साधन-भक्तिके चौंसठ अंग
१—श्रीगुरु-चरण-कमलोंका आश्रय-ग्रहण।
२—श्रीगुरुदेवसे श्रीकृष्णमन्त्रकी दीक्षा लेकर भगवद्विषयमें शिक्षा प्राप्त करना।
३—विश्वासके साथ गुरुकी सेवा करना।
४—साधु-महात्माओंके आचरणका अनुसरण करना।
५—भागवतधर्मके सम्बन्धमें विनयपूर्वक प्रश्न करना।
६—श्रीकृष्णकी प्राप्तिके लिये भोगादिका त्याग करना।
७—द्वारका, अयोध्या आदि भगवान्के लीलाधामोंमें और गंगादि तीर्थोंमें रहना।
८—जितने व्यवहारके बिना काम न चले, नियमपूर्वक उतने ही व्यवहार करना।
९—एकादशी, जन्माष्टमी, रामनवमी आदिका उपवास करना।
१०—आँवला, पीपल, तुलसी आदि पवित्र वृक्ष और गौ-ब्राह्मण तथा भक्तोंका सम्मान करना।
ये दस अंग साधन-भक्तिके सहायक हैं और ग्रहण करने योग्य हैं।
११—भगवद्विमुख असाधु पुरुषका संग बिलकुल त्याग देना।
१२—अनधिकारीको, प्रलोभन देकर या बलपूर्वक किसीको शिष्य न बनाना, अधिक शिष्य न बनाना।
१३—भगवान्के सम्बन्धसे रहित आडम्बरपूर्ण कार्योंका आरम्भ न करना।
१४—बहुत-से ग्रन्थोंका अभ्यास न करना। व्याख्या या तर्क-वितर्क न करना। भगवत्सम्बन्धरहित कलाओंको न सीखना।
१५—व्यवहारमें अनुकूलता न होनेपर दीनता न लाना।
१६—शोक, मोह, क्रोधादिके वश न होना।
१७—किसी भी दूसरे देवता या दूसरे शास्त्रका अपमान न करना।
१८—किसी भी प्राणीको उद्वेग न पहुँचाना।
१९—सेवापराध और नामापराधसे सर्वथा बचे रहना।
२०—श्रीकृष्ण और श्रीकृष्णके भक्तोंके द्वेष और निन्दा आदि-को न सह सकना।
इन दस अंगोंके पालन किये बिना साधन-भक्तिका यथार्थ उदय नहीं होता।
२१—वैष्णव-चिह्न धारण करना।
२२—हरिनामाक्षर धारण करना।
२३—निर्माल्य धारण करना।
२४—श्रीभगवान्के सामने नृत्य करना।
२५—श्रीभगवान्को दण्डवत् प्रणाम करना।
२६—श्रीभगवान्की मूर्तिको देखते ही खड़े हो जाना।
२७—श्रीभगवान्की मूर्तिके आगे-आगे या पीछे-पीछे चलना।
२८—श्रीभगवान्के स्थानों अर्थात् उनके धाम और मन्दिरोंमें जाना।
२९—परिक्रमा करना।
३०—श्रीभगवान्की पूजा करना।
३१—श्रीभगवान्की परिचर्या या सेवा करना।
३२—श्रीभगवान्का लीला-सम्बन्धी गान करना।
३३—श्रीभगवान्के नाम, गुण, लीला आदिका उच्चस्वरसे कीर्तन करना।
३४—श्रीभगवान्के नाम और मन्त्रादिका जप करना।
३५—श्रीभगवान्के समीप अपनी दीनता दिखलाकर उनके प्रेमके लिये, सेवा प्राप्त करनेके लिये प्रार्थना करना।
३६—श्रीभगवान्की स्तुतियोंका पाठ करना।
३७—महाप्रसादका सेवन करना।
३८—चरणामृत पान करना।
३९—धूप और माला आदिका सुगन्ध ग्रहण करना।
४०—श्रीमूर्तिका दर्शन करना।
४१—श्रीमूर्तिका स्पर्श करना।
४२—आरति और उत्सवादिका दर्शन करना।
४३—श्रीभगवान्के नाम-गुण-लीलादिका श्रवण करना।
४४—श्रीभगवान्की कृपाकी ओर निरन्तर देखते रहना।
४५—श्रीभगवान्का स्मरण करना।
४६—श्रीभगवान्के रूप, गुण, लीला, सेवा आदिका ध्यान करना।
४७—सारे कर्म श्रीभगवान्को अर्पण करके अथवा उन्हींके लिये सब कर्म करते हुए भगवान्का अनन्यदास बन जाना।
४८—दृढ़ विश्वास और प्रीतिके साथ अपनेको श्रीभगवान्का सखा मानना।
४९—श्रीभगवान्के प्रति आत्मसमर्पण कर देना।
५०—अपनी उत्तम-से-उत्तम और प्यारी-से-प्यारी सब वस्तुएँ भगवान्के प्रति निवेदन कर देना।
५१—भगवान्के लिये ही सब चेष्टा करना।
५२—सब प्रकारसे सर्वथा श्रीभगवान्के शरण हो जाना।
५३—उनकी तुलसीजीका सेवन करना।
५४—उनके शास्त्रोंका सेवन करना।
५५—उनके पुरियोंका सेवन करना।
५६—उनके भक्तोंका सेवन करना।
५७—अपने वैभवके अनुसार सज्जनोंके साथ मिलकर भगवान्का महोत्सव करना।
५८—कार्तिकके व्रत करना।
५९—जन्म और यात्रा-महोत्सव मनाना।
६०—श्रद्धा और विशेष प्रेमके साथ भगवान्के चरण-कमलोंकी सेवा करना।
६१—रसिक भक्तोंके साथ मिलकर श्रीमद्भागवतके अर्थ और रसका आस्वादन करना।
६२—सजातीय और समान आशयवाले, भगवान्के रसिक महापुरुषोंका संग करना।
६३—नाम-संकीर्तन करना।
और
६४—व्रज-मण्डलादि मधुर लीलाधामोंमें वास करना।