प्रवचन—७

साधकको गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिये कि इन्द्रियोंके द्वारा हम जिन विषयोंका अनुभव करते हैं, क्या वे विषय अपने (स्वयं)- तक पहुँचते हैं? वास्तवमें सब विषय शरीरतक ही पहुँचते हैं; परंतु अपनेको शरीररूप ही माननेके कारण उन्हें गलतीसे स्वयंतक पहुँचते हुए मान लेते हैं। ‘मैं हूँ’ के रूपमें अपनी नित्य सत्ता है और शरीरादि जड वस्तुओंकी सत्ता अनित्य है। इसलिये अपनेतक कोई भी वस्तु नहीं पहुँचती। इसमें भी एक विशेष बात ध्यान देनेकी है कि वस्तुएँ जहाँतक पहुँचती हैं, वहाँ भी वे सदा नहीं रहतीं। अत: साधकको विचार करना चाहिये कि देखने-सुननेमें आनेवाले जितने भी पदार्थ हैं, वे अपनेतक तो पहुँचते नहीं और जहाँतक पहुँचते हैं, वहाँ भी सदा साथ नहीं रहते; अत: उनके द्वारा कबतक सुख लेंगे? उनके साथ कबतक रहेंगे? शरीरादि जड पदार्थोंमें परिवर्तन होता है पर अपनेमें परिवर्तन नहीं होता। ऐसे परिवर्तनशील पदार्थोंसे हम कबतक काम चलायेंगे? उनके भरोसे कबतक रहेंगे? इस प्रकार यदि साधक विचार करे तो उसकी शीघ्र ही उन्नति हो जाय।

विषयभोग तो अपनेतक नहीं पहुँचता पर उसका सुख और दु:खरूप परिणाम मनुष्य अपनेतक स्वीकार करता है—‘पुरुष: सुखदु:खानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते।’ (गीता १३। २०) अर्थात् मनुष्य सुख-दु:खके भोगनेमें हेतु बनता है। जैसे मिली हुई वस्तुएँ सदा नहीं रहतीं, वैसे उनसे होनेवाला सुख-दु:ख भी सदा नहीं रहता।

जब मनुष्यको पता लग जाता है कि यह साँप है, तब उसे वह छूता नहीं। भोग भी साँपके समान हैं। भोग भोगना साँपको पकड़नेके समान ही अनिष्टकारक है। धनादि पदार्थोंका संग्रह करना कूड़ा-करकट इकट्ठा करनेके समान है। संग्रहसे अपना कोई वास्तविक और सदा रहनेवाला हित सिद्ध नहीं होगा। भोग और संग्रह—दोनों ही अपनेतक नहीं पहुँचते। अत: इनसे अपना बिलकुल भी सम्बन्ध नहीं है।

भोगोंसे सम्बन्धजन्य सुख होता है और संग्रहसे अभिमानजन्य सुख होता है। इन दोनों सुखोंमें जो आसक्त है अर्थात् इनके पराधीन है, वह कभी पूर्ण सुखी नहीं हो सकता—‘पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं।’ (मानस १।१०१।३)। वास्तविक सुख स्वाधीन होनेमें ही है। परंतु भोग और संग्रहमें आसक्त होनेके कारण मनुष्य पराधीनतामें भी सुखका अनुभव करता है। वह सोचता है कि मेरे पास रुपये हैं तो मैं स्वाधीन हूँ पर वास्तवमें वह पराधीन ही है।

एक स्त्रीने मुझसे कहा कि ‘मैं पुरुष होती तो बड़ा अच्छा रहता। मुझे इस बातका दु:ख है कि स्त्रीको पुरुषके पराधीन रहना पड़ता है। स्वाधीन रहनेके कारण पुरुष व्यापार आदिसे अच्छी तरह धन कमा सकता है पर स्त्री ऐसा नहीं कर सकती!’

मैंने उससे कहा कि ‘तुम धनकी प्राप्तिमें स्वतन्त्रता मानती हो कि मेरे पास धन हो जाय तो मैं स्वतन्त्र हो जाऊँ पर यह बताओ कि धन ‘स्व’ है या ‘पर’? उसने कहा कि ‘धन’ तो ‘पर’ है, ‘स्व’ तो है नहीं।’

मैंने पूछा कि ‘धनकी परतन्त्रता और पुरुषकी परतन्त्रता—दोनोंमें सबसे अधिक परतन्त्रता किसकी है?’ उस स्त्रीकी बुद्धि तेज थी। उसने तुरंत कहा कि ‘सबसे अधिक परतन्त्रता धनकी ही है। इसलिये पुरुषके अधीन रहना ही अच्छा है।’

धन तो जड है। उसकी परतन्त्रतासे तो चेतन पुरुषकी परतन्त्रता ही अच्छी है। पुरुष तो माता, पिता या पति होगा पर धन माता, पिता या पति नहीं होता। इसमें भी माता, पिता या पतिकी परतन्त्रता हमें वास्तवमें स्वतन्त्र बनानेवाली है। उनकी पराधीनतामें भी महान् स्वतन्त्रता भरी पड़ी है। एक उनके पराधीन नहीं होनेसे हमें अनेकोंके पराधीन होना पड़ेगा और एक उनके पराधीन रहें तो हम वास्तवमें स्वाधीन हो जायँगे।

लोग सोचते हैं कि हमारे पास लाखों-करोड़ों रुपये हो गये तो हम स्वतन्त्र (बड़े) हो गये पर वास्तवमें वे महान् परतन्त्र (छोटे) हो गये। यदि धनके कारण हम बड़े हो गये, तो वास्तवमें हम धनसे छोटे ही हुए। विचार करना चाहिये कि हम चेतन हैं और धन जड है तथा वह धन भी हमारा ही पैदा किया हुआ है। फिर उस धनके कारण अपनेको बड़ा मानना कहाँतक सही है?

इस प्रकार साधकको अपने जीवनपर विचार करके पराधीनता (संसार और शरीरके आश्रय)-का त्याग कर देना चाहिये।