महायोग-तत्त्व

प्राचीन कालकी बात है, राजा धर्मध्वजके दोनों कुमारोंके केशिध्वज और खाण्डिक्य-जनक नामक दो तेजस्वी पुत्र थे। राजकुमारोंने सब प्रकारकी विद्या और कलाएँ सीखी थीं। कुमार केशिध्वज अध्यात्मशास्त्रके बड़े पण्डित हुए और खाण्डिक्य कर्मरहस्यके ज्ञाता हुए। दोनों भाइयोंमें परस्पर विजयेच्छा रहती थी। समयपर केशिध्वजने खाण्डिक्यको जीतकर नगरसे बाहर निकाल दिया। पराजित खाण्डिक्य अपने पुरोहित, मन्त्री और परिवारके कुछ लोगोंको साथ लेकर दुर्गम वनमें जा बसे। इधर केशिध्वज अविद्याद्वारा होनेवाली मृत्युसे बचनेके लिये विविध प्रकारके यज्ञ करने लगे।

एक समय केशिध्वज वनमें यज्ञ कर रहे थे, उन्हें समाधिमें स्थित जानकर एक व्याघ्रने उनकी धर्म-धेनुको मार डाला। राजाको इस दुर्घटनाका पता लगनेपर उन्होंने पश्चात्ताप करते हुए यज्ञकी पूर्तिके लिये अपने पुरोहितोंसे गोहत्याके प्रायश्चित्तका विधान पूछा। पुरोहितोंने कहा कि ‘इस विषयमें हम कुछ भी नहीं कह सकते, आप कशेरू मुनिसे पूछिये।’ कशेरूसे पूछनेपर उन्होंने भार्गव शुनक मुनिका नाम बतलाया। राजाने शुनकके पास जाकर पूछा, तब शुनक बोले कि ‘राजन्! तुम्हारे द्वारा पराजित तुम्हारे शत्रु खाण्डिक्यके सिवा इस समय पृथ्वीमें कशेरू, मैं या अन्य कोई भी ऐसा कर्मके तत्त्वको जाननेवाला नहीं है जो तुम्हें प्रायश्चित्तका यथार्थ विधान बतला सके। तुम चाहो तो उनके पास जाकर पूछ सकते हो।’ यज्ञका विघ्न दूर करनेकी इच्छासे केशिध्वजने कहा कि ‘मुने! मैं इस कार्यके लिये अभी खाण्डिक्यके पास जाता हूँ। यदि वे मुझे अपना शत्रु समझकर मार डालेंगे तब तो मुझे आत्मबलिदानके फलस्वरूप यज्ञका फल यों ही मिल जायगा। यदि वे मुझे शास्त्रोक्त प्रायश्चित्त बतला देंगे तो मैं तदनुसार करके यज्ञकी पूर्ति कर दूँगा।’

यों कहकर महामति राजा केशिध्वज कृष्णाजिन पहनकर रथपर सवार हो तुरन्त उस वनकी ओर चले, जहाँ खाण्डिक्य अपने परिवारसहित निवास करते थे। खाण्डिक्य अपने शत्रुको दूरसे अपनी ओर आते देखकर, उसकी दुर्भावना समझकर बड़े क्रोधित हुए। क्रोधसे लाल-लाल आँखें करके पुकारकर कहने लगे—‘केशिध्वज! क्या तुम इसीलिये कृष्णाजिन (काले मृगका चर्म) धारण करके आये हो कि इसको देखकर मैं तुम्हें नहीं मारूँगा? तुमने और मैंने न मालूम कितने कृष्णचर्मधारी मृगोंको तीक्ष्ण बाणोंसे मारा होगा। अतएव इस वेषके कारण मैं तुम्हें नहीं छोड़ सकता।’ केशिध्वजने कहा—‘मैं आपको मारनेके लिये नहीं आया हूँ, सन्देहकी निवृत्तिके लिये आपसे कुछ पूछने आया हूँ, आप किसी प्रकारका सन्देह न करें और क्रोध तथा बाणको त्यागकर मेरे प्रश्नका उत्तर देनेकी कृपा करें।’

केशिध्वजके ये वचन सुनकर बुद्धिमान् खाण्डिक्य अपने पुरोहित और मन्त्रियोंको एकान्तमें ले जाकर उनसे परामर्श करने लगे। मन्त्रियोंने कहा—‘महाराज! ऐसा अवसर कब मिलेगा? शत्रु आपके हाथोंमें आ गया है, अब तो इसका काम तमाम ही कर डालना चाहिये। इस वैरीके मरते ही सारी पृथ्वी आपके अधीन हो जायगी!’ खाण्डिक्यने उनके वचन सुनकर गम्भीरतासे कहा—‘नि:सन्देह इसके मरनेसे पृथ्वीपर एकाधिपत्य हो जायगा, परन्तु ऐसा करनेसे मेरा परलोक बिगड़ जायगा। मेरी समझसे पृथ्वीके राज्यकी अपेक्षा परलोकमें विजयी होना—जीव-जीवनका उच्चतर अवस्थामें पहुँच जाना कहीं अधिक महत्त्वका विषय है; क्योंकि—

परलोकजयोऽन्तत: स्वल्पकालो महीजय:।

परलोकका जय अनन्तकालके लिये होता है, पर पृथ्वीकी विजय तो अल्पकालस्थायी होती है, अतएव .....‘एनं न हिंसिष्ये यत्पृच्छति वदामि तत् ।’ मैं इसे मारूँगा नहीं, यह जो कुछ पूछेगा सो बतलाकर इसे विदा करूँगा।’ धन्य धर्मपरायणता और साधुता!

खाण्डिक्य-जनक अपने शत्रु केशिध्वजके पास जाकर शान्ति और प्रेमसे कहने लगे ‘आपको जो कुछ पूछना हो मुझसे पूछिये, मैं आपको यथार्थ उत्तर दूँगा।’ केशिध्वजने धर्म-धेनुके वधकी घटना सुनाकर उसके प्रायश्चित्तका विधान पूछा, खाण्डिक्यने बड़ी सरलतासे विस्तारपूर्वक विधान बतला दिया। केशिध्वजने वहाँसे अपनी यज्ञभूमिमें लौटकर यथाविधि प्रायश्चित्त और क्रमश: यज्ञकी समस्त क्रियाएँ कीं। यज्ञ समाप्त होनेपर राजाने सब ऋत्विक् और सदस्योंका पूजन-सम्मान किया, अतिथियोंको अनेक प्रकारसे विविध दान देकर प्रसन्न किया। तब भी राजाके मनमें शान्ति नहीं हुई। इसका कारण सोचते-सोचते केशिध्वजके मनमें यह भावना हुई कि ‘मैंने प्रायश्चित्तका विधान बतलानेवाले खाण्डिक्यको अभी गुरुदक्षिणा नहीं दी, इसीसे मेरा मन अशान्त है।’ इस विचारके पैदा होते ही केशिध्वज फिर खाण्डिक्यके निवासस्थानकी ओर चले। इस बार भी खाण्डिक्यने नीतिके अनुसार उसपर सन्देह करके शस्त्र उठाये, परन्तु केशिध्वजने वहाँ जाते ही नम्र वचनोंमें खाण्डिक्यसे कहा—‘खाण्डिक्य! मैं आपकी कोई बुराई करने नहीं आया हूँ, आप क्रोध न करें। आपके उपदेशसे मेरा यज्ञ भलीभाँति पूर्ण हो चुका है, मैं अभी गुरु-दक्षिणा नहीं दे सका, उसीको देने आया हूँ, आपकी जो इच्छा हो सो माँग सकते हैं।’

केशिध्वजकी यह बात सुनकर खाण्डिक्यने अपने मन्त्रियोंसे सम्मति पूछी, उन्होंने कहा, ‘राजन्! आप इससे सारा राज्य माँग लीजिये। बिना ही युद्धके जहाँ राज्यकी प्राप्ति होती हो वहाँ बुद्धिमान् पुरुष राज्य ही लिया करते हैं।’ मन्त्रियोंकी इस उक्तिपर महामति खाण्डिक्य हँस पड़े और कहने लगे, ‘मित्रो! आप अन्य सभी कार्योंमें मुझे उचित परामर्श दिया करते हैं, परन्तु परमार्थ वस्तु क्या है और उसकी प्राप्ति कैसे होती है, इस बातको आपलोग विशेषरूपसे नहीं जानते। क्या मुझ-जैसे व्यक्तिके लिये ऐसे अवसरपर थोड़े दिनोंतक रहनेवाले राज्यकी कामना करना उचित है? ‘स्वल्पकालं महीराज्यं मादृशै: प्रार्थ्यते कथम्।’ आपलोग देखिये, मैं उससे क्या माँगता हूँ। इतना कहकर खाण्डिक्यने केशिध्वजके पास जाकर कहा—‘भाई! क्या सचमुच तुम मुझे गुरु-दक्षिणा दोगे?’ केशिध्वजने दृढ़तासे कहा—‘हाँ, अवश्य दूँगा।’ तब खाण्डिक्य कहने लगे—केशिध्वज!

भवानध्यात्मविज्ञानपरमार्थविचक्षण: ॥

यदि चेद्दीयते मह्यं भवता गुरुनिष्क्रय:।

तत्क्लेशप्रशमायालं यत् कर्म तदुदीरय॥

‘अध्यात्म-विज्ञानरूप परमार्थ ज्ञानमें आप प्रवीण हैं, यदि आप गुरु-दक्षिणा देना चाहते हैं तो मुझे वह उपाय बतलाइये, जिससे मेरे समस्त क्लेश सम्पूर्णरूपसे नष्ट हो जायँ।’

केशिध्वजने कहा—‘आप मुझसे निष्कण्टक राज्य क्यों नहीं चाहते? क्षत्रियोंको तो राज्यके समान और कोई पदार्थ इतना प्रिय नहीं होता।’ खाण्डिक्य कहने लगे—‘केशिध्वज! मूर्ख मनुष्य जिसके लिये सदा लालायित रहते हैं, ऐसे विशाल राज्यको मैंने क्यों नहीं माँगा, इसका कारण आपको बतलाता हूँ।

‘प्रजाका पालन करना और धर्मयुद्धमें राज्यके शत्रुओंका संहार करना ही क्षत्रियोंका धर्म है। मेरा राज्य आपने छीन लिया है, इससे प्रजापालन न करनेका दोष इस समय तो मुझपर कुछ भी नहीं है, परन्तु यदि राज्य ग्रहण करके न्यायपूर्वक उसका पालन न किया जायगा तो मुझे अवश्य पापका भागी होना पड़ेगा। इसके सिवा भोग-पदार्थोंकी इच्छा न करनेमें एक हेतु यह भी है कि क्षत्रिय कभी माँगकर राज्य नहीं लिया करते, यह सज्जनोंका सिद्धान्त है। फिर राज्यकी प्राप्तिमें वास्तवमें सुख ही कौन-सा है? जो मूर्ख अहंकाररूपी मदिरा पीकर पागल हो रहे हैं या जिनका मन ममताके मायाजालमें फँस रहा है, वे ही राज्यका लोभ किया करते हैं, मैं ऐसे राज्यसे कोई लाभ नहीं समझता, इसीलिये मैंने इस अविद्याके अन्तर्गत राज्यकी कामना नहीं की।’

खाण्डिक्यके इन वचनोंसे प्रसन्न होकर केशिध्वजने उन्हें साधुवाद देते हुए कहा—‘खाण्डिक्य-जनक! मैं प्रजापालन आदि अविद्याकी क्रियाओंद्वारा काम-क्रोधादिसे छूटनेके लिये राज्यका पालन तथा अनेक यज्ञोंका अनुष्ठान करता हूँ और भोगद्वारा पुण्योंका क्षय कर रहा हूँ। ईश्वरेच्छासे आपके मनमें विवेक जाग्रत् हो गया है, यह बड़े ही आनन्दका विषय है। मैं आपको अविद्याका स्वरूप बतलाता हूँ। कुलनन्दन! अनात्ममें आत्मबुद्धि और जो वस्तु अपनी नहीं है, उसको अपनी समझना, ये दो अविद्या-वृक्षके बीज हैं। दुष्टबुद्धि जीव मोहरूपी अन्धकारसे आच्छन्न होकर पाँच भूतोंसे बने हुए इस स्थूल शरीरको ही आत्मा समझते हैं। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वीसे जब आत्मा सर्वथा अलग है, तब ऐसा कौन बुद्धिमान् और प्राज्ञ मनुष्य होगा जो इस पंचभूतात्मक शरीरको आत्मा और शरीरद्वारा भोग किये जानेवाले घर, जमीन, धन, ऐश्वर्य आदि भोगोंको अपना समझे? जब शरीर ही अपना नहीं है, तब उसके द्वारा उत्पन्न हुए पुत्र-पौत्रादिको अपना समझकर बुद्धिमान् मनुष्यको कभी मोहमें नहीं पड़ना चाहिये।

‘मनुष्य इस देहके भोगके लिये ही सारे कर्म करता है, यह देह जब आत्मासे भिन्न है तब जीवका इस देहमें आत्मबुद्धि करना केवल संसारमें बन्धनके लिये ही होता है। जैसे मिट्टीके घरकी रक्षाके लिये मिट्टी और जलसे उसपर लेप किया जाता है, वैसे ही यह पार्थिव शरीर भी अन्न-जलके द्वारा रक्षित होता है। इस तरह जब पंचभूतात्मक भोगोंद्वारा इस पंचभूतमय शरीरकी ही रक्षा और तृप्ति होती है तब जीवका इसमें गर्व करना व्यर्थ है।

‘वासनाकी धूलिसे लिपटा हुआ यह जीव हजारों जन्मोंतक इस संसारमें भटकता हुआ केवल परिश्रमको ही प्राप्त होता है। संसारमें भटकनेवाले इस भ्रान्त पथिककी यह वासनारूपी धूलि जब ज्ञानरूप गरम जलसे धुल जाती है तभी उसकी मोहरूपी थकावट दूर होती है। मोह-श्रम मिटनेपर जीवका अन्त:करण स्वस्थ होता है और तभी इसे अनन्य अतिशय आनन्दकी प्राप्ति होती है। वास्तवमें यह निर्वाणमय सुखस्वरूप निर्मल आत्मा सदा मुक्त ही है, दु:ख-अज्ञान आदि मल तो प्रकृतिके धर्म हैं, आत्माके नहीं। परन्तु जैसे थालीके जलसे अग्निका कोई साक्षात् सम्बन्ध न होनेपर भी थालीके सम्बन्धके कारण जलमें उष्णता आदि गुण उत्पन्न हो जाते हैं, वैसे ही प्रकृतिके संगसे यह अव्यय आत्मा भी अभिमानादि द्वारा दूषित होकर प्रकृतिके धर्मोंका भोग करता हुआ प्रतीत होता है। यही अविद्याके बीजका स्वरूप है, इस अविद्यासे उत्पन्न क्लेशोंके नाशके लिये योगके सिवा और कोई भी उपाय नहीं है।’

इतना सुनकर खाण्डिक्यने केशिध्वजसे कहा—‘महाभाग! आप उस योगके तत्त्वको भलीभाँति जानते हैं, कृपाकर मुझे वह योगतत्त्व बतलाइये।’ इसपर केशिध्वज कहने लगे—‘खाण्डिक्य! जिस योगमें स्थित हो मुनिगण ब्रह्ममें लीन होकर संसारमें फिर कभी नहीं आते।’ मैं उस योगका स्वरूप बतलाता हूँ, मन लगाकर सुनिये—

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयो:।

बन्धस्य विषयासंगि मुक्तेर्निर्विषयं तथा॥

मन ही मनुष्योंके बन्ध और मोक्षका कारण है। जब यह मन विषयोंमें आसक्त होता है, तब बन्धनका और जब विषयोंका त्याग कर देता है, तब यही मुक्तिका कारण बन जाता है। ज्ञानके साधक मुनिगण इस मनको विषयोंसे हटाकर मुक्तिके लिये उस परब्रह्म परमेश्वरमें लगाते हैं। श्रेष्ठ! जैसे चुम्बक पत्थरसे स्वाभाविक ही लोहेका आकर्षण होता है, उसी प्रकार मनके द्वारा निरन्तर चिन्तन किये जानेपर ब्रह्म भी योगीको अपनी ओर स्वाभाविक ही खींच लेता है। मनकी यह गति आपके ही यत्नपर निर्भर करती है। मनकी गतिका ब्रह्मके साथ संयोग कर देना ही ‘योग’ कहलाता है। इस प्रकारके योगकी साधना करनेवाले व्यक्तिको ही योगी और मुमुक्षु कहते हैं। योगयुक्त पुरुष पहले ‘युंजान’ कहलाता है। तदनन्तर वह क्रमश: समाधिसम्पन्न होकर ब्रह्मज्ञानको प्राप्त होता है। युंजान योगी यदि किसी कारणवश इस जन्ममें सिद्धिको प्राप्त नहीं होता तो उसका मन दोषरूप विघ्नसे रहित होनेके कारण वह जन्मान्तरमें पूर्वके अभ्यास-बलसे मुक्त हो जाता है। परन्तु समाधिसम्पन्न योगी तो इसी जन्ममें मुक्तिको प्राप्त होता है, कारण उसके समस्त अदृष्ट योगकी अग्निके द्वारा बहुत ही शीघ्र भस्म हो जाते हैं।

‘योगीको चाहिये कि वह अपने मनको तत्त्वज्ञानके उपयोगी बनानेके लिये निष्कामभावसे ब्रह्मचर्य, अहिंसा, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह आदि नियमोंका अवलम्बन कर संयतचित्तसे स्वाध्याय, शौच, सन्तोष तथा तप करते हुए मनको निरन्तर परब्रह्म परमेश्वरके चिन्तनमें लगाये रखे। यही दस प्रकारके यम-नियम हैं। इनका सकामभावसे पालन करनेवालेको उत्तम फलकी प्राप्ति होती है और निष्काम आचरण करनेवालेको मुक्ति मिलती है। भद्र आदि आसनोंमेंसे किसी एक आसनका अवलम्बन करके सद‍्गुणी पुरुषको यम-नियमसे सम्पन्न होकर वशमें किये हुए चित्तसे योगका अभ्यास करना चाहिये।

‘अभ्याससे प्राण नामक वायुको वशमें करनेवाली क्रियाका नाम प्राणायाम है। प्राणायाम सबीज और निर्बीज भेदसे दो प्रकारका है। जब प्राण और अपान वायु सद्विधानसे परस्परको जीत लेते हैं, तब इन दोनोंके संयमित हो जानेपर कुम्भक नामक तीसरा प्राणायाम होता है। योगी जब पहले-पहल प्राणायामका अभ्यास करते हैं, तब भगवान‍्का स्थूल रूप ही उनके चित्तका अवलम्बन रहता है। योगीको चाहिये कि वह क्रमश: प्रत्याहारपरायण होकर शब्द, स्पर्शादि विषयोंमें आसक्त इन्द्रियोंका निग्रह करके उन्हें चित्तका अनुसरण करनेवाली बना ले, इन अत्यन्त चंचल स्वभाववाली इन्द्रियोंको वशमें करनेकी बड़ी आवश्यकता है। जबतक इन्द्रियाँ वशमें नहीं होतीं, तबतक योगी योगकी साधनामें समर्थ नहीं हो सकता। इस प्रकार प्राणायामद्वारा प्राणवायुको और प्रत्याहारद्वारा इन्द्रियोंको वशमें करके योगीको कल्याणका आश्रय लेकर अपना चित्त भलीभाँति स्थिर करना चाहिये।’

खाण्डिक्यने कहा—‘महाभाग! जिस कल्याणके आश्रयसे चित्तके सारे दोष नष्ट हो जाते हैं वह क्या वस्तु है सो कृपा करके मुझे समझाइये।’ केशिध्वज कहने लगे—‘राजन्! ब्रह्म ही चित्तका शुभ आश्रय है। वह स्वभावत: ही दो प्रकारका है—मूर्त और अमूर्त, जिसको पर और अपर भी कहते हैं। इस जगत‍्में तीन प्रकारकी भावनाएँ होती हैं—एक ब्रह्मभावना, दूसरी कर्मभावना और तीसरी ब्रह्म-कर्मभावना। सनन्दन आदि ऋषिगण ब्रह्मभावनावाले हैं, देवताओंसे लेकर जड़-चेतन समस्त प्राणी कर्मभावनावाले हैं और हिरण्यगर्भ आदिमें ब्रह्म-कर्म दोनों भावनाएँ हैं। जिसका जैसा ज्ञान और अधिकार है उसकी वैसी ही भावना हुआ करती है।

‘भेद-ज्ञानके हेतु कर्म जबतक बने रहते हैं तभीतक जीवोंको विश्व और परमात्मामें भेद दीखता है। जिस ज्ञानसे सारे भेद मिट जाते हैं, जो ज्ञान सत्तामात्र है, जो मन, वाणीसे अगोचर है और जिसको केवल आत्मा ही जानता है उसीका नाम ब्रह्मज्ञान है। वही अज, अक्षर तथा अरूप विष्णुका नित्य और परमरूप है और वह समस्त विश्वरूपसे विलक्षण है। आरम्भमें योगी उस परमरूपका चिन्तन नहीं कर सकते, इसीलिये उन्हें परमात्माके विश्वगोचर स्थूल रूपका चिन्तन करना चाहिये। हिरण्यगर्भ, इन्द्र, प्रजापति, वायु, वसु, रुद्र, आदित्य, नक्षत्र, ग्रह, गन्धर्व, यक्ष और दैत्य आदि समस्त देवयोनियाँ—मनुष्य, पशु, पर्वत, समुद्र, नदी और वृक्ष आदि अगणित प्राणी, उनके कारण और प्रधान आदितक एकपाद, द्विपाद, बहुपाद अथवा अपाद चेतन और अचेतन सभी त्रिविध भावनात्मक परमात्मा हरिका मूर्त रूप है। यह समस्त चराचर विश्व उस परब्रह्मस्वरूप भगवान् विष्णुकी शक्तिसे समन्वित है।

‘भगवान‍्की यह शक्ति तीन प्रकारकी है—(१) विष्णुशक्ति, (२) अपरा क्षेत्रज्ञशक्ति और (३) कर्म नामक अविद्याशक्ति, जिससे आवृत होकर सर्वव्यापी क्षेत्रज्ञशक्ति भी संसारके समस्त तापोंका भोग करती है। इस अविद्याशक्तिके द्वारा ढकी रहनेके कारण ही क्षेत्रज्ञशक्ति सब भूतोंमें समान होनेपर भी न्यूनाधिकरूपसे दिखायी देती है। प्राणहीन पदार्थोंमें वह बहुत ही कम प्रमाणमें दीख पड़ती है, स्थावरोंमें उससे कुछ अधिक दीखती है, साँपोंमें उससे अधिक, पक्षियोंमें उससे अधिक, मृगोंमें उससे अधिक, मनुष्योंमें रहनेवाले पशुओंमें उससे अधिक, पशुओंसे मनुष्योंमें अधिक, मनुष्योंसे नागोंमें अधिक, उनसे गन्धर्वोंमें अधिक, गन्धर्वोंसे यक्षोंमें, यक्षोंसे देवताओंमें, देवताओंसे इन्द्रमें, इन्द्रसे प्रजापतिमें और प्रजापतिसे भी अधिक क्षेत्रज्ञशक्तिका विकास हिरण्यगर्भमें पाया जाता है। ये सभी उस अशेषरूप भगवान‍्के ही रूप हैं; क्योंकि ये सभी आकाशकी भाँति उन्हींकी शक्तिद्वारा व्याप्त हैं।

‘अब उस ब्रह्मके दूसरे रूपका ध्यान बतलाता हूँ, बुद्धिमान् लोग इस रूपको सत् और अमूर्त कहा करते हैं। जिस रूपमें पूर्वोक्त समस्त शक्तियाँ प्रतिष्ठित हैं यही विश्वरूपका स्वरूप है। भगवान‍्के और भी अनेक रूप हैं। देवता, तिर्यक् और मनुष्य आदिकी चेष्टासे जो सब रूप प्रकट होते हैं, जिन्हें भगवान् जगत‍्के उपकारके लिये लीलासे धारण करते हैं ऐसे रूपोंकी समस्त चेष्टाएँ स्वतन्त्र होती हैं, किसी कर्मके अधीन होकर नहीं होतीं। योगी साधकको अपनी चित्तशुद्धिके लिये सारे पापोंके नाश करनेवाले विश्वरूपके उसी रूपका चिन्तन करना चाहिये। जैसे वायुके जोरसे बढ़ी हुई, धधकती हुई अग्नि सूखे घासको क्षणभरमें भस्म कर डालती है, वैसे ही चित्तमें स्थित भगवान् विष्णु भी योगियोंके सारे पापोंको भस्म कर देते हैं। इसलिये समस्त शक्तियोंके आधार उन परमेश्वरमें ही चित्त स्थिर करना चाहिये, इसीका नाम विशुद्ध धारणा है।

‘सर्वव्यापी आत्माका भी आश्रय और तीनों भावनाओंसे अतीत वह परमात्मा ही मुक्तिके लिये योगियोंके चित्तका एकमात्र शुभ अवलम्बन है। इसके अतिरिक्त दूसरे कर्मयोनि देवताओंका आश्रय शुद्ध नहीं है। भगवान‍्का मूर्तरूप चित्तको दूसरे विषयोंसे नि:स्पृह कर देता है। कारण, चित्त उसीकी ओर दौड़ता है, इसीलिये इसको धारणा कहते हैं।

‘अनाधार विष्णुके अमूर्त रूपको चित्त सहसा धारण नहीं करता, इसीसे उसके मूर्त रूपका चिन्तन करना चाहिये, वह मूर्तरूप इस प्रकारका मनोहर है—जिसका सुन्दर प्रसन्नमुख है, कमलकी पँखड़ियोंके समान नेत्र हैं, सुन्दर कपोल हैं, विशाल और उज्ज्वल मस्तक है, लम्बे कानोंमें मनोहर कर्णभूषण शोभित हो रहे हैं, सुन्दर कण्ठ है, चौड़ा वक्षस्थल श्रीवत्सके चिह्नसे अंकित है, गम्भीर नाभि और उदरपर त्रिवली सुशोभित हैं, आजानुलम्बित आठ या चार भुजाएँ हैं, ऊरु और जंघाएँ समभावसे स्थित हैं, हाथ और पैर सुस्थिर हैं, निर्मल पीत वस्त्र और शार्ङ्ग धनुष, गदा, खड्ग, शंख, चक्र, अक्ष तथा वलय धारण किये हुए हैं। भगवान‍्की ऐसी पवित्र विष्णुमूर्तिमें जबतक मन रम न जाय तबतक मनका संयम करके चिन्तन करते ही रहना चाहिये। जब कहीं भी जाने-आने, बैठने-उठने या स्वेच्छापूर्वक किसी भी कार्यके करते समय भी चित्तसे भगवान‍्का यह रूप न हटे, तब धारणाकी सिद्धि समझनी चाहिये।

‘इसके बाद साधकको शंख, गदा, चक्र और शार्ङ्ग आदिसे रहित अक्षसूत्र धारण की हुई भगवान‍्की प्रशान्त मूर्तिका ध्यान करना चाहिये। उस मूर्तिमें धारणा स्थिर होनेपर किरीट, केयूररहित मूर्तिका ध्यान करना चाहिये। तदनन्तर उसी भगवान‍्की मूर्तिके एक-एक अवयवका चिन्तन करना चाहिये। इसके बाद योगीको उस अवयवी भगवान‍्में प्रणिधान करना चाहिये।

‘दूसरे विषयोंमें सर्वथा नि:स्पृह होकर जब साधक केवल भगवान‍्के रूपमें ही अनन्यभावसे तन्मय हो जाता है, तब उसीको ध्यान कहते हैं। यह ध्यान, यमादि छ: प्रकारके अंगोंद्वारा सम्पादित होता है। इसके बाद समाधि होती है। समस्त कल्पनाओंसे सर्वथा रहित होकर केवल स्वरूपमें ही स्थित रहनेको समाधि कहते हैं, यह समाधि ध्यानके द्वारा प्राप्त होती है।

‘समाधिके अनन्तर भगवत्-साक्षात्काररूप विज्ञानसे ही परब्रह्मरूप प्राप्य विषयकी प्राप्ति होती है, अब पूर्वोक्त त्रिविध भावनासे अतीत परमात्मा ही प्राप्त होता है। मुक्तिमें क्षेत्रज्ञ कारण और ज्ञान करण है; इन दोनोंके द्वारा ही मुक्ति प्राप्त होती है। मुक्त होते ही जीव कृतकृत्य होकर जन्म-मृत्युसे छूट जाता है—परमात्माकी भावनामें विभोर जीव परमात्माके स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। जीवको अज्ञानसे ही भेद-ज्ञान हुआ करता है। समस्त पदार्थोंके भेदजनक ज्ञानका सम्पूर्णरूपसे विनाश हो जानेपर आत्मा और ब्रह्मके भेदकी चिन्ता कौन करे? खाण्डिक्य! यही योग है, इसीको जानकर मनुष्य परमात्माकी प्राप्तिके लिये प्रयास कर सकता है। मैंने संक्षेप और कुछ विस्तारसे यह महायोग आपको बतलाया, अब कहिये, मुझे और क्या करना होगा?’

खाण्डिक्यने कहा—‘महाभाग! आपने मुझे यह महायोग बतलाकर सब कुछ दे दिया है, आज आपके उपदेशसे मेरे चित्तका सभी मल नष्ट हो गया। इसमें कोई सन्देह नहीं कि मैं जो यह ‘मेरा’, ‘मेरा’ कहता हूँ सो सर्वथा मिथ्या है। ‘मैं’ और ‘मेरा’ के द्वारा व्यवहार होता है, परन्तु वास्तवमें यह अविद्या ही है। परमार्थ वाणीके अगोचर होनेसे जबानकी चीज नहीं है। केशिध्वज! आपने मुझको मुक्ति देनेवाला यह महायोग बतलाकर मेरा बहुत ही उपकार किया है, अब आप अपने कल्याणके लिये घर पधारिये।’

तदनन्तर केशिध्वज खाण्डिक्यके द्वारा पूजित होकर अपने घर लौट आये। खाण्डिक्यने यम-नियमादिकी साधनाके द्वारा परमात्मामें चित्त लगाकर अन्तमें निर्मल परब्रह्मको प्राप्त किया। इधर केशिध्वज भी भोगोंके द्वारा अदृष्टका क्षय करके निष्काम कर्म करते हुए निर्मलचित्त होकर परमसिद्धिको प्राप्त हो गये।

(विष्णुपुराणके आधारपर)