प्रवचन—४
साधनमें खास बात है—अपने लक्ष्यका निर्णय करना कि वास्तवमें मैं क्या चाहता हूँ। साधक जप, ध्यान, भजन, कीर्तन आदि कुछ भी करता रहे, पर जबतक वह अपने लक्ष्यका निर्णय नहीं कर लेता,तबतक उसकी वास्तविक साधना आरम्भ नहीं होती। लक्ष्यका निर्णय हो जानेपर साधक लक्ष्यको प्राप्त किये बिना, लक्ष्यके सिवाय दूसरी जगह ठहर ही नहीं सकता। लक्ष्यका निर्णय जितना दृढ़ होगा, उतनी ही शीघ्रतासे उसकी प्राप्ति होगी। उसके निर्णयमें जितनी ढिलाई होगी, उसकी प्राप्ति भी उतनी ही देरीसे होगी। इसलिये साधकको सबसे पहले गम्भीरतापूर्वक यह विचार करना है कि भगवान्ने मुझे मनुष्य क्यों और किसलिये बनाया? गहरा विचार करनेपर पता लगेगा कि किसी बहुत बड़े प्रयोजनकी सिद्धिके लिये ही यह मनुष्य-शरीर मिला है। सांसारिक पदार्थोंके भोग और संग्रहके लिये मनुष्य-शरीर नहीं मिला है। सुखभोग तो पशु-पक्षी आदि मानवेतर योनियोंमें भी मिल सकता है। मनुष्य-शरीर तो उस सर्वोपरि तत्त्वको प्राप्त करनेके लिये मिला है। इसे प्राप्त करनेपर कुछ भी करना, जानना और पाना शेष नहीं रहता। इस विषयमें गीताका बहुत सुन्दर श्लोक है—
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं तत:।
यस्मिन्स्थितो न दु:खेन गुरुणापि विचाल्यते॥
(६।२२)
‘जिस लाभको प्राप्त होकर उससे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और जिसमें स्थित होनेपर बड़े भारी दु:खसे भी विचलित नहीं होता।’
—ऐसी स्थितिको प्राप्त करना ही मनुष्य-जीवनका खास उद्देश्य है। इस स्थितिको प्राप्त किये बिना जो सन्तोष करता है, वह गलती करता है। जबतक कुछ भी करने, जानने और पानेकी इच्छा रहती है, तबतक साधकको यही समझना चाहिये कि वास्तवमें मैं जो चाहता हूँ, वह (वास्तविक तत्त्व) प्राप्त नहीं हुआ।
जैसे बदरीनारायण जाते समय मनुष्य रास्तेमें किसी जगह ठहरता है तो वहाँ भोजन कर लेता है, सो लेता है और अन्य आवश्यक काम कर लेता है, पर वहाँ अपना डेरा नहीं लगा लेता। जगह अच्छी है, जलवायु भी अच्छी है, सुविधा भी है—ऐसा विचार करके वह वहाँ रह नहीं जाता। यदि रह जाता है, तो वास्तवमें उसे बदरीनारायण जाना ही नहीं है। इसी प्रकार संसारकी जितनी भी अवस्थाएँ हैं, वे सब रास्तेकी हैं। साधक उनमेंसे कहीं भी ठहर नहीं सकता, अटक नहीं सकता। उसे तो अपने एकमात्र लक्ष्य परमात्माकी ओर जाना है। जहाँ कुछ भी करना, जानना और पाना शेष नहीं रहता, साधकको तो वहाँ पहुँचना है।
सच्चा साधक लक्ष्यको प्राप्त किये बिना चैन-आरामसे नहीं बैठ सकता। संसारमें धन मिल गया, तो क्या हो गया? मान-बड़ाई मिल गयी, तो क्या हो गया? सुख-आराम मिल गया, तो क्या हो गया? कारण कि ये सांसारिक धन, मान, बड़ाई, सुख-आराम आदि सबसे बढ़कर नहीं हैं। सबसे बढ़कर जो वस्तु है, वह नहीं मिली, तो क्या मिला? अर्थात् कुछ नहीं मिला। आरामसे खा लिया, पी लिया, सो लिया—यह सब पशुओंके ही योग्य है, विवेकी मनुष्यके योग्य नहीं। मनुष्य-शरीरकी महिमा इसी बातको लेकर है कि यह सबसे अधिक उन्नत हो सकता है। मनुष्य-शरीर देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। देवताओंके पास भोगोंकी भरमार है पर वे भी मनुष्य-शरीरकी प्राप्ति चाहते हैं।
सांसारिक भोग मनुष्यको सुखी नहीं कर सकते। मुख्य कारण यह है कि मनुष्य स्वयं तो नित्य-निरन्तर रहनेवाला है, पर भोग नित्य-निरन्तर रहनेवाले नहीं हैं। ऐसे भोगोंको हम कबतक अपने साथ रखेंगे? भोग कबतक टिके रहेंगे? उनसे कितना सुख-सन्तोष मिलेगा? इस ओर ध्यान न रहनेसे मनुष्य बेपरवाह रहता है। चाहे जितना धन कमा लें, धनकी इच्छा शेष रहेगी ही। लाखों-करोड़ों रुपये मिल जायँ, फिर भी तृप्ति नहीं होगी। ज्यों-ज्यों अधिक रुपये मिलेंगे, त्यों-ही-त्यों तृष्णा अधिक बढ़ेगी। तृष्णा अधिक बढ़नेपर झूठ, कपट, चोरी, बेईमानी, ठगी, विश्वासघात आदि अनेक दोष आते जायँगे, जिससे और अधिक पतन होगा। बिलकुल सही बात है। नाशवान् पदार्थोंको सदा अपने साथ रख नहीं सकते और सदा उनके साथ रह नहीं सकते। एक दिन सबको छोड़ना ही पड़ेगा। अत: बिगड़ने और बिछुड़नेवाली वस्तुओंको लेकर कौन-सा बड़ा काम किया। निर्वाहमात्रका प्रबन्ध तो भगवान्की ओरसे जीवमात्रके लिये ही है; अत: इसके लिये चिन्ता करनेकी आवश्यकता नहीं। आवश्यकता वास्तविक तत्त्वको प्राप्त करनेकी ही है। उसकी प्राप्तिमें सांसारिक भोग और संग्रहकी कामना ही महान् बाधक है। वास्तविक तत्त्वको प्राप्त किये बिना चैनसे रहना बड़े ही दु:खकी बात है। मनुष्य कभी धन चाहता है, कभी मान-बड़ाई चाहता है, कभी निरोगता चाहता है, कभी आराम चाहता है पर वास्तवमें यह उसकी चाह नहीं है। अत: वास्तवमें मुझे क्या चाहिये—इसका निर्णय करनेकी बहुत अधिक आवश्यकता है। लक्ष्यका निर्णय होनेपर फिर उसकी विस्मृति (भूल) नहीं होती। जिसकी विस्मृति होती है, वह लक्ष्य नहीं है।
जैसा कि पहले बताया गया, लक्ष्य वह है, जिसकी प्राप्तिके बाद कुछ भी करना, जानना और पाना शेष न रहे। इसीको तत्त्वप्राप्ति, भगवत्प्राप्ति, भगवत्प्रेम, भगवद्दर्शन, जीवन्मुक्ति, कैवल्य आदि-आदि कहते हैं। साधक तत्त्वज्ञान, भगवत्प्रेम, भगवद्दर्शन आदि जो चाहता है, वही उसे मिल जाता है।