निर्भरा भक्ति

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये

सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।

भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे

कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥

(रामचरितमानस)

भक्तिके अनेक प्रकार हैं, उनमेंसे एकका नाम है निर्भरा भक्ति। प्रपत्ति, शरणागति, आत्मनिवेदन, समर्पण आदिके साथ इसका प्राय: सादृश्य है। इस भक्तिमें भक्त स्वाभाविक ही केवल भगवच्चिन्तन-परायण रहता है, शेष सारा काम भगवान् करते हैं। इसके कई स्तर हैं और अधिकारिभेदसे उनके पृथक्-पृथक् स्वरूप और उपयोग हैं।

निर्भरा भक्तिमें सबसे पहली आवश्यक चीज है ‘विश्वास’। भगवान‍्में जिसका यह दृढ़ विश्वास होगा कि भगवान् सर्वशक्तिमान् हैं, सर्वेश्वर हैं, मेरे परम आत्मीय हैं वही अपने किसी कामके लिये भगवान् पर निर्भर करेगा। संसारमें भी हम देखते हैं कि किसी भी क्षेत्रमें और किसी भी कामके लिये जिसमें विश्वास होता है, उसीपर मनुष्य भरोसा करता है। जिसके सम्बन्धमें मनुष्यकी यह धारणा होती है कि ‘इससे मेरा काम नहीं सधेगा अथवा सधेगा—इसमें सन्देह है या मेरा काम साधनेकी इसमें योग्यता तो है परन्तु मेरा काम यह क्यों करेगा अथवा यह मेरा हित तो करना चाहता है परन्तु इसमें योग्यता एवं शक्तिका अभाव है, उसपर मनुष्य कभी अपने कामके लिये निर्भर नहीं कर सकता, चाहे वह कितना ही शक्तिमान् हो अथवा कितना ही सुहृद् हो।’ जिसमें दोनों बातें हों, उसीपर मनुष्य भरोसा करता है और यही भरोसा बढ़ते-बढ़ते निर्भरताके स्वरूपमें परिणत हो जाता है। इसीसे भगवान‍्ने गीतामें कहा है—

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।

सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥

(५। २९)

‘मुझको समस्त यज्ञ-तपोंका भोक्ता, सब लोकोंका महान् ईश्वर और सब प्राणियोंका अहैतुक मित्र जान लेनेपर मनुष्य शान्तिको प्राप्त हो जाता है।’

मनुष्यके मनमें नाना प्रकारके मनोरथ हैं। संसारमें वह सदा ही अपनेको किसी-न-किसी अभावसे ग्रस्त पाता है। किसी भी अवस्थामें वह यह अनुभव नहीं करता कि मुझको सब कुछ मिल गया, अब और कुछ भी नहीं चाहिये। बड़ी-से-बड़ी दुर्लभ वस्तुके पानेपर भी वह उसमें किसी कमीका अनुभव करता है और यह सोचता है कि जब मेरी यह कमी पूरी होगी, तब मुझे शान्ति मिलेगी। यह अभावका अनुभव कभी मनुष्यके चित्तको शान्त नहीं होने देता। शान्तिकी दो ही स्थितियाँ हैं। एक तो वह, जिसमें पहुँचनेपर वह स्वयं शान्तिस्वरूप हो जाता है। फिर उसे किसी वस्तुकी कमीका कभी बोध होता ही नहीं। वह सभीमें सर्वत्र, सर्वथा और सर्वदा एकमात्र परमात्माको देखता है और अपनेको उनसे अभिन्न पाता है। उसकी यह पूर्णता उसकी स्वरूपभूता होती है, इसीका नाम मुक्ति है। दूसरी वह स्थिति है, जिसमें वह अपनेको सदा-सर्वदा भगवान‍्के संरक्षणमें पाता है, जहाँ भगवान् अनन्त हाथों और अनन्त शक्तियोंसे उसकी कमीको पूरा करनेके लिये सदा प्रस्तुत रहते हैं परन्तु उसे भगवान‍्को पाकर किसी कमीका अनुभव होता ही नहीं, वह कृतार्थ हो जाता है—यहाँतक कि मुक्तिकी ओर भी उसकी दृष्टि भूलकर भी कभी नहीं जाती। वह इस बातको पहले ही जान चुकता है कि जगत‍्में जितने भी यज्ञ-तप किये जाते हैं, विभिन्न देवताओंके रूपमें एकमात्र भगवान् ही उन सबके भोक्ता हैं; अतएव देवोपासनारूप कर्मसे जिनको जो कुछ भी फल मिलता है, सब भगवान‍्के अपरिमित भण्डारसे ही आता है। भगवान् ही सब लोकोंके विभिन्न ईश्वरोंके एकमात्र महान् ईश्वर हैं और वे भगवान् जीवमात्रके परम सुहृद् होनेके कारण मेरे भी परम सुहृद् हैं। यह जानते ही उसे शान्ति मिल जाती है। उसे निश्चय हो जाता है कि अब मैं सब प्रकारसे सुरक्षित और पूर्णकाम हो गया; क्योंकि जिनमें समस्त सत्कर्मोंका फल निहित है, वे सब ईश्वरोंके ईश्वर सर्वशक्तिमान् भगवान् जब मेरे परम सुहृद् हैं, तब मुझे किसका डर और किस बातका अभाव रह गया। ऐसी अवस्थामें वह सब प्रकारसे भगवान् पर निर्भर करके निश्चिन्त और शान्तचित्त हो जाता है।

सकाम भक्तोंमें तीन तरहके भक्त माने गये हैं—अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु (‘आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी’)। इनमें एक तो वह है, जो किसी भी अर्थकी सिद्धिके लिये—धन, जन, मान, यश, भोग, स्वर्ग आदिकी प्राप्तिके लिये भगवान‍्को भजता है; दूसरा वह है, जो प्रारब्धवश किसी संकटमें पड़कर उससे त्राण पानेके लिये भगवान‍्की भक्ति करता है और तीसरा वह है, जो भगवान‍्की प्राप्तिका सरल और सहज पथ जाननेके लिये भगवान‍्को याद करता है। इन तीनों सकाम भक्तोंकी सकाम भक्तिको भी तभी पूर्ण समझना चाहिये जब कि वे भगवान‍्को ही एकमात्र आश्रय मानकर उन्हींपर निर्भर करें और तभी उन्हें अनायास फल भी मिलता है। ध्रुव अर्थार्थी भक्त थे; वे ज्यों ही भगवान् पर निर्भर हुए, त्यों ही उन्हें इनका इच्छित फल मिल गया। द्रौपदी और गजराज आर्त भक्त थे और जबतक वे दूसरोंसे त्राणकी जरा भी आशा करते रहे, तबतक उनके संकट दूर नहीं हुए; जब एकमात्र भगवान् पर निर्भर करके उनको पुकारा, तब उसी क्षण भगवान‍्ने स्वयं प्रकट होकर उनके दु:ख दूर कर दिये। जिज्ञासु भक्त तो ऐसे बहुत हुए हैं, जो भगवान् पर निर्भर करके भगवत्प्रेरणासे भगवान‍्के पथपर सहज ही आरूढ़ हो गये हैं। सकाम-भावकी इस निर्भरताके लिये बन्दरके बच्चेसे तुलना करके सन्तलोग बिल्लीके बच्चेका दृष्टान्त दिया करते हैं। बन्दरका बच्चा स्वयं कूदकर माँको पकड़कर उसका स्तन-पान करने लगता है। परन्तु भूखा बिल्लीका बच्चा माँकी प्रतीक्षा करता हुआ अपने स्थानमें बैठा रहता है; स्वयं माँ उसकी चिन्ता करती है और उसके पास आकर जहाँ ले जाना होता है, अपने मुँहसे उठाकर उसे वहाँ ले जाती है और अपना दूध पिलाकर सन्तुष्ट करती है। इसी प्रकार जो मनुष्य किसी भी कामकी सिद्धिके लिये श्रद्धा-विश्वासपूर्वक भगवत्कृपाकी प्रतीक्षा करते हुए भगवान् पर निर्भर करते हैं, उनके कामको भगवान् स्वयं पधारकर पूरा कर देते हैं। नरसी मेहता आदि अनेक भक्तोंके उदाहरण इसमें प्रमाण हैं। परन्तु जहाँतक ऐसा सकामभाव है, वहाँतक भगवान् पर निर्भरता आंशिक ही है।

इसके बाद यह होता है कि मनुष्य कुछ चाहता तो है, उसे अभावका अनुभव तो होता है; परन्तु उस अभावकी पूर्ति किस वस्तुसे होगी, इसको वह नहीं जानता। उसे विश्वास होता है कि जिस वस्तुसे मेरे अभावकी पूर्ति होगी, उसको भगवान् जानते हैं और इसलिये वह उस अज्ञात वस्तुके लिये भगवान् पर निर्भर करता है। जैसे छोटा शिशु बिस्तरपर पड़ा रोता है, उसे कोई कष्ट है—जाड़ा लग रहा है, मच्छर काट रहे हैं या और कोई पीड़ा है। वह यह नहीं जानता कि किस वस्तुकी प्राप्ति होनेपर मेरा संकट दूर होगा—वह केवल माँको जानता है और रोकर माँको बुलाता है। माँ आकर स्वयं पता लगाती है कि बच्चा क्यों रो रहा है और पता लगाकर स्वयं उसके कष्ट निवारणका उपाय करती है। इसी प्रकार इस अवस्थामें भक्त अपने लिये उपयोगी अज्ञात फलके लिये भगवान् पर निर्भर करता है और उन्हींकी कृपासे कल्याणकारी फलको प्राप्त करके सन्तुष्ट होता है। इसमें फलरूप वस्तुका निर्णय भगवान् करते हैं, इस दृष्टिसे निर्भरताका यह स्तर पहलेसे ऊँचा होनेपर भी सकामभाव होनेके कारण यह भी वस्तुत: आंशिक ही है।

इसके बाद उन भक्तोंकी बात है, जो केवल भगवान‍्को ही प्राप्त करना चाहते हैं और उसके लिये भगवान् पर ही निर्भर करते हैं। इनके लिये भी बिल्लीके बच्चे और छोटे शिशुके उदाहरण लागू पड़ सकते हैं। ये केवल चिन्तनपरायण रहते हैं, उसका फल भगवान‍्की प्राप्ति कब होगी, क्योंकर होगी—इस बातको भगवान् पर ही छोड़ देते हैं और वास्तवमें यों सब कुछ भगवान् पर छोड़नेवाले बड़े लाभमें ही रहते हैं। क्योंकि प्रथम तो कोई शर्त न होनेसे इनके भजनमें निष्काम और अनन्यभाव रहता है; दूसरे, जिनको पाना है, वे ही भगवान् जब स्वयं मिलना चाहें, तब उनके मिलनेमें विलम्ब भी नहीं होता। भक्तको कहीं चलकर नहीं जाना पड़ता, बिल्लीकी भाँति या छोटे शिशुकी स्नेहमयी जननीकी भाँति स्वयं भगवान् ही उसके समीप आ जाते हैं। ऐसे ही भक्तोंके लिये भगवान‍्की यह प्रतिज्ञा है—

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥

(गीता ९। २२)

‘केवल मुझपर ही निर्भर करनेवाले जो भक्त नित्य मेरा चिन्तन करते हुए मुझे भलीभाँति भजते हैं, उन नित्य मुझमें लगे हुए भक्तोंका ‘योगक्षेम’ मैं स्वयं वहन करता हूँ।’

अप्राप्त वस्तुकी प्राप्तिका नाम ‘योग’ है और प्राप्त वस्तुके संरक्षणका नाम ‘क्षेम’ है। इस ‘योग’ और ‘क्षेम’ के वहनका सारा भार स्वयं भगवान् अपने ऊपर ले लेते हैं। संसारमें हम देखते हैं कि अल्पज्ञ और अल्पशक्तिवाले होनेपर भी जिनपर हमारा विश्वास होता है, वे वैद्य-डॉक्टर जब हमारे इलाजका भार ले लेते हैं, तब हम निश्चिन्त होकर उनपर निर्भर करने लगते हैं। अपना जीवन उन्हें सौंप देते हैं, विश्वासपूर्वक उनकी दी हुई दवा लेते हैं—चाहे वह जहर ही क्यों न हो—और उनके आज्ञानुसार पथ्य भी करते हैं। हमारी असमर्थतामें कोई श्रेष्ठ पुरुष जिनकी शक्ति और हितैषितापर हमारा विश्वास होता है, हमारे जीवन-निर्वाहका भार ले लेते हैं, तब हम निश्चिन्त होकर उनपर अपनेको छोड़ देते हैं। केवटके विश्वासपर नौकामें बैठ जाते हैं, चलानेवालेपर निर्भर करके मोटर और हवाई-जहाजमें बैठ जाते हैं और मनमें कोई चिन्ता नहीं करते। तब स्वयं अपने मुँहसे हमारे सुहृद् होनेकी घोषणा करनेवाले सर्वसमर्थ सर्वशक्तिमान् सर्वज्ञ सर्वलोकमहेश्वर भगवान् पर निर्भर करनेमें तो हमारा कल्याण-ही-कल्याण है। वे हमारे परम सुहृद् हैं, इसलिये कभी अकल्याण नहीं कर सकते; सर्वज्ञ हैं, इसलिये हमारा कल्याण किस बातमें है, इसको अच्छी तरह जानते हैं, वे कभी भूल नहीं कर सकते और सर्वशक्तिमान् हैं, इसलिये हमारा कल्याण अनायास ही कर सकते हैं। और वे यहाँतक जिम्मा लेनेको तैयार हैं कि तुम्हारे लिये जो आवश्यक अप्राप्त वस्तु है, उसकी प्राप्ति मैं करा दूँगा और जो आवश्यक वस्तु प्राप्त है, उसकी रक्षा मैं करूँगा। इतनेपर भी हम यदि उनपर निर्भर करके उनके चिन्तनपरायण नहीं होते तो फिर हमारे समान मन्दबुद्धि और मन्दभाग्य और कौन होगा।

यहाँ इस ‘योगक्षेम’ से यह अर्थ भी लिया जाता है कि भक्तके देह-परिवारादिकी रक्षा और उसके लिये आवश्यक लौकिक पदार्थोंकी व्यवस्था भी भगवान् करते हैं। और ऐसा अर्थ लेना अनुचित भी नहीं है; क्योंकि अनन्यभक्तकी तो अपने भगवान‍्को छोड़कर न किसी अन्य वस्तुमें आसक्ति है, न किसी वस्तुकी ओर उसका लक्ष्य है, न देह-परिवारादिके देख-रेखकी उसे चिन्ता है और न उसे दूसरेके अस्तित्वकी कल्पना करनेके लिये अवकाश ही है। ऐसी अवस्थामें भक्तवत्सल भगवान् उसके देह-परिवारादिके लिये आवश्यक प्राप्त सामग्रियोंकी रक्षा करें और अप्राप्तकी प्राप्ति करवा दें तो इसमें क्या अनहोनी बात है? बल्कि भगवान् पर निर्भर करनेवाले भक्तका ‘योगक्षेम’ और भी अच्छा होना चाहिये। वह अपनी परिमित शक्तिसे उतनी रक्षा नहीं कर सकता, जितनी भगवान‍्की शक्तिसे हो सकती है और इसी प्रकार वह अपने लिये आवश्यक वस्तुओंका भी संग्रह इच्छानुसार नहीं कर सकता; क्योंकि उसके पास उनके संग्रह करनेके लिये उतना मूल्य देनेकी भी सामर्थ्य नहीं है। परन्तु समस्त ऐश्वर्यके महान् ईश्वर भगवान् जो चाहे वही वस्तु—चाहे वह वस्तु मनुष्यकी ताकतसे कितनी भी दुर्लभ हो—उसे अनायास दे सकते हैं। ऐसी अवस्थामें अपने बलपर निर्भर करनेवालेकी अपेक्षा भगवान् पर निर्भर करनेवाला स्वाभाविक ही उत्तम-से-उत्तम ‘योगक्षेम’ को प्राप्त होता है। परन्तु जो भक्त अपने मनमें यह सोचकर भगवान् पर निर्भर होना चाहता है कि ‘भगवान् पर निर्भर करके उनका चिन्तन करनेसे मेरा योगक्षेम उत्तम-से-उत्तम होगा’ वह वास्तवमें न तो अनन्य है और न अनन्यचित्तसे चिन्तन ही करता है। बात तो यथार्थमें यह है कि ऐसे निर्भर और अनन्यभक्तके मनमें भगवान‍्के सिवा और कुछ होता ही नहीं; वह भगवान् पर निर्भर रहकर भगवान‍्का चिन्तन करनेके लिये ही भगवान् पर निर्भर करके भगवान‍्का चिन्तन करता है। उसके मनमें लौकिककी तो बात ही क्या, पारमार्थिक ‘योगक्षेम’ की चिन्ताके लिये भी गुंजाइश नहीं होती। वह इस बातको भी नहीं जानता कि ‘मुझे किस साधनपथसे चलना चाहिये और मैं कब अपने लक्ष्यको प्राप्त करूँगा।’ उसके लिये कौन-सा साधन उत्तम है, किस बातमें उसका कल्याण है—इस बातको भगवान् ही सोचते हैं। उसके कल्याणका स्वयं अपने (भगवान् के) मनसे निश्चित किया हुआ साधन भगवान् ही उससे करवाते हैं, भगवान् ही उसके द्वारा प्राप्त साधन-सम्पत्तिकी रक्षा करते हैं और भगवान् ही उसके साधनके लक्ष्यको स्वयं वहन करके उसके समीप पहुँचा देते हैं। साधन और सिद्धि दोनोंका भार भगवान् अपने ऊपर ले लेते हैं। इसीसे ऐसा कहा जाता है कि भगवान् पर निर्भर करनेवाला भक्त जिस प्रकार अनायास अतिशीघ्र भगवान‍्को प्राप्त करता है, उस प्रकार दूसरा कोई भी प्राप्त नहीं कर सकता। इसमें एक विशेषता और है—वह यह कि ऐसा निर्भर भक्त सच्चिदानन्दघन, निष्कल, निष्क्रिय, निर्विकार, निरंजन, निर्गुण, सनातन, अव्यक्त और सर्वव्यापी, सर्वाधार, सर्वाश्रय, सर्वेश्वर, सर्वगुणसम्पन्न, सर्वैश्वर्यशाली भगवान‍्को अपने परम प्रेमास्पद नित्य जीवन-सहचर और परम आत्मीय सुहृद्के रूपमें प्राप्त करता है। परन्तु इस प्रकार निर्भर करनेसे भगवत्प्राप्ति शीघ्र होगी, ऐसी शुभ भावना उसके मनमें नहीं होती। वह तो इससे भी ऊँचा उठकर केवल भगवान् पर ही निर्भर रहता है; क्योंकि यह निर्भरतापूर्ण भगवच्चिन्तन ही ऐसे भक्तके अस्तित्वका आधार होता है। फिर उसे किसी अन्य वस्तुके योगक्षेमकी चिन्ता कैसे हो सकती है। यह निर्भरा भक्तिकी ऊँची अवस्था है। परन्तु इसमें भी भगवत्प्राप्तिकी शुभ वासना छिपी है, जो सर्वथा कल्याणकारिणी और परम वांछनीय होनेपर भी निर्भर भक्तकी निर्भरतामें कुछ कमीका अनुभव कराती है।

इसके बादकी वह अवस्था है, जिसमें भक्त भगवच्चिन्तनरूपी क्रिया भी अपने अहंकारसे प्रेरित होकर नहीं करता। वस्तुत: वह स्वयं कुछ करता ही नहीं, भगवान् ही उसके द्वारा सब कुछ करते-कराते हैं। वह तो केवल उनके हाथकी कठपुतलीमात्र होता है। जैसे जड कठपुतलीको नट अपने इच्छानुसार इशारेपर नचाता है, वह कहीं कुछ भी नहीं बोलती, उसी प्रकार निर्भर भक्त यन्त्री भगवान‍्को सब कुछ समर्पण करके यन्त्रवत् उनके इशारेपर नाचता रहता है। वह अपने लिये किसी वस्तुकी या कार्यकी कोई आवश्यकता ही नहीं समझता, वस्तुत: अपना भी उसे कोई पता नहीं रहता; क्योंकि वह तो अपनेको उनके हाथका यन्त्र बनाकर अपनेपनको पहले ही खो चुकता है। भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा—

मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।

निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वर:॥

(गीता ३।३०)

‘तुम सब कर्मोंका अध्यात्मचित्तसे मुझमें संन्यास (भलीभाँति निक्षेप) करके आशा-ममताको छोड़कर और सन्तापसे मुक्त होकर युद्ध करो।’ ‘न्यास’ का अर्थ है निक्षेप यानी डाल देना। कोई वस्तु—कोई काम, किसी दूसरी वस्तुपर या किसी दूसरे पुरुषपर छोड़ देनेका नाम न्यास है। न्यास निक्षेपका ही पर्याय है। ‘निक्षेपापरपर्यायो न्यास:।’ न्यासके साथ ‘सम्’ उपसर्ग लगानेसे उसका अर्थ होता है—‘भलीभाँति छोड़ देना।’ भगवान् कहते हैं कि तुम न युद्धमें विजयी होनेकी आशा करो, न राज्यमें, न युद्धस्थलमें उपस्थित बन्धु-बान्धवोंमें और न अपने शरीरमें ही ममता रखो और न बन्धुवध और पराजयरूप प्रतिकूल फल आदिके कारण मनस्तापको प्राप्त होओ। आसक्ति होगी तो विजयकी आशा रहेगी, अहंभाव होगा तो उसके फलस्वरूप ममता होगी और द्वेष होगा तो मनस्ताप होगा। तुम अहंकार और राग-द्वेषसे सर्वथा मुक्त होकर—यह समझकर कि मैं कुछ भी नहीं करता, मैं तो भगवान‍्के शरण हूँ, वे यन्त्री भगवान् ही मुझसे यन्त्रवत् जो कुछ कराना चाहते हैं, वही किया जाता है, इस प्रकार मुझमें सब कर्मोंका भलीभाँति त्याग करके युद्ध करो। तुम्हारे अन्दर न अज्ञान रहे और न अज्ञानके कार्यरूप अहंकार, राग, द्वेष, ममता, आशा और सन्ताप आदि ही रहें। तुम बस, मेरे हाथकी कठपुतली बनकर मेरे इशारेपर मैं जो कराऊँ, सो करते रहो!’ यह ‘न्यासयोग’ ही आगे चलकर निर्भरा भक्ति हो जाता है। इसमें भक्तका समस्त भार उसके भगवान् पर रहता है; परन्तु भक्त भी इतना परतन्त्र हो जाता है कि वह कर्म या कर्मफलकी तो बात ही क्या, अपने अस्तित्वतकके लिये भी भगवान् पर ही निर्भर करता है। जैसे दिनका अस्तित्व सूर्यपर या जीवनका अस्तित्व प्राणोंपर निर्भर है, उसी प्रकार ऐसे भक्तका जीवन अपने परमाधार भगवान् पर निर्भर करता है। उसका आत्मा, प्राण, मन, धन, जीवन, परिवार, सम्पत्ति, लोक, परलोक, भोग और मोक्ष—सब कुछ एकमात्र भगवान् ही होते हैं। भगवान् भी ऐसे भक्तके परतन्त्र होते हैं। वे भी उसके नचाये नाचते हैं। भगवान् स्वयं कहते हैं—

अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज।

साधुभिर्ग्रस्तहृदयो भक्तैर्भक्तजनप्रिय:॥

मयि निर्बद्धहृदया: साधव: समदर्शना:।

वशीकुर्वन्ति मां भक्त्या सत्स्त्रिय: सत्पतिं यथा॥

(श्रीमद्भा० ९। ४। ६३, ६६)

‘हे द्विज! मैं भक्तके पराधीन हूँ, स्वतन्त्रकी तरह कुछ नहीं कर सकता। भक्तोंके प्रेमने मेरे हृदयको सर्वथा अपने अधीन कर लिया है, वे भक्त मुझे बहुत ही प्यारे हैं। मुझमें अपने हृदयको सदाके लिये बाँध देनेवाले (मेरे ही इशारेपर सब कर्म करनेवाले) समदृष्टि साधु पुरुष मुझको अपनी भक्तिसे वैसे ही वशमें कर लेते हैं, जैसे पतिव्रता स्त्री अपने सदाचारी पतिको वशमें कर लेती है।’ धन्य है! परन्तु भक्त कभी यह कल्पना भी नहीं करता कि भगवान् मेरे अधीन हैं। वह तो अपनेको सम्पूर्णरूपेण समर्पण करके अन्य किसी कल्पनाके लिये अपने अन्दर गुंजाइश ही नहीं रहने देता।

ऐसा निर्भर भक्त कुछ भी कर्म नहीं करता, ऐसी बात नहीं है। वह अपने लिये कुछ भी नहीं करता और न अपने लिये किसी कर्मका त्याग ही करता है। भगवान् जब जो कुछ कराते हैं, वह उसीको करता है; चाहे वह कर्मका ग्रहण हो या त्याग, क्रूर कर्म हो या सौम्य कर्म, सृजन हो या संहार। जब भगवान् खूब कर्म कराते हैं, तब वह खूब करता है, जब थोड़ा कराते हैं, तब थोड़ा करता है और जब बिलकुल नहीं कराते, तब बिलकुल नहीं करता। उसे न तो करनेसे मतलब है और न नहीं करनेसे ही। वह दोनों ही अवस्थामें अपनी स्थितिमें अविचल स्थित रहता है।

यहाँ यह प्रश्न होता है कि ऐसे भक्तका सांसारिक योगक्षेम कैसे चलता है। इसका सीधा उत्तर यही है कि भगवान् चलाते हैं। वैसे ही चलता है। इसमें कोई खास नियम नहीं है कि ऐसा भक्त लौकिक दृष्टिसे वर्णाश्रमानुसार धन, जन, मान, यश आदिसे सम्पन्न हो या इनसे सर्वथा हीन हो। दोनों ही तरहके उदाहरण मिलते हैं। इतनी बात अवश्य है कि उसका सारा भार भगवान् पर चला जानेसे न तो उससे कोई निषिद्ध कर्म हो सकता है और न उसे कोई अकल्याणकारी भोग्य-पदार्थ ही वस्तुत: मिल सकता है। जिसका ‘योगक्षेम’ भगवान् स्वयं देखते हों, उसके लिये ऐसी कोई स्थिति तो हो ही नहीं सकती कि जिसमें उसके लिये परिणाममें किसी अमंगलकी जरा भी सम्भावना हो। हाँ, रहस्यको न समझनेवाले लोग मूर्खतावश मंगलमें अमंगलकी कल्पना कर सकते हैं। बच्चा साँप पकड़ने दौड़ता है, जलती आगमें हाथ डालना चाहता है, माँ लपककर उसे रोक देती है, नहीं मानता तो स्नेहवश उसे डाँट भी देती है; बच्चेको मनचाही वस्तु न मिलनेसे दु:ख होता है, वह समझ सकता है कि मेरा बड़ा अमंगल हो गया, मुझे मनचाही चीज नहीं मिली। इसी प्रकार हम अल्पज्ञ अपनी तुच्छ बुद्धिसे जिसमें अपना मंगल समझते हैं, सम्भव है सर्वज्ञ भगवान‍्की बुद्धिमें उसके परिणाममें हमारा घोर अमंगल हो। हम जिसके संयोगमें सुख और वियोगमें महान् दु:खकी प्राप्ति समझते हैं, सम्भव है भगवान् अपनी यथार्थ दृष्टिसे उस संयोगसुखको भीषण दु:खकी और वियोग-वेदनाको महान् सुखकी भूमिका समझते हों और हमें हमारा मनमाना फल न देकर हमारे मंगलके लिये अपना मनमाना फल देते हों और ऐसा होनेमें हम मूर्खतावश अपना अमंगल मानते हों। जो भगवान् पर निर्भर करनेवाले भक्त हैं, वे तो ऐसा नहीं मान सकते। परन्तु उनकी रहस्यमयी स्थितिको अपनी विषय-विभ्रमरत, मोहावृत्त बुद्धिके तराजूपर तौलनेवाले लोग उनमें अमंगल मान सकते हैं। अवश्य ही उनके माननेसे भक्तोंकी स्थितिमें जरा भी अन्तर नहीं आता। वे भक्त कितने धन्य और सुखी हैं, जिनके कल्याणकी और कल्याणकारी साधनोंके संग्रहकी व्यवस्था सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, सर्वशक्तिमान् और परम सुहृद् भगवान् स्वयं करते हैं!

इन सब बातोंपर विचार करनेसे यही निष्कर्ष निकलता है कि भगवान‍्की निर्भरा भक्ति बहुत ही उपयोगी और शीघ्र कल्याणप्रदा है। भगवान् पर विश्वास करके पहले निर्भरताकी भावना करनी चाहिये और भगवान‍्की कृपाप्राप्तिके लिये भगवान‍्का नित्य अनन्य और निष्काम चिन्तन करते हुए भगवान् पर पूर्ण निर्भर होनेका यत्न करते रहना चाहिये। इस साधनमें प्रधान चार बातें हैं—१.दृढ़ विश्वास, २.संसारी चिन्ताओंका सर्वथा त्याग, ३.अनुकूल आचरण और ४.अनन्य चिन्तन! भक्त वृत्रासुरके इन शब्दोंके अनुसार भगवान‍्से सदा प्रार्थना कीजिये—

अहं हरे तव पादैकमूल-

दासानुदासो भवितास्मि भूय:।

मन: स्मरेतासुपतेर्गुणांस्ते

गृणीत वाक् कर्म करोतु काय:॥

न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठ्यं

न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम्।

न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा

समञ्जस त्वा विरहय्य काङ्क्षे॥

अजातपक्षा इव मातरं खगा:

स्तन्यं यथा वत्सतरा: क्षुधार्ता:।

प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा

मनोऽरविन्दाक्ष दिदृक्षते त्वाम्॥

‘हे भगवन्! तुम्हारे चरण ही जिनका मुख्य आश्रय हैं, मैं पुन: तुम्हारे उन दासोंका भी दास बनना चाहता हूँ। मेरा मन सदा तुम प्राणाधारके गुणोंका स्मरण करे, मेरी वाणी तुम्हारा नाम-गुण-कीर्तन करे और शरीर सदा तुम्हारी सेवारूपी कर्ममें लगा रहे। तुम प्रियतमको छोड़कर मुझको स्वर्ग, ब्रह्माका पद, सार्वभौम साम्राज्य, पातालका राज्य, योगकी दुर्लभ सिद्धियाँ और कैवल्य-मोक्ष भी नहीं चाहिये। हे कमलनयन! जिनके पाँख नहीं उगे हैं, ऐसे पक्षियोंके बच्चे जैसी अदम्य उत्सुकतासे माँकी बाट देखा करते हैं, भूखे बछड़े जैसे वनमें गयी हुई गायका स्तनपान करनेके लिये छटपटाते हैं और परदेश गये हुए स्वामीकी प्रियतमा पत्नी जैसे पतिको आँखोंसे देखनेके लिये व्याकुल रहती है, वैसे ही मैं भी तुमको देखनेके लिये व्याकुल हो रहा हूँ!’