प्रवचन—६

संसारमें हम देखते हैं कि प्रत्येक वस्तुका कोई उत्पादक होता है, कोई मालिक होता है। यह जो पृथ्वी, समुद्र, सूर्य, चन्द्रमा, वायु, आकाश आदि दीखते हैं और विभिन्न प्रकारके प्राणी, जीव-जन्तु दीखते हैं, इस (सृष्टि)-का भी एक मालिक है। वह सबका मालिक है पर उसका कोई मालिक नहीं है। वह सबका उत्पादक है पर उसका कोई उत्पादक नहीं है। उसीको परमात्मा कहते हैं। आश्चर्यकी बात यह है कि उस परमात्माकी रची हुई वस्तुओंमें तो मनुष्य आकर्षित होते हैं, उन्हें अपना मानते हैं। उन्हें महत्त्व देते हैं, उनसे अपनेमें बड़प्पनका अनुभव करते हैं पर उनका जो उत्पादक है, मालिक है, उसकी तरफ ध्यान ही नहीं देते!

भगवान‍् अर्जुनसे कहते हैं—

इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्।

मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्‍द्रष्टुमिच्छसि॥

(गीता ११।७)

‘हे गुडाकेश! अब इस मेरे शरीरमें तू एक जगह स्थित चराचरसहित सम्पूर्ण जगत‍्को देख तथा और भी जो कुछ देखना चाहता है, वह (भी) देख।’

तात्पर्य यह है कि चराचरसहित पूरा-का-पूरा जगत् तू मेरे शरीरमें केवल एक ही जगह देख, और अभी देख—‘पश्याद्य’ और कहाँ देख ‘मम देहे’ अर्थात् मेरे शरीरमें देख। अर्जुन भी कहते हैं कि ‘मैं सम्पूर्ण देवोंको आपके शरीरमें देखता हूँ’—‘पश्यामि देवांस्तव देव देहे’ (११।१५)। और संजय भी कहते हैं कि अर्जुनने ‘सम्पूर्ण जगत‍्को भगवान‍्के शरीरमें एक जगह स्थित देखा—‘अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा॥’(११। १३)। ‘गुडाका’ नाम निद्राका है और उसके मालिक (निद्राको जीतनेवाले)-को गुडाकेश कहते हैं। अर्जुनको ‘गुडाकेश’ कहनेका तात्पर्य है कि आलस्यरहित होकर बड़ी सावधानीसे देख। और कुछ देखना चाहता है तो वह भी देख—‘यच्चान्यद्‍द्रष्टुमिच्छसि’। भगवान‍् उसके मनकी बात जानते हैं कि वह और क्या देखना चाहता है। अर्जुन देखना (जानना) चाहते थे कि हमें युद्ध करना चाहिये या नहीं करना चाहिये और जीत हमारी होगी या उनकी होगी—‘न चैतद्विद्म:कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयु:।’ (गीता २।६)।

दसवें अध्यायके अन्तमें भगवान‍्ने कहा था कि अर्जुन! बहुत जाननेसे क्या होगा; मैं अपने एक अंशसे सम्पूर्ण जगत‍्को धारण करके स्थित हूँ। मैं तेरे सामने बैठा हूँ; अत: तुझे मेरी विभूतियोंको बहुत जाननेकी क्या जरूरत है, तू मेरी तरफ देख। तभी अर्जुनको वह रूप देखनेकी इच्छा हुई—‘द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरम्’ (११। ३) तो यह संसार भगवान‍्के एक अंशमें स्थित है। इस संसारको उत्पन्न करनेवाला भी वही है। इसका आधार और मालिक भी वही है। यह संसार उत्पन्न और नष्ट होनेवाला है, जिसमें प्रवाहरूपसे निरन्तर परिवर्तन होता रहता है। ऐसे संसारको महत्त्व देता है वह जीव, जो भगवान‍्का अंश है—‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५।७)। भगवान‍् नित्य-निरन्तर रहनेवाले हैं। ऐसे ही उनका अंश (जीव) भी नित्य-निरन्तर रहनेवाला है। वह जीव नित्य-निरन्तर बदलनेवाले संसारको आदर देता है—यह बड़े आश्चर्यकी बात है!

भगवान‍्ने जड संसारको अपनी ‘अपरा प्रकृति’ और जीवको अपनी ‘परा प्रकृति’ बतलाया है (गीता ७। ४-५)। परन्तु जीवने जगत‍्को धारण कर लिया—‘ययेदं धार्यते जगत्’ अर्थात् उसीमें उलझ गया। यदि यह जगत‍्को धारण न करे तो फिर जगत् नहीं रहेगा, अपितु एक भगवान‍् ही रह जायँगे—‘वासुदेव: सर्वम्’ (७। १९)। परन्तु जीव संसारको अपना मानकर उसीमें उलझ जाता है। इतना ही नहीं, संसारके अत्यन्त तुच्छ अंश रुपयोंको लेकर वह अपनेको बड़ा मानने लग जाता है। कितने आश्चर्यकी बात है! थोड़ी विद्या, थोड़ी शक्ति लेकर वह घमण्ड करने लग जाता है। हिरण्यकशिपुने प्रह्लादजीसे पूछा कि तुम्हारा कौन है? तो उन्होंने उत्तर दिया कि जिसके थोड़े-से अंशको लेकर आपने त्रिलोकीपर विजय प्राप्त कर ली, वही मेरा है। मनुष्य तुच्छ-तुच्छ वस्तुओंको लेकर अपनेमें बड़प्पनका अनुभव करता है। परन्तु वास्तवमें उसका बड़प्पन परमात्माको प्राप्त करनेमें ही है। परमात्माकी तरफ चलनेकी रुचि भी हो जाय तो मनुष्य बड़ा हो जाता है। जिसकी भगवान‍्में रुचि हो गयी है, उसके सामने संसारमात्रका वैभव भी कुछ नहीं है। भगवान‍् कहते हैं—

‘जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते।’ (गीता६।४४) अर्थात् परमात्मतत्त्वका जिज्ञासु भी शब्दब्रह्म (वेदों)-को अतिक्रमण कर जाता है। वेदोंके अध्ययन, यज्ञ, तप, दान आदिके जो फल बतलाये गये हैं, उन सम्पूर्ण फलोंको वह अतिक्रमण कर जाता है और सनातन परमपदको प्राप्त कर लेता है (गीता ८।२८)। ऐसा करनेका अवसर मनुष्यशरीरमें ही है, जो हमें मिला हुआ है। परन्तु फिर भी तुच्छ वस्तुओंमें फँसे हुए हैं—यह कितने आश्चर्यकी बात है! तुच्छ वस्तुओंसे कबतक काम चलेगा? सदा हमारे साथ न धन रहेगा, न कुटुम्ब रहेगा, न मान-बड़ाई रहेगी, न यह अवस्था रहेगी, न शरीर रहेगा; क्योंकि ये रहनेवाली वस्तुएँ हैं ही नहीं।

अजानन् दाहात्म्यं पतति शलभो दीपदहने

स मीनोऽप्यज्ञानाद्वडिशयुतमश्नाति पिशितम्।

विजानन्तोऽप्येते वयमिह विपज्जालजटिलान्

न मुञ्चाम: कामानहह गहनो मोहमहिमा॥

(भर्तृहरिवैराग्यशतक)

‘जलनेसे होनेवाले दु:खको न जाननेके कारण ही पतंगा दीपमें गिरता है। न जाननेके कारण ही मछली वंसीमें लगे मांसके टुकड़ेको खा लेती है और फँस जाती है। परन्तु हमलोग जानते हुए भी विपत्तिके जटिल जालमें फँसानेवाली कामनाओंको, भोगोंको नहीं छोड़ते। अहो! यह मोहकी बड़ी गहन, विचित्र महिमा है!’

विचार करना चाहिये कि अबतक जो धन कमाया है, मान-बड़ाई प्राप्त की है, यदि आज मर जायँ तो वह क्या काम आयेगी? केवल अपना अमूल्य समय ही नष्ट किया। इसलिये अब चेत होना चाहिये। संसारका जो अनन्त अपार ऐश्वर्यशाली मालिक (भगवान‍्) है, उनसे प्रेम करेंगे तो वे भी हमसे वैसे ही प्रेम करनेको तैयार हैं—‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।’ (गीता ४। ११)। रुपयोंके लिये हम कितना ही झूठ, कपट, बेईमानी आदि करें पर जाते समय रुपये हमसे सम्मति भी नहीं लेते और चुपचाप खिसक जाते हैं। उन्हें दया ही नहीं आती कि इसने मेरे लिये कितना झूठ, कपट, बेईमानी, अन्याय आदि पाप किये हैं तो कम-से-कम जाते समय इसकी सम्मति तो ले लें। जो हमारा कोई आदर नहीं करते, उनके हम पीछे पड़े हैं और जो हमारा आदर करता है, हमसे स्नेह, प्यार करता है, उधर जाते ही नहीं! भगवान‍् हमारा कितना ध्यान रखते हैं। हमारा पालन-पोषण करते हैं और जीवन-निर्वाहका सब प्रबन्ध करते हैं, चाहे हम उन्हें मानें या न मानें। वे तो प्राणिमात्रके सुहृद् हैं—‘सुहृदं सर्वभूतानाम्’ (गीता ५।२९)। इसलिये आज ही निश्चय कर लें कि अब एक भगवान‍्की तरफ ही चलना है, उन्हींकी खोज करनी है। फिर कल्याणमें सन्देह नहीं। एकमात्र भगवान‍्की तरफ चलनेपर ये जितने बड़े-बड़े वैभव हैं, वे हमारी सेवा करनेके लिये तैयार हो जायँगे। बड़े-बड़े राजा-महाराजा और देवता भी भगवद्भक्तके दास होते हैं और उसके दर्शनसे अहोभाग्य मानते हैं। वैसा हम सभी हो सकते हैं। संसारका वैभव इकट्ठा करनेमें तो कोई स्वतन्त्र नहीं है पर भगवान‍्को प्राप्त करनेमें हम सब स्वतन्त्र हैं। आश्चर्यकी बात है कि स्वतन्त्रतासे तो विमुख हो रहे हैं और परतन्त्रताको दौड़-दौड़कर ले रहे हैं! इसलिये जो इस समस्त संसारका मालिक है, इसका उत्पादक, प्रकाशक और आधार है; जिसके एक अंशमें यह सारी सृष्टि स्थित है, उन अपने परमप्रियतम भगवान‍्से ही सम्बन्ध जोड़ लें। उन्हें चाहे माँ बना लें, चाहे पिता बना लें, चाहे पुत्र बना लें, चाहे भाई बना लें, चाहे मित्र बना लें और चाहे अर्जुनके समान सारथि बना लें, वे सब कुछ बननेको तैयार हैं। अर्जुन उनसे कहते हैं कि मेरा रथ दोनों सेनाओंके बीच खड़ा करो तो वे वैसा ही कर देते हैं। कितनी विचित्र बात है! इस प्रकार आज्ञाका पालन तो आजकल बेटा भी नहीं करता। ऐसे अपने प्यारे प्रभुको छोड़कर निष्ठुर संसारकी तरफ चलना कहाँकी बुद्धिमानी है?

अहो बकी यं स्तनकालकूटं

जिघांसयापाययदप्यसाध्वी।

लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं

कं वा दयालुं शरणं व्रजेम॥

(श्रीमद्भा० ३।२।२३)

‘अहो! इस पापिनी पूतनाने जिसे मार डालनेकी इच्छासे अपने स्तनोंपर लगाया हुआ कालकूट विष पिलाकर भी वह गति प्राप्त की, जो धात्रीको मिलनी चाहिये, उसके अतिरिक्त और कौन दयालु है, जिसकी शरणमें जायँ!’