कर सकते, फिर वह अपना कैसे? रुपये, जमीन, मकान आदिको भी इच्छानुसार नहीं रख सकते। अत: ‘वे अपने हैं’—यह सरासर झूठी बात है। वे सेवाके लिये हमें मिले हैं, अत: उनकी नि:स्वार्थभावसे सेवा कर दें। वे अपने दीखते हैं तो यह भगवान‍्की उदारता है। भगवान‍् किसीको कोई वस्तु देते हैं तो इस ढंगसे देते हैं कि वह उसे अपनी ही प्रतीत होती है। यह देनेवालेकी विलक्षण उदारता है कि सब कुछ देकर भी उसने अपने-आपको छिपा रखा है। मिली हुई वस्तुको अपनी मानना भगवान‍्की उदारताका दुरुपयोग है। अत: जो अपना नहीं है, उसे अपना नहीं मानना है और जो वास्तवमें अपना है, उस (परमात्मा)-के सम्मुख होना है।

शरीरादि पदार्थ प्रतिक्षण ही नाशकी ओर जा रहे हैं। आजतक ये पदार्थ किसीके पास सदा नहीं रहे तो अब कैसे रहेंगे? इन आने-जानेवाले पदार्थोंको अपनी ओरसे छुट्टी दे दें। ये आ जायँ तो मौज, चले जायँ तो मौज। इसीका नाम त्याग है। त्यागसे तत्काल शान्ति प्राप्त होती है—‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’ (गीता १२। १२)। त्यागका अर्थ यह नहीं है कि धन, जमीन, परिवार आदिको छोड़कर भाग जायँ। इन्हें छोड़कर जहाँ भी जायँ, शरीर तो साथ ही रहेगा। शरीर भी तो उन्हीं (धन, जमीन आदि)-का साथी है। एक शरीरसे सम्बन्ध है तो संसारमात्रसे सम्बन्ध है। शरीर संसारका बीज है। एक बीजसे जंगल पैदा हो सकता है। इसलिये इन पदार्थोंको स्वरूपसे नहीं छोड़ना है, अपितु इन्हें अपना और अपने लिये नहीं मानना है। इन्हें अपना न माननेपर सब चिन्ता-क्लेश मिट जाते हैं। कन्या बड़ी होनेपर उसकी बहुत चिन्ता रहती है। पर उसका अच्छे घरमें विवाह हो जाय तो चिन्ता मिट जाती है। कन्या भी वही और हम भी वही पर विवाहके बाद वह कन्या हमारे घरमें बैठी है तो भी उसकी चिन्ता नहीं होती; क्योंकि अब वह अपनी नहीं है—ऐसा मान लिया। इसी प्रकार यह शरीर भी कन्या है। इसका पालन-पोषण तो करना है पर इसे अपना नहीं मानना है। इस शरीररूपी कन्याको भगवान‍्के हाथ सौंपकर निश्चिन्त हो जायँ।

शरीरादि सांसारिक पदार्थोंको आजतक कोई नहीं रख सका। कई बड़े-बड़े तपस्वी हुए और उन्होंने उनके बड़े-बड़े वरदान प्राप्त किये पर शरीरादिको कोई रख नहीं सका। इन्हें कोई रख सकता ही नहीं। फिर इन्हें अपने पास रखनेका झूठा प्रयास करनेसे क्या लाभ? शरीर, धन, जमीन, मकान, परिवार आदिको अपने पास बनाये रखनेका प्रयास करना अँधेरा ढोनेके समान ही है। अँधेरेको ढोकर, उसे उठाकर क्या बाहर फेंका जा सकता है? और यदि कोई दीपक लेकर अँधेरेको देखना चाहे तो क्या देख सकता है? इसी प्रकार संसारको देखने (जानने)-का प्रयास करें, तो मिलेगा कुछ नहीं; क्योंकि असत् संसारकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं। केवल सत् परमात्मतत्त्वकी सत्तासे ही वह सत्तावान् दीख रहा है।

साधक गुण और दोष दोनोंसे अपना सम्बन्ध न माने तो गुणोंका अभिमान नहीं रहेगा और दोष रहेंगे ही नहीं। स्वयंकी स्थिति गुण-दोषसे रहित है। इसीलिये कहा गया है—

सुनहुँ तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक।

गुन यह उभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक॥

(मानस ७।४१)

‘गुणदोषदृशिर्दोषो गुणस्तूभयवर्जित:॥

(श्रीमद्भा० ११। १९।४५)

‘गुणों और दोषोंपर दृष्टि जाना अर्थात् उनसे अपना सम्बन्ध मानना ही सबसे बड़ा दोष है और उनपर दृष्टि न जाकर अपने निर्विकार स्वरूपमें स्थित रहना ही सबसे बड़ा गुण है।’

अपनेमें गुणोंको देखनेसे उनके साथ अभिमान आदि दोष आयेंगे ही। कारण कि गुणोंकी महिमा दोषोंके कारण ही होती है। जैसे धनवानोंकी महिमा निर्धनोंके कारण ही है, धनवानोंके कारण नहीं; विद्वानोंकी महिमा मूर्खोंके कारण ही है, विद्वानोंके कारण नहीं; वक्ताकी महिमा श्रोताओंके कारण ही है, वक्ताओंके कारण नहीं। छोटी वस्तु रहनेके कारण ही बड़ी वस्तुकी महिमा होती है। यदि छोटी वस्तु न रहे तो बड़ी वस्तु कैसे देखनेमें आयेगी?

संसारके भोग जहरके लड्डूके समान हैं। मनुष्य लड्डूको नहीं छोड़ता तो जहर मनुष्यको नहीं छोड़ता। जहरसे बचनेके लिये लड्डूका त्याग करना ही पड़ेगा। लड्डू भी खा लें और जहर भी न चढ़े, ऐसा होगा नहीं। यदि यह पता लग जाय कि लड्डूमें जहर है तो मीठा लगनेपर भी उसे कोई खायेगा नहीं। यदि उसे कोई खाता है तो इससे यही सिद्ध होता है कि लड्डूमें जहर केवल सुना हुआ है, माना हुआ नहीं है। कहा भी है—

करनी बिन कथनी कथे, अग्यानी दिन रात।

कूकर ज्यों भूँकत फिरै, सुनी सुनायी बात॥