पाप विषयासक्तिसे होते हैं, प्रारब्धसे नहीं

प्रश्न—मनुष्यसे जो पापकर्म बनते हैं, उसमें प्रधान कारण क्या है?

उत्तर—पापोंके होनेमें प्रधान कारण विषयोंकी आसक्ति ही है; आसक्तिसे कामना उत्पन्न होती है, कामनाकी पूर्तिसे लोभ और कामनामें विघ्न पड़नेसे क्रोध उत्पन्न होता है। ये काम, क्रोध, लोभ ही सारे पापोंकी जड़ हैं। भगवान‍्ने स्पष्ट शब्दोंमें कहा है—

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन:।

काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥

(गीता १६। २१)

काम, क्रोध और लोभ—ये तीन प्रकारके नरकके द्वार हैं; ये आत्माका नाश (अध:पतन) करनेवाले हैं, अतएव इन तीनोंको त्याग देना चाहिये।

प्रश्न—क्या विषयासक्तिका और काम, क्रोध, लोभका त्याग करना मनुष्यकी शक्तिमें है?

उत्तर—अवश्य ही है; शक्तिमें न होता तो भगवान् त्याग करनेकी आज्ञा ही कैसे देते तथा क्यों वेद-पुराण, स्मृति-शास्त्र निषिद्धके त्याग और विहितके ग्रहणकी व्यवस्था करते।

प्रश्न—बात तो ऐसी ही मालूम होती है, परन्तु एक सन्देह होता है। कुछ सज्जन कहते हैं कि इसमें जीव पराधीन है। एक बार हरिद्वारमें गंगातटपर एक सिन्धी माईसे बातचीत होने लगी। माईको वेदान्तका बड़ा बोध मालूम होता था। उन्होंने मुझसे कहा कि ‘पाप विषयासक्तिसे भी होते हैं और प्रारब्धसे भी। बल्कि कभी-कभी तो प्रारब्धका इतना प्रबल वेग होता है कि मनुष्यको बाध्य होकर बुरे-से-बुरे पापकर्म करने पड़ते हैं।’ जब मैंने नहीं माना तो उन्होंने मुझे जगत्प्रसिद्ध श्रीविद्यारण्यस्वामिकृत ‘पंचदशी’ ग्रन्थसे निम्नलिखित श्लोकोंको पढ़कर सुनाया और उनका अर्थ करके यह समझानेकी चेष्टा की कि ‘पाप प्रारब्धसे होते हैं, इनसे छूटनेकी कोशिश न करके ब्रह्मके बोधके लिये चेष्टा करनी चाहिये। ब्रह्मका बोध होनेपर पाप रह भी गये तो कोई हर्ज नहीं; क्योंकि पाप जिन काम-क्रोधादिसे होते हैं, वे तो अन्त:करणके धर्म हैं। जबतक अन्त:करण है, तबतक वे रहेंगे ही और अन्त:करण स्थूल-शरीरके विनाशतक जरूर रहेगा; अतएव पापोंके लिये कोई चिन्ता नहीं करनी चाहिये।’ पंचदशीके ये श्लोक थे—

अपथ्यसेविनश्चोरा राजदाररता अपि।

जानन्त एव स्वानर्थमिच्छन्त्यारब्धकर्मत:॥

न चात्रैतद् वारयितुमीश्वरेणापि शक्यते।

यत ईश्वर एवाह गीतायामर्जुनं प्रति॥

सदृशं चेष्टते स्वस्या: प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।

प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रह: किं करिष्यति॥

इनका अर्थ समझाते हुए माईजीने कहा—‘कुपथ्यका सेवन करनेवाले, चोर और राजाकी स्त्रीके साथ रमण करनेवाले लोग अपने भविष्यमें होनेवाले अनर्थको जानते हुए भी प्रारब्धकर्मके वशमें होकर ऐसे काम करनेकी इच्छा करते हैं और उनकी इन प्रारब्धजनित इच्छाओंका रोकना ईश्वरके लिये भी शक्य नहीं है। इस विषयमें स्वयं ईश्वरने गीतामें अर्जुनके प्रति कहा है कि ज्ञानवान् पुरुष भी अपनी प्रकृतिके अनुसार चेष्टा करता है, सभी जीव अपनी प्रकृतिके वश रहते हैं; फिर मैं (ईश्वर) या और कोई उसका निग्रह क्या करेगा। यदि मनुष्य अवश्य होनेवाले दु:खोंको रोक सकता तो नल, राम तथा युधिष्ठिर-सरीखे प्रतापी और शक्तिमान् पुरुष कभी दु:खोंमें न फँसते। प्रारब्धका भोग तीन प्रकारसे होता है—स्वेच्छासे, अनिच्छासे और परेच्छासे। स्वेच्छासे दु:खका भोग देनेवाला प्रारब्ध यदि दुष्कर्मकी इच्छा उत्पन्न न करेगा तो भोग होगा ही कैसे। अतएव स्वेच्छा-प्रारब्धके अनुसार प्राप्त होनेवाले दु:खभोगोंमें मनुष्यके द्वारा पापादिका होना अनिवार्य है। अवश्य ही अज्ञानी इन पापोंमें मनसे फँसता है और ज्ञानी प्रारब्धकी प्रेरणासे बाध्य होकर; क्योंकि अवश्यम्भावीका प्रतीकार तो हो ही नहीं सकता। इसी प्रकार अनिच्छा-प्रारब्धमें बिना अपनी इच्छाके दु:ख-भोगकी प्राप्ति होती है। अनिच्छा-प्रारब्धकी प्रेरणासे रजोगुण बढ़ता है, उससे काम और क्रोध उत्पन्न हो जाते हैं। इन्हींके कारण मनुष्य पापमें प्रवृत्त हो जाता है। उसकी अपनी इच्छा न रहनेपर भी उसे बाध्य होकर पाप करना पड़ता है। यदि ऐसा न हो तो अनिच्छा-प्रारब्ध सिद्ध ही नहीं हो सकता। इसीलिये गीतामें श्रीकृष्ण और अर्जुनके संवादमें ऐसा आया है—

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुष:।

अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजित:॥

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव:।

महाशनो महापाप्मा विद‍्ध्येनमिह वैरिणम्॥

(३।३६-३७)

अर्जुन पूछता है—‘श्रीकृष्ण! यह पुरुष इच्छा न करनेपर भी किसकी प्रेरणासे पाप करता है? मानों कोई जबरदस्ती उसे पापमें लगा रहा हो।’ इसके उत्तरमें श्रीकृष्ण कहते हैं—‘‘जो इस पुरुषको पापमें प्रवृत्त करता है, वह रजोगुणसे उत्पन्न हुआ काम है; यह ‘काम’ ही क्रोधका रूप धारण कर लेता है, यह काम महाशन है अर्थात् कामनाकी कभी पूर्ति होती ही नहीं। अतएव इसी कामको तुम अपना वैरी जानो।’ परेच्छा-प्रारब्धका भोग दूसरेको प्रसन्न करनेके लिये होता है। अतएव इन पापोंको कौन टाल सकता है। इनसे घबरानेकी आवश्यकता नहीं।’’

माईजीके इस उपदेशका मर्म मैं ठीक-ठीक समझ नहीं सका। फिर एक बार एक जगह साधुओंकी एक मण्डली आयी। तीन साधु थे। उनमें जो प्रधान साधु थे, वे नग्न थे, उनके साथ एक युवती स्त्री थी। उनके आचरणपर कुछ सन्देह होनेपर मैंने पता लगाया तो मालूम हुआ कि युवती सदा साधुजीके पास रहती है और उसके साथ उनका सम्बन्ध पवित्र नहीं है। मैंने साहस करके साधुजीसे इसका कारण पूछा तो उन्होंने पहले तो यह कहा कि ‘तुमको इससे क्या मतलब है, हमसे कोई उपदेश लेना हो तो पूछो।’ मैंने जब नम्रतापूर्वक आग्रह किया, तब उन्होंने जोशमें आकर कहा कि ‘हम तो अशास्त्रीय कुछ भी नहीं कर रहे हैं। स्त्रीके साथ रहनेसे हमारे आत्मबोधमें कुछ भी फर्क नहीं पड़ता।’ फिर वे भी पंचदशीके उपर्युक्त माईजीवाले श्लोकोंको कह गये और बोले कि ‘यह सब कुछ प्रारब्धसे होता है, जबतक शरीरका प्रारब्ध-भोग शेष है, तबतक इस स्त्रीको हम हटा नहीं सकते। न यह हमें छोड़ सकती है। यह तो इस शरीरके भोगके लिये है। फिर दूसरी बात यह भी है कि हम जो कुछ भी करें, वस्तुत: हम तो कुछ करते ही नहीं। यह तो सब प्रकृतिमें होता है, सब इन्द्रियोंका व्यापार है, हमसे इसका क्या सम्बन्ध! गीता भी तो यही कहती है—

नैव किंचित् करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।

पश्यञ्शृण्वन्स्पृशंजिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ॥

प्रलपन् विसृजन् गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥

(५। ८-९)

‘तत्त्वज्ञानी महात्मा देखता, सुनता, स्पर्श करता, सूँघता, खाता, सोता, साँस लेता, बोलता, छोड़ता, ग्रहण करता, पलकें मारता और खोलता—यह सब काम करता हुआ यही मानता है कि इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयोंमें बर्त रही हैं, हम शुद्ध-बुद्ध-मुक्त-स्वभाव आत्मासे इसका कोई सम्बन्ध नहीं है।’

साधुजीकी व्याख्यापर उस समय मुझे कोई उत्तर नहीं आया और मैं वहाँसे अपने घर चला आया।

मुझे सिन्धी माईजीसे बात करके तो ऐसा अनुमान हुआ था कि माईजी जो कुछ कहती हैं, अपने सरल विश्वाससे जैसा समझी हैं, वैसा ही कहती हैं; परन्तु साधुजीकी बात सुनकर और उनके हाव-भाव देखकर तो यही प्रतीत हुआ कि ये अपने दोषका समर्थन करनेके लिये ही शास्त्रका दुरुपयोग कर रहे हैं। जो कुछ भी हो, अब प्रश्न यह है कि क्या वास्तवमें स्वेच्छा और अनिच्छा-प्रारब्धसे मनुष्य पाप करनेको बाध्य है? क्या गीतामें इसका समर्थन है? और क्या ज्ञानी पुरुष भी निषिद्ध आचरण कर सकता है? यदि नहीं तो विद्यारण्य स्वामी-जैसे ग्रन्थकारने ऐसी बातें क्यों लिखीं? क्या आपने पंचदशी पढ़ी है? आपका इस सम्बन्धमें जो कुछ भी अभिमत हो, मुझसे स्पष्ट समझाकर कहिये।

उत्तर—श्रीविद्यारण्य स्वामीकी पंचदशीको मैंने देखा है। पंचदशी वेदान्तका बहुत ही उपादेय और मान्य ग्रन्थ है। विद्यारण्य स्वामीकी महान् विद्वत्ताके सामने सहज ही मनुष्यका सिर झुक जाता है। फिर आचार्यके नाते तो वे हम सबके परम पूज्य हैं, ऐसी दशामें मुझ-सरीखा साधारण मनुष्य उनके शब्दोंपर क्या आलोचना कर सकता है। दीर्घकालतक आचार्योंके चरणोंमें बैठकर श्रद्धापूर्वक स्वाध्याय करनेसे ही उनके वचनोंका रहस्य जाना जा सकता है। पूज्यपाद विद्यारण्य स्वामीने ही यदि इस प्रकरणको लिखा है तो किस रहस्यको मनमें रखकर लिखा है, कुछ समझमें नहीं आता। परन्तु इस प्रकरणका साधारणत: जो अर्थ किया जाता है या समझा जाता है, उससे तो अवश्य ही बहुत ही अनुचित प्रवृत्तियोंके विस्तारमें सहारा मिला है और उसके बलपर पापका बहुत विस्तार हुआ है। आपने जो उदाहरण दिये हैं, ऐसे सैकड़ों-हजारों उदाहरण मिल सकते हैं। परन्तु एक बात याद रखनी चाहिये, किसीके द्वारा दुरुपयोग किये जानेसे ही शास्त्रके रहस्यमय वाक्य दूषित नहीं हो जाते। दुरुपयोग तो विषयीलोग हर एक बातका ही करते हैं, उनका उद्देश्य ही किसी-न-किसी प्रकारसे अपनी भोग-कामनाको पूर्ण करना होता है। देखना तो यह है कि वास्तवमें इसका रहस्य क्या है, इस सम्बन्धमें मैं तो बहुत नम्रताके साथ पूज्यपाद श्रीविद्यारण्य स्वामीजीके पवित्र चरणोंमें नमस्कार करता हुआ यही कहता हूँ कि बार-बार विचार करनेपर भी पंचदशीके उपर्युक्त वाक्योंका रहस्य मैं समझ नहीं सका। वरं कभी-कभी तो मनमें ऐसा दृढ़ भाव आता है कि ये वाक्य महामान्य विद्यारण्य मुनिके हैं ही नहीं; क्योंकि जो महामान्य विद्यारण्य मुनि पंचदशीमें ही अन्यत्र स्वयं कहते हैं—

अशास्त्रीयमपि द्वैतं तीव्रं मन्दमिति द्विधा।

कामक्रोधादिकं तीव्रं मनोराज्यं तथेतरत् ॥

उभयं तत्त्वबोधात् प्राङ्‍‍निवार्यं बोधसिद्धये।

शम: समाहितत्वं च साधनेषु श्रुतं यत:॥

तत्त्वं बुद‍्ध्वापि कामादीन्नि:शेषं न जहासि चेत् ।

यथेष्टाचरणं ते स्यात् कर्मशास्त्रातिलंघन:॥

बुद्धाद्वैतसतत्त्वस्य यथेष्टाचरणं यदि।

शुनां तत्त्वदृशां चैव को भेदोऽशुचिभक्षणे॥

बोधात् पुरा मनोदोषमात्रात् क्लिश्यस्यथाधुना।

अशेषलोकनिन्दा चेत्यहो ते बोधवैभवम्॥

विड्वराहादितुल्यत्वं मा क्राङ्क्षीस्तत्त्वविद् भवान्।

सर्वधीदोषसंत्यागाल्लोकै: पूज्यस्व देववत् ॥

(पंचदशी, द्वैतविवेकप्रकरण ४९ से ५०, ५४ से ५७)

‘अशास्त्रीय द्वैत भी तीव्र और मन्द—दो प्रकारका होता है। काम-क्रोधादिको तीव्र द्वैत कहते हैं और मनोराज्यको मन्द। बोधकी सिद्धिके लिये अर्थात् ज्ञानकी प्राप्तिके लिये इन दोनों प्रकारके द्वैतोंको पहले ही निवारण कर देना चाहिये; क्योंकि ब्रह्मज्ञानके साधनोंमें मन-इन्द्रियोंका वशमें होना और चित्तका समाहित होना दोनों ही सुने जाते हैं। तत्त्वको जानकर भी यदि तू कामादिका पूर्णरूपसे नहीं त्याग करेगा तो उसके फलस्वरूप शास्त्रोंकी आज्ञाको लंघन करनेवाला यथेच्छाचारी बन जायगा। और यदि अद्वैत तत्त्वको जान लेनेपर भी यथेच्छाचार ही बना रहा तो फिर उस शास्त्रका उल्लंघन करनेवाले तत्त्वज्ञानी और कुत्तोंमें यह भेद ही क्या रह गया! इससे तो अज्ञानी रहना अच्छा था; क्योंकि उस अवस्थामें तुझे काम-क्रोधादि मानसिक दोष ही क्लेश दिया करते थे, पर अब ज्ञानी कहलानेपर उन दोषोंके साथ-साथ लोकमें तेरी बड़ी भारी निन्दा और होने लगी है। वाह! तेरा यह ज्ञानका वैभव भी विचित्र ही है। (अर्थात् यदि यही ज्ञान है तो फिर अज्ञान क्या होगा) अतएव तुम तत्त्ववेत्ता होकर विष्ठा खानेवाले सूअर आदिके समान बनना मत चाहो। सब दोषोंको इस प्रकार छोड़कर ज्ञानी बनो कि लोग तुम्हारी देववत् पूजा करें।’

जो महापुरुष इतने कड़े शब्दोंमें मिथ्या ज्ञानीकी खबर लेते हैं और काम-क्रोधका विरोध करते हैं, वे प्रारब्धभोगके व्याजसे ज्ञानीके लिये भी प्रकारान्तरसे परवश होकर पाप करना कैसे सिद्ध करेंगे? तत्त्वज्ञानके अधिकारकी व्याख्या करती हुई श्रुति स्पष्ट शब्दोंमें घोषणा करती है—

नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहित:।

नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥

(कठ० १। २। २४)

‘जो पापकर्मोंसे निवृत्त नहीं हुआ है, जिसकी इन्द्रियाँ शान्त नहीं हैं और जिसका चित्त समाहित नहीं है और जो अशान्तमानस है, वह पुरुष केवल (बाह्य) ज्ञानके द्वारा ही आत्माको प्राप्त नहीं कर सकता।’ जब आत्माकी प्राप्तिके पहले ही पापोंका परित्याग कर देना पड़ता है, तब आत्मप्राप्तिके अनन्तर बोधवान् पुरुषके द्वारा पाप कैसे हो सकते हैं? और कैसे महामान्य विद्वान् श्रीविद्यारण्य मुनि-जैसे महापुरुष उसका प्रतिपादन कर सकते हैं। इन्हीं सब बातोंपर विचार करनेसे मेरे उस सन्देहकी पुष्टि हो जाती है कि सम्भव है किसी मनचले मनुष्यने अपने मिथ्या ज्ञानको (जिसका स्वयं विद्यारण्य मुनि विरोध करते हैं) वास्तविक ज्ञानके आसनपर बैठानेके लिये विद्यारण्य मुनिके पवित्र नामका दुरुपयोग किया है। इसीसे शरीर और मनसे पापाचरण करते हुए भी लोग अपनेको आज जीवन्मुक्त ज्ञानी पुरुष कहनेमें नहीं सकुचाते और भोली जनताको भ्रममें डालते हैं। ऐसे ही लोगोंके लिये कहा गया है—

सर्वे ब्रह्म वदिष्यन्ति सम्प्राप्ते हि कलौ युगे।

नानुतिष्ठन्ति मैत्रेय शिश्नोदरपरायणा:॥

‘हे मैत्रेय! कलियुग आनेपर व्यभिचारी और पेटूलोग साधन कुछ भी नहीं करेंगे, परन्तु ब्रह्मकी बातें सब करेंगे।’ गोस्वामीजीने भी कहा है—

ब्रह्म ग्यान बिनु नारि नर कहहिं न दूसरि बात।

कौड़ी लागि लोभ बस करहिं बिप्र गुर घात॥

ऐसे ही लोगोंने पंचदशीमें अपनी बात रख दी हो तो क्या आश्चर्य है। क्योंकि वहाँका वह प्रसंग युक्तिसंगत और शास्त्रीय नहीं ठहरता; कैसे नहीं ठहरता, इस विषयपर कुछ निवेदन करता हूँ।

सबसे पहली बात तो यह है कि प्रारब्धसे पाप होना युक्तिसंगत नहीं है। प्रारब्धके परवश होकर मनुष्य पाप करनेको बाध्य हो—इस सिद्धान्तके माननेसे कई अनिवार्य दोष आते हैं, जिनमें कुछ ये हैं—

१—विधि-निषेधात्मक शास्त्रवाक्योंका कोई मूल्य नहीं रह जाता। ‘ऐसा करो’ और ‘ऐसा न करो’—ये शास्त्रवाक्य तभी लागू हो सकते हैं, जब मनुष्य करनेमें स्वतन्त्र हो; यदि परवश होकर वह अनिच्छापूर्वक पाप करनेके लिये बाध्य है, तब शास्त्रोंका शासन उसपर कैसे चल सकता है और ऐसी अवस्थामें सभी पापाचारी नर-नारी यह कह सकते हैं कि हम तो प्रारब्धके कारण ही ऐसा कर रहे हैं, शास्त्रको मानना हमारे लिये सम्भव नहीं है।

२—प्रारब्धवश पापकी इच्छा होती है, ऐसा माननेवालोंको यह तो मानना ही पड़ता है कि वह प्रारब्ध-भोग पुण्यकर्मका फल नहीं है, पापका ही फल है और जब पापका फल पाप है और उसे करनेके लिये मनुष्य बाध्य है, तब उसके पापका कभी अन्त हो ही नहीं सकता। पापका फल पाप, फिर पापका फल पाप—इस अनवस्थादशामें जीवके उद्धारकी कोई आशा नहीं रह जाती। साथ ही यह भी सिद्ध होता है कि इस प्रकार विधान करनेवाला ईश्वर जीवोंको पापके बन्धनसे कभी मुक्त करना ही नहीं चाहता।

३—साधारण विवेकसे भी यह बात भलीभाँति समझमें आती है कि किसी भी विवेकयुक्त कानूनमें ऐसा विधान नहीं होना चाहिये कि जो एक अपराधके दण्डस्वरूप पुन: दूसरा अपराध करनेकी अनुमति देता हो। कोई भी दण्डविधान यह नहीं कह सकता कि चोरी करनेवालेको पुन: चोरी करनी पड़ेगी। जब मानवी कानूनमें ऐसा विधान नहीं हो सकता, तब परम न्यायकारी और दयालु ईश्वरके कानूनमें ऐसा विधान होना कैसे सम्भव है।

४—शास्त्रोंमें पापके लिये दण्डविधान है। रोग, धननाश, पुत्रनाश, अकीर्ति आदिके रूपमें पापका ही दण्ड मिलता है। परन्तु जब स्वयं ईश्वर जीवके लिये पापका विधान करता है और उसे पाप करनेके लिये मजबूर करता है और फिर स्वयं ही उसके लिये दण्ड-भोगकी व्यवस्था करता है, तब तो इससे ईश्वर अन्यायी सिद्ध होता है।

५—जब जगन्नियन्ता ईश्वर ही जीवसे कर्म कराता है, तब उसके फलस्वरूप प्राप्त होनेवाला सुख-दु:ख भी ईश्वरको ही भोगना चाहिये। कर्म करनेको बाध्य करे ईश्वर और फल भोग करे जीव—यह भी ईश्वरका एक अन्याय ही है।

अतएव किसी भी युक्तिसे सिद्ध नहीं होता कि पाप प्रारब्धसे होते हैं। स्वेच्छा और अनिच्छा-प्रारब्धके भोगमें जो गीताका प्रमाण दिया गया है, वह भी युक्तियुक्त नहीं है; क्योंकि ज्ञानी भी प्रकृतिके अनुसार चेष्टा करता है—इसका अर्थ यह नहीं होता कि वह पूर्वजन्मके कर्मवश पाप करता है। प्रकृतिका अर्थ है स्वभाव, ज्ञानीका स्वभाव ज्ञानकी यथार्थ प्राप्तिसे पूर्व साधन-कालमें ही शुद्ध हो जाता है। उस शुद्ध-स्वभावमें अशुद्धि कैसे आ सकती है। फिर इसी श्लोकके अगले ही श्लोकमें भगवान् यह कहते हैं कि प्रत्येक इन्द्रियके अर्थमें राग-द्वेष स्थित हैं, उन दोनोंके वशमें मत हो; क्योंकि वे दोनों तुम्हारे परिपन्थी हैं—साधनको लूटनेवाले हैं।

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।

तयोर्न वशमागच्छेत् तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥

(गीता ३। ३४)

यदि ज्ञानवान् पुरुष भी प्रकृतिपरवश होकर पाप करनेमें बाध्य होता तो भगवान् राग-द्वेषसे—जो पापोंके मूल हैं—बचनेकी आज्ञा कैसे देते; क्योंकि वैसी अवस्थामें बचना-न-बचना तो उसके हाथमें है ही नहीं। अतएव यही सिद्ध होता है कि यहाँ प्रकृतिका अर्थ उसका निवृत्ति या प्रवृत्तिपरक स्वभाव है, पाप-वासना नहीं। अत: प्रारब्ध-भोगवश पाप करनेके लिये मनुष्य बाध्य है, इसके समर्थनमें ईश्वर-वाक्यके रूपमें उक्त ‘सदृशं चेष्टते स्वस्या:’ श्लोकका प्रमाण सर्वथा अनुपयुक्त है। उससे आगे ‘अनिच्छा-प्रारब्ध-भोग’ के प्रमाणमें अर्जुनके प्रश्न और श्रीभगवान‍्के उत्तरको प्रमाणमें देनेकी तो किसी प्रकार भी संगति नहीं बैठती; क्योंकि वहाँ तो भगवान् स्पष्ट शब्दोंमें पाप-वासनामें रजोगुणसे उत्पन्न कामको कारण बताते हैं, ‘प्रारब्ध’- को नहीं! और आगे चलकर उसी प्रसंगमें अति स्पष्ट शब्दोंमें अर्जुनको यह आज्ञा करते हैं कि ‘इन्द्रिय, मन और बुद्धिमें बसकर ज्ञान-विज्ञानका नाश करनेवाले इस पापी कामको तू पहले इन्द्रियोंका नियमन करके अवश्य मार। आत्मा बुद्धिसे भी श्रेष्ठ है, इस बातको समझकर आत्माके द्वारा आत्माको वश करके तू, हे महाबाहो! इस दुर्जय कामरूपी वैरीको मार!’ यदि प्रारब्धवश ही कामके वशमें होनेमें मनुष्य बाध्य होता तो भगवान् यही कहते कि ‘‘भाई! प्रारब्धके कारण ऐसा होता है। इसमें कोई क्या करे—निग्रह: किं करिष्यति।’’ परन्तु यहाँ तो ‘काम’ पर विजय प्राप्त करनेकी आज्ञा स्पष्ट दी गयी है। ऐसी परिस्थितिमें इन श्लोकोंका ‘अनिच्छा-प्रारब्धवश’ पापाचरण होनेके समर्थनमें प्रयोग किया जाना कदापि गीताके पूर्वापरको देखते उचित नहीं जान पड़ता। अतएव प्रथम तो प्रारब्धवश पापोंका होना ही सिद्ध नहीं होता, फिर ज्ञानीके द्वारा तो पाप-कर्मकी सम्भावना ही नहीं है। ज्ञानीमें अज्ञान, अहंकार, राग, द्वेष और भय—कुछ भी नहीं रहते, फिर पाप हो कहाँसे। सबका मूल तो अज्ञान है। जब उसीका नाश हो गया, तब पापोंका रहना कैसे माना जा सकता है। अवश्य ही ज्ञानी पुरुषमें जैसे पाप नहीं हैं, वैसे ही पुण्य भी नहीं हैं; तथापि जिस अन्त:करणसे ज्ञानीका सम्बन्ध कहा जाता है, उस अन्त:करणके समस्त कर्म ज्ञानाग्निद्वारा जल जानेके कारण वह परम पवित्र हो जाता है; उस परम पवित्र अन्त:करणमें जो पूर्व स्वभाववश स्फूर्ति होती है, वह पुण्यमयी और शास्त्रानुमोदित ही होती है और उस स्फूर्तिके फलस्वरूप होनेवाले प्रत्येक कर्ममें प्राणियोंका कल्याण भरा रहता है!

साधारण मनुष्यको प्रारब्धवश सुख-दु:खका भोग करना पड़ता है और उस अवश्य होनेवाले सुख-दु:खसे मनुष्य बच भी नहीं सकता। सुखका तो कहीं त्याग भी कर सकता है; क्योंकि वह तो उसको अपने पाससे देना है। परन्तु दण्डस्वरूप दु:खभोगका त्याग कोई नहीं कर सकता। यह दु:खभोग ही ‘अवश्यम्भावी’ है और इससे कोई भी नहीं बच सकता। इस दृष्टिसे यदि कहा जाय कि नल, राम, युधिष्ठिरको भी दु:ख भोगने पड़े तो ठीक ही है, परन्तु दु:ख भोगनेका पर्याय पाप करना नहीं है।* दुष्कर्मका फल दण्डभोग है, पाप तो नवीन कर्म है, जो पापवासनासे उत्पन्न होता है।

अब यदि यह प्रश्न हो कि फिर स्वेच्छा, अनिच्छा और परेच्छाप्रारब्धका क्या रूप होगा तो उनके बहुत-से रूप हो सकते हैं। एक मनुष्य इच्छा करके नदीमें नहाने जाता है, वहाँ डूब जाता है; व्यापार करता है, उसे घाटा-नफा हो जाता है; यह स्वेच्छा-प्रारब्ध है। रास्तेमें चल रहा है, ऊपरसे पेड़ गिर पड़ा, मकानमें बैठा है, छत टूटकर उसपर पत्थर गिर गया। भूकम्पसे सर्वनाश हो गया। बाढ़में सब कुछ बह गया। घरकी नींवमें धन मिल गया। यह अनिच्छा-प्रारब्ध है। बिना जाँचे-माँगे ही दान दे दिया, किसीने किसीको मार दिया, जानवरने काट खाया, द्वेषवश या किसी परिस्थितिके कारण किसीने प्रहार कर दिया—यहपरेच्छा-प्रारब्धभोग है।

इन सब बातोंके कहनेसे मेरा यह अभिप्राय नहीं है कि मैं तुच्छ जीव महामान्य विद्यारण्य मुनिके वचनोंका खण्डन कर रहा हूँ; इस प्रकरणको लेकर लोग नानाविध युक्तियोंसे जो उनका खण्डन करते हैं और उससे जो मेरे मनमें क्लेश होता है, उस क्लेशसे अपनेको मुक्त करनेके लिये मैं ऐसा अनुमान कर रहा हूँ और शास्त्र तथा तर्क मेरे इस अनुमानकी पुष्टि कर रहे हैं। अपनी तुच्छ बुद्धिके अनुसार मुझे इस प्रकरणके पंचदशीकारकी कृति होनेमें ही सन्देह है; क्योंकि पंचदशीकार इस प्रकारकी लचर दलीलवाली बात पंचदशी-सरीखे उच्च श्रेणीके महामान्य ग्रन्थमें नहीं लिख सकते।

इतना होनेपर आखिर है यह मेरा अनुमान ही। मैं यह बलपूर्वक नहीं कह सकता कि ऐसा ही है और न उपर्युक्त विवेचन करनेपर भी यही कहनेका साहस करता हूँ कि पंचदशीकारके कहनेका वही अर्थ है, जो साधारण लोगोंकी समझका अनुसरण करते हुए मैंने दिया है। पंचदशीकारकी कृति होनेकी हालतमें तो मैं यही कह सकता हूँ कि मैं उनकी इस व्याख्याको समझ नहीं सका हूँ और यह मैं पहले भी कह चुका हूँ। परन्तु पाठकोंसे इतना निवेदन अवश्य कर देना चाहता हूँ कि जिस अर्थमें पंचदशीकारका यह प्रसंग लिया जाता है, उसी अर्थमें इसको सिद्धान्तरूपसे माननेमें हानिको छोड़कर लाभ नहीं है; किसी भी रूपमें पापका समर्थन करना दुर्बलेन्द्रिय साधकके लिये परम हानिकर हुए बिना नहीं रह सकता। विधिनिषेधके परे पहुँचे हुए सिद्ध पुरुषकी भी शोभा इसमें कदापि नहीं है।

अब गीताके श्लोकोंकी बात रही, सो मेरी समझसे इन्द्रियोंके इन्द्रियार्थमें बर्तनेका ऐसा अर्थ करना गीताका भी दुरुपयोग ही है। अब यह बात समझमें आ गयी होगी कि पाप प्रारब्धसे नहीं होते, पाप होनेमें कारण ‘काम’ है और ‘काम’ की उत्पत्ति रजोगुणसे है तथा ‘रजो रागात्मकं विद्धि’ के अनुसार रजोगुण ‘राग’ रूप है। यह राग या विषयासक्ति ही पापमें कारण है; इसका त्याग कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग—किसी भी मार्गपर चलनेवालेको करना पड़ता है और ऐसा करनेमें मनुष्य स्वतन्त्र है। भगवान‍्ने कहा है, ‘कर्ममें तेरा अधिकार है’— ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते।’ दूसरी बात यह है कि ज्ञानी पुरुषसे निषिद्ध कर्म होता ही नहीं; उसमें यदि कहीं कोई निषिद्धता दीखती है तो वह हमारा दृष्टिदोष है तथा उसके स्वभावज कर्मकी सदोषताके कारण वैसी प्रतीति होती है।

साथ ही यह बात भी याद रखनी चाहिये कि काम-क्रोधादि अन्त:करणके धर्म नहीं, विकार हैं। विकार हैं, इसीलिये सत्संग, कुसंग पाकर वे घटते-बढ़ते हैं। जो चीज घटती-बढ़ती है, वह नाश भी हो सकती है। अतएव काम-क्रोधका नाश न मानना उचित नहीं। जो लोग वस्तुत: काम-क्रोधके वश हो रहे हैं, उन्हें कभी ज्ञानी नहीं मानना चाहिये और अपनेमें भी जबतक ऐसी दोषकी वृत्तियाँ वर्तमान हैं, तबतक इनके नाशका प्रयत्न करते रहना चाहिये और यही मानना चाहिये कि वास्तविक परमात्मज्ञानसे हम अभी बहुत दूर हैं।*