भोग और त्याग

आधुनिक मनोविज्ञानके विश्लेषण (New Psycho-analysis)-का सिद्धान्त यह प्रतिपादित करनेकी भरपूर चेष्टा कर रहा है कि ‘भोगोंको अतिमात्रामें भोग लेनेसे ही शान्ति मिलती है और तभी भोगोंसे हमारी विरति होती है। इस मतके अनुसार मनुष्य भोगोंसे भागकर उनसे पिण्ड नहीं छुड़ा सकता। भाग जानेपर भी वह बार-बार उनमें फँसेगा, इसलिये आवश्यक है कि भोगोंको खूब भोगकर, उनका खूब अनुभव करके, उनके आनन्द और उपभोगकी अतिमात्राके कारण विरसताका भी अनुभव करके उन्हें सदाके लिये छोड़ दिया जाय। भोगोंका अतिभोग ही सच्ची विरक्ति ला सकता है न कि उसके प्रति अज्ञान या अवहेलना।’

दूसरा मत जो हमारे यहाँ बहुत ही प्राचीन कालसे चला आ रहा है और जिसकी घोषणा हमारे शास्त्र और सन्त डंकेकी चोट कर रहे हैं—यह है कि भोगोंके त्यागसे ही शान्ति मिल सकती है; भोगोंकी कोई इति नहीं। अस्तु उनसे अलग हो जाना ही, उनको त्याग देना ही कल्याणकामियोंके लिये सर्वथा उचित तथा उपादेय है। इस मतके लोगोंका कथन यह है कि भोगोंकी अतिसे क्षणिक विरति भले ही हो, पर बार-बार मन उनमें फिर भी जा सकता है।

दोनों ही मत अपने-अपने विचारसे ठीक हैं; क्योंकि एक बात तो दोनोंमें ही है और वही मुख्य है—वह है शान्तिकी इच्छा। किसी प्रकार हो, लोग शान्तिकी खोजमें हैं, शान्ति चाहते हैं और उसी शान्तिके लिये भिन्न-भिन्न मार्ग तथा मत स्थापित करते हैं। भगवान‍्ने गीताजीमें शान्ति-प्राप्तिके बहुत-से उपाय विभिन्न अधिकारियोंके लिये बतलाये हैं, उनमेंसे एक यह है—

विहाय कामान् य: सर्वान् पुमांश्चरति नि:स्पृह:।

निर्ममो निरहंकार: स शान्तिमधिगच्छति॥

(२। ७१)

इस श्लोकमें भगवान‍्ने चार बातें बतलायी हैं—जो पुरुष (१) सम्पूर्ण कामनाओंको त्यागकर, (२) सर्वथा ममतारहित होकर, (३) अहंकाररहित और (४) स्पृहारहित हुआ बर्तता है, वह शान्तिको प्राप्त करता है और जब भीतर शान्ति नहीं है, चित्त अशान्त है, तब सुख कहाँ—‘अशान्तस्य कुत: सुखम्?’ मनमें किसी कामनाका उदय होना ही यह सूचित करता है कि कोई अभाव है। अभावके बोधमें ही प्रतिकूलता है और प्रतिकूलता ही अशान्ति है—दु:ख है। कामना दो प्रकारकी होती है—(१) प्रतिकूल वस्तु है तो उसका नाश हो जाय, (२) अनुकूल वस्तु नहीं है तो वह मिल जाय। ये दो प्रकार के अभाव होते हैं—एकमें प्रतिकूलके नाशका अभाव है, दूसरेमें अनुकूलके न होनेसे अभाव है, यह अभावका बोध ही प्रतिकूलता है और प्रतिकूलता ही दु:ख है। जहाँतक कामना है, वहाँतक अभावका अनुभव है। अभाव ही प्रतिकूलता और प्रतिकूलता ही अभाव है। अत: जहाँतक इन कामनाओंका नाश नहीं हो जाता, वहाँतक शान्ति नहीं मिल सकती।

कामनाके नाशके लिये ही उपर्युक्त दोनों मार्ग हैं—भोगोंको भोगना, अतिमात्रामें भोगना, इतना कि भोगते-भोगते उनकी ओरसे मन ऊब जाय—हट जाय और दूसरा यह कि भोग-कामनाको उगने ही नहीं देना, आरम्भसे ही भोगोंका त्याग कर देना। दृष्टिभेदसे दोनों ही ठीक हैं। एक ही वस्तु एक ही व्यक्तिको हर समय बार-बार दी जायगी तो वह कभी-न-कभी उससे अवश्य ही ऊब जायगा। यदि किसी व्यक्तिको खीर खानेकी इच्छा है तो उसे हर समय यदि केवल खीर ही खानेको दी जाय तो वह ऊब उठेगा, खीरसे घबरा जायगा। इसी प्रकार स्त्री-सुख है। यदि किसी पुरुषको खाने-पीनेको कुछ भी न दिया जाय और रात-दिन केवल स्त्री-सम्भोगकी ही छुट्टी दे दी जाय तो वह उससे शीघ्र ही ऊब उठेगा। भोगोंको अतिमात्रामें पानेसे उनसे स्वाभाविक ही अरुचि होती है।

परन्तु एक बात स्मरण रखनेकी है और वह यह कि कामनाके प्रधानतया दो रूप होते हैं—वासना और इच्छा। जबतक मनमें वासना है, तबतक इच्छा भी होगी ही। वासना सूक्ष्म है, इच्छा स्थूल है। जबतक वासना नष्ट नहीं होती, तबतक यह सर्वथा सम्भव है कि कुछ समय बाद वह स्थूल रूपमें इच्छा बनकर फिर जाग उठे। खीर अधिक खा लेनेसे आज हमारी तृप्ति हो जाती है और उस समय उससे हमारी अरुचि हो जाती है; हम और नहीं चाहते; पर यदि हमारे मनसे उसकी वासना न मिटी तो कुछ दिनों बाद फिर खीरके स्वादका स्मरण आयेगा और हम उसे पाना चाहेंगे। ठीक यही बात स्त्री-सम्भोगकी भी है। आज उसकी अतिमात्राके कारण उससे भले अरुचि हो जाय, पर महीने-दो-महीनेमें फिर वह वासना धर दबायेगी और उस समय पहलेकी विरतिका स्मरणतक भी नहीं होगा। चित्त जब मुरझाया हुआ होता है, उस समय मनमें ऐसा भासता है कि भीतर भोगकी गन्ध भी नहीं है, पर अवसर और अनुकूल संयोग पाते ही दबी हुई वासना उदय हो ही जाती है। बीमारीकी हालतमें चित्त भोगोंसे हटता है, पर बीमारी बीतनेके बाद फिर वही चाट। अघा जानेपर एक बार विषयोंसे जो उपरति होती है, वह विषयोंसे हमारी स्थायी विरक्ति है, ऐसा नहीं कहा जा सकता; क्योंकि यदि वासनाका सर्वथा नाश हो गया होता तो फिर वह उगती कहाँसे? भोगोंको अधिक भोग लेनेसे मनमें जो तात्कालिक विरति होती है, वह स्थायी नहीं कहला सकती।

इसी प्रकार बलात् भोगोंके त्यागकी बात है। उनका हम हठसे त्याग करते हैं। जबतक वासनाका त्याग नहीं होता, तबतक मन उनपर चलता रहता है। जहाँ उस निग्रहका नियम ढीला हुआ कि फिर मन उसी वस्तुपर चला जाता है। भोगोंका अधिक भोग तथा हठपूर्वक त्याग दोनोंसे ही—जबतक चित्तमें वासना है, तबतक स्थायी और सच्ची विरति या उपरति प्राप्त नहीं होती, अत: तबतक शान्ति-सुख भी नहीं मिल सकते। वासनाका मूल नहीं कटता—किसी कारणसे वह दब-सी जाती है, पर फिर उभर आती है। बहुत बार हम उसे नियमोंके द्वारा दबा देते हैं; पर मन बरबस बार-बार उधर ही जाता है। दोनोंमें ही कामनाका आत्यन्तिक नाश नहीं होता। जबतक अविद्याका—मोहका नाश नहीं होता, तबतक भोगोंका त्याग न हठपूर्वक त्यागसे ही हो सकता है, न अधिक भोगसे ही।

यहाँ सहज ही प्रश्न उठता है कि ‘वासना-नाशके लिये फिर दोनोंमें—अतिभोग और भोगत्यागमें—सही मार्ग कौन-सा है? कौन-सा ऐसा पथ है, जिसके द्वारा हम वासनाका यथार्थत: त्याग कर सकते हों और जो बराबर सुरक्षित हो।’ इसके उत्तरमें इतना तो डंकेकी चोट कहा जा सकता है कि ‘त्यागका मार्ग’ ही श्रेष्ठ है। यही हमारे शास्त्रोंका निचोड़ है, यही हमारे सन्त-महापुरुषोंकी अनुभवपूर्ण अमर वाणी है। भोगोंके भोगनेसे और अधिक प्राप्तिसे भले ही शरीर दुर्बल हो जाय, पर भोगोंकी कामना मिट जाती हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता। जब शरीर अशक्य हो जाय और चित्त व्याकुल हो, तब भले ही कामनाका अभाव-सा प्रतीत हो; परन्तु जहाँ शक्ति हुई कि पुन: वे ही कामनाएँ और भी भयानक रूपमें सामने आ जाती हैं। भोगोंसे भोग-कामनाका उपशमन कभी नहीं होता!

बुझै न काम अगिनि तुलसी कहुँ बिषय भोग बहु घी ते।

राजा ययातिने बहुत भोग भोगे, परन्तु भोगोंसे तृप्ति हुई ही नहीं, तब हारकर कहा—

यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशव: स्त्रिय:।

न दुह्यन्ति मन:प्रीतिं पुंस: कामहतस्य ते॥

न जातु काम: कामानामुपभोगेन शाम्यति।

हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते॥

यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेष्वमंगलम्।

समदृष्टेस्तदा पुंस: सर्वा: सुखमया दिश:॥

या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्जीर्यतो या न जीर्यते।

तां तृष्णां दु:खनिवहां शर्मकामो द्रुतं त्यजेत् ॥

(श्रीमद्भा० ९। १९। १३—१६)

‘जिसका चित्त कामनाओंसे ग्रस्त है, उस पुरुषके मनको पृथ्वीमें जितने भी भोग्यपदार्थ—धान्य, सुवर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं, सब मिलकर भी सन्तुष्ट नहीं कर सकते। विषयके भोगनेसे भोगवासना कभी शान्त नहीं हो सकती, वरं जैसे घीकी आहुति डालनेपर आग और भड़क उठती है, वैसे ही भोगोंकी प्राप्तिसे भोगवासनाएँ भी प्रबल हो जाती हैं। जब मनुष्य किसी भी प्राणी और किसी भी वस्तुके साथ राग-द्वेषका भाव नहीं रखता, तब वह समदर्शी हो जाता है तथा उसके लिये फिर सभी दिशाएँ सुखमयी बन जाती हैं। विषयोंकी तृष्णा ही दु:खोंका उद्भवस्थान है, मन्दबुद्धि मनुष्य बड़ी कठिनाईसे उसका त्याग कर सकते हैं। शरीर बूढ़ा हो जाता है, पर तृष्णा नित्य तरुणी ही बनी रहती है। अत: जो कल्याण चाहता है, उसे शीघ्र-से-शीघ्र इस तृष्णा (भोग-वासना)-का त्याग कर देना चाहिये।’

ज्यों-ज्यों मनचाही चीज मिलने लगती है, त्यों-त्यों मनचाहीकी सीमा और आगे बढ़ती है। यदि भोगोंकी प्राप्तिमें ही वास्तविक तृप्ति होती तो किसी भी अवस्थामें तो मनुष्य यह कहता कि ‘अब और नहीं चाहिये।’ पर देखनेमें आता है कि करोड़पति-अरबपतिमें भी वही हाहाकार है, वही अशान्ति है, वही ‘अभी कुछ और’ की पुकार बनी हुई है। जबतक अविद्याका नाश नहीं होता, तबतक शान्ति कहाँ?

संसारके समस्त सुख-भोग, समृद्धि-वैभव पाकर भी यह जीव तृप्त नहीं होता इसका क्या कारण है? हम सम्राट् भी हो जायँ फिर भी इच्छाओंकी इति नहीं—इसमें क्या हेतु है? यह जीव सच्चिदानन्द है। आत्माका सनातन अंश है, नित्य पूर्ण है, इसकी तृप्ति अपूर्णसे कैसे होगी? यह जिस अवस्थाको प्राप्त करता है, जहाँ भी यह जाता है, सम्राट् होनेपर भी यह देखता है कि वहाँ पूर्णता नहीं। देवराज इन्द्र बन जानेपर भी पूर्णताका बोध नहीं होता। वहाँ भी अतृप्त रहता है। जीवकी यह ‘आत्यन्तिक अतृप्ति’ यह सूचित करती है कि यह उस अवस्थाकी खोजमें है जो नित्य, सत्य, परिपूर्ण, अज, अविनाशी, शाश्वत, सनातन है। जबतक उसकी प्राप्ति नहीं होती तबतक इसे शान्ति नहीं मिलती। यदि भोगोंसे ही वासना मिट जाय तब तो इस सिद्धान्तमें ही बाधा आ जायगी। क्या जीव अपूर्णसे कभी तृप्त होगा? असलमें जीवके लिये इन अपूर्ण वस्तुओंकी प्राप्ति और उनमें रति पूर्णकी प्राप्तिमें बाधक है। ‘असत् में सद‍्बुद्धि, अनित्यमें नित्यबुद्धि, दु:खमें सुखबुद्धि और अपवित्रमें पवित्रबुद्धि’ ही तो अविद्याके लक्षण हैं। जब यह असत् , अपवित्र और दु:खरूपी वस्तु पूर्णकी प्राप्तिमें बाधक है, तब फिर इसीके बलपर—अविद्याका सहारा लेकर जीव अपनी शाश्वती परमानन्द-स्थितिको कैसे प्राप्त करेगा? हमें तो अपने घर पहुँचना है, यदि राहकी ही किसी वस्तुपर हमारा मन लुभा गया और उसीमें हम रम गये, राहमें ही रह गये तो मार्ग छूटा, घरकी ओर बढ़नेसे रुके और घरसे अलग ही रह गये। इसीलिये तो संसारशिखरपर खड़े होकर सन्त-महात्मा हमें चेताते हैं—‘घर लौटो, राहमें न भटको! यह संसार दु:खालय है, अशाश्वत है, अनित्य है, असुख है, इसमें न भरमो।’ भगवान‍्ने कहा है—

‘अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्।

‘इस क्षणभंगुर और सुखरहित संसारको पाकर मुझे भजो।’ तुम्हारा मार्ग न छूटे। रास्ता छोड़कर अन्यत्र न भटक जाओ। दु:खका यह भण्डार है, क्षणभर भी ठहरनेवाला नहीं है! सावधान! भोगोंमें ही जब सुखका, तृप्तिका बोध होने लगेगा, तब मनुष्य वहीं ठहर जायगा। इसका परिणाम? परिणाम तो स्पष्ट है—वह आत्मासे वंचित रह जाता है। ‘घर’ नहीं पहुँचता, बीचमें ही रुक जाता है और भोगोंमें तृप्ति कहाँ? ज्यों-ज्यों भोग मिलते हैं, वासना बढ़ती जाती है। इसीलिये सन्त कहते हैं—इन्हें छोड़ो—‘विषयान् विषवत्त्यज!’ भोगोंको विषके समान त्याग दो! भोगोंसे तृप्ति नहीं होती, हो नहीं सकती।

हमारे मनमें जो स्फुरणा होती है, उसका कारण है—हमारी संचित कर्मराशि। संचित है क्रियमाणकी पूँजी। क्रियमाणकी तहपर तह लग जाती है—कर्मोंकी बड़ी भारी तह लग गयी। इसी कर्मराशिका नाम संचित है, इस संचितसे कुछ सार लेकर प्रारब्ध बनता है। क्रियमाण और प्रारब्धका यही स्वरूप है। स्फुरणा उसी संचितकी अधिक होती है, जो नवीन होता है। जो कर्म आदमी वर्तमानमें करता है उसीका नया संचित बनता है। संचितसे स्फुरणा (कर्मप्रेरणा) उत्पन्न होती है और बार-बार जैसी स्फुरणा होती है प्राय: वैसा ही नया कर्म बनता है। नया कर्म ही संचित बन जाता है, उसीकी फिर स्फुरणा होती है। यों चक्र चलता जाता है। इससे पुराने संचितके पुराने संस्कार दब जाते हैं। जैसे गोदाममें जो माल सबके बाद रखा जाता है, निकालते समय सबसे पहले वही निकलता है। इसी प्रकार अन्तरमें जो अनन्त कर्मराशिकी तह-पर-तह लगी है, उनमेंसे उसीकी स्फुरणा पहले होती है, जो सबसे आगेकी या ऊपरके स्तरका कर्म होता है। जैसे गोदाममें नीचे प्याज दबा है, ऊपर और आगे केसर-कपूर भर दिया जाय तो प्याजकी गन्ध दब जाती है और केसर-कपूरकी आती है। इतना होनेपर भी कभी-कभी वायुके झोंकेसे नीचे दबे प्याजकी भी गन्ध आ जाती है। वैसे ही वर्तमानके शुभ-कर्मोंकी शुभ स्फुरणा होनेपर भी मनमें संचित अशुभ-कर्मोंकी अशुभ स्फुरणा भी कभी-कभी हो ही जाती है। पर यदि मनुष्य लगातार शुभका ही संचय करता जाय तो पुराने कर्म बहुत नीचे दब जाते हैं। इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह बराबर शुभ संगमें रहे और शुभको पकड़े रहे। तो इस प्रकार धीरे-धीरे उसके सारे बुरे कर्म और भाव दबकर नये शुभ और पुण्य भाव उदय होंगे। नवीन कर्म पुरुषार्थप्रधान है। बार-बार सत् पुरुषार्थ करे। यों करते रहनेसे आगे चलकर शुभका एक ऐसा सुन्दर चक्र बन जायगा कि फिर अशुभ होगा ही नहीं और जब शुभ खूब बढ़ जायगा, तब ज्ञानाग्नि उत्पन्न होगी ही। जैसे केसर-कपूरकी प्रचुरता होनेपर कभी रगड़ लगकर आग उत्पन्न हो ही जाती है। ज्ञानाग्नि शुद्ध अन्त:करणमें ही उत्पन्न होती है। ज्ञानाग्नि सारी भली-बुरी कर्मराशिको भस्मकर मनुष्यको सच्ची निष्कर्मता प्रदान करती है। गोदाममें आग लग गयी, बुरा-भला सब भस्म हो गया। यदि हम त्यागके मार्गपर रहें तो सारा जीवन त्यागमय हो जाता है। यदि भोगमें रहें तो फिर नये-नये भोगोंका परिचय, उनमें रुचि, वासना, आसक्ति और उनकी कामना मनमें बढ़ती जाती है और परिणामस्वरूप मनमें उन्हींका संस्कार दृढ़ होता है। इससे निश्चय ही नये-नये पाप होते हैं। मनुष्यको यह निश्चितरूपसे समझ लेना चाहिये कि पाप होनेमें कारण प्रारब्ध नहीं, कामासक्ति है। अर्जुनके पूछनेपर कि ‘इच्छा न होनेपर भी मनुष्यसे बलात् कराये हुएकी भाँति पाप कौन करवाता है?’ भगवान‍्ने कहा—

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव:।

महाशनो महापाप्मा विद‍्ध्येनमिह वैरिणम्॥

(गीता ३।३७)

‘अर्जुन! यह रजोगुण (रागात्मक वृत्ति—आसक्ति)-से उत्पन्न काम (कामना) ही क्रोध है। यह कभी न अघानेवाला (भोगोंसे सदा अतृप्त रहनेवाला) और महान् पापी (पापोंका उत्पादक) है, इस सम्बन्धमें तू इसीको वैरी समझ।’ पापोंकी जड़ है बस भोगकामना।

भगवान‍्ने बतलाया है—

ध्यायतो विषयान् पुंस: संगस्तेषूपजायते।

संगात् संजायते काम: कामात् क्रोधोऽभिजायते॥

क्रोधाद् भवति सम्मोह: सम्मोहात् स्मृतिविभ्रम:।

स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति॥

(गीता २।६२-६३)

(‘मनसहित इन्द्रियोंको वशमें करके उन्हें भगवत्परायण न कर दिया जायगा तो) मनके द्वारा विषयोंका चिन्तन होगा और विषयोंका चिन्तन करनेवाले पुरुषकी उन विषयोंमें भी कामना उत्पन्न होगी, कामनामें विघ्न पड़नेसे क्रोध होगा (और कामना सफल होनेपर लोभ)। क्रोध (या लोभ) बढ़ते ही महान् मूढ़भाव उत्पन्न होगा और मूढ़तासे स्मरणशक्ति नष्ट-भ्रष्ट हो जायगी, स्मृतिके भ्रंश हो जानेसे बुद्धि अर्थात् विवेकशक्तिका नाश हो जायगा और बुद्धिके नाश होनेसे यह श्रेयसाधनसे सर्वथा भ्रष्ट हो जायगा।’ इस प्रकार विषयके स्मरणमात्रसे मनुष्यका सर्वनाश हो जाता है। अच्छे-अच्छे संस्कारवाला पुरुष भी विषयोंके चिन्तनमें लग जाय तो वह महापापी हो जायगा और उधर महापापी भी चित्तके द्वारा विषयोंका चिन्तन छोड़कर भगवान‍्के चिन्तनमें लगे तो वह शीघ्र ही पुण्यात्मा हो जायगा—

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।

‘वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और उसे शाश्वती शान्ति प्राप्त होती है।’ विषयोंके चिन्तनमात्रसे अशान्ति एवं सर्वनाशका द्वार खुल जाता है और भगवान‍्के स्मरणमात्रसे आनन्द और शान्तिका अमृत बरस पड़ता है। यह है महान् अन्तर। विषयोंके चिन्तनका अर्थ है—सर्वनाश। भगवान‍्के शरणका अर्थ है—आत्माको परम शान्तिकी प्राप्ति। भोगका अर्थ है—बार-बार मरना, बार-बार जन्म-मृत्युके चक्‍करमें पड़ना। त्यागका अर्थ है—मृत्युसे आत्यन्तिक निवृत्ति, भगवत्प्राप्ति!

इस प्रकार भोगोंसे भोगका नाश कैसे होगा? ‘छूटइ मल कि मलहि के धोएँ?’ बहादुरीके साथ, निष्ठा और लगनके साथ भोगोंका त्याग करना चाहिये। भोगविषयोंका त्याग लोगोंको दिखानेके लिये—दम्भके लिये न हो, ईमानदारीसे होना चाहिये। साधन दूसरी वस्तु है तथा साधनका दम्भ दूसरी। लोगोंको दिखलानेके लिये जो कुछ होता है, मान-सम्मानकी आशासे जो कुछ किया जाता है, उसे दम्भ समझना चाहिये। त्यागका स्वाँग त्याग नहीं है। महिमा तो सच्चे त्यागकी है। निश्छल, निष्कपट त्याग ही त्याग है।

त्याग होना चाहिये यथार्थ, सच्चा। ऊपरसे त्याग हो और मनमें चिन्तन चलता रहे, कामनाकी आग बुझे नहीं तो वह दम्भाचार होगा। भोगत्यागका असली अर्थ है—भोगकामनाका त्याग। उस त्यागसे तुरन्त शान्ति मिलती है। संसारमें रहनेवालेसे भोगका सर्वथा त्याग तो होगा ही नहीं। पर राग-द्वेषरहित होकर वशमें किये हुए मन-इन्द्रियोंसे जो संयमित (शास्त्रविहित, परिमित और नियमित) विषयोंका भोग होता है, उससे प्रसाद (अन्त:करणकी प्रसन्नता और निर्मलता) प्राप्त होता है तथा उस प्रसादसे सारे दु:खोंका नाश हो जाता है—

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।

आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥

प्रसादे सर्वदु:खानां हानिरस्योपजायते।

(गीता२।६४-६५)