प्रवचन—५
उत्पन्न होनेवाली प्रत्येक वस्तुके मूलमें उसका कोई कारण होता है। इस दृष्टिसे सम्पूर्ण सृष्टिका कोई एक मूल कारण है। परम्परासे विचार करें तो उत्पत्तिमात्रका कारण कोई एक अनुत्पन्न तत्त्व है। सम्पूर्ण संसारका जो ज्ञान होता है, वह ज्ञान किसी प्रकाशमें होता है। जैसे नेत्रोंसे जो कुछ भी दीखता है, वह प्रकाशमें ही दीखता है, ऐसे ही सम्पूर्ण सृष्टिका कोई प्रकाशक है, जिसके प्रकाशमें सृष्टिका ज्ञान होता है। तात्पर्य यह कि जिससे संसार उत्पन्न होता है और जिसके प्रकाशसे संसार प्रकाशित होता है, वह एक अनुत्पन्न और सर्वप्रकाशक तत्त्व (परमात्मा) है। उस तत्त्वका अनुभव करना ही साधकका एकमात्र उद्देश्य है।
उत्पन्न होनेवाले और प्रकाशित होनेवाले जड पदार्थोंमें ममता-आसक्ति करनेसे, उनका आश्रय लेनेसे ही मनुष्य दु:ख पाता है। यदि मनुष्य उत्पन्न होनेवाले पदार्थोंमें ममता-आसक्ति न करे, उनका आश्रय न ले तो अनुत्पन्न परमात्मतत्त्वमें उसकी स्वत:-स्थिति हो जायगी।
वास्तवमें अनुत्पन्न तत्त्वमें मनुष्यमात्रकी स्वत:सिद्ध स्थिति है। कार्यमात्र कारणमें रहता है। कार्यके बिना कारण रह सकता है पर कारणके बिना कार्य नहीं रह सकता। अतएव परमात्मतत्त्व संसारके होनेपर भी रहता है और न होनेपर भी रहता है; क्योंकि उसकी स्वतन्त्र सत्ता है। परंतु उत्पन्न और नष्ट होनेवाला संसार परमात्मतत्त्वकी सत्तापर ही टिका हुआ है अर्थात् उसकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। इस संसारसे यदि हम अपना कोई सम्बन्ध न मानें, इसमें तादात्म्य-ममता-कामना न करें तो हमें परमात्मतत्त्वमें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव हो जायगा। अनुभव होनेपर फिर दु:ख, चिन्ता, भय, शोक, सन्ताप आदि कुछ नहीं रहेंगे; क्योंकि ये (दु:ख आदि) परमात्मतत्त्वमें नहीं हैं।
भगवान् कहते हैं—‘ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन:।’ (गीता १५। ७) अर्थात् इस देहमें यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है। वस्तुत: उत्पन्न और नष्ट होनेवाले संसारको पकड़नेके कारण ही यह ‘अंश’ कहलाता है। वस्तुत: यह अंश नहीं है। जैसे पिताके पास अरबों-खरबों रुपये हैं और पुत्र उसमेंसे एक लाख रुपये लेकर उन्हें अपना मान ले तो वह अपनेको उन एक लाख रुपयोंका मालिक समझता है पर वास्तवमें वह उनका गुलाम बन जाता है। यदि वह एक लाख रुपयोंको अपना न माने तो वह स्वत:-स्वाभाविक अरबों-खरबों रुपयोंका मालिक है—पिताकी पूरी सम्पत्तिका अधिकारी है। ऐसे ही उत्पन्न होनेवाली वस्तुका छोटा-सा टुकड़ा लेकर जीव उसमें फँस जाता है और दु:ख पाता है। यदि वह ऐसा न करे तो आनन्दके समुद्रमें नित्य मग्न रहे। परंतु परमात्मासे विमुख होकर वह मुफ्तमें प्यासा मरता है—
आनँद सिंधु मध्य तव बासा।
बिनु जाने कस मरसि पियासा॥
(विनय-पत्रिका १३६। २)
सांसारिक वस्तुएँ केवल सदुपयोग करनेके लिये हैं, आश्रय लेनेके लिये नहीं। आश्रय लेनेसे ही उनका दुरुपयोग होता है। रुपये खर्च करनेके लिये ही हैं। अपने या दूसरेके लिये खर्च करनेके अतिरिक्त रुपये और किस काम आयेंगे? रुपयोंके संग्रहसे अभिमान, आसक्ति, प्रमाद आदि ही बढ़ते हैं पर उनका संग्रह करके मनुष्य फँस जाता है। इसी प्रकार संसारके सब पदार्थ सदुपयोग करनेके लिये ही हैं। उन्हें अपने लिये मानकर मनुष्य मुफ्तमें बँध जाता है। पदार्थ तो अपने पास सदा रहते नहीं, केवल बन्धन-बन्धन रह जाता है।
सम्बन्ध सदा दोमें ही होता है। पिता-पुत्र, पति-पत्नी आदिमें दोनों ओरसे (दोतरफा) सम्बन्ध होता है अर्थात् पिता कहता है कि यह मेरा पुत्र है और पुत्र कहता है कि यह मेरा पिता है, इत्यादि। परंतु शरीर, धन-सम्पत्ति आदि जड वस्तुओंके साथ सम्बन्ध केवल हमारी ओरसे ही (एकतरफा) होता है अर्थात् हम ही कहते हैं कि शरीर मेरा है, धन-सम्पत्ति मेरी है, पर शरीर, धन-सम्पत्ति आदि वस्तुएँ कभी हमें यह नहीं कहतीं कि तुम हमारे हो या हम तुम्हारे हैं। इन वस्तुओंसे हम अपना जो सम्बन्ध मान लेते हैं, वह सम्बन्ध ही बन्धनका खास कारण है। इससे भी अधिक आश्चर्यकी बात यह है कि वस्तुके न रहनेपर भी उससे सम्बन्ध मानते रहते हैं! सम्बन्धी तो नहीं रहता पर सम्बन्ध रह जाता है! जैसे पतिका देहान्त हुए कई वर्ष बीत जानेपर भी विधवा स्त्री अपनेको उसीकी पत्नी मानती रहती है। वस्तुके रहते हुए भी हम उससे अपना सम्बन्ध तोड़ सकते हैं, फिर वस्तुके न रहनेपर तो उससे सम्बन्ध रहना ही नहीं चाहिये। वस्तुसे अपना जो सम्बन्ध दीखता है, वह केवल उस वस्तुके सदुपयोग-(सेवा)-के लिये ही है, अपना अधिकार जमानेके लिये नहीं।
यदि मनुष्य संसारसे माने हुए सम्बन्धका त्याग कर दे तो वह निहाल हो जाय! मनुष्यका वास्तविक सम्बन्ध परमात्माके साथ है, जो नित्यसिद्ध है। अत: साधकको दृढ़तापूर्वक यह मान लेना चाहिये कि ये उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तुएँ मेरी नहीं हैं। मेरे तो केवल भगवान् ही हैं—‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई।’
उस नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वको उद्योगसाध्य (परिश्रमसाध्य या पुरुषार्थसाध्य) मान लेना भूल है। उद्योगसाध्य वस्तु बनावटी होती है। परमात्मतत्त्वमें हमारी स्थिति बनावटी नहीं है, अपितु वास्तविक है उसमें हमारी स्थिति स्वत: है। परमात्माके सिवा सब कुछ ‘पर’ है। ‘पर’ (संसार)-के अधीन होना पराधीनता है। उद्योग इतना ही है कि पराधीनताको त्याग दें अर्थात् संसारसे अपना सम्बन्ध-विच्छेद कर लें। जो निरन्तर हमें छोड़ता चला जा रहा है, उसीको छोड़ना है। यही साधन है। जो सदासे विमुख है, उस संसारसे ही विमुख होना है और जो सदासे सम्मुख है, उस परमात्मतत्त्वके ही सम्मुख होना है—
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं।
जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं॥
(मानस ५। ४३। १)
मनुष्यने संसारमें ‘यह अपना है और यह अपना नहीं है’—इस प्रकार दो विभाग किये हुए हैं। वह जिसे अपना मानता है, उसीकी चिन्ता उसे होती है। जिस मकानको हमने अपना मान लिया है, उसीकी चिन्ता होती है। जिस मकानको अपना नहीं माना है, वह धराशायी हो जाय तो भी उसकी चिन्ता नहीं होती। वास्तवमें चिन्ता मकानकी नहीं, अपितु अपनेपनकी होती है। संसारमें प्रतिदिन कई मनुष्य मरते हैं, कई पशु-पक्षी मरते हैं, पर उनकी चिन्ता हमें नहीं होती, जबकि आरम्भको देखा जाय तो एक परमात्मासे ही सबकी उत्पत्ति होनेसे सब भाई-बन्धु ही हैं! अत: जिन-जिनको अपना माना है, उन-उनकी ही चिन्ता होती है। जिन्हें अपना नहीं माना है, वे मर जायँ तो भी चिन्ता नहीं होती। जबतक लड़कीका विवाह नहीं होता, तभीतक आपको उसकी चिन्ता रहती है। विवाह होनेके बाद वह लड़की आपके पास बैठी हो, तब भी उसकी चिन्ता नहीं होती। लड़की भी वही है और आप भी वही हैं। लड़कीके प्रति आपका वात्सल्य भी वही है। पर अब चिन्ता इसलिये नहीं होती कि अब उसे आप अपनी नहीं मानते। संसार भी कन्याके समान है। इसे भगवान्के हाथ सौंप दें, तो सारी चिन्ताएँ मिट जायँ। भगवान् भी राजी हो जायँ, आप भी राजी हो जायँ और सृष्टि भी राजी हो जाय!
स्वयं नित्य-निरन्तर रहनेवाला है और संसार प्रतिक्षण बदलनेवाला है। अत: वास्तवमें संसारसे सम्बन्ध न होनेपर भी उससे जो सम्बन्ध मान रखा है, उसमें खास कारण यह है कि उससे सुख लेते हैं और उससे सुखकी आशा करते हैं। यही खास बीमारी है। इस बीमारीको मिटानेका उपाय है—संसारसे सुख न लें, अपितु उसे सुख दें। बस, इतनी ही बात है। संसारके पदार्थोंका उपयोग भोगबुद्धिसे न करें, अपितु शरीर-निर्वाहमात्रके लिये करें। संसारसे जो सुख लेना चाहते हैं, वह (सुख) दु:खोंका कारण है—‘ये हि संस्पर्शजा भोगा दु:खयोनय एव ते।’ (गीता ५।२२)। दु:खोंके कारणको तो छोड़ें नहीं और दु:खसे छूटना चाहें—यह कैसे होगा? इसलिये यदि दु:खोंसे छूटना हो तो सुख लेनेकी इच्छा छोड़नी ही पड़ेगी, नहीं तो दु:खोंसे कभी छूट नहीं सकते। वहम तो सुखका रहेगा पर पाना पड़ेगा दु:ख। इसमें किंचिन्मात्र सन्देह नहीं। अतएव घरसे लेकर बाहरतक सबको सुख पहुँचाना है। सबको सुखी करना तो हमारे वशकी बात नहीं है पर सबको सुखी करनेका भाव बनाना हमारे वशकी बात है। यदि साधकके हृदयमें प्राणिमात्रके हितका भाव रहेगा तो उसे परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति सुगमतापूर्वक हो जायगी—‘ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रता:॥’(गीता १२।४)