प्रवचन—९

प्राय: साधकोंकी यह धारणा रहती है कि करनेसे ही सब कुछ होता है, इसलिये शुभ कर्म करने चाहिये। यह धारणा बड़ी अच्छी है पर कर्म कर्ताके अधीन होते हैं। अत: कर्ता जैसा होता है, उसके द्वारा कर्म भी वैसे ही होते हैं। कर्मयोग भी निष्काम कर्मसे नहीं होता, अपितु निष्काम कर्तासे होता है; अत: स्मरण, कीर्तन, जप, ध्यान, स्वाध्याय आदि करना बहुत उत्तम है और करना भी चाहिये। परन्तु जप, ध्यानादि कर्म एक तो स्वत: होते हैं और एक करने पड़ते हैं। जबतक कर्तामें भाव नहीं है, तबतक उसे जप, ध्यानादि करने पड़ते हैं। पर भाव होनेसे उसके द्वारा स्वत:स्वाभाविक ही जप, ध्यानादि होते हैं और तेजीसे होते हैं। कर्तामें भाव कैसे आये? इसपर विचार करें।

जहाँ हम ‘मैं हूँ’ इस प्रकार अपने-आपको मानते हैं, वहीं यह मान लें कि ‘मैं भगवान‍्का हूँ’। इस प्रकार जब ‘मैं’-पनमें अटल भाव हो जायगा, तब निरन्तर स्वत: भगवान‍्का भजन होगा। अभी तो घर (संसार)-का काम स्वत: होता है और रात-दिन हरदम होता है। जैसे नौकरी करते हैं तो समयपर जाते हैं और समयपर आते हैं, वैसे ही जप-ध्यानादि भी समयपर करते हैं। तात्पर्य यह है कि जप-ध्यानादि कर्म समयकी सीमामें बँधे रहते हैं। यदि हमारा भाव हो जाय कि ‘मैं भगवान‍्का हूँ और भगवान‍् मेरे हैं’ तो घरके कामकी तरह रात-दिन हरदम भगवान‍्का भजन होगा। भजनके बिना रह नहीं सकेंगे और घर (संसार)-का काम नौकरीकी तरह होगा। अत: कर्तामें परिवर्तन होनेसे कर्मोंमें स्वत:स्वाभाविक और शीघ्रतासे परिवर्तन हो जाता है।

साधकसे भूल यह होती है कि वह ‘मैं हूँ’ के स्थानपर अपने नाम, वर्ण, आश्रम, जाति, सम्प्रदाय आदिको बैठा देता है, और मैं अमुक नामवाला हूँ, मैं अमुक वर्णवाला हूँ, मैं साधु हूँ, मैं गृहस्थ हूँ आदि अनेक मान्यताएँ कर लेता है। ऐसी मान्यताओंके कारण साधनकी सिद्धिमें विलम्ब होता है। कारण कि ये मान्यताएँ ‘मैं’ में रहती हैं और भगवान‍्का भजन (उपासना) ‘कर्म’ में रहता है। साधकको चाहिये कि वह ‘मैं भगवान‍्का हूँ’—इस प्रकार ‘मैं’ में भगवान‍्को रखे और वर्णाश्रम आदिको ‘कर्म’ में रखे। तात्पर्य यह है कि भीतरसे ‘मैं तो भगवान‍्का हूँ’ ऐसा मानते हुए बाहरसे नाटकमें स्वाँगकी तरह अपने वर्णाश्रम आदिके कर्तव्यका पालन करता रहे।

जहाँ साधक ‘मैं हूँ’ मानता है, वहाँ भगवान‍् उससे भी अधिक सूक्ष्मरूपसे विराजमान हैं। ‘मैं हूँ’ क्षेत्रज्ञ अर्थात् क्षेत्र (शरीर)-को जाननेवाला (गीता १३। १) और भगवान‍् कहते हैं कि सब क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञ मैं ही हूँ—‘क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।’ (गीता१३। २)। तात्पर्य यह कि क्षेत्रज्ञ तो केवल एक शरीरके साथ सम्बन्ध रखनेवाला है पर क्षेत्रज्ञमें जो परमात्मा हैं उनका किसी शरीरके साथ सम्बन्ध नहीं है और सबमें परिपूर्ण होनेके कारण उनका सबसे सम्बन्ध है! वे ही वास्तवमें अपने हैं। हम जिस शरीरको अपना मानते हैं, वह कभी अपना था नहीं, है नहीं और रहेगा नहीं। पर परमात्मा अपने थे, अपने हैं और अपने रहेंगे। वे अपनेसे कभी विमुख नहीं हुए। हम ही उनसे विमुख हुए हैं। वे परमात्मा बड़े मधुर हैं, बड़े प्रिय हैं और वे अपनेमें हैं—ऐसा माननेपर वे याद किये बिना ही याद रहेंगे, भजन किये बिना ही उनका भजन होगा, चिन्तन किये बिना ही उनका चिन्तन होगा। उनमें स्वत: ऐसी प्रियता होगी, जैसी अपने शरीरमें और अपने जीते रहनेमें भी नहीं है।

‘मैं हूँ’ में जो ‘हूँ’ है, वह शरीरको लेकर है। उस ‘हूँ’ में ‘है’ रूपसे परमात्मा ही हैं। तू है, यह है, वह है—सब जगह परमात्मा ही ‘है’-रूपसे विद्यमान हैं। जड और चेतनमें, स्थावर और जंगममें, उत्पत्ति, स्थिति और विनाशमें, भाव और अभावमें—सब जगह वे परमात्मा ज्यों-के-त्यों हैं। साधक यदि ‘हूँ’ का त्याग कर दे अर्थात् ‘मैं’ (अहंता)-को मिटाकर सामान्य सत्तामें स्थित हो जाय (जो वास्तवमें है) और ‘है’ रूपसे विद्यमान परमात्माको अपना मान ले, तो फिर उनकी विस्मृति नहीं होगी। जप-ध्यानादि भी स्वत: होंगे, करने नहीं पड़ेंगे। अपनेमें प्रभु स्वत: हैं, बनावटी नहीं हैं। जो अपनेमें स्वत: है, उसकी ओर दृष्टि करनेमें देरी किस बातकी? अपनेमें प्रभुको देखनेवाला कौन है? जो क्षेत्रको देखता था, वही अपनेमें प्रभुको देखता है। जिसका अंश है, उसीको देखता है। अपने अंशीको देखते ही वह अंशीमें मिल जाता है।

अंशीमें मिलनेके दो तरीके हैं—अभेदपूर्वक और अभिन्नतापूर्वक। पहले अभेद होता है, फिर अभिन्नता होती है। अभेदमें भेदकी कुछ गन्ध रहती है पर अभिन्नतामें यह नहीं रहती। अभिन्नता वास्तविक है। अभिन्नता भेद-उपासनामें भी होती है और अभेद-उपासनामें भी होती है। भेदमें अभिन्नता ऐसे होती है कि जैसे कहींका लड़का और कहींकी लड़की गृहस्थमें आकर एक हो जाते हैं तो भिन्न-भिन्न होनेपर भी उनमें अभिन्नता हो जाती है। इसी प्रकार दो मित्रोंमें भी अभिन्नता होती है। भिन्न-भिन्न होते हुए भी अभिन्न हो जाना ‘ज्ञान’ है और अभिन्न होते हुए भी भिन्न-भिन्न हो जाना ‘भक्ति’ है।

स्वयं (स्वरूप) परमात्मासे अभिन्न है, परंतु संसार और शरीरसे सम्बन्ध माननेके कारण परमात्मासे भिन्नता प्रतीत होती है। अत: संसार और शरीरसे विमुख हो जायँ कि यह ‘मैं’ नहीं और ‘मेरा’ नहीं; और ‘मैं’ प्रभुका हूँ और प्रभु ‘मेरे’ हैं—इस प्रकार परमात्माके सम्मुख हो जायँ। सम्मुख होते ही उनसे अभिन्नता हो जाती है। अभिन्नताके बाद फिर बड़ा विचित्र आनन्द है। वह (द्वैत) अद्वैतसे भी सुन्दर है—‘भक्त्यर्थं कल्पितं द्वैतमद्वैतादपि सुन्दरम्’। वहाँ केवल आनन्द-ही-आनन्द है, मस्ती-ही-मस्ती है। उसे प्राप्त करना चाहें तो अभी कर सकते हैं। प्राप्त क्या करना है, वह तो प्राप्त ही है। केवल दृष्टि उधर करनी है। इतनी सीधी, सरल और श्रेष्ठ बात कोई नहीं है। गीतामें भगवान‍् कहते हैं—

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वत:।

ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्॥

(१८।५५)

‘पराभक्तिके द्वारा वह मुझ परमात्माको, मैं जो हूँ और जितना हूँ, ठीक वैसा-का-वैसा तत्त्वसे जान लेता है तथा उस भक्तिसे मुझे तत्त्वसे जानकर तत्काल ही मुझमें प्रविष्ट हो जाता है।’

‘विशते तदनन्तरम्’ पदोंका यह अभिप्राय है कि भगवान‍्को तत्त्वसे जानने अर्थात् उनका अनुभव होनेके बाद फिर उनसे अभिन्न होनेमें एक क्षणका भी अन्तर नहीं पड़ता। शरीर-संसारसे माना हुआ सम्बन्ध छूटते ही ज्यों-के-त्यों विद्यमान परमात्माका अनुभव हो जाता है। उनका अनुभव होते ही तत्काल भिन्नता मिट जाती है। वास्तवमें भिन्नता है ही नहीं, तभी वह मिटती है। यदि वास्तवमें भिन्नता होती, तो उस (सत् )-का अभाव कैसे होता?

असत् (संसार)-में जो आकर्षण या प्रियता है, वह ‘आसक्ति’ कहलाती है। वही आकर्षण भगवान‍्में हो जाय, तो उसे ‘भक्ति’ या ‘प्रेम’ कहते हैं। धनमें, भोगोंमें, परिवार आदिमें जो हमारा खिंचाव है, वह खिंचाव भगवान‍्की तरफ होते ही भक्ति हो जाती है। वास्तवमें अपनेमें भक्तिका संस्कार—भगवान‍्का खिंचाव स्वत: है, पर असत् से सम्बन्ध जोड़नेसे असत् की ओर खिंचाव हो गया। लक्ष्य (परमात्मा)- की प्राप्ति होनेपर असत् का खिंचाव सर्वथा मिट जाता है।

अब के सुलताँ फनियान समान हैं,

बाँधत पाग अटब्बर की।

तजि एकहिं दूसरे को जो भजै,

कटि जीभ गिरै वा लब्बर की॥

सरनागति ‘श्रीपति’ श्रीपतिकी,

नहिं त्रास है काहुहि जब्बर की।

जिनको हरि की परतीति नहीं,

सो करौ मिलि आस अकब्बर की॥