परा और अपरा विद्या
पराशर मुनिने ऋषि मैत्रेयसे कहा—मैत्रेयजी! बुद्धिमान् पुरुष आध्यात्मिकादि तीनों तापोंको जानकर ज्ञान-वैराग्यद्वारा आत्यन्तिक लयको प्राप्त होते हैं। आध्यात्मिक ताप शारीरिक और मानसिक भेदसे दो प्रकारका है। इनमेंसे शारीरिक दु:खके अनेक प्रकार हैं—मस्तकरोग, ज्वर, शूल, भगन्दर, गुल्म, अर्श, श्वास, शोथ, छर्दि, चक्षुरोग, अतिसार, कुष्ट और जलोदर आदि भेदसे बहुत प्रकारसे शारीरिक क्लेश होते हैं। मानस दु:खोंमें काम, क्रोध, भय, द्वेष, लोभ, मोह, विषाद, शोक, असूया, अपमान, ईर्षा और मात्सर्यादिसे उत्पन्न अनेक भेद हैं। द्विजश्रेष्ठ! इन विविध दु:खोंको आध्यात्मिक ताप कहते हैं।
पशु, पक्षी, मनुष्य, पिशाच, सर्प, बिच्छू, राक्षस आदि भूत-प्राणियोंसे जिन दु:खोंकी उत्पत्ति होती है, उनका नाम आधिभौतिक ताप है। सर्दी, गरमी, वायु, अनावृष्टि, अतिवृष्टि, वज्रपात आदिसे जो दु:ख उत्पन्न होते हैं, उनको आधिदैविक ताप कहते हैं।
मुनिराज! इनके अतिरिक्त गर्भवास, जन्म, जरा (बुढ़ापा), अज्ञान, मृत्यु और नरकादिमें हजारों प्रकारके दु:ख हैं। बहुत-से मलद्वारा ढके हुए गर्भमें सुकुमार शरीरको उदरके कीड़े काटते हैं, जेरसे लिपटा हुआ वह बालक माताके खाये हुए खट्टे, कड़वे, तीखे, गरम और नमकीन भोजनके द्वारा अत्यन्त कष्टसे जीता है। हाथ, पैरको पूरी तरह फैला नहीं सकता, मल-मूत्रमें पड़ा रहता है, श्वासहीन रहनेपर भी सचेतनभावसे पूर्वजन्मके कर्मोंका स्मरण करता हुआ पराधीनतामें समय बिताता है।
इसके बाद जन्म होनेके समय मल, मूत्र, शुक्र, रुधिरद्वारा लिपटकर वह प्राजापत्य नामक वायुसे बड़ी ही पीड़ाको प्राप्त होता है, उसी समय अत्यन्त प्रबल सूति नामक वायु उसके मुखको नीचेकी ओर कर देती है, तदनन्तर वह जीव बड़े क्लेशसे माताके पेटसे योनिद्वारा बाहर निकलता है।
मुनिसत्तम! जीव जन्म होते ही मूर्च्छित हो जाता है, फिर बाहरकी वायुके लगनेसे क्रमश: उसमें चेतना आती है और पूर्वसंस्कारोंको भूल जाता है, तब वह काँटोंसे बिंधे हुए और आरेसे विदीर्ण किये हुए कृमिकी तरह जमीनपर पड़ जाता है। उसमें अपने-आप करवट बदलने और देह खुजलानेतककी शक्ति भी नहीं होती। दुग्धपानादि आहारके लिये भी वह पराधीन ही रहता है। मल-मूत्रमें पड़ा रहता है, कीड़े और मच्छर काटते हैं पर उसमें यह सामर्थ्य नहीं कि वह इन दु:खोंसे अपनेको छुड़ा सके। इस प्रकार जन्म और बालकपनमें जीव अनेक प्रकारसे आधिभौतिकादि दु:ख भोगता है।
अज्ञानान्धकारसे आच्छादित विमूढ़ अन्त:करणका वह मनुष्य, ‘मैं कहाँसे आया हूँ, कौन हूँ, कहाँ जाऊँगा और मेरा क्या स्वरूप है आदि’ कुछ भी नहीं जानता। ‘मैं किस बन्धनसे संसार-कारागारमें कैद हूँ? इसका कोई कारण है या बिना ही कारण मुझे यह दु:खोंकी राशि भोगनी पड़ती है? मुझे क्या करना और क्या नहीं करना चाहिये? क्या बोलना और क्या नहीं बोलना चाहिये? क्या धर्म है और क्या अधर्म है? किस तरह कौन-सा पथ अवलम्बन करना चाहिये और किस कार्यमें क्या दोष तथा क्या गुण है?’ ऐसी अनेक चिन्ताओंसे ग्रस्त वे शिश्नोदर-भोगपरायण पशुसदृश मूढ़ मनुष्य अज्ञानवश नाना प्रकारके भोग भोगते रहते हैं।
अज्ञान तमोगुणका स्वभाव है, इससे जडता उत्पन्न होती है, जडता और प्रमादसे शास्त्रोक्त कर्म नहीं होते। कर्मोंका आरम्भ जडतारहित प्रवृत्तिसे होता है, परन्तु मूर्ख मनुष्य जडताकी अधिकतासे क्रमश: कर्मलोप कर देते हैं। कर्मलोपसे नरकोंकी प्राप्ति होती है। अतएव मूर्ख मनुष्य इस लोक और परलोकमें केवल दु:ख ही भोगते हैं।
जवानी अज्ञानजनित जडता और प्रमादमें बीत जाती है, तदनन्तर देहके जरा-जर्जरित होनेपर अंग शिथिल हो जाते हैं, दाँत गिर पड़ते हैं, मांस ढीला होकर स्नायु और नाड़ियोंसे ढक जाता है, आँखें बैठ जानेसे नजर कम पड़ जाती है, नाकोंसे रोम बाहर निकल आते हैं। शरीर सदा काँपने लगता है, देहकी हड्डियाँ बाहर चमकने लगती हैं, शरीर कुबड़ा हो जाता है, जठराग्नि मन्द पड़ जाती है, आहार कम हो जाता है और क्रमश: शरीरकी सभी चेष्टाएँ संकुचित हो जाती हैं। तबतक वह अन्धप्राय मनुष्य बहुत ही कष्टसे उठने, बैठने, सोने और चलने-फिरनेमें समर्थ होता है। उसके मुँहसे हमेशा लार टपका करती है।
इन्द्रियोंपर अधिकार न रहनेसे वह मृत्युके समीप पहुँच जाता है, उस समय उसे अनुभूत पदार्थोंका भी स्मरण नहीं रहता। एक शब्दके उच्चारणमें ही वह थक जाता है, श्वास-खाँसीकी यन्त्रणासे नींदका सुख सदाके लिये नष्ट हो जाता है। दूसरेके उठाने-बैठानेसे वह उठ-बैठ सकता है। ऐसी हालतमें स्त्री-पुत्र-नौकर आदि सभी उसका अपमान करने लगते हैं। उसकी पवित्रता जाती रहती है, परन्तु आहार-विहारकी तृष्णा बनी रहनेसे घर-परिवारके लोग उसकी हँसी उड़ाते और उसे अपने लिये क्लेशका कारण समझने लगते हैं। जवानीके भोगोंको पूर्वजन्मके भोगोंकी तरह याद करके वह लम्बे-लम्बे श्वास लेता है, पर कोई उपाय नहीं चलता। यों कष्ट सहते-सहते मृत्युकाल आ जाता है।
तब गला घुटने लगता है और हाथ टूट-से जाते हैं, शरीर काँपने लगता है, बारम्बार मूर्च्छा होने लगती है। ऐसी अवस्थामें वह ‘मेरे धनका क्या होगा? मेरे पीछे मेरे स्त्री-पुत्रोंकी क्या दशा होगी? मेरे नौकरोंकी क्या हालत होगी? मेरा धन-ऐश्वर्य लोग खा जायँगे।’ इस प्रकारकी ममताजनित चिन्तासे व्याकुल हो जाता है। मर्मभेदी महारोगरूपी यमराजके दारुण बाणोंसे उसके देहकी हड्डियाँ टूट जाती हैं, आँखें उलट जाती हैं, तालु, कण्ठ और होठ सूख जाते हैं। उस समय वह भीषण यन्त्रणासे बारम्बार हाथ-पैर पीटता है, कण्ठ रुक जाता है, श्वासकी गति ऊर्ध्व हो जाती है, गलेमें कफ अटक जानेसे ‘घुर-घुर’ शब्द होने लगता है; भूख-प्याससे वह अत्यन्त पीड़ित हो जाता है। अन्तमें यम-किंकरोंके दीखनेसे भयभीत हो उठता है। मृत्युसमय प्राणियोंको इस प्रकारके अनेक कष्ट होते हैं।
मृत्युके बाद पापी मनुष्योंको यमदूत बाँधकर अनेक तरहसे पीड़ा देते हैं, नाना प्रकारके भयंकर मार्ग देखने पड़ते हैं, फिर यमराजके दर्शन होते हैं। गरम बालू, अग्नि, यन्त्र और शस्त्रादिद्वारा नरकोंकी भयानक यातना भोग करनी पड़ती है। यमदूत करौतसे काटते हैं, जलते हुए कड़ाहेमें डाल देते हैं, कुठारसे आघात करते हैं, जमीनमें गाड़ देते हैं, शूलीपर चढ़ा देते हैं, बाघके मुखमें डाल देते हैं, गृध्रोंसे शरीर नुचवाते हैं, हाथियोंके पैरोंतले रुँदवाते हैं, उबलते हुए तैलमें डाल देते हैं, क्षार और कादेसे लिपेट देते हैं, ऊपरसे नीचे डालते हैं और फेंकनेके यन्त्र द्वारा दूर फेंक देते हैं। इस प्रकार नारकी जीवोंको नरकोंमें नाना प्रकारसे इतनी यातना दी जाती है कि जिनकी कोई गिनती नहीं हो सकती।
द्विजराज! केवल नरकमें ही दु:ख है सो बात नहीं है, स्वर्गवासी पुण्यात्मा पुरुष भी पतनके भयसे सदा दु:खी रहते हैं। इस प्रकार कर्मफल भोगनेपर जीव फिर गर्भमें आकर जन्म ग्रहण करता है तथा पुन: उसी तरह मृत्युको प्राप्त हो जाता है। कोई जन्मते ही, कोई लड़कपनमें, कोई जवानीमें, कोई प्रौढ़ अवस्थामें और कोई वृद्ध होकर मृत्युके मुखमें चला जाता है। जैसे कपासका बीज कपाससे व्याप्त रहता है, इसी प्रकार यह जीव भी जीवनभर नाना प्रकारके दु:खोंसे व्याप्त रहता है। अर्थके उपार्जन, पालन और नाशमें तथा प्रियजनोंकी विपत्तिमें मनुष्यको नाना प्रकारसे कष्ट सहन करने पड़ते हैं।
मैत्रेय! जो सब पदार्थ मनुष्यको पहले प्रीतिकर मालूम होते हैं, वे ही परिणाममें दु:खके कारण हो जाते हैं। स्त्री, स्वामी, भृत्य, घर, धन, परिवार और जमीन आदिद्वारा मनुष्यको जितना क्लेश होता है, सुख उसकी उपेक्षा बहुत ही थोड़ा हुआ करता है। इन सब दु:खरूप सूर्यके तापसे तापितचित्त मनुष्योंको मुक्तिरूपी वृक्षकी शीतल छायाको छोड़कर अन्यत्र कहीं भी सुख नहीं मिल सकता! गर्भ, जन्म, जरा आदिसे उत्पन्न इन त्रिविध दु:खोंकी एकमात्र परम औषध भगवत्-प्राप्ति ही है—‘भैषज्यं भगवत्प्राप्ति:।’ अतएव बुद्धिमान् पुरुषोंको उस भगवत्-प्राप्तिके लिये ही प्रयत्न करना चाहिये।—‘तस्मात्तत्प्राप्तये यत्न: कर्तव्य: पण्डितैर्नरै:।’
महामुने! भगवत्-प्राप्तिमें कर्म और ज्ञान दोनों ही हेतु हैं। ज्ञान दो प्रकारका है—एक आगमशास्त्रसे उत्पन्न और दूसरा विवेकसे उत्पन्न। इनमें आगमसे उत्पन्न ज्ञानसे शब्दब्रह्म और विवेकसे उत्पन्न ज्ञानद्वारा परमब्रह्म जाननेमें आता है। जैसे दीपकसे अन्धकारका नाश होता है, वैसे ही शास्त्रजन्य ज्ञानसे शब्दमय ब्रह्मके जाननेपर कुछ अंशोंमें तो अज्ञानका नाश होता है, परन्तु जैसे सूर्यके उदय होनेपर अन्धकारका पूर्ण नाश हो जाता है, इसी प्रकार विवेकजन्य ज्ञानसे परमब्रह्मको जान लेनेपर सम्पूर्ण अज्ञान नष्ट हो जाता है।
मनु महाराजने कहा है—‘ब्रह्म दो प्रकारका है; प्रथम शब्दमय और दूसरा परम। शब्दब्रह्मका ज्ञान हो जानेके बाद परब्रह्मका होता है। विद्या भी कर्म और ज्ञानरूपसे दो प्रकारकी है; आथर्वणी श्रुतिमें ऐसा ही कहा गया है। पराविद्याद्वारा अक्षरब्रह्मकी प्राप्ति होती है। ऋग्वेदादिमयी विद्या ही पराविद्या है। अव्यक्त, अजर, अचिन्त्य, नित्य, अव्यय, अनिर्देश्य, अरूप, हस्तपदादिरहित, विभु, सर्वगत, भूत-समूहोंका बीजरूप होनेपर भी अकारण तथा व्याप्य और व्यापक सभी रूपोंमें मुनिगण ज्ञानचक्षुसे जिसका दर्शन करते हैं, वही परब्रह्म है। मोक्षकी इच्छावाले पुरुष उसीका ध्यान करते हैं। उसीको वेदोंने अत्यन्त सूक्ष्म और विष्णुका परमपद बतलाया है!
परमात्माकी इसी मूर्तिको भगवान् कहते हैं। भगवान् शब्द इस आदि और अक्षर परमात्माका ही वाचक है। इसी प्रकारसे मुनियोंको जो तत्त्वज्ञान होता है वही परम और वेदमय है। द्विज! वह परब्रह्म शब्दसे अगोचर होनेपर भी उसकी पूजाके लिये ‘भगवत् ’ शब्दद्वारा उसका कीर्तन किया जाता है। विशुद्ध और समस्त कारणोंके कारण महाविभूतिशाली उस परब्रह्ममें ही ‘भगवत् ’ शब्दका प्रयोग होता है। ‘भगवत् ’ शब्दमें ‘भ’ के दो अर्थ हैं, सबका भरण करनेवाला और सबका आधार, ‘ग’ का अर्थ गमयिता और स्रष्टा। दोनों अक्षर मिलनेसे ‘भग’ बनता है। सम्पूर्ण ऐश्वर्य धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्यको भग कहते हैं। ‘व’ अक्षरका अर्थ यह है कि ‘अखिल जगत्के आत्मभूत इस परमात्मामें ही सब भूतप्राणी निवास करते हैं। साधुश्रेष्ठ! इस प्रकारके अर्थवाला यह महान् ‘भगवत् ’ शब्द परब्रह्मस्वरूप वासुदेवके सिवा अन्य किसीके लिये प्रयुक्त नहीं हो सकता। उस परब्रह्मसे ही इस ‘भगवत् ’ शब्दकी सार्थकता है।’ वह समस्त भूतोंकी उत्पत्ति, प्रलय, अगति, गति और विद्या, अविद्याको जानता है, इसीसे उसे ‘भगवान्’ कहते हैं। ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य और तेज आदि सद्गुण ‘भगवत् ’ शब्दद्वारा ही वाच्य हैं। वह परमात्मा सब भूतोंमें निवास करता है और सबके आत्मस्वरूप उस वासुदेवमें ही सब भूत निवास करते हैं। प्राचीनकालमें खाण्डिक्यके द्वारा पूछे जानेपर केशिध्वजने ‘वासुदेव’ नामका यथार्थ अर्थ यही बतलाया था कि ‘‘समस्त भूतप्राणी उसमें निवास करते हैं और वही समस्त भूतोंमें जगत्के धाता-विधातारूपसे विराजमान है, इसीलिये उस प्रभुका नाम ‘वासुदेव’ है।’’
महामुने! वह परमात्मा स्वयं सम्पूर्ण आवरणोंसे मुक्त रहकर अखिल विश्वके आत्मरूपसे सब भूतोंकी प्रकृति, विकार, गुण और दोष आदि त्रिभुवनमें जो कुछ भी है, सबमें व्याप्त हो रहा है। समस्त कल्याण-गुण-स्वरूप वह परमात्मा अपनी शक्तिके कणमात्रसे सम्पूर्ण भूतप्राणियोंको आवृतकर, अपनी इच्छासे अनेक प्रकारके रूप धारण करके जगत्का अनन्त कल्याण कर रहा है। जो तेज, बल, ऐश्वर्य तथा महाबोधस्वरूप है, अपने वीर्य और शक्तिका एकमात्र आधार है, परात्पर है, जिसमें क्लेशका लेश भी नहीं है, वही ईश्वर व्यष्टि और समष्टिरूप है, वही व्यक्त और अव्यक्तरूप है, वही सबका स्वामी और सर्वत्रगामी है, वही सर्ववेत्ता और सबका शक्तिस्वरूप है और उसीका नाम परमेश्वर है।
जिस ज्ञानके द्वारा इस प्रकारके निर्दोष, विशुद्ध, निर्मल और एकरूप परमेश्वरको जाना और देखा जा सकता है, वही ज्ञान है और उसीका नाम परा विद्या है। जो इससे विपरीत है सो अज्ञान है और उसीको अपरा विद्या कहते हैं। (विष्णुपुराणके आधारपर)