सच्चा भिखारी
जग जाचिअ कोउ न, जाचिअ जौं,
जियँ जाचिअ जानकीजानहि रे।
जेहि जाचत जाचकता जरि जाइ,
जो जारति जोर जहानहि रे॥
गति देखु बिचारि बिभीषनकी,
अरु आनु हिएँ हनुमानहि रे।
तुलसी! भजु दारिद-दोष-दवानल,
संकट-कोटि-कृपानहि रे॥
सारा संसार भिखारी है, सदासे भिखारी है, कुछ परमात्माके प्रेम-पागलोंको छोड़कर संसारमें ऐसा कोई नहीं जिसे कुछ भी न चाहिये। कोई भी अपनी स्थितिसे सन्तुष्ट नहीं है, इसीलिये जीव सदासे भिक्षापरायण है; परन्तु उसकी भीखकी झोली कभी भरती नहीं। वह माँग-माँगकर जितना ही झोलीमें डालता है उतनी ही उसकी झोली खाली होती जाती है। अतएव उसका भिखारीपन कभी नहीं मिटता। कारण यही है कि वह माँगना नहीं जानता, वह उनसे माँगता है जो स्वयं भिखारी हैं या उन वस्तुओंको माँगता है जो सदा अभावमयी हैं। इसलिये मित्रो! यदि माँगते-माँगते थक गये हो, अपमान सहते-सहते तुम्हारे प्राण व्याकुल हो उठे हों तो एक बार उस जानकीजीवन श्रीरामसे माँगकर देखो! प्रसिद्ध परमहंस स्वामी कृष्णानन्दजीने एक बार कहा था—
असली भिखारी जगत्में द्वार-द्वारपर तभीतक भटकता है, जबतक कि उसकी भीखकी झोली पूर्ण परमात्माके कृपाकणोंसे नहीं भर जाती। भीखके लिये ही भगवान्ने हमें अन्त:करणरूपी भीखकी झोली दी है, परन्तु हम भीख माँगना नहीं जानते। इसीसे संसारके कीचड़से सने हुए घृणित चावलोंकी कनीसे ही झोली भर रहे हैं। जिस पवित्र अन्नसे अमृतपूर्ण भोजन बन सकता है, उसका तो एक कण भी हमें नहीं मिला। आओ भिखारी! एक बार कल्पतरुके नीचे खड़े हो मनचाही चीज माँग लो! सदाके लिये माँग लो! अपने रीते जीवन-कमण्डलुको अमृतरससे भर लो। ‘माँ’ ‘माँ’ पुकारकर, ‘प्राणप्रिय प्रियतम’ पुकारकर, ‘जगत् -पति’ के नामसे पुकारकर वाणी सफल कर लो! उस त्रिभुवन-मोहनरूपकी माधुरीधारासे नयनोंको धो डालो, दर्शनकी तृष्णा मिटा लो। अपने मन, प्राण और इन्द्रियसमूहके प्रत्येक परमाणुको सुधासिन्धुके बिन्दुपानसे मतवाला बना दो। माँग लो, इस मनुष्य-शरीरके रहते-रहते ही। फिर सूअर होकर माँगना न पड़े, वहाँ तो विष्ठाकी ही भीख मिलेगी। अरे मनुष्य! जल्दी करो, ‘नीके दिन बीते जा रहे हैं।’ मनुष्य-वृत्तियोंसे पूर्ण अन्त:करणरूपी पात्रमें ही उस राजराजेश्वरसे मनकी वस्तु माँगकर सदाके लिये तृप्त हो जाओ! अपने इस पवित्र पात्रको उसके प्रसादसे भर लो। तुम्हारी अनन्तकालकी कमी और कामना सदाके लिये पूरी हो जायगी। अच्छे अवसरकी प्रतीक्षामें जन्मको न गँवाओ।
भिखारीपर ही भगवान्की कृपा हुआ करती है। दीनता ही भगवान्की कृपादृष्टिको आकर्षित करती है, अभाव ही भावशक्तिका आह्वान करता है। सर्वशून्य दरिद्रता ही दयाके पूर्ण प्रकाशका प्रधान कारण है। अतएव सच्चा भिखारी बन सकना दुर्दशाकी बात नहीं, किन्तु बड़े सौभाग्यका विषय है परन्तु प्रकृत भिक्षुक बनना बहुत ही कठिन है। ऐसा होनेके लिये अभिमानको भगा देना पड़ता है, अहंकारको चूर्ण कर देना पड़ता है। जिसका हृदय अभिमानसे भरा है वह क्या कभी यथार्थ अभावग्रस्त भिखारी बन सकता है? अभिमानसे अभिभूत हृदयमें क्या कभी दीनता टिक सकती है? महाप्रभु कहते हैं—
तृणादपि सुनीचेन तरोरिव सहिष्णुना॥
तृणकी अपेक्षा भी दीन और वृक्षके समान सहनशील बनकर भगवान्की सेवा करनी चाहिये। बड़ी कठिन बात है। इसीसे लोग इस पथपर नहीं चल सकते।
वास्तवमें भिखारी होना, नम्र बनना, निरभिमान होना जितना कठिन है, भगवान्को प्राप्त करना उतना कठिन नहीं है। एक सच्ची घटना है। एक आधुनिक सभ्यताभिमानी बाबू साहब बीमार हुए, बहुत तरहसे इलाज करवाया गया, परन्तु कुछ भी लाभ नहीं हुआ। ऐलोपैथिक, होमियोपैथिक, वैद्यक, हकीमी आदि सभी तरहके इलाज हुए परन्तु रोग दूर नहीं हुआ। अन्तमें श्रद्धालु गृहिणीकी सलाहसे देवकार्य करना निश्चय हुआ। पण्डितजीने सूर्यकी उपासना बतलायी। कहा कि ‘बाबूजी प्रतिदिन प्रात:काल सूर्यनारायणको साष्टांग प्रणाम करके अर्घ्य दें।’ बाबूने कहा, ‘साष्टांग प्रणाम कैसा होता है, मैं नहीं जानता, आप दिखला दें।’ पण्डितजीको तो अभ्यास था ही, उन्होंने पृथ्वीपर लेटकर साष्टांग प्रणामकी विधि बतला दी। इस प्रणामका ढंग देखकर बाबू बड़े असमंजसमें पड़ गये, परन्तु क्या करें, बड़े कष्टसे घुटने नीचे किये, माथा भी कुछ झुकाया परन्तु जमीनपर पड़नेकी कल्पना आते ही वे दु:खी हो गये। उन्होंने उठकर पण्डितजीसे कहा—‘महाराज! बीमारी दूर हो या न हो, मुझसे ऐसा बेढंगा प्रणाम नहीं होगा।’ सारांश यह कि, जिसके शरीर-मन-प्राण अभिमानके विषसे जर्जरित हैं, वह देवताके चरणोंमें अपना सिर क्यों झुकायेगा? जगत्में जो पार्थिव अभिमान फूट निकला है, महारुद्रके संहार-शूलका दर्शन किये बिना वह मुरझायेगा नहीं। ऐसे अभिमानका त्याग करना जितना कठिन है, भगवान्को प्राप्त करना उतना कठिन नहीं है। जो चीज बहुत दूर होती है, उसीका मिलना कठिन होता है। भगवान् जगत्-प्रभु तो तुम्हारे निकटसे भी निकट देशमें रहते हैं, परन्तु वे तुम्हारे पास क्यों आवें? तुम तो स्वयं ही प्रभु (अहं) बन रहे हो। जगत्प्रभुके लिये तुमने जो हृदयासन बिछा रखा है, वह तो बहुत ही क्षुद्र है। इतने छोटे आसनपर वे और तुम दोनों एक साथ नहीं बैठ सकते।
इसीसे गोसाईंजी महाराजने कहा है—
जहाँ राम तहँ काम नहिं,
जहाँ काम नहिं राम।
‘तुलसी’ कबहुँ कि रहि सके,
रबि रजनी इक ठाम॥
जहाँ श्रीराम रहते हैं, वहाँ काम या विषय-परायण ‘अहम्’ नहीं रह सकता और जहाँ यह काम निवास करता है, वहाँ राम नहीं रहते। सूर्य और रात्रि कभी एक साथ रह सकते हैं? अतएव ‘मैं’ और ‘भगवान्’ दोनों अन्धकार-प्रकाशकी भाँति एक साथ नहीं रह सकते। ‘मैं’ इस पदको हटाना पड़ेगा। तभी ‘वे’ यहाँ पधारकर विराजित हो सकेंगे। वे तो दुर्लभ नहीं हैं। साधक! झूठमूठ ही भगवान्को दुर्लभ बताकर उनपर कलंक क्यों लगाते हो? वे तुम्हारे हृदय-देशमें निवास करनेके लिये आते हैं, परन्तु दरवाजा बन्द पाकर लौट जाते हैं, तुम्हारे हृदय-कपाट खुले नहीं रहते, इसीसे ध्यानके समय श्रीराधाकृष्णकी मूर्ति-से वे तुम्हारे ‘सामने’ खड़े रहते हैं। यह कलंक असलमें हमारा है, उनका नहीं।
भीख ही ऐश्वर्य-शक्तिको बुलाती है। जो ‘भिक्षायां नैव नैव च’ कहते हैं, वे भ्रमसे ऐसा कहते हैं। यथार्थ भिखारी बन जानेपर तो ऐश्वर्य-शक्ति दौड़ी हुई आकर उसका आश्रय लेती है। इसीसे तो जगद्धात्री अन्नपूर्णा राजराजेश्वरी भिक्षुकप्रवर महादेवकी गृहिणी बनी हैं। महापण्डित महाप्रभुने भिखारी बनकर ही—कन्था-कौपीन धारण करके ही—तर्काभिमान चूर्ण करके ही अमूल्य ‘नीलकान्त-मणि’ को प्राप्त किया था। यह भिक्षा ही उसके राज्यकी व्यवस्था है। पूर्ण दीन, पूर्ण निरभिमानी हुए बिना वह प्रियतम नहीं मिल सकता है। दीन बनकर यही समझना होगा कि ‘मेरा’ कुछ भी नहीं है—वही मेरा सर्वस्वधन है। ‘मैं’ कुछ भी नहीं हूँ, विराट्रूपसे विश्वमें एकमात्र वही विराजित है। वास्तवमें वही तो सबकी सत्ता (आत्मा)-रूपसे स्थित है। तुम और मैं (देहेन्द्रियादि जडपिण्ड) पीछेसे आकर उसको भगानेवाले कौन हैं? हमें इतना घमण्ड किस बातपर है? यह मनुष्यकी देह मिट्टीसे ही पैदा हुई है और एक दिन पुन: मिट्टी ही हो जायगी। फिर अभीसे मिट्टी क्यों नहीं बन जाते। भगवान्के सखा अर्जुनने मिट्टी होकर ही—दीन बनकर कहा था—
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।
इसीलिये गीताका अमृतमय उपदेश देकर भगवान्ने उसके ज्ञानचक्षु खोल दिये। पूर्ण दीनतामय भावके सूक्ष्म सूत्रका अवलम्बन करके ही भावस्वरूप भगवान् प्रकट होते हैं। पापियोंके अत्याचारसे जब पृथ्वीपर दीनता छा जाती है, पुण्यका जब पूर्ण अभाव हो जाता है, तभी भगवान्का अवतार होता है। साठ हजार शिष्योंको साथ लेकर जिस समय ऋषि दुर्वासा वनमें पाण्डवोंकी कुटियापर पहुँचे, उस समय द्रौपदीके सूर्यप्रदत्त पात्रमें अन्नका एक कण भी नहीं था। उस पूर्ण अभावके समय—पूरी दीनताके कालमें—द्रौपदीने पूर्णरूप प्रभुको कातरस्वरसे पुकारकर कहा था—‘हे द्वारकाधीश! इस कुसमयमें दर्शन दो! दीनबन्धो! विपत्तिके इस तीरहीन समुद्रमें तुम्हें देखकर कुछ भरोसा होगा।’ द्रौपदीकी आर्त-प्रार्थना सुनकर जगत्-प्रभु स्थिर नहीं रह सके। ऐश्वर्यशालिनी रुक्मिणी और सत्यभामाको छोड़कर भिखारिणी दरिद्रा द्रौपदीकी ओर दौड़े। द्वारकाके अतुलनीय ऐश्वर्यस्तम्भको भेदकर अरण्यवासी पाण्डवोंकी पर्णकुटीरमें विभूतिस्वरूपकी प्रखर प्रभा प्रकाशित हो गयी। द्रौपदीने कहा, ‘नाथ! क्या इतनी देर करके आना चाहिये?’ भगवान् बोले, ‘तुमने मुझको द्वारकाधीशके नामसे क्यों पुकारा था, प्राणेश्वर क्यों नहीं कहा? जानती नहीं हो, द्वारका यहाँसे कितनी दूर है? इसीसे आनेमें देर हुई है।’
जो हमारे प्राणोंके अन्दरकी प्रत्येक क्रियाको जानते हैं, उनके सामने माँगनेके लिये मुँह खोलना बुद्धिमानी नहीं है। भीखकी झोली बगलमें लेकर दरवाजेपर खड़े होते ही वे दया करते हैं। बस, हमें तो चुपचाप उनकी सेवा करनी चाहिये। हम दीन-हीन कंगाल हैं, द्वारपर पड़े रहना ही हमारा कर्तव्य है। उनका कर्तव्य वे जानते हैं, हमें उसके लिये क्यों चिन्ता करनी चाहिये? सेवकका दु:ख-दर्द दूर करना चाहिये, इस बातको प्रभु स्वयं सोचेंगे, हमें तो मनमें भी कुछ नहीं कहना चाहिये। यही निष्काम भिखारीकी भाषा है। यथार्थ भिखारी तो प्रभुके दर्शन पानेके लिये ही व्याकुल रहता है। उनका दर्शन होनेपर माँगनेकी नौबत ही नहीं आती, सारे अभाव पहले ही मिट जाते हैं, समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। भिखारीकी घास-पातकी झोंपड़ी अमूल्य रत्नराशिसे भर जाती है। फिर माँगनेका मौका ही कहाँ रहता है? श्रीमद्भागवतमें कथा है—
सुदामा पण्डित लड़कपनसे ही भगवान् श्रीकृष्णके सखा थे—दोनों मित्र एक ही गुरुजीके यहाँ साथ ही पढ़ा करते थे। विद्या पढ़ लेनेपर दोनोंको अलग होना पड़ा। बहुत दिन बीत गये। परस्पर कभी मिलना नहीं हुआ। भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकाके राजराजेश्वर हुए और गरीब सुदामा अपने गाँवमें भीख माँगकर काम चलाने लगे। सुदामाकी गृहस्थी बड़ी ही कठिनतासे चलती थी। एक दिन उनकी स्त्रीने कहा—‘आप इतने बड़े पण्डित होकर भी कुछ कमाई नहीं करते। फिर इस विद्यासे क्या लाभ होगा?’ सुदामा बोले, ‘ब्राह्मणी! मेरी विद्या इतनी तुच्छ नहीं है कि मैं उसे केवल नगण्य धन कमानेमें लगाऊँ?’ इसपर ब्राह्मणी बोली, ‘अच्छी बात है आप इसे धन कमानेमें मत लगाइये! परन्तु आप कहा करते हैं ‘श्रीकृष्ण मेरे बालमित्र हैं’, सुना है वे इस समय द्वारकाके राजा हैं, उनसे मिलनेपर तो सहज ही आपको खूब धन मिल सकता है।’ सुदामाने कहा, ‘तुम तो खूब सलाह दे रही हो! भगवान्से मेरी मित्रता है, इसलिये क्या मैं उनसे धन माँगू? मुझसे ऐसा नहीं होगा। मैं भक्तिको इतनी छोटी चीज नहीं समझता, जो तुच्छ धनके बदलेमें उड़ा दी जाय! तुम पगली हो गयी हो इसीसे ऐसा कह रही हो।’ ब्राह्मणी बोली, ‘स्वामिन्! मैं कहाँ कहती हूँ कि आप उनके पास जाकर धन माँगें। मैं तो यही कहती हूँ, जब वे आपके बालसखा हैं, तब एक बार उनसे मिलनेमें क्या हानि है? आप उनसे कुछ भी माँगियेगा नहीं।’ स्त्रीके बहुत समझाने-बुझानेपर सुदामाने सोचा कि चलो, इसी बहाने मित्रके दर्शन तो होंगे और वे वहाँसे चल पड़े। थोड़ेसे चिउड़ोंकी कनी पल्ले बाँध ली।
सुदामाजी द्वारकाजी पहुँचे। वहाँके बड़े-बड़े सोनेके महलोंको देखकर उनकी आँखें चौंधिया गयीं। श्रीकृष्णके महलपर पहुँचकर उन्होंने द्वारपालसे कहा कि, ‘जाओ, अपने स्वामीसे कह दो कि आपके एक बालसखा मिलने आये हैं।’ महलोंकी छटा देखकर गरीब ब्राह्मण सोचने लगा कि कहीं श्रीकृष्ण मुझे भूल तो नहीं गये होंगे, परन्तु अन्तर्यामीसे कुछ भी छिपा नहीं था। उनको पता लग गया कि पुराने प्राणसखा सुदामा द्वारपर खड़े हैं। भगवान् पलंगपर लेट रहे थे, श्रीरुक्मिणीजी चरण-सेवा कर रही थीं। भगवान् चमककर उठे और दरवाजेपर खड़े हुए बाल-बन्धुको आदरके साथ अन्दर लिवा लानेके लिये दौड़े। पटरानियाँ भी पीछे-पीछे दौड़ीं।
साधक! तुम उनकी ओर एक पैर आगे बढ़ोगे तो वे तीन पैर बढ़ेंगे। उनकी अतुल दया ऐसी ही है। सखाको साथ लेकर भगवान् अन्त:पुरमें पधारे। पटरानियोंने मिलकर सुदामाके चरण धोये। उन्हें पलंगपर बिठाकर भगवान् स्वयं चमर डुलाने लगे। भगवान्ने प्रेमसे कहा, ‘सखे! बहुत दिन बाद तुम मिले हो, मेरे लिये क्या लाये हो?’ सुदामाने लज्जासे सिर नीचा कर लिया। इतने बड़े धनीको चिउड़ोंकी टूटी कनी देते सुदामाको बड़ा संकोच हुआ, परन्तु भगवान् श्रीकृष्णने उनकी बगलसे पुटलिया छीन ली और लगे चिउड़ा फाँकने। भक्तके प्रेमभरे उपहारकी वे उपेक्षा क्यों करते? भगवान्ने एक मुट्ठी फाँककर ज्यों ही दूसरी हाथमें ली, त्योंही भगवती रुक्मिणीजीने उन्हें रोक लिया। भगवान् मुट्ठी छोड़कर मुसकराने लगे। तदनन्तर वे बोले—भक्तमाल-रचयिता महाराजा श्रीरघुराजसिंहजी कहते हैं—
ऐसे सुनि प्यारी बचन, जदुनन्दन मुसकाइ।
मन्द मन्द बोले बचन, आनँद उर न समाइ॥
ब्रजमें यशोदा मैया मन्दिरमें माखन औ
मिश्री मही मोहन त्यों मोदक मलाई है।
खायो मैं अनेक बार तैसे मथुरामें आइ,
व्यंजन अनेक मोहि जननी जेंवाई है।
तैसे द्वारिकामें जदुवंशिन के गेह-गेह,
सहित सनेह पायो भोजन में लाई है।
रघुराज आजलों त्रिलोकहुमें मीत ऐसी,
राउर के चाउर ते पाई ना मिठाई है॥
खायो अनेकन यागन भागन
मेवा रमा कर वागन दीठे,
देवसमाजके साधुसमाजके
लेत निवेदन नाहि उबीठे।
मीत जु साँची कहौ रघुराज
इते कस वै भये स्वाद ते सीठे,
पायो नहीं कतहूँ अस मैं
जस राउर चाउर लागत मीठे॥
सुदामाके चिउड़ोंकी महिमा वर्णन करनेके बाद सभी सुदामाजीकी सेवामें लग गये। कुछ दिन मित्रके घर रहनेके बाद सुदामाने विदा माँगी। भगवान्ने संकोचसे अनुमति दे दी। ब्राह्मण खाली हाथों लौट चले। घरके पास पहुँचकर ब्राह्मणने देखा तो झोपड़ी नहीं है। वहाँ एक बड़ा सुन्दर महल बना हुआ है। ब्राह्मण सुदामाने सोचा, किसी राजाने जमीन छीनकर महल बनवा लिया होगा। ब्राह्मणको बड़ी चिन्ता हुई। फूसकी मड़ैया और पतिव्रता ब्राह्मणी भी गयी। इतनेमें सुदामा देखते हैं कि उनकी स्त्री महलके झरोखेमें खड़ी उन्हें पुकार रही है। ब्राह्मणने सोचा, दुष्ट राजाने ही स्त्रीको भी हर लिया है, पर वह बुला क्यों रही है? ब्राह्मण डरकर दौड़े। बड़ी कठिनतासे नौकर उन्हें समझा-बुझाकर घरमें ले गये। गृहिणीने बहुत ही नम्रतासे चरणोंमें प्रणाम करके कहा, ‘प्राणेश्वर! डरें नहीं! यह अतुल सम्पत्ति आपकी ही है, आपके मित्रने यह आपको भेंट की है।’ सुदामा बोले, ‘मैंने तो उनसे कुछ माँगा ही नहीं था।’ ब्राह्मणीने कहा, ‘आपने प्रत्यक्ष नहीं माँगा, इसीसे उन्होंने आपको प्रत्यक्षमें कुछ भी नहीं दिया।’ अन्तर्यामी यों ही किया करते हैं। ब्राह्मणकी दोनों आँखोंसे आँसुओंकी धारा बह चली। प्राणसखाके प्रेमकी स्मृतिसे सुदामा भावावेशसे विह्वल हो गये।
जगत् ! देख जाओ, आज इस कंगालके ऐश्वर्यको देख जाओ! जो कल राहका भिखारी था, वही आज रत्नसिंहासनपर आसीन है। देख जाओ! आज पर्णकुटीरमें त्रिभुवनव्यापिनी माधुरी छा रही है। संसार! तुम जिस भिखारीको उपेक्षाकी दृष्टिसे देखते थे, जिसको पददलित समझते थे, देख जाओ, आज वही भिखारी दीनताके रूपको भेदकर अखिल विश्वब्रह्माण्डमें वरणीय हो गया है।
भिखारी! जगत्की चुटकियोंकी ओर न देखो। जगत्के अपमानकी ओर दृष्टि मत डालो। विविध विपत्तियोंसे डरकर मत काँपो। तुम अपना काम अचल चित्तसे किये जाओ। जितने ही बाधा-विघ्न और संकट बढ़ेंगे, उतना ही यह समझो कि तुम्हें गोदमें लेनेके लिये जगज्जननीका हाथ तुम्हारी ओर बढ़ रहा है। स्नेहमयी माता पुत्रको गोद लेनेसे पहले अँगोछेसे उसके शरीरको रगड़-रगड़कर साफ करती है। साधक! इसी प्रकार जगज्जननी भी तुम्हें गोदमें लेनेसे पूर्व एक बार रगड़ेगी। इस रगड़से घबराना नहीं—डरना नहीं। यह समझना कि, इस वेदनासे तुम्हारी यम-वेदना विध्वंस हो गयी है। इस कष्टसे तुम्हारा सारा कष्ट नष्ट हो गया है, अतएव साधक! हताश न होना!