नैतिक पतन और उससे बचनेके उपाय

भगवान् श्रीकृष्णने श्रीमद्भगवद‍्गीताके सोलहवें अध्यायमें आसुरी सम्पत्तिके स्वरूप, लक्षण तथा परिणामका विशद वर्णन करते हुए अन्तमें कहा—

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन:।

काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥

(१६।२१)

‘काम, क्रोध और लोभ। ये तीन प्रकारके नरकके द्वार हैं और आत्माका नाश करनेवाले हैं। इसलिये इन तीनोंका त्याग करना चाहिये।’

पर हमारा बड़ा दुर्भाग्य है कि यही तीनों आज हमारे जीवनके अवलम्बन-से हो रहे हैं। कोई भी क्षेत्र इनके बुरे प्रभावसे अछूता नहीं बचा है। इन्हींके कारण आज सारा समाज बड़ी तेजीसे पतनकी ओर जा रहा है। इसीलिये इतनी अशान्ति, कलह, दु:ख और पीड़ा है।

प्रथम तो वर्तमान सरकारने प्रजापर इतने अधिक कर लगा दिये हैं कि उनके बोझसे सब दब गये हैं और किसी भी उपायसे उस कर-भारसे बचना चाहते हैं। कुछ वर्षों पहलेकी बात है—एक बड़े व्यापारी सज्जनने कहा था कि ‘‘हमलोग शौकसे झूठ-कपट नहीं कर रहे हैं। इतना भारी कर लगा है कि उसे यदि पूरा चुकाने जायँ तो खर्च जोड़कर अमुक प्रतिशत उलटा घाटा रहता है। यह तो वैसी ही बात है जैसे कोई डाकू घर-बार लूटनेके लिये सदल-बल घरमें आ घुसा हो और उसका सामना करके बचनेकी आशा न हो; तब जैसे उससे बचानेके लिये घरका धन, जेवर-जवाहरात आदि छिपा लिया जाता है और उससे विनयपूर्वक असत्य कहा जाता है कि ‘हमारे घरमें तो कुछ है ही नहीं, देख लो।’ ठीक वैसे ही इस अन्यायपूर्ण करसे बचनेके लिये हमलोगोंको मिथ्याका आश्रय लेना पड़ता है।’’ यद्यपि उनकी इस युक्तिका पूर्ण समर्थन नहीं किया जा सकता। किसी भी स्थितिमें छल, कपट और चोरीका समर्थन आस्तिक तथा धर्मभीरु पुरुषके लिये इष्ट नहीं है। इधर तो आय-करमें कुछ कमी भी हुई है, तथापि यह बात ऐसी नहीं है जो बिलकुल उड़ा दी जाय। आजकल जिस प्रकारसे नये-नये कर लगाये जा रहे हैं, हर एक बातमें प्रजाको पराधीन बनाया जा रहा है, खुला व्यापार मानो रहा ही नहीं। ऐसी अवस्थामें छिपाकर धन कमाने और रखनेकी प्रवृत्ति होना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। सचमुच आजके नैतिक पतनमें यह भयानक कर-भार भी एक प्रधान कारण है।

दूसरा कारण है—नियन्त्रण या कण्ट्रोल। महात्मा गाँधीजीने इसकी बुराइयोंको समझा था और वे रहते तो अबतक यह नियन्त्रणकी विशाल माया-नगरी कभीकी उजड़ गयी होती। नियन्त्रणकी बुराइयोंको अधिकारी लोगोंमेंसे अधिकांश जानते हैं; परन्तु नियन्त्रण बने रहनेमें ही सबका स्वार्थ है, इसलिये विविध युक्तियोंसे नियन्त्रणकी आवश्यकता बतलायी जाती है। यद्यपि हम उन बातोंको प्रमाणित नहीं कर सकते पर हमें अच्छी तरह ज्ञात है कि नियन्त्रणके कारण ही चोरबाजारी अधिक होती है। इस विभागके बहुत-से उच्च अफसर तथा इन्सपेक्टर आदि अपनेको प्रलोभनसे नहीं बचा सकते और वे उचित-अनुचित सभी तरीकोंसे व्यापारियोंसे रुपये लेते हैं। फलत: व्यापारियोंको चोरबाजारी करनेमें उत्साह और सुविधा मिल जाती है और कहीं-कहीं तो उन्हें (उनके कथनानुसार) आवश्यकता भी प्रतीत होने लगती है; क्योंकि ऐसा किये बिना वे उन अधिकारियोंकी माँग पूरी नहीं कर पाते। कई जगह तो व्यापारियोंसे इन लोगोंकी नियत मासिक रकम बँधी होती है। कई जगह अमुक प्रतिशत देना पड़ता है। इसके अतिरिक्त अन्य भी अनेक प्रकारसे व्यापारी और अधिकारी मिलकर यह पाप करते हैं। अब तो इन्हें इसका ऐसा चसका लग गया है जो किसी भी कानूनसे रुकना बड़ा कठिन है।

मनुष्य जबतक पापको पाप समझता है, तबतक वह पापसे डरता है। कभी परिस्थिति या किसी लोभविशेषके कारण वह पाप कर भी लेता है तो पीछे पश्चात्ताप करता है। पर जब पापसे घृणा हट जाती है और उसमें बुद्धिमानी तथा गौरवका बोध होने लगता है—पापमें पुण्यबुद्धि हो जाती है, तब पापसे बचना बहुत ही कठिन हो जाता है। फिर तो पापके नित्य नये-नये तरीके निकलते रहते हैं। इस प्रकार पापको पुण्य, अधर्मको धर्म या अन्यायको न्याय मानते-मानते बुद्धि इतनी तमसाच्छन्न हो जाती है कि फिर सभी चीजें उसे उलटी दीखने लगती हैं—‘सर्वार्थान् विपरीतांश्च बुद्धि: सा पार्थ तामसी’ (गीता १८। ३२)। ऐसा कामोपभोगपरायण लोभग्रस्त तामस मनुष्य या समाज क्रमश: मानवताको खोकर दानव या असुर बन जाता है, फिर ऐसा कोई भी जघन्य कार्य नहीं जो वह नहीं कर सकता और समाजमें जब प्रमुख माने जानेवाले लोग इस प्रकारके बन जाते हैं, तब दूसरे लोग भी उन्हींका अनुसरण करने लगते हैं और समाजमें उनको कोई बुरा नहीं कहता। खुले चोर और डाकुओंको समाज बुरा बतलाता है और उनसे घृणा करता है, जो उचित ही है। पर ये छिपे चोर और डाकू—जो खुले चोर-डाकुओंसे कहीं भयानक और समाजका अध:पात करनेवाले हैं—क्योंकि वे चोर-डाकू तो कभी-कभी चोरी-डकैती करते हैं पर ये तो दिन-रात व्यापार और अधिकारकी आड़में भयानक-से-भयानक दुष्कर्म करते रहते हैं और समाजमें श्रेष्ठ होनेके कारण दूसरे लोगोंमें भी वैसे ही करनेकी प्रवृत्ति पैदा करते हैं—समाजमें प्रतिष्ठा और उच्च पद प्राप्त करते हैं।

आज हमारी प्राय: ऐसी ही दशा हो रही है। समाजमें आज उसीका मान और आदर है जो धन कमा लेता है, फिर वह चाहे किसी भी बुरे-से-बुरे साधनसे कमाता हो। एक ऊँचे अफसरने एक बार कहा था कि ‘मैं रिश्वत नहीं लेता, इससे मेरे ऊपर तथा नीचेके अधिकारी मुझको मूर्ख तो मानते ही हैं, अपने मार्गका काँटा समझते हैं और ऐसा प्रयत्न करते हैं कि मैं किसी प्रकार दोषी साबित होकर यहाँसे निकाल दिया जाऊँ।’ एकाधिक ऐसे अफसरोंको हम जानते हैं, जो रिश्वत न खानेके कारण अपने ऊपरके अफसरोंको खुश नहीं रख सके और इसी कारण उनपर कई प्रकारकी विपत्तियाँ आयीं। उनकी उन्नति रुक गयी, उन्हें मुअत्तिल किया गया, उनको अपने स्तरसे नीचे गिराया गया तथा उनपर कई तरहके अपराध लगाये गये और हजार प्रयत्न करनेपर भी उनका कष्ट दूर नहीं हुआ। वे मूर्ख और विक्षिप्त तो कहलाये ही, शरारती भी कहलाये।

इसी प्रकार व्यापारी जगत‍्में भी जो सचाईसे काम करता है, छल-कौशलसे अनाप-शनाप पैसा नहीं कमा सकता, उसे बन्धु-बान्धव तथा आस-पासके लोग मूर्ख बतलाते हैं और विद्वान् बुद्धिमान् होनेपर भी उस बेचारेको अपनी निन्दा सुननी पड़ती है तथा पाँच आदमियोंमें झेंपना पड़ता है। यह दोष यहाँतक गहरा चला गया है कि जो लोग गीता-रामायण पढ़ते हैं, अपनेको ज्ञानी या भक्त मानते हैं, जो धर्मात्मा, उदार और दानशील माने जाते हैं तथा जो प्रसिद्ध देशभक्त, समाज-सेवक और नेता समझे जाते हैं, वे लोग भी इस महान् दोषको दोष नहीं मानते और जीवन-यापनके लिये मानों आवश्यक मानकर इसे खुशीसे अपनाते हैं।

ईश्वर, परलोक तथा पापका डर तो शास्त्रोंमें अश्रद्धा होनेसे चला गया। समाजका डर भी जाता रहा; क्योंकि प्राय: समाजभरमें यह पाप फैल गया, अत: कौन किसको बुरा कहे। बचा कानून, सो उसका डर भी अब प्राय: नहीं रहा; क्योंकि मेल-मिलापसे वह भी दूर हो जाता है। क्या कहा जाय। दिनोंदिन बुराइयाँ बढ़ती जा रही हैं और इस ओर प्राय: बहुत ही कम लोगोंका ध्यान है तथा जिनका ध्यान है वे कुछ कर नहीं सकते या करनेमें प्रमाद करते हैं। इस प्रकार पापमें गौरवबुद्धि हो जानेके कारण क्या-क्या होने लगा है, इसपर जरा विचार कीजिये—

(१) रिश्वतखोरी उत्तरोत्तर बढ़ती ही जा रही है, अवश्य ही उसके रूप और ढंग बदलते रहते हैं।

(२) डरा-धमकाकर, पकड़नेकी धमकी देकर या पकड़कर भी रुपये वसूल किये जाते हैं। पकड़ा-धकड़ी जितनी अपराध मिटानेके लिये नहीं होती, उतनी अपने स्वार्थसाधनके लिये होती है। यथार्थ तथा बड़े अपराधी कम पकड़े जाते हैं। बड़े अपराधियोंपर आतंक जमानेके लिये छोटे ही अधिक शिकार होते हैं।

(३) व्यापारीलोग करसे बचने तथा भाँति-भाँतिकी अनीतिको छिपानेके लिये रिश्वत देते तथा झूठे बहीखाते बनाते हैं।

(४) भारतके बाहरसे आनेवाली और बाहर भेजी जानेवाली चीजोंपर जो समय-समयपर प्रतिबन्ध लगाये तथा उठाये जाते हैं, उसमें कई बार तो ऐसे छिपे कारण होते हैं, जो सर्वथा अनीतिपूर्ण हैं। कुछ बड़े व्यापारियोंको सप्ताहों पहले इसका पता लग जाता है कि अमुक तारीखको अमुक वस्तुपर प्रतिबन्ध लगेगा या उठेगा। वरं यह कहना भी अत्युक्ति न होगी कि कभी-कभी तो किसी एक या अधिक व्यापारियोंके लिये ही प्रतिबन्ध लगता या उठता है और वे प्रतिबन्ध लगने या उठनेकी नियत तारीखसे पहले-पहले ही उक्त चीज प्रचुर मात्रामें खरीद या बेच लेते हैं। फिर अकस्मात् घोषणा हो जाती है, जिससे बाजारमें उथल-पुथल मच जाती है। फलत: वे व्यापारी लाखों-करोड़ोंका अनुचित लाभ उठाते हैं और बेचारे अनजान हजारों छोटे व्यापारी मारे जाते हैं! इस चीजको हम प्रमाणित नहीं कर सकते, पर वे अधिकारी और व्यापारी अपनी-अपनी छातीपर हाथ रखकर इसकी सचाईको जान सकते हैं। भगवान् तो जानते ही हैं।

(५) नीच स्वार्थ और लोभके वश होकर लोग, जहाँ सम्भव होता है, बिना किसी हिचकके असली चीजोंके साथ नकली चीजें मिला देते हैं, यहाँतक कि नकली चीजोंको ही असली बताकर बेचते हैं। आटेमें इमलीके बीजोंका चूर्ण बहुत मिलाया जाता है। घीमें तो जमाया हुआ (वनस्पति) तैल मिलाया ही जाता है। कहीं-कहीं लोग चर्बीतक मिलाते हैं। पिछले दिनों सरसोंके साथ भटकटैयाके बीज मिलाकर तेल पेरा गया था, जिससे हजारों आदमी बेरी-बेरी रोगसे पीड़ित हो गये थे। इसी प्रकार चावल, दाल, चीनी आदिमें भी मिलावट होती है। पथ्यके लिये रोगियोंको शुद्ध साबूदानातक नहीं मिलता। शीशियोंपर झूठे लेबल चिपकाकर नकली दवाइयाँ बेची जाती हैं। ऐसे खाद्य-पदार्थ और ओषधियोंका सेवन करके चाहे कितने ही लोग मर जायँ, कमानेवालोंको इसकी परवा नहीं है, वे तो इसको व्यापारका एक अंग मानते हैं।

(६) अच्छा नमूना दिखलाकर घटिया माल देना, तौलमें कम देना या अधिक ले लेना, रूई या पाटको जलसे भिगोकर उनका वजन बढ़ा देना, बाजार तेज हो जानेपर बेचे हुए मालको देनेसे इनकार कर जाना और मन्दा होनेपर खरीदा हुआ माल न लेना—आदि बातें तो आज व्यापारकी चतुराई समझी जाने लगी हैं। उच्च सम्मानप्राप्त बड़े-बड़े उद्योगपति तथा व्यापारी इनको गौरवके साथ करते हैं।

(७) धर्म और ईश्वरके नामपर भोले-भाले नर-नारियोंको ठगने और उनका धन, शील आदि अपहरण करनेकी प्रवृत्ति बढ़ रही है। कई लोग तो अपनेको भगवान् कहकर पुजवाते हैं।

(८) शिक्षाविभाग और डाक-तार विभागतकमें रिश्वत चलने लगी है और न देनेपर काम बिगड़ जाता है। कोर्ट और रेलवे आदिमें तो माँग-माँगकर ली-दी जाती है।

(९) राजनीतिक क्षेत्रमें बढ़ती हुई दलबन्दियाँ, एक-दूसरेको नीचा दिखानेका प्रयत्न, दूसरोंको गिराकर अपनेको ऊपर उठानेकी कोशिश; परनिन्दामें, दूसरेकी अवनतिमें और दु:खमें सुखका अनुभव, लूट-मार, दूसरोंको व्यर्थ हानि पहुँचानेकी इच्छा, हिंसा तथा क्रोधमें गौरव-बुद्धि, दलोंका बाहुल्य, धार्मिक क्षेत्रका पारस्परिक विद्वेष और स्वेच्छाचार आदि अनर्थ दिनोंदिन बढ़ते ही जा रहे हैं!

(१०) सिनेमा, रेडियो तथा गन्दे साहित्यके द्वारा जनतामें कामवासनाकी वृद्धि हो रही है और फलत: उच्छृंखलता तथा चारित्रिक पतन बढ़ रहा है। भले-भले घरोंके पुरुष और स्त्रियोंमें बड़ी तेजीसे चरित्रका नाश हो रहा है और इस चरित्रनाशमें कहीं-कहीं तो गौरवका अनुभव किया जा रहा है!

(११) विद्यार्थी-जगत‍्में उच्छृंखलता बढ़ रही है। शिक्षकों और विद्यार्थियोंके सम्बन्ध अत्यन्त अवांछनीय हो रहे हैं। गुरु-शिष्यकी पवित्र मर्यादा प्राय: नष्ट हो गयी है और परस्पर प्रतिद्वन्द्विता तथा द्वेषके भाव बढ़ रहे हैं। चरित्र-नाश भी बड़ी तेजीसे हो रहा है!

(१२) तरुणी कुमारियों और नवयुवकोंकी सहशिक्षासे भी चरित्रकी पवित्रताका बड़ा ह्रास और नाश हुआ है तथा उत्तरोत्तर अधिक हो रहा है। कहाँ तो जगज्जननी सीताजीने पुत्रके समान सेवक ब्रह्मचारी हनुमान‍्जीका स्पर्श करना अस्वीकार कर दिया था और कहाँ आज अबाध संसर्गको प्रोत्साहन दिया जा रहा है, सो भी शिक्षाके पवित्र नामपर!

(१३) खान-पानमें हर किसीका जूँठा खानेकी प्रवृत्ति बढ़ रही है और इससे सुधार बताया जा रहा है! रेलोंमें, होटलोंमें और घरोंमें भी काँच तथा चीनी-मिट्टीके बर्तनोंका प्रचार, जूते पहने हुए ही भोजन करना, किसी भी जातिके और कैसे भी गन्दे रहनेवाले आदमीके हाथोंसे खाना, जूँठे हाथों जूँठी चम्मचसे खानेकी सामग्री लेना, एक ही बर्तनमें रखे हुए फल-मेवा-पान आदि पदार्थोंको बहुत-से लोगोंका मुँहमें हाथ या अँगुली देकर खाना, एक ही थाली या पत्तलमें बहुतोंका साथ खाना, जूँठे बर्तनोंमें ही चाय, सोडा, जल आदि पीना, बर्तनोंको केवल धो भर लेना, मांस-मदिरासे भी परहेज न करना, अण्डोंका भोजनके रूपमें प्रयोग करना, खाकर हाथ-मुँह न धोना, कुल्ले न करना और चलते-चलते खाना आदि ऐसी बातें हैं जिनसे पवित्रताका नाश तो होता ही है, तरह-तरहकी बीमारियाँ भी फैलती हैं!

भ्रष्टाचार और अनाचारके ये थोड़े-से उदाहरण दिये गये हैं। न मालूम ऐसे कितने शारीरिक, वाचनिक और मानसिक दोष हमारे अन्दर आज आ गये हैं। इन सबका कारण है—घोर विषयासक्ति और तज्जनित काम, क्रोध तथा लोभका आश्रय। भगवान् और धर्मको भूल जानेपर मनुष्य असंयमी तथा यथेच्छाचारी होकर पतित हो जाता है और भ्रमवश उस पतनको ही उत्थान मानने लगता है! आज हमारे समाजकी यही दशा हो रही है। इस पतनके प्रबल प्रवाहको शीघ्र ही न रोका गया तो पता नहीं यह हमें कहाँ ले जायगा!

इसको रोकनेके उपाय हैं—धर्म तथा भगवान‍्में श्रद्धा उत्पन्न करना, भगवान‍्से प्रार्थना करना, परलोक और पुनर्जन्ममें विश्वास बढ़ाना, सद‍्ग्रन्थोंका प्रचार करना, त्याग तथा प्रेमकी पवित्र भावनाएँ फैलाना, संयमका महत्त्व समझना, अहिंसा और सत्यका क्रियात्मक प्रसार करना, स्वार्थबुद्धिका नाश हो ऐसी शिक्षा देना, स्वयं नि:स्वार्थभावसे सबकी सेवा करके आदर्श उपस्थित करना, स्कूल-कॉलेजोंमें धार्मिक शिक्षाका अनिवार्य करना तथा वैराग्य और सच्ची भावनासे विषयासक्तिका नाश करना इनमेंसे जिनसे, जिस क्षेत्रमें, जितना कुछ हो सके, वही सचाईके साथ भगवान् पर विश्वास रखकर करना चाहिये।