प्रवचन—८
हम यह तो कहते हैं कि मन मेरा है, बुद्धि मेरी है, इन्द्रियाँ मेरी हैं, प्राण मेरे हैं पर यह नहीं कहते कि मैं मन हूँ, मैं बुद्धि हूँ, मैं इन्द्रियाँ हूँ, मैं प्राण हूँ। इससे यह सिद्ध हुआ कि ‘मैं’-पन ‘मेरा’ पनसे अलग है अर्थात् मेरे कहलानेवाले पदार्थोंसे मैं अलग हूँ। विचार करें तो मेरे कहलानेवाले पदार्थ भी वास्तवमें मेरे नहीं हैं, अपितु प्रकृतिके हैं। स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीरके साथ तादात्म्य करनेके कारण ही ये मेरे प्रतीत होते हैं।
अपना स्वरूप स्थूल, सूक्ष्म और कारण—तीनों ही शरीरोंसे अलग है। अत: स्वरूपमें इन शरीरोंकी जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—तीनों ही अवस्थाएँ नहीं हैं। अवस्थाएँ बदलती हैं और स्वरूप नहीं बदलता। स्वरूप इन अवस्थाओंको जाननेवाला है; अत: इनसे अलग है। यदि इन अवस्थाओंको जाननेवाला अवस्थाओंसे अलग न होता तो इन तीनों अवस्थाओंकी गणना कौन करता? और इनके बदलनेको कौन देखता? अवस्थाएँ तीन हैं और ये बदलती हैं—इसमें किसीको भी संदेह नहीं। तात्पर्य यह निकला कि अपना स्वरूप अवस्थाओंसे अलग है।
हम सबका यह अनुभव है कि अवस्थाएँ हमारे बिना नहीं रह सकतीं पर हम अवस्थाओंके बिना रह सकते हैं और रहते भी हैं। जब जाग्रत् से स्वप्न-अवस्थामें जाते हैं, तब उस (जाग्रत् और स्वप्नकी) सन्धिमें कोई अवस्था नहीं होती। इसी प्रकार स्वप्नसे सुषुप्ति-अवस्थामें जाते हैं, तब उस सन्धिमें कोई अवस्था नहीं होती। परंतु उनकी सन्धिमें कोई अवस्था न होनेपर भी हम रहते हैं। स्वप्न-अवस्था चली गयी और जाग्रत्-अवस्था आ गयी, सुषुप्ति-अवस्था चली गयी और जाग्रत्-अवस्था आ गयी—इस प्रकार अवस्थाओंके बदलनेको हम जानते हैं। इससे सिद्ध हुआ कि हम अवस्थाओंसे अतीत हैं।
‘मैं’ शब्दके दो अर्थ हैं—एक सत्तारूप वास्तविक ‘मैं’ और दूसरा माना हुआ ‘मैं’। वास्तविक ‘मैं’ सदा ज्यों-का-त्यों रहता है पर माना हुआ ‘मैं’ किसी भी समय एक नहीं रहता, अपितु बदलता रहता है; जैसे—मैं जागता हूँ, मैं सोता हूँ, मैं धनी हूँ, मैं निर्धन हूँ, मैं विद्वान् हूँ, मैं मूर्ख हूँ, मैं साधु हूँ, मैं गृहस्थ हूँ इत्यादि। यह माना हुआ ‘मैं परस्पर विरुद्ध मान्यता भी करता है; जैसे—पिताके सामने ‘मैं’ पुत्र हूँ’ और पुत्रके सामने ‘मैं पिता हूँ’। अत: यह माना हुआ ‘मैं’ हमारा वास्तविक स्वरूप नहीं है। इस ‘मैं’ को पकड़नेसे ही हम परिच्छिन्न होते हैं; क्योंकि जिसके साथ हम ‘मैं’ मानते हैं, वह परिच्छिन्न (एकदेशीय) है। अपनी वास्तविक सत्तामें परिच्छिन्नता नहीं है।
मानी हुई परिच्छिन्नता मिटानेके लिये साधक ऐसा मान ले कि ‘मैं भगवानका हूँ’ अथवा विवेकपूर्वक यह मान ले कि माना हुआ ‘मैं’ अर्थात् असत् मेरा स्वरूप नहीं है। स्वरूपके प्रकाशमें मन-बुद्धिके समान ‘मैं’ पन भी प्रकाशित होता है। गहरा विचार किया जाय तो ज्ञान (बोध) वस्तुत: असत् का ही होता है, सत् का नहीं। ‘मैं हूँ’ इस प्रकार अपनी सत्ताका ज्ञान तो रहता ही है और इसमें किसीको सन्देह नहीं होता। परन्तु अपनी सत्तामें जो असत् को मिलाया हुआ है, उस असत् का ज्ञान हमें नहीं होता। यह सिद्धान्त है कि असत् का ज्ञान असत् से अलग होनेपर होता है और सत् का ज्ञान सत् से अभिन्न होनेपर होता है; क्योंकि वास्तवमें हम असत् से भिन्न और सत् से अभिन्न हैं। अतएव जिस क्षण असत् का ज्ञान होता है, उसी क्षण असत् की निवृत्ति हो जाती है अर्थात् असत् से अपनी भिन्नताका बोध हो जाता है। असत् से भिन्नताका बोध होते ही सत् में हमारी स्थिति स्वत:सिद्ध है, करनी नहीं पड़ती। वह सत् ही जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—तीनों अवस्थाओंको, उनके परिवर्तनको और उनके अभावको जानता है। जाग्रत् में स्वप्न और सुषुप्तिका अभाव, स्वप्नमें जाग्रत् और सुषुप्तिका अभाव तथा सुषुप्तिमें जाग्रत् और स्वप्नका अभाव होता है। पर अपना अभाव कभी नहीं होता। सब अवस्थाओंमें अपना भाव अर्थात् अपनी सत्ता ज्यों-की-त्यों रहती है। यह सबका अनुभव है। साधकको चाहिये कि वह अपने अनुभवको महत्त्व दे अर्थात् अपने स्वरूपमें अटल भावसे स्थित रहे।
आवत हर्ष न ऊपजै जावत सोक न होय।
ऐसी रहनी जो रहै घर में जोगी होय॥
इस जग की कोई वस्तु न हमें सुहाती।
पल-पलमें श्यामल मूर्ति स्मरण है आती॥
उगा सो ही आथवें फूला सो कुम्हलाय।
चिण्या देवल ढह पड़े जाया सो मर जाय॥