प्रवचन—३
मनुष्य काम करनेके लिये किसी कार्यालय-(आफिस-)में जाता है तो वह बड़ी तत्परता और उत्साहसे उस कार्यालयका ही काम करता है और उस कामके लिये उसे वेतन मिलता है। काम कार्यालयके लिये होता है और वेतन अपने लिये। इसी प्रकार संसारमें आकर मनुष्यको केवल संसारके लिये ही काम करना है, अपने लिये नहीं। सबका हित कैसे हो? सबका भला कैसे हो? सबको सुख कैसे मिले? सबको आराम कैसे मिले? इस भावसे केवल संसारके लिये ही काम करना है। जैसे कार्यालयमें रखी हुई वस्तु कार्यालयके कामके लिये ही होती है, अपने लिये नहीं, वैसे ही संसारकी सब वस्तुएँ संसारके लिये ही हैं, अपने लिये नहीं। शरीर, धन, जमीन, मकान, आदि सब वस्तुएँ संसारसे ही मिली हैं और अन्तमें इन्हें संसारको ही लौटाकर जाना है। अत: संसारसे मिली हुई वस्तुओंको संसारकी ही मानकर उसीकी सेवामें लगा देना है। वे वस्तुएँ न तो अपनी हैं और न अपने लिये ही हैं। इसलिये अपने लिये कुछ करना ही नहीं है। अपने लिये कुछ न करनेपर संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है और परमात्माके साथ अपने नित्य-सम्बन्धका अनुभव हो जाता है। इसीका नाम ‘योग’ है। कर्म संसारके लिये होता है और योग अपने लिये। यह योग ही मानो वेतन है।
अपने लिये कुछ करना है ही नहीं और अपने लिये कोई वस्तु है ही नहीं—ऐसा अनुभव होते ही संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है। यही कर्मयोग है। इसके विषयमें भगवान्ने कहा है—
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥
(गीता २।४०)
‘इस कर्मयोगमें उपक्रम अर्थात् आरम्भमात्रका भी नाश नहीं होता और इसका उलटा फल भी नहीं होता। इस कर्मयोगरूप धर्मका थोड़ा-सा भी अनुष्ठान जन्म-मृत्युरूप महान् भयसे रक्षा कर लेता है।’
कार्यालयके समान इस संसारमें आकर अपनी ड्यूटी पूरी कर देनी है, अपने कर्तव्यका निष्कामभावपूर्वक सांगोपांगरीतिसे पालन कर देना है। कर्मयोगका स्वरूप यह है—
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
(गीता २।४७)
‘तेरा कर्म करनेमें ही अधिकार है, उसके फलोंमें कदापि नहीं। इसलिये तू कर्मोंके फलका हेतु मत बन तथा तेरी कर्म न करनेमें भी आसक्ति न हो।’
कामना—आसक्तिसे रहित होकर कर्म करनेपर संसारके सम्बन्धका त्याग हो जाता है और त्यागसे तत्काल शान्ति होती है—‘त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्’ (गीता १२।१२)। जितनी भी अशान्ति है, वह सब नश्वर संसारके सम्बन्धसे ही है। नाशवान् वस्तुओंसे जितना अधिक सम्बन्ध अर्थात् अपनापन जोड़ेंगे, उतनी ही अधिक अशान्ति होगी। संसारसे सम्बन्ध न जोड़ें तो अशान्ति हो ही नहीं सकती। इस प्रकार शान्ति तो स्वत:सिद्ध है और अशान्ति बनावटी अर्थात् खुद अपनी बनायी हुई है।
संसारकी किसी भी वस्तुसे मनुष्यका सम्बन्ध नहीं है। समय समाप्त होते ही चट यहाँसे चल देना है। एक दिन सब वस्तुओंको ज्यों-का-त्यों छोड़कर जाना पड़ेगा। सब-की-सब वस्तुएँ यहीं पड़ी रह जायँगी। यह शरीर भी यहीं रह जायगा। इसलिये जबतक संसारमें रहना है, तबतक निष्कामभावसे दूसरोंकी सेवा करनी है। जब जायँगे, तब साथ कुछ ले नहीं जायँगे। बिलकुल कार्यालयके समान संसारमें काम (सेवा) करनेके लिये आये हैं।
शंका—ऊपर कही बातें तो बिलकुल ठीक हैं पर ये बातें सदा याद नहीं रहतीं।
समाधान—ये बातें याद करनेकी हैं ही नहीं। याद करनेकी बात तो भगवान्का नाम है, उनका स्वरूप है, उनकी लीला इत्यादि है। उपर्युक्त बातें तो बिलकुल समझनेकी हैं। जैसे, अभी हम अयोध्यामें हैं तो ‘हम अयोध्यामें हैं; हम अयोध्यामें हैं’—ऐसा जप नहीं करना पड़ता; क्योंकि यह याद करनेकी बात ही नहीं है। ऐसे ही किसी व्यक्तिकी एक कार्यालयमें नियुक्ति हो जाय और वहाँ वह काम करना आरम्भ कर दे तो उसे ‘यह कार्यालय मेरा नहीं है’—ऐसा याद नहीं करना पड़ता; कारण कि इसमें किंचित् भी याद करनेकी बात नहीं है। यह तो केवल स्वीकृति या अस्वीकृतिकी बात है। ‘हम अयोध्यामें हैं’—इसे स्वीकार कर लिया। ‘कार्यालय मेरा है’—इसे स्वीकार नहीं किया। बस, इतनी ही बात है। ‘कार्यालय मेरा नहीं है, वहाँकी वस्तुएँ मेरी नहीं हैं’—यह बात आरम्भसे जँच गयी, भीतर बैठ गयी। ऐसे ही संसारकी कोई भी वस्तु मेरी और मेरे लिये नहीं है—इस वास्तविक बातको दृढ़तासे भीतर बैठा लें।