शीघ्र भगवत्प्राप्ति कैसे हो?
प्रवचन—१७
साधकोंके सम्मुख दो बातें विशेषरूपसे आती हैं—एक संसारकी और दूसरी परमात्माकी। संसार नाशवान् है और परमात्मा अविनाशी हैं। संसारके सम्बन्धसे दु:ख-ही-दु:ख होता है और परमात्माके सम्बन्धसे आनन्द-ही-आनन्द होता है, दु:खका लेश भी नहीं होता। संसारका आश्रय कभी टिकता ही नहीं है और परमात्माका आश्रय कभी मिटता नहीं है। इन बातोंको हम संत-महापुरुषोंसे सुनते हैं, वेद-पुराणादि शास्त्रोंमें पढ़ते हैं और स्वयं मानते भी हैं, परन्तु ऐसा मानते हुए भी हमारा दु:ख दूर क्यों नहीं हो रहा है? हमें परम आनन्दकी प्राप्ति क्यों नहीं हो रही है? हमें भगवान् क्यों नहीं मिल रहे हैं?
अभी जैसे ‘हरि: शरणम्, हरि: शरणम्’ कीर्तन हुआ तो भगवान्के चरणोंकी शरण लेना बहुत ही बढ़िया बात है, क्योंकि संसारका आश्रय टिकेगा नहीं, भगवान्का आश्रय ही टिकेगा। ये बातें सुनते हैं, समझते हैं, मानते हैं, फिर भी वह गुत्थी कहाँ उलझी हुई है जो सुलझती नहीं है। इस समस्यापर हमें गम्भीरतापूर्वक विचार करना है।
इस विषयमें अनेक बातें कही जा सकती हैं; परन्तु एक बातपर हमें विशेष ध्यान देना है। वह यह है कि बातें सुनने, पढ़नेसे केवल बौद्धिक या बातूनी ज्ञान होता है। परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें अपनी उत्कट अभिलाषा ही काम आती है, बौद्धिक या बातूनी ज्ञान कुछ भी काम नहीं आता। जिस दिन हमें संसारका सम्बन्ध सुहायेगा नहीं और हम परमात्माके बिना रह सकेंगे नहीं, उसी दिन हमें परमात्माकी प्राप्ति हो जायगी।
संसार असत्य है—ऐसा मानते हुए भी यदि हम सांसारिक सुख-भोगोंको भोगते रहेंगे तो उससे हमें कोई लाभ नहीं होगा। परमात्मा सत्य हैं, उनका नाम सत्य है—ऐसा कहनेमात्रसे कोई विशेष लाभ नहीं होगा। उलझन ज्यों-की-त्यों ही बनी रहेगी। इस उलझनको तभी मिटाया जा सकता है, जब हमारी वर्तमान समस्या यही बन जाय कि संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद कैसे हो? परमात्माकी प्राप्ति कैसे हो?
यह ठीक है कि हम परमात्माकी प्राप्ति चाहते हैं; तत्त्वज्ञान चाहते हैं; मुक्ति चाहते हैं; भगवान्के दर्शन चाहते हैं, भगवत्प्रेम चाहते हैं; परन्तु हमारी इस चाहकी सिद्धिमें एक बहुत बड़ी बाधा हमारी यह मान्यता है कि ‘भविष्यमें काफी समयके बाद—भगवत्प्रेम होगा; समय लगेगा; तब कहीं भगवान् दर्शन देंगे; समय पाकर ही तत्त्वज्ञान होगा, परमात्माकी प्राप्तिमें तो समय लगेगा’ इत्यादि। यह जो भविष्यकी आशा है कि फिर होगा, वही परमात्मप्राप्तिमें सबसे बड़ी बाधा है! सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्तिके लिये तो भविष्यकी आशा करना उचित है; क्योंकि सांसारिक पदार्थ सदा सब जगह विद्यमान नहीं हैं, परन्तु सच्चिदानन्दघन परमात्मा तो सम्पूर्ण देश, काल, वस्तु और व्यक्तिमें विद्यमान हैं, उनकी प्राप्तिमें भविष्यका क्या काम? इस तथ्यकी ओर प्राय: साधकोंका ध्यान ही नहीं जाता। वे यही मान बैठते हैं कि ‘इतना साधन करेंगे; इतना नाम-जप करेंगे; ऐसी-ऐसी वृत्तियाँ बनेंगी; इतना अन्त:करण शुद्ध होगा, इतना वैराग्य होगा; भगवान्में इतना प्रेम होगा; ऐसी अवस्था होगी, ऐसी योग्यता होगी—तब कहीं परमात्माकी प्राप्ति होगी! इस प्रकारकी अनेक आड़ें (रुकावटें) साधकोंने स्वयं ही लगा रखी हैं यही महान् बाधा है।
जिस दिन साधकके भीतर यह उत्कट अभिलाषा जाग्रत् हो जाती है कि परमात्मा अभी ही प्राप्त होने चाहिये अभी, अभी.....अभी! उसी दिन उसे परमात्मप्राप्ति हो सकती है! साधककी योग्यता, अभ्यास आदिके बलपर परमात्माकी प्राप्ति हो जाय—यह सर्वथा असम्भव है। परमात्माकी प्राप्ति केवल उत्कट अभिलाषासे ही हो सकती है।
आप सगुण या निर्गुण, साकार या निराकार—किसी भी तत्त्वको मानते हों, उसके बिना आपसे रहा नहीं जाय उसके बिना चैन न पड़े। भक्तिमती मीराबाईने कहा है—
हेली म्हाँस्यूँ हरि बिन रह्यो न जाय॥
‘हे सखी! मुझसे हरिके बिना रहा नहीं जाता।’
निर्गुण-उपासकोंने भी यही कहा है—
दिन नहिं भूख रैन नहिं निद्रा,
छिन-छिन व्याकुल होत हिया,
चितवन मोरी तुमसे लागी पिया।
तत्त्वकी प्राप्तिके बिना दिनमें भूख नहीं लगती और रातमें नींद नहीं आती! आप कैसे मिलें! क्या करूँ? हृदयमें क्षण-क्षण व्याकुलता बढ़ रही है। उसे छोड़कर और कुछ सुहाता नहीं।
सन्तोंने भी कहा है—
‘नारायण’ हरि लगन में ये पाँचों न सुहात।
‘विषय भोग, निद्रा हँसी, जगत प्रीति, बहु बात॥
ये विषयभोगादि पाँचों चीजें जिस दिन सुहायेंगी नहीं, अपितु कड़वी अर्थात् बुरी लगेंगी, भगवान्का वियोग सहा नहीं जायगा। उसी दिन प्रभु मिल जायँगे। इतने प्यारे भगवान्! इतने प्रियतम परमात्मा! जिनके समान कोई प्यारा हुआ नहीं, है नहीं, होगा नहीं, हो सकता नहीं, ऐसे अपने प्यारे प्रभुके वियोगमें हम दिन बिता रहे हैं! उनके मिले बिना ही हम सुखसे रह रहे हैं!
भगवान् कहते हैं इतनेसे ही काम चलाओ औरकी जरूरत नहीं है, इसलिये चाह पूरी नहीं करते। परन्तु जो भगवान्के लिये दु:खी हो जायगा उसका दु:ख भगवान्से नहीं सहा जायगा। उनके मिले बिना ही हम नींद लेते हैं, आराम करते हैं! बड़ा काला दिन है। इस प्रकार यदि उस प्रभुके बिना क्षण-क्षणमें महान् दु:ख होने लगे, प्राण छटपटाने लगें तो भगवान् उसी समय मिल जायँगे। उनके मिलनेमें देरी नहीं है। भक्तका भगवत्प्राप्ति-विषयक दु:ख वे सह नहीं सकते। वे कृपाके समुद्र हैं!
फिर भी संसार दु:खी है न! संसार तो दु:खके लिये ही दु:खी हो रहा है। इसे दु:ख चाहिये, इसे आफत और चाहिये, धन और चाहिये, बेटा-पोता और चाहिये! भगवान्के लिये अगर दु:खी हो जाय तो वे तुरन्त आ जायँगे। इसके लिये भीतर एकमात्र यही लगन पैदा हो जाय कि भगवान्के दर्शन कैसे हों? भगवान् कैसे मिलें? क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? ऐसी छटपटाहट तो लगे!
भगवान् प्राणिमात्रका आकर्षण कर रहे हैं—उन्हें खींच रहे हैं, इसीलिये उन्हें कृष्ण कहते हैं। प्राणी जिस अवस्था या परिस्थितिमें रहता है, उसमें भगवान् उसे टिकने नहीं देते—यही उनका खींचना है! यह भगवान्का बुलावा है कि मेरे पास आओ! गीतामें भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं।
आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥
(८।१६)
‘हे अर्जुन! ब्रह्मलोकपर्यन्त सब लोक पुनरावर्ति अर्थात् जिनको प्राप्त होकर पीछे संसारमें आना पड़े, ऐसे हैं, परन्तु हे कौन्तेय! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता।’
तात्पर्य यह है कि भगवत्प्राप्तिके बिना मनुष्य कहीं भी टिकता नहीं है और बारंबार संसारमें ही घूमता रहता है। भगवान्को प्राप्त होनेपर ही मनुष्य टिकता है।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥
(गीता १५। ६)
‘जहाँ जानेपर मनुष्य लौटकर नहीं आता, वह मेरा परमधाम है।’
आप चाहे कितनी भी शक्ति लगा लें, न तो शरीर सदा रहेगा और न कुटुम्बी ही सदा रहेंगे। संसारकी कोई भी वस्तु आपके पास सदा नहीं रहेगी। कारण यही है कि भगवान् निरन्तर आपको खींच रहे हैं। यह उनकी हमपर महान् कृपा है! अतएव यदि आप संसारसे विमुख हो जाओगे तो भगवान्की प्राप्ति हो जायगी और आप सदाके लिये सुखी हो जाओगे। यदि संसारमें ही रचे-पचे रहे तो दु:खका अन्त कभी आयेगा ही नहीं और नित्य नया-से-नया, तरह-तरहका दु:ख मिलता ही रहेगा।
यह बड़े दु:खकी बात है कि लोग भगवान् और सन्त-महात्माओंसे भी सांसारिक सुख माँगते हैं! दान-पुण्यादि करके भी बदलेमें सांसारिकभोग चाहते हैं। परमात्मतत्त्वको बेचकर बदलेमें महान् दु:खोंके जालरूप संसारको खरीद लेते हैं। यह महान् कलंककी बात है! गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं—
एहि तन कर फल बिषय न भाई।
स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥
नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं।
पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं॥
(मानस ७। ४३। १)
मूर्ख लोग अमृतको देकर बदलेमें जहर ले लेते हैं। परमात्मप्राप्तिके लिये मिले हुए इस मनुष्य-शरीरमें नाशवान् सांसारिक पदार्थोंकी माँगका रहना बड़ी लज्जाकी बात है। यदि आप कहें कि इस माँगके बिना हमसे रहा नहीं जाता तो आप आर्त होकर भगवान्से प्रार्थना करें कि हे प्रभो! यह भोग-पदार्थोंकी माँग हमसे मिटती नहीं है, अतएव आप ही इसे मिटा दें। यदि आपकी यह प्रार्थना सच्ची होगी तो भगवान् अवश्य मिटा देंगे। परन्तु आप तो भोग-पदार्थोंमें और उसकी माँगमें रस लेते हैं, उनमें प्रसन्न होते हैं आपकी मिटानेकी इच्छा ही नहीं है फिर माँग मिटे कैसे?
भगवान्के समान कोई भी नहीं है। अर्जुन भगवान्से कहते हैं।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिक: कुतोऽन्यो
लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव॥
(गीता ११। ४३)
‘हे अनुपम प्रभाववाले प्रभो! तीनों लोकोंमें आपके समान भी दूसरा कोई नहीं है, फिर अधिक तो कैसे हो सकता है।’
ऐसे सर्वोपरि भगवान्को प्राप्त करनेके लिये हमारे भीतर उत्कट अभिलाषा होनी चाहिये। वे कितने मधुर हैं। जब वे हाथोंमें वंशी लेकर त्रिभंगीरूपमें खड़े होते हैं तो कितने प्यारे लगते हैं। उनमें कितना आकर्षण है! कितनी प्रियता है! साधक यदि थोड़ा भी उनका ध्यान करे तो विह्वल हो जाय। उसकी वृत्ति संसारकी तरफ जा ही न सके।
‘नारायन’ बिना मोल बिकी हों
याकी नैक हसन में।
‘मोहन बसि गयो मेरे मन में।
वे प्रभु यदि थोड़ा-सा भी मुसकरा दें तो आपका सब कुछ समाप्त हो जायगा; शेष कुछ भी नहीं बचेगा। आपको कुछ नहीं करना पड़ेगा। प्रेम, ज्ञान, मुक्ति आदिका उसके सम्मुख कोई मूल्य नहीं। संतोंने कहा है—
चाहै तू योग करि भृकुटी-मध्य ध्यान धरि,
चाहै नाम रूप मिथ्या जानिकै निहारि लै।
निर्गुन, निर्भय, निराकार ज्योति व्याप रही,
ऐसो तत्त्वज्ञान निज मन में तू धारि लै॥
‘नारायन’ अपने कौ आप ही बखान करि,
मोतें, वह भिन्न नहीं, या विधि पुकारि लै।
जौलौं तोहि नंद कौ कुमार नाहिं दृष्टि परॺो,
तौलौं तू भलै ही बैठि ब्रह्म को विचारि लै॥
उस नन्दकुमारमें इतना आकर्षण है कि एक बार उसके दृष्टिगोचर होनेपर फिर ब्रह्म-विचार करनेकी शक्ति ही नहीं रहती। ऐसे प्रभुके रहते हुए हम नाशवान् एवं दु:ख देनेवाले सांसारिक पदार्थोंमें फँसे हुए हैं और फँस ही नहीं रहे हैं उनकी माँग कर रहे हैं। मान-बड़ाई, आराम, निरोगता, सुख-सुविधा, धन-सम्पत्ति आदि अनेक प्रकारके भोग्य पदार्थोंको चाहते हैं—यह बड़ी भारी बाधा है।
यदि भगवत्प्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा जाग्रत् न भी हो तो भी आप घबरायें नहीं। भगवान् कहते हैं—‘व्यवसायात्मिकाबुद्धिरेकेह’ (गीता २। ४१) ‘निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है’। अतएव आप यही दृढ़ निश्चय कर लें कि हम तो एक भगवान्की तरफ ही चलेंगे। यदि केवल भगवान्की तरफ चलनेकी इस अभिलाषाको ही विचारपूर्वक जाग्रत् रखा जाय तो यह अभिलाषा अपने-आप उत्कट हो जायगी। इसका कारण यह है कि प्रभुकी अभिलाषा सही है और संसारकी अभिलाषा गलत है। हम भी (स्वरूपत:) अविनाशी हैं। परमात्मा भी अविनाशी है और परमात्मप्राप्तिकी अभिलाषा भी अविनाशी है। परन्तु संसार और संसारकी अभिलाषा—दोनों ही नाशवान् हैं। परमात्मविषयक अभिलाषा यदि थोड़ी-सी भी जाग्रत् हो जाय तो वह बड़ा भारी काम करती है।
अपने-अपने इष्टदेवके स्वरूपका ध्यान करते हुए आप इसी समय हे नाथ! हे नाथ! ऐसे पुकारते हुए शान्त...... चुपचाप...... उनके चरणोंमें गिर जायँ। ऐसा मान लें कि हम उनके चरणोंमे ही पड़े हैं और सदा उनके चरणोंमें ही पड़े रहना है। इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं करना है, क्योंकि करनेके आधारपर भगवान्को खरीदा नहीं जा सकता। उनकी प्राप्तिमें अपनेको कभी अयोग्य न माने। जो सर्वथा अयोग्य या अनधिकारी होता है वही भगवच्चरणोंकी शरण होनेका अधिकारी होता है। जिसको संसारमें कोई पद या अधिकार नहीं मिलता, वह परमात्मप्राप्तिका अधिकारी होता है। भगवान्के चरणोंमें गिर जाना बहुत बड़ा भजन है। इसलिये ऐसा मानते हुए उनके चरणोंमें गिर जायँ कि यह हाड़-मांसका अपवित्र शरीर तथा मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ हमारे नहीं हैं और हम उनके नहीं हैं। हमारे केवल प्रभु हैं और हम केवल प्रभुके हैं।
पूरी गीता कहनेके बाद भगवान्ने सम्पूर्ण गोपनीयोंसे भी अतिगोपनीय बात यह कही—
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥
‘सम्पूर्ण धर्मों (कर्तव्यकर्मोंके आश्रय)-को त्यागकर केवल एक मेरी शरणमें आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा। तू शोक मत कर।’
इसलिये दूसरे सब आश्रय त्यागकर एक प्रभुका ही आश्रय ले लें, क्योंकि यही टिकेगा, दूसरे आश्रय तो कभी टिक ही नहीं सकते।
अंतहि तोहि तजैंगे पामर!
तू न तजै अब ही ते।
मन पछितैहैं अवसर बीते॥