नम्र निवेदन

भगवच्चर्चाका तीसरा भाग प्रेमी पाठकोंकी सेवामें प्रस्तुत किया था। यह चौथा भाग भगवत्प्रेमी जनताकी मनस्तुष्टिके लिये प्रस्तुत किया जा रहा है। भगवत्प्रेमियोंको भगवान‍्की चर्चामें—उनके पावन गुणोंके परस्पर कथन और श्रवणमें जितना सुख मिलता है, उतना किसी अन्य विषयमें नहीं मिलता। उनकी तुष्टि एवं मनोरंजनका वही सबसे प्रिय विषय होता है। अत: हमें आशा है कि प्रस्तुत भाग भी भगवत्प्रेमी पाठकोंको पिछले भागोंके समान ही रुचिकर एवं उपादेय सिद्ध होगा। इसमें पिछले भागोंकी अपेक्षा भी अधिक महत्त्वपूर्ण, गूढ़ एवं शिक्षाप्रद विषयोंका समावेश हुआ है। इसमें सन्त-महिमा, निर्भरा भक्ति, वर्णाश्रमधर्म, मौन व्याख्यान, भगवदनुराग आदि बोधप्रद विषयोंके साथ-साथ वर्णाश्रमधर्म और ब्राह्मण, पाप विषयासक्तिसे होते हैं—प्रारब्धसे नहीं, श्रीरामका स्वरूप और उनकी प्रसन्नताका साधन, चोर-जार-शिखामणि एवं श्रीराधाजी कौन थीं—आदि कुछ ऐसे विषयोंपर भी प्रकाश डाला गया है, जिनके सम्बन्धमें जिज्ञासुओंको कई प्रकारकी शंकाएँ हुआ करती हैं। साथ ही—साधनोपयोगी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विषयोंका प्रतिपादन और रामायणके मुख्य-मुख्य पात्रोंकी चरित्र-समीक्षा तथा रामायणविषयक कतिपय अन्य उपयोगी विषयोंका दिग्दर्शन कराया गया है। इस प्रकार सभी दृष्टियोंसे यह संग्रह भगवत्प्रेमियों एवं भगवत्वजिज्ञासुओंके बड़े ही कामकी वस्तु बन गया है। आशा है, इस अनुपम चयनसे परमार्थपथके पथिक भाई-बहिन पूरा लाभ उठाकर अपने जीवनको भगवदभिमुखी एवं धन्य बनानेकी चेष्टा करेंगे।

विनीत

चिम्मनलाल गोस्वामी

अक्षयतृतीया, २०१० वि०