दशरथके समयकी अयोध्या
यह महानगरी बारह योजन लम्बी थी। इसमें सुन्दर लम्बी-चौड़ी सड़कें बनी हुई थीं। नगरीकी प्रधान सड़कें तो बहुत ही लम्बी-चौड़ी थीं, जिनपर प्रतिदिन जलका छिड़काव होता था, सुगन्धित फूल बिखेरे जाते थे, दोनों ओर सुन्दर वृक्ष लगे हुए थे। नगरीके अन्दर अनेक बाजार थे, सब प्रकारके यन्त्र, मशीनें और युद्धके सामान तैयार मिलते थे। बड़े-बड़े कारीगर वहाँ रहते थे। अटारियोंपर ध्वजाएँ फहराया करती थीं। नगरकी चारदीवारीपर सैकड़ों शतघ्नी (तोपें) लगी हुई थीं, बड़े मजबूत किवाड़ लगे हुए थे, नगरके चारों ओर गहरी खाई थी। अनेक सामन्त, राजा और शूरवीर वहाँ रहा करते थे। व्यापारी भी अनेक रहते थे। नगरी इन्द्रकी पुरीके समान बड़े सुन्दर ढंगसे बसी हुई थी। उसके आठ कोने थे। वहाँ सब प्रकारके रत्न थे और सात मंजिले बड़े-बड़े मकान थे। राजाके महलोंमें रत्न जड़े हुए थे। बड़ी सघन बस्ती थी। नगरी समतल भूमिपर बसी हुई थी। खूब धान होता था और अनेक प्रकारके पदार्थ होते थे। वेद-वेदांगके ज्ञाता, अग्निहोत्री और गुणी पुरुषोंसे नगरी भरी हुई थी। महर्षियोंके समान अनेक महात्मा भी वहाँ रहते थे।
उस समय उस रम्य नगरी अयोध्यामें निरन्तर आनन्दमें रहनेवाले, अनेक शास्त्रोंको श्रवण करनेवाले धर्मात्मा, सत्यवादी, लोभरहित और अपने ही धनमें सन्तुष्ट रहनेवाले मनुष्य रहते थे। ऐसा एक भी गृहस्थ नहीं था जिसका धन आवश्यकतासे कम हो, जिसके पास इहलोक और परलोकके सुखोंके साधन न हों। सभी गृहस्थोंके घर गौ, घोड़े और धन-धान्यसे पूर्ण थे। कामी, कृपण, क्रूर, मूर्ख और नास्तिक तो ढूँढ़े भी नहीं मिलते थे। वहाँके सभी स्त्री-पुरुष धर्मात्मा, इन्द्रियनिग्रही, हर्षयुक्त, सुशील और महर्षियोंके समान पवित्र थे। सभी स्नान करते, कुण्डल-मुकुट-माला धारण करते, सुगन्धित वस्तुओंका लेपन करते, उत्तम भोजन करते और दान देते थे। परन्तु वे सभी आत्मवान् थे, सभी अग्निहोत्र और सोमयाग करनेवाले थे। क्षुद्र विचारका, चरित्रहीन, चोर और वर्णसंकर कोई नहीं था। वहाँके जितेन्द्रिय ब्राह्मण निरन्तर अपने नित्यकर्मोंमें लगे रहते थे। दान देते थे, विद्याध्ययन करते थे, परन्तु निषिद्ध दान कोई नहीं लेता था। अयोध्यामें कोई भी नास्तिक, झूठा, ईर्ष्या करनेवाला, अशक्त और मूढ़ नहीं था। सभी बहुश्रुत थे। ऐसा कोई न था जो वेदके छ: अंगोंको न जानता हो, व्रत-उपवासादि न करता हो, दीन हो, पागल हो या दु:खी हो। अयोध्यामें सभी स्त्री-पुरुष सुन्दर और धर्मात्मा राजाके भक्त थे। चारों वर्णोंके स्त्री-पुरुष देवता और अतिथिकी पूजा करनेवाले, दु:खियोंको आवश्यकतानुसार देनेवाले, कृतज्ञ और शूरवीर थे। वे धर्म और सत्यका पालन करते थे। दीर्घजीवी थे और स्त्री-पुत्र-पौत्रादिसे युक्त थे। वहाँके क्षत्रिय ब्राह्मणोंके अनुयायी, वैश्य क्षत्रियोंके अनुयायी और शूद्र तीन वर्णोंके सेवारूप सुकर्ममें लगे रहते थे। नगरी राजाके द्वारा पूर्णरूपसे सुरक्षित थी। विद्या-बुद्धि-निपुण, अग्निके समान तेजस्वी और शत्रुके अपमानको न सहनेवाले योद्धाओंसे अयोध्या उसी प्रकार भरी हुई थी जैसे गुफाएँ सिंहोंसे भरी रहती हैं। अनेक प्रकारके घोड़े और बड़े-बड़े मतवाले हाथियोंसे नगरी पूर्ण थी। उसका अयोध्या नाम इसीलिये पड़ गया था कि वहाँ कोई भी शत्रु युद्धके लिये नहीं आ सकता था।
अब आजके भारतसे इसका मिलान कीजिये!