साधकोंसे

संसारमें अधिक लोग तो ऐसे हैं, जिनका भगवान‍्के भजनसे कोई सरोकार नहीं है; वे ईश्वरको मानते तो हैं, परन्तु उनका वह मानना प्राय: न मानने-जैसा ही है। वे शरीर, धन, स्त्री, पुत्र, मान, यश आदिमें ही परम सुख मानकर दिन-रात उन्हींकी चिन्तामें लगे रहते हैं। उनके चित्तको क्षणभरके लिये भी भगवच्चिन्तनकी आवश्यकताका विचार करनेके लिये भी अवसर नहीं मिलता। इन लोगोंमें कुछ तो ऐसे हैं, जो इन सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्ति और रक्षाके लिये भी यथार्थरूपसे उत्साहरहित निर्दोष चेष्टा न करके या तो शरीरके आराम, प्रमाद और इन्द्रियोंकी तृप्तिमें ही लगे रहते हैं या भाँति-भाँतिके दुराचरण और पाप करके जीवनको और भी कलुषित, अशान्त और दु:खमय बना लेते हैं।

कुछ लोग ऐसे हैं, जो तर्क और प्रत्यक्षवादका आश्रय लेकर मोहसे ढकी हुई बुद्धिके अभिमानमें ईश्वरका विरोध करते हैं; ये जब ईश्वरके अस्तित्वको ही नहीं मानते, तब उसके भजनकी आवश्यकताको क्यों समझने लगे।

कुछ लोग ऐसे हैं, जो भगवान‍्का भजन करनेमें स्वयं तो कोई दिलचस्पी नहीं रखते और न भजन या परमार्थपथमें लगना ही चाहते हैं, पर सांसारिक कामनाओंकी पूर्तिके लिये भोले लोगोंको ठगनेके उद्देश्यसे भक्त, ज्ञानी, साधु, महात्मा या सिद्ध पुरुषका-सा स्वाँग धारण किये रहते हैं। इनमेंसे कुछ लोग तो बड़े ही चालाक होते हैं, जो जीवनभर दम्भको निभा देते हैं। ये वस्तुत: अत्यन्त ही निष्कृष्ट जीव हैं और बड़े ही मूर्ख हैं। ये मनुष्य-जीवनको व्यर्थ ही नहीं खोते वरं बहुत बड़ा पापका बोझा बाँधकर ले जाते हैं। दम्भीलोग ईश्वरसे नहीं डरते; वे स्वेच्छाचारी होते हैं और दुनियाको ठगनेके लिये निरंकुश होकर नाना प्रकारके समयानुकूल वेष धारण करते हैं। ऐसे लोग असली ईश्वर-भजनकी जरूरत समझते ही नहीं। ये नास्तिकोंसे भी गये-बीते होते हैं। ईश्वरको न माननेवाले ईमानदार नास्तिक तो समझमें आनेपर ईश्वरको स्वीकार भी कर सकते हैं; क्योंकि वे सच्चे होते हैं; परन्तु दम्भी मनुष्यके लिये समझनेका और स्वीकार करनेका कोई प्रश्न ही नहीं रहता।

कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो विषयोंके साथ ही भगवान‍्में भी कुछ प्रेम रखते हैं। वे समय और सुभीता मिलनेपर सत्संग, सेवा, दान, पुण्य, नित्यकर्म, स्वाध्याय, भजन आदि भी करते हैं; परन्तु भगवान‍्का महत्त्व बहुत कम समझनेके कारण इनकी विषयासक्ति कम नहीं होती, इससे इनके द्वारा न तो भजन ही बढ़ता है और न उसमें शुद्ध निष्कामभाव और अनन्यभाव ही आता है। अवश्य ही ये ईश्वर और पापसे डरते हैं और यथासाध्य पापसे बचनेकी कोशिश करते हैं; ऐसे पुण्यकर्मा विषयासक्त लोग विपरीत करनेवाले या कुछ भी न करनेवाले मनुष्योंकी अपेक्षा बहुत ही अच्छे हैं।

थोड़े ही लोग ऐसे हैं, जिनके मनमें भगवत्प्राप्तिकी इच्छा जागती है और वे उसके लिये साधनामें लगते हैं; परन्तु उनमें भी बहुत ही थोड़े ऐसे होते हैं, जो ध्येयकी प्राप्तितक साधनामें भलीभाँति लगे रहकर उत्तरोत्तर अग्रसर होते हैं। इसीसे भगवान‍्ने कहा है—

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद् यतति सिद्धये।

यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वत:॥

(गीता ७। ३)

‘हजारों मनुष्योंमें कोई विरला ही मेरी प्राप्तिके लिये यत्न करता है और उन यत्न करनेवाले सिद्धोंमें भी कोई विरला ही मुझको तत्त्वसे जानता है।’

इसका कारण यही है कि साधनामें प्रवृत्त होनेके समय प्राय: मनमें जैसी शुद्ध भावना, उत्साहकी वृत्ति, तत्परता और प्रीति देखी जाती है, वैसी आगे चलकर रहती नहीं। मूलमें ही बहुत मन्द मुमुक्षा होनेके कारण आगे चलकर भिन्न-भिन्न हेतुओंसे साधनामें शिथिलता आ जाती है, तत्परता नहीं रहती और प्रीति बहुत कम हो जाती है। साधना भार-सी मालूम होने लगती है, उसमें कोई रस नहीं आता। इससे कुछ लोग तो साधनाको छोड़ बैठते हैं और कुछके हृदयमें दम्भ आ जाता है। थोड़े ही ऐसे बचते हैं, जो साधनामें लगे रहते हैं; परन्तु उनमें भी बहुत-से ऐसे होते हैं, जो थोड़ी-सी सिद्धिमें ही अपनेको कृतार्थ मानकर साधना छोड़ देते हैं और भगवान‍्की तत्त्वत: प्राप्तिसे वंचित रह जाते हैं। इसलिये साधकोंको कुछ ऐसी बातोंका खयाल रखना चाहिये, जिनसे उनकी साधनामें शिथिलता न आने पाये और अन्ततक साधना छूटे नहीं। इसी विचारसे यहाँ साधकोंके लिये कुछ आवश्यक बातें लिखी जाती हैं—

१—भगवत्प्राप्ति ही जीवनका एकमात्र उद्देश्य है, इस बातका बहुत ही दृढ़रूपसे निश्चय कर लें। इस लक्ष्यसे कभी डिगें नहीं। संसारके सुख-दु:ख, हानि-लाभ, नाना प्रकारके प्रलोभन किसी तरह भी मनको इस लक्ष्यसे च्युत न कर सकें—इस तरहका निश्चित लक्ष्य बना लें और केवल उसी ओर दृष्टि रखते हुए मार्गके विघ्नोंको वीरता-धीरतापूर्वक हटाते हुए तेज चालसे आगे बढ़ते रहें।

२—लक्ष्यकी सिद्धिके लिये साधना स्थिर करें। साधना सबके लिये एक-सी नहीं होती। लक्ष्य वह स्थान है, जहाँ सबको पहुँचना है और साधना उसके मार्ग हैं। यदि सब लोग यह कहें कि हम तो एक ही रास्तेसे और एक ही चालसे वहाँ जायँगे तो उनका यह कहना भ्रमयुक्त है; भिन्न-भिन्न दिशाओंमें रहनेवाले भिन्न-भिन्न स्थितियोंके मनुष्योंका एक रास्ते और एक चालसे चलना सम्भव नहीं है। आसाम, कराची, मद्रास और बद्रिकाश्रम—इन चार स्थानोंके चार पुरुष काशी जाना चाहते हैं। परन्तु वे यदि कहें कि हम एक ही मार्गसे और एक ही चालसे जायँगे तो यह उनकी भूल है; क्योंकि वे चार भिन्न-भिन्न दिशाओंमें हैं, उनको अपने-अपने रास्तोंसे ही जाना पड़ेगा और उन चारों स्थानोंकी दूरीमें, रास्तेकी बनावटमें और सवारियोंमें भी भेद है, ऐसी हालतमें वे एक चालसे भी नहीं चल सकते। हाँ, समीप पहुँचनेपर वे एक रास्तेपर आ सकते हैं। बस, यही बात साधनक्षेत्रमें है। जो लोग सबको एक मार्ग और एक चालसे चलाना चाहते हैं, वे स्वयं न तो पहुँचे हुए हैं और न मार्गका ही उन्हें अनुभव है। अतएव अपने उपयुक्त साधनाकी जानकारीके लिये किसी जानकारकी शरण लेनी चाहिये। अपनी दृष्टिमें जो सबसे बढ़कर ऊँची स्थितिपर पहुँचे हुए महात्मा, त्यागी, दैवीसम्पत्तियुक्त और भगवत्प्राप्त पुरुष दीख पड़ें, श्रद्धा-भक्तिसहित जिज्ञासुके भावसे उनकी शरण लें। (शरण होनेके पहले आजकलके जमानेमें इतना अवश्य देख लेना चाहिये कि वे ‘कामिनी-कांचनके फन्देमें तो नहीं फँसे हैं।’ चाहे कामिनी-कांचनका संसर्ग दिखावटी ही हो, परन्तु उस दिखावटका आप निश्चय नहीं कर सकते; इसलिये आपको तो वहाँसे डरना ही चाहिये।) और अपनी बुद्धिका अभिमान छोड़कर नम्रता और सेवासे उन्हें प्रसन्न करके अपने अधिकारके उपयुक्त साधना उनसे पूछें तथा वे जो कुछ साधना बतला दें, उसे श्रद्धा, तत्परता और इन्द्रियसंयमके साथ करने लगें। उनकी बतलायी हुई साधना चाहे देखनेमें बहुत ऊँची न हो, चाहे दूसरे साधकोंकी साधनाओंसे वह नीचे दर्जेकी समझी जाती हो, चाहे उसमें प्रत्यक्ष लाभ न दीखता हो और चाहे कुछ दिनोंके अभ्याससे कोई शान्ति भी नहीं मिली दीखती हो, तथापि उसे छोड़ें नहीं और इसके परिणाममें अवश्य ही कल्याण होगा, ऐसा निश्चय करके उनके आज्ञानुसार साधना करते ही रहें। याद रखना चाहिये कि एक दवा बहुत मूल्यवान् है और बहुत ही कठिनतासे मिलती है, परन्तु वह हमारे रोगकी निवृत्ति करनेमें समर्थ नहीं है और दूसरी कौड़ियोंकी है तथा सहज ही मिलती है, परन्तु वह हमारे रोगके लिये लाभदायक है, तो वही हमारे कामकी है और उसीसे हमारा रोग नाश हो सकता है। सद‍्गुरु महात्मा पुरुष हमारी स्थितिको पहचानकर हमारे लिये जिस साधनका विधान कर देंगे, वही हमारे लिये हितकर है—यह विश्वास रखना चाहिये। रोगका निदान निपुण वैद्य ही कर सकता है, रोगी नहीं। जो रोगी अनुभवी निपुण वैद्यके निदानको न मानकर मनमानी करता है, वह तो मरता ही है। फिर महात्माओंकी वाणीमें भी तो बल होता है, सत्यकाम जाबालको सिद्ध सद‍्गुरुने कहा कि ‘इन चार सौ पशुओंको जंगलमें ले जाओ, इनकी सेवा करो; ये जब पूरे एक हजार हो जायँ, तब लौट आना।’ श्रद्धालु शिष्यने यह नहीं विचार किया कि मैं आया था ब्रह्मज्ञानकी साधना पूछने और ये मुझको पशुओंके पीछे क्यों भेज रहे हैं। वह आज्ञानुसार गोसेवामें लग गया और हजार गौओंको लेकर लौटते समय राहमें ही उसे ब्रह्मकी प्राप्ति हो गयी।

३—अपने लिये जो साधना स्थिर हो, उसके करनेमें जी-जानसे अपनेको लगा दें। आलस्य, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, सन्देह, दोषदृष्टि, कुतर्क, अश्रद्धा, अनियमितता आदि दोषोंसे सर्वथा बचकर नियमित साधना करें। जबतक उस साधनाका पूरा परिणाम सामने न आ जाय, तबतक उसे बदलें नहीं। पहलेका रास्ता तै होनेपर ही दूसरा रास्ता पकड़ा जाता है; जो पहले ही रास्तेको बार-बार बदलता रहता है, वह तो आगे बढ़ ही नहीं सकता, उसका सारा समय राह बदलनेमें ही बीत जाता है।

४—यह कभी न सोचें कि सिद्धि प्राप्त करनेके बाद साधनाको छोड़ ही देना है। बल्कि यह निश्चय करें कि जिस साधनासे सिद्धि मिली, वह तो हमारे लिये परम प्रिय वस्तु है; उसे कभी छोड़ना ही नहीं है। काकभुशुण्डिने कहा था कि ‘मैं इसीलिये कौएका शरीर नहीं छोड़ता कि मुझे इसीमें श्रीरामका प्रेम प्राप्त हुआ और श्रीरामके दर्शन मिले थे।’ अत: यह शरीर मुझे बहुत प्यारा है।

ताते यह तन मोहि प्रिय भयउ राम पद नेह।

निज प्रभु दरसन पायउँ गए सकल संदेह॥

दूसरी बात यह है कि साधना छोड़नेकी कल्पना होनेसे मनुष्यको आगे चलकर वह साधना भार-सी प्रतीत होने लगती है। वह सोचता है, ‘इतने दिन हो गये इस साधनाको करते, अब इसे कबतक करता रहूँगा। इससे कुछ होता तो दिखायी देता नहीं, छोड़ दूँ इस बखेड़ेको।’ इस प्रकारके विचारसे साधक साधनाको छोड़ बैठता है और वह उसी पथिककी भाँति, जो अपने गाँवसे गंगा नहानेको चलकर अस्सी कोस चला आया, परन्तु फिर यह सोचकर कि ‘इतना चला, अभी तो गंगाजी आयीं ही नहीं। पता नहीं कब आयेंगी, चलो, लौट चलें।’ बीस ही कोस और चलनेसे असमर्थ होकर गंगास्नानसे वंचित रह जाता है, थोड़ी-सी साधनाके अभावसे बहुत दूरतक जाकर भी लक्ष्यकी प्राप्ति नहीं कर पाता।

इसके अतिरिक्त एक बात यह भी है कि साधनाके मार्गमें ही कई बार साधक अपनेमें दोषोंका अभाव देखकर भ्रमसे यह मान बैठता है कि मैं लक्ष्यपर पहुँचकर कृतकृत्य हो गया हूँ; ऐसी स्थितिमें जिसका पहलेसे साधना छोड़नेका निश्चय होता है, वह साधना छोड़कर निश्चिन्त-सा हो जाता है। परन्तु साधनरहित अवस्थामें कुसंग पाकर दबे हुए या दुर्बल हुए दोष पुन: जाग उठते हैं और बलवान् हो जाते हैं। किन्तु जिसका किसी भी अवस्थामें साधन न छोड़नेका निश्चय होता है, वह साधना करता ही रहता है; इससे दबे दोषोंको सिर उठानेका अवसर ही नहीं मिलता और क्षीण होते-होते अन्तमें वे मर ही जाते हैं। यह सत्य है कि परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद कोई साधना नहीं करनी पड़ती। उसकी स्वाभाविक ही ऐसी स्थिति होती है, उसमें स्वाभाविक ही ऐसे सद‍्गुणोंका प्रादुर्भाव हो जाता है कि उसका संग करके, उसको देखकर, यहाँतक कि उसके गुण सुनकर ही दुराचारी पुरुष भी साधनमें लग जाते हैं। वह कुछ भी करनेकी इच्छा नहीं करता, उसके लिये कुछ भी करना शेष नहीं रह जाता; तथापि उस महापुरुषसे सम्बन्धित शरीर, मन-वाणीसे जो कुछ भी होता है, सब पवित्र और लोककल्याणकारी ही होता है। इसीलिये मुक्त पुरुषोंके लोकसंग्रहार्थ कर्म करनेकी बात कही गयी है।

वस्तुत: भगवत्प्राप्तिके बाद क्या होता है और क्या होना चाहिये—इसकी यथार्थ मीमांसा भगवत्प्राप्तिसे पूर्व कोई कर नहीं सकता और भगवत्प्राप्तिके बाद इसकी आवश्यकता रहती नहीं। परन्तु साधकका तो यही निश्चय होना चाहिये कि अपने तो साधनावस्था और सिद्धावस्था दोनोंमें ही साधनाको पकड़े रहना है। पहले प्राप्तिके लिये और प्राप्ति होनेपर पूर्व अभ्यासके कारण अथवा लोकसंग्रहार्थ। उनका उसीमें कल्याण है। अतएव किसी भी अवस्थामें साधनाको छोड़ देना साधकके लिये हानिकारक है।

५—साधक तीन चीजोंकी बड़ी सावधानीसे प्राप्ति और रक्षा करते रहें—

(१) उच्चभाव—भगवत्प्राप्तिके अतिरिक्त मनमें और कोई भी कामना कभी न उठने पाये। भगवत्प्राप्तिकी भी कामना न रहकर केवल भजनकी ही कामना हो तो और भी उत्तम है। भगवत्प्राप्ति या मोक्षकी कामना यद्यपि समस्त कामनाओंका सर्वथा नाश करनेवाली होनेसे कामना नहीं है, तथापि विशुद्ध प्रेम, अनन्यशरणागति अथवा तत्त्वज्ञानके सिद्धान्तोंकी उच्चता देखते तो कोई भी कामना—भले ही वह कितनी ही विशुद्ध अथवा उच्च हो—नहीं होनी चाहिये, परन्तु ऐसा न हो तो भी आपत्ति नहीं है। हाँ, भोग-कामना तो सर्वथा त्यागनी ही चाहिये। स्त्री, पुत्र, धन, शरीरका आराम, मान-बड़ाई, स्वर्गसुख आदि इस लोक और परलोकके किसी भी दुर्लभ-से-दुर्लभ माने जानेवाले पदार्थके लिये मनमें कामनाकी गन्ध भी कल्पनामें भी न रहने पाये। यही उच्चभाव है।

(२) दैवी सम्पत्ति—भगवत्प्राप्तिकी इच्छा तभी समझी जाती है, जब कि संसारके सारे भोगोंकी इच्छा सर्वथा नष्ट होकर एक भगवान‍्को पानेकी ही अमिट और अति उत्कट लालसा हृदयमें जाग उठे। इस महान् विशुद्ध इच्छाकी जागृति तभी होती है, जब आसुरी सम्पदाका नाश होकर चित्त दैवी सम्पदाका अटूट भण्डार हो जाता है। जबतक एक भी आसुरी सम्पदाकी वस्तु हमारे मनमें है, तबतक मोक्ष या भगवत्प्राप्तिकी कामना त्याग करनेकी बात तो दूर रही, मोक्षकी यथार्थ इच्छा ही नहीं हुई है। साधकको बड़ी ही सावधानीसे आसुरी सम्पदाको खोज-खोजकर उसका नाश कर देना चाहिये।

यह विश्वास रखना चाहिये कि हमारे द्वारा जो कुछ दुष्कर्म बनते हैं या हमारे हृदयमें जो भी दुर्भाव रहते हैं, उसमें भूलसे हो, प्रमादसे हो या कमजोरीसे हो, हमारी आत्माकी अनुमति अवश्य रहती है। यदि आत्मा बलपूर्वक मनसे कह दे कि ‘आजसे एक भी पापवृत्तिको अपनेमें नहीं रख सकते।’ और पापवृत्तियोंको ललकारकर कह दे कि, ‘जाओ, निकल जाओ, यहाँसे तुरन्त; यहाँ रहे तो समूल नष्ट हो जाओगे।’ तो मनकी हिम्मत नहीं कि एक भी दोषको अपनेमें स्थान दे सके और पापवृत्तियोंकी शक्ति नहीं कि क्षणभर भी वे हमारे अन्दर ठहर सकें। आत्माके समान बलवान् और कोई भी नहीं है। आत्माके ही बलको पाकर सब बलवान् हैं। आत्माकी शक्तिसे ही सबमें शक्ति है। शक्तिका मूल उद‍्गम स्थान और पूर्ण केन्द्र तो आत्मा ही है। यही सबका सचेतन शक्तिधाम है। भगवान‍्ने स्पष्ट शब्दोंमें कहा है—

एवं बुद्धे: परं बुद‍्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।

जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥

(गीता ३। ४३)

‘इस प्रकार आत्माको बुद्धिसे भी परम शक्तिमान् और श्रेष्ठ जानकर अपने द्वारा इन सबको—बुद्धि, मन, इन्द्रिय, शरीरादिको वशमें करके हे महाबाहो! इस ज्ञानियोंके नित्य वैरी और सब पापोंके मूल दुर्जय कामरूपी शत्रुको मार डालो।’

भगवान‍्की इस वाणीसे यह निश्चय होता है और सन्तोंका ऐसा अनुभव भी है कि आसुरी सम्पदा और उसके प्रधान आधार काम, क्रोध, लोभादिका नाश करके दैवी सम्पदाका अर्जन करना भगवत्कृपासे हमारे लिये कोई बड़ी बात नहीं है, बस, आत्मामें बलवती आज्ञाशक्तिका प्रकाश हो जाना चाहिये, जो उसका स्वरूप है; फिर आसुरी सम्पत्तिका विनाश और दैवी सम्पत्तिका विकास होते देर नहीं लगती। आत्माकी जागृति होते ही आसुरी सम्पदाएँ भागने लगती हैं और दैवी सम्पदाओंका प्रवाह चारों ओरसे आने लगता है।

(३) अन्तर्मुखी वृत्ति—इन्द्रियोंकी और मनकी दृष्टि सदा बाहरकी ओर ही होती है। इसीसे स्वाभाविक ही चित्तवृत्ति बहिर्मुखी रहती है। साधक यदि विशेषरूपसे सावधान रहें तो उनकी साधनाका लक्ष्य विचार-बुद्धिसे भगवान् होनेपर भी क्रियारूपमें विषय-भोग ही बना रह जाता है। वे अपनी प्रत्येक साधनाको बाहरी शक्तिसे शक्तिसम्पन्न बनाने और बाहर ही उसका विकास देखनेकी इच्छा करते हैं। सारी शक्ति भगवान‍्से, जो नित्य हमारे अन्दर आत्मारूपसे भी विराजित हैं, जाती हैं और सारी शक्तियोंसे उन्हींकी हमें पूजा करनी है। इस बातको साधक प्राय: भूल जाते हैं इससे उनका चित्त बाहर-ही-बाहर भटकता है और इसी हेतुसे वे साधनाके फलस्वरूप अवश्य प्राप्त होनेवाली यथार्थ शान्तिको नहीं पाते। वृत्तिको बाहरसे हटाकर अन्दर लगानेके लिये, विषयरूप संसारसे हटाकर सच्चिदानन्दघन परमात्मामें जोड़नेके लिये यथावश्यक एकान्तवास, जप, स्वाध्याय आदि उपाय करने चाहिये। किसी भी तरहसे हो, चित्त आठों पहर भगवान‍्में ही लगा रहे—ऐसा प्रयत्न किये बिना साधकको सहज ही सफलता नहीं मिलती!

६—साधनाको निरुपद्रव और सफल बनानेके लिये शरीर, वाणी और मन—तीनोंके ही संयमकी आवश्यकता है। शरीरसे चोरी, मैथुन, हिंसा, दूसरेका अपमान, टेढ़ापन या ऐंठ, आराम-तलबी, अपवित्रता, व्यर्थ क्रिया और कुसंगतिमें बैठना आदिका त्याग करे। वाणीसे असत्य, अप्रिय, अहितकर वचन, चुगली, निन्दा, अधर्मयुक्त परचर्चा और व्यर्थ वचनोंका त्याग करे। मौन रहनेसे भी वाणीके बहुत दोषोंका नाश हो सकता है। मनसे शोक, निर्दयता, द्वेष, वैर, हिंसा, अशुद्ध विचार, भोग-कामना, परदोषचिन्तन और व्यर्थ चिन्तनका त्याग करना चाहिये। इस विषयमें विवेकयुक्त होकर विशेष सावधानी रखनी चाहिये। एक मनुष्य स्त्रियोंमें नहीं बैठता, परन्तु स्त्रियोंके चित्र देखता है, स्त्रीसम्बन्धी पुस्तकें पढ़ता है, तो वह स्त्रीसंग करता ही है। एक मनुष्य कुसंगमें नहीं जाता, परन्तु बुरे-बुरे चित्र देखता है और पुस्तकों आदिमें लिखी गन्दी बातें पढ़ता है, वह भी कुसंग ही करता है। बल्कि मनमें स्त्रीचिन्तन और कुविचार जबतक है, तबतक यही समझना चाहिये कि इनका यथार्थ त्याग हुआ ही नहीं। परन्तु इतना ध्यान रहे कि जिस दोषका जिस किसी प्रकारसे जितने भी अंशमें त्याग हो, उतना ही लाभकारी है। मनमें संयम नहीं होनेपर भी वाणी और शरीरका संयम तो करना ही चाहिये। वह मनके संयममें बहुत सहायक होता है।

साधक यह न समझें कि हम साधन करते ही हैं, फिर इस संयमकी हमें क्या आवश्यकता है। उन्हें याद रखना चाहिये कि जबतक भगवत्प्राप्ति नहीं होती, तबतक हमारे अन्दर रहनेवाले अज्ञानजनित दोषों और विकारोंका सर्वथा नाश नहीं होता, वे संयम, सत्संग और साधनाके कारण छिपते हैं, दबते हैं और क्षीणबल होते हैं। यदि संयमयुक्त सत्संग और साधना चलती रहे तो क्षीण होते-होते वे भगवत्प्राप्ति होनेके साथ ही नष्ट हो जाते हैं; परन्तु यदि संयम न रहे तो अनुकूल वातावरण पाकर वे उसी तरह बलवान् हो जाते हैं और हमारी साधन-सम्पत्तिको लूट लेते हैं; जैसे घरके भीतर छिपे हुए डाकू बाहर डाकुओंका दल देखकर बलवान् हो जाते हैं, उनका साहस बढ़ जाता है और वे हमला करनेकी तैयारी करने लगते हैं। और यदि दोनों ओरसे आक्रमण होता है तो गृहस्थको प्राय: लुटना ही पड़ता है। इस प्रकार बाहरके दोषोंका सहारा पानेसे अन्दरके दोष बढ़कर हमारी सारी साधनाको नष्ट कर देते हैं। इसलिये मन, वाणी और शरीरके अटूट संयमके बलसे अन्दरके दोषोंको सदा दबाते और मारते रहना चाहिये तथा बाहरके नये दोषोंको जरा भी आने नहीं देना चाहिये। साधकको निरन्तर आत्मनिरीक्षण करते रहना चाहिये और जरा-से भी दोषको देखते ही उसे मारना चाहिये।

७—साधकको उपदेशक, नेता, गुरु, आचार्य और पंच आदि नहीं बनना चाहिये। संसारमें अपने-अपने क्षेत्रोंमें इन सभीकी आवश्यकता और उपादेयता है, परन्तु ये सभी साधन संसारसे बाहरकी चीजें हैं। या तो विषयी पुरुष आसक्तिवश इनमें रहते हैं या नि:संग और निष्काम मुक्त पुरुष जलमें कमलके पत्तेकी तरह निर्लेप रहकर (‘पद्मपत्रमिवाम्भसा’) लोकसंग्रहार्थ ये कार्य करते हैं। साधकोंके लिये तो इन्हें अपने मार्गके विघ्न समझकर इनसे दूर रहना ही श्रेयस्कर है।

पहले-पहले अच्छे साधक पुरुष नि:स्वार्थ दया या लोकहितके उद्देश्यसे ही इन कामोंमें पड़ते हैं; परन्तु पीछे जब इनका विस्तार होता है और राग-द्वेषमय जगत‍्से रात-दिनका सम्बन्ध दृढ़ हो जाता है, तब बहुत बुरी दशा होती है। जिस मोहको छोड़नेके लिये साधना आरम्भ की थी, वही दूसरे रूपमें उन्हें आ घेरता है। मोहकी प्रबलतासे सारी साधना छूट जाती है और वह विरक्त साधुको भी साधुके वेशमें ही पूरा प्रपंची बना देता है।

इसके सिवा एक बात और भी है। भगवत्प्राप्त पुरुष तो आलोचनासे परे हैं; परन्तु साधारण साधक जब उपदेशक, नेता, गुरु, आचार्य या पंच बन जाता है, तब वह अपनेको, अपने लक्ष्यको और अपनी स्थितिको प्राय: भूल-सा जाता है। वह जो कुछ कहता है दूसरोंके लिये ही कहता है; परिणाम यह होता है कि जिन दोषों और बुराइयोंसे बचनेका वह दूसरोंको उपदेश देता है; स्वयं उन्हींको आवश्यक और अनिवार्य समझकर अपनाये रखता है। उसका जीवन बहुत ही बाह्य बन जाता है। इसीके साथ-साथ उसमें पूजा-प्रतिष्ठा और मान-बड़ाईकी इच्छा प्रबलरूपसे जाग्रत् और विस्तृत होती है, जो उसे साधनपथसे सर्वथा गिरा देती है।

साथ ही साधकको बहुधन्धी भी नहीं होना चाहिये। इतना कार्य अपने पीछे कभी नहीं लगा रखना चाहिये, जिससे उसे भजन और ध्यान आदि आवश्यक साधनांगोंकी पूर्तिके लिये अवकाश ही न मिले। शास्त्रार्थ या विवादमें पड़ना भी साधकके लिये बहुत हानिकर है।

इसलिये मान-सम्मान, अभिमान-गर्व, पूजा-प्रतिष्ठा आदिसे तथा उपर्युक्त दोषोंसे बचनेके लिये साधकको जहाँतक हो सके, प्रसिद्धिके कार्योंसे सर्वथा अलग ही रहना चाहिये।

यह स्मरण रखना चाहिये कि ईश्वरकी दृष्टिमें जो उत्तम है, वही उत्तम है; क्योंकि उन्हींकी दृष्टि निर्दोष एवं सत्य है। मनुष्यके द्वारा उत्तम कहलानेसे कुछ भी नहीं बनता। भीतरकी न जाननेवाली जनता तो दम्भीकी भी प्रशंसा कर सकती है।

८—साधकको यह दृढ़ और अटूट विश्वास रखना चाहिये कि भगवान‍्के शरणागत, साधनमें लगे हुए सच्चे पुरुषके लिये भगवत्कृपाके बलसे लक्ष्यको प्राप्त करना जरा भी कठिन नहीं है। निराशाकी तो बात ही क्या, उसे कठिनता भी नहीं होती। भगवान् पर विश्वास करना सब सफलताओंकी एक कुंजी है। भगवान् या आत्माकी शक्ति अप्रतिहत और अमोघ है। जो इस शक्तिका आश्रय लेता है, वह सभी क्षेत्रोंमें निश्चय ही सफल होता है। कोई भी विघ्न ऐसा नहीं, जिसपर विजय पाना इसके लिये असम्भव हो।

हाँ, साधकको यह अवश्य ध्यानमें रखना चाहिये कि भ्रमसे, प्रमादसे और असावधानीसे कहीं वे भगवान‍्की इस अमोघ शक्तिके बदले शरीर और विषयजन्य आसुरी शक्तिका तो आश्रय नहीं ले रहे हैं। उनका मन उन्हें धोखेमें रखकर कहीं दुनियावी पदार्थों, मनुष्यों, साधनों और विचारोंका तो अवलम्बन नहीं पकड़ रहा है।

९—साधनामें सफलता प्राप्त करनेके लिये प्रतिदिन नियमित समयपर सर्वशक्तिमान् परम दयामय भगवान‍्से प्रार्थना करनी चाहिये। प्रार्थना अपनी भाषामें अपने भावोंके अनुसार की जा सकती है। प्रार्थनाका कैसा रूप होना चाहिये, इस विषयमें नमूनेके तौरपर पाठक-पाठिकाएँ नीचे लिखी पंक्तियोंको ध्यानमें रख सकते हैं—

‘हे प्रभो! मैं सब कुछ भूलकर केवल तुम्हें याद रख सकूँ, सब कुछ खोकर केवल तुम्हें पानेका प्रयत्न करूँ, मुझे ऐसा मन और ऐसी बुद्धि दो! हे अन्तर्यामी! मेरे मन-समुद्रमें जो-जो तरंगें उठती हैं, तुमसे एक भी छिपी नहीं है; प्रभो! इन सारी तरंगोंको मिटाकर इसे शान्त कर दो, इस समुद्रको क्षीरसागर बनाकर तुम स्वयं मेरी माता श्रीलक्ष्मीजीसहित इसमें विराजो अथवा इसको बिलकुल सुखा ही दो।’

‘हे महामहिम! मैं बड़ा ही मूढ़ हूँ; इसीसे तुम्हारे चरणोंकी ओर न झुककर, तुम्हारी अलौकिक अनूप रूपसुधाके लिये न तरसकर बुद्धिमान् और अनुभवी पुरुष जिन भोगोंको दु:खप्रद, अशान्तिप्रद और नरकप्रद बतलाते हैं, उन्हींके पीछे पागल हो रहा हूँ। इसका कारण यही है कि मैं मूर्ख तुम्हारी महान् महिमाको, तुम्हारे अनन्त गुणोंको, तुम्हारे परम तत्त्वको, तुम्हारे गूढ़तम रहस्यको नहीं जानता; जानूँ भी कैसे। मैं तो मूढ़ हूँ ही, बड़े-बड़े विद्वान् तथा तपस्वी, ज्ञानी और योगी भी तुम्हारे यथार्थ स्वरूपको नहीं पहचानते। तुम्हें वही पहचान सकते हैं, वही जान सकते हैं, जिनको कृपापूर्वक तुम अपनी पहचान बता देते हो, अपनी जानकारी करा देते हो; तो प्रभो! मुझपर भी कृपा करके अपनी पहचान मुझे करा दो न। तुम्हारी महान् महिमाके ज्ञानसे मेरी मूढ़ताको मिटते क्या देर लगेगी।’

‘सुना है तुम्हारी ओर आकर्षित हुए बिना, तुम्हें चाहे बिना तुम कृपा नहीं करते; तो क्या तुम्हारी कृपामें भी विषमता है? नहीं, नहीं! ऐसा नहीं हो सकता। तुम तो समताकी मूर्ति हो, तुम्हारे लिये अपना-पराया कोई नहीं; फिर क्या बात है जो मैं तुम्हारी कृपासे वंचित हूँ? महात्मालोग कहते हैं, प्रभुकी तो सभी जीवोंपर अपार कृपा है; परन्तु उस कृपाका लाभ उन्हींको होता है, जो उसे पहचानते हैं, उसका अनुभव करते हैं। ठीक है, यही बात होगी; पर मैं मूढ़ तुम्हारी उस अनन्त असीम सर्वत्रव्यापिनी कृपाको कैसे पहचानूँ, कैसे अनुभव करूँ? इसके लिये भी तुम्हींको कृपा करनी पड़ेगी, तुम्हीं अपनी इस महती कृपासे मुझे दर्शन करा दो; नहीं तो ऐसे अपने भक्त सन्तोंकी कृपा मुझे दिला दो, जो तुम्हारी परम कृपाको पहचान-जानकर उससे लाभ उठा रहे हैं। प्रभो! मेरी नीचताकी ओर न देखकर अपने विरुदकी ओर देखो!’

‘पर मैं मूढ़ सन्तोंको पाऊँ कहाँ? उन्हें पहचानूँ कैसे? यह काम भी तुम्हारी कृपाको ही करना पड़ेगा। मुझे सच्चे सन्तसे मिला दो और उसका परिचय भी करा दो, जिसके अनुग्रहसे मैं तुम्हारी कृपाको पहचान सकूँ, जिसके संगसे मेरे हृदयसे अज्ञानका परदा दूर हो जाय, जिसके सेवनसे मेरी मोहकी गाँठें टूट जायँ और जिसका हाथ पकड़कर मैं तुम्हारे चरणोंतक पहुँचकर तुम्हारी पावन चरण-धूलि प्राप्तकर अपनेको धन्य कर सकूँ।’

‘दयामय! मेरे नीच जीवनकी प्रत्येक बातका तुम्हें पता है; तुमसे क्योंकर छिपाऊँ, क्यों छिपाऊँ और क्या छिपाऊँ? लोग मुझे अच्छा समझते हैं; परन्तु मैं कैसा हूँ, इसको तुम तो भलीभाँति जानते हो! यह दम्भ तुम्हारे मिटाये ही मिटेगा और तुम्हीं इस नीच जीवनको पवित्र और दिव्य जीवन बना सकोगे। मैं नीच, दम्भी होनेपर भी जब तुम्हारा कहाने लगा हूँ, तब तुम कृपा करके मेरे दम्भ-पाखण्ड और काम-क्रोधको सर्वथा मिटाकर अपना क्यों नहीं बना लेते, मेरे नाथ? सदा न सही, कभी-कभी तो मेरा हृदय सचमुच ही तुम्हें चाहता है, तुम्हारा ही बनना चाहता है; फिर तुम क्यों नहीं मुझे अपनाते? सम्भव है मेरी इस चाहमें भी सचाई न हो, पूर्णता न हो, मन धोखा देता हो; पर इसके लिये मैं क्या करूँ, मेरे स्वामी! चाहको भी तुम्हीं अपनी सहज कृपासे सच्ची, पूर्ण और अनन्य बना लो!’

‘मनमोहन! मेरे मनको अपनी माधुरीसे मोह लो। मेरे मनमें जो मान, यश और विषय-सुखकी इच्छारूपी आग जल रही है, इसे तुम्हीं अपने कृपा-वारिसे बुझा दो। प्रभो! मैं केवल तुम्हींको चाहूँ, केवल तुम्हींको अपना सर्वस्व समझूँ, तुम्हीं मेरे प्राणाधार और प्राण हो—तुम्हीं मेरे आत्मा और परमात्मा हो, इस बातको जानकर मैं केवल तुम्हींसे प्रेम करूँ, तुम्हारे इस प्रेम-प्रवाहमें मेरा अपना माना हुआ धन-जन, मान-मोह, सब बह जाय। तुम्हारे प्रेमसागरमें सब कुछ डूब जाय। मैं केवल तुम्हारी ही झाँकी करता रहूँ—ऐसा सौभाग्य दे दो, मेरे प्रियतम!’

‘फिर सारे जगत‍्में मुझको तुम्हीं दिखायी पड़ने लगो, सारा जगत् तुम्हीं हो जाओ। मैं सबमें, सब ओर, सदा-सर्वदा तुम्हींको देखूँ, सब तुम्हारे ही स्वरूपमें परिणत हो जायँ। अहा! वह दिन कैसा सुदिन होगा, वह घड़ी कैसी शुभ घड़ी होगी, वह क्षण कैसा मधुर क्षण होगा और वह स्थिति कैसी आनन्दमयी होगी, तब ऐसा हो जायगा। तब इस जगत‍्में मेरे लिये कोई पराया नहीं रहेगा; तब मेरे मनके राग-द्वेष, वैर-विरोध, सुख-दु:ख आदि सारे द्वन्द्व मिट जायँगे और मुझे सब ओर विशुद्ध प्रेम, सब ओर अपार आनन्द, सब ओर अनन्त शान्ति और सब ओर सौन्दर्य-माधुर्यभरी तुम्हारी मनमोहिनी मूर्ति दिखायी देगी। मेरी साधना सफल हो जायगी, मैं निहाल हो जाऊँगा; क्योंकि उस समय मैं और तुम—बस, हम दो ही रह जायँगे। मैं तुम्हारी मनमानी सेवा करूँगा और तुम उस सेवाको स्वीकारकर मेरी सेवा करोगे! सभी बातें मेरे मनकी होंगी। नहीं, तब मेरा मन भी तो मेरा नहीं रहेगा, वह तो तुम्हारे ही मनकी छाया बन जायगा; अत: सब तुम्हारे ही मनकी होगी। तुम जबतक अपने महान् संकल्पसे मुझे यों अलग रखकर मुझसे खेलोगे, तबतक मैं परम धन्य और परम सुखी बना तुम्हारे साथ तुम्हारी रुचिके अनुसार खेलता रहूँगा और तुम जिस क्षण अपने संकल्पको छोड़कर अपने उस खेलको समेटकर मुझे आलिंगन करना चाहोगे, उसी क्षण मैं तुम्हारे विशाल हृदयमें समा जाऊँगा। यह खेल भी कैसा मधुर होगा, मेरे मधुरिमामय मोहन! मेरा यह सुख-स्वप्न सच्चा कर दो, मेरे सनातन स्वामी!’

‘जबतक ऐसा न हो, तबतक इतना तो हो ही जाय—

(१) मैं एक क्षण भी तुम्हारे पवित्र स्वरूप और मधुर नामको न भूलूँ।

(२) जगत‍्में किसी भी प्राणीका मेरे द्वारा किसी भी रूपमें अहित न हो, मैं सभीका हित चाहूँ और हित करूँ।

(३) विषय-सुख, धन-सम्पत्ति, मान-यशकी इच्छा कभी मनमें न पैदा हो।

(४) जीवनका प्रत्येक क्षण तुम्हारे स्मरणसहित तुम्हारी सेवामें बीते, जगत‍्के सभी जीवोंकी मैं तुम्हारे नाते सदा विनम्र-भावसे सेवा करता रहूँ।

(५) मेरा तन-मन सदा पवित्र रहे, एक भी बुरा कार्य शरीरसे न हो, एक भी बुरा विचार मनमें न आने पाये।

(६) जीवनका लक्ष्य केवल तुम्हींको पाना हो।

(७) तुम्हारे प्रत्येक विधानमें मुझे सन्तोष रहे और सांसारिक दृष्टिमें मैं भयानक-से-भयानक दु:खमयी स्थितिमें भी कृतज्ञ हृदयसे तुम्हारा स्मरण करूँ और अपार आनन्दका अनुभव करूँ।

(८) तुम्हारे लिये मैं बड़े ही सुखसे, अपार उल्लाससे मान और प्राणोंका त्याग करनेको तैयार रहूँ और करूँ।

(९) इन्द्रियाँ और मन पूर्णरूपसे संयत रहें और उनसे सदा तुम्हारी सेवा होती रहे।

(१०) मेरी अपनी वासना, कामना, इच्छा—कुछ भी न रहे। मोक्षकी भी नहीं। मैं तो बस, तुम खिलाड़ीके हाथका खिलौना बना रहूँ। यन्त्रकी पुतलीकी भाँति तुम्हारे नचाये नाचूँ, उठाये उठूँ, बैठाये बैठूँ, सुलाये सोऊँ, रुलाये रोऊँ, हँसाये हँसूँ, जिलाये जीऊँ और मारे मर जाऊँ। मैं अपने मनसे कुछ भी न करूँ, मेरा अपना मन ही न रहे। तुम जो कुछ कराना चाहो, वही मेरे द्वारा बिना बाधा और बिना संकोच होता दिखलायी दे। मेरे लिये सुख-दु:ख, मानापमान, हानि-लाभ—सब समान हो जायँ।

(११) परन्तु हे मेरे परम सुहृद्! मैं जो प्रार्थना करके तुमसे कुछ चाहता हूँ, यह भी तो मेरी मूढ़ता ही है। तुम तो सब जानते ही हो और परम सुहृद् होनेके कारण मेरे बिना ही कहे तुम सदा मेरा अशेष कल्याण ही करते हो। मेरे कल्याणकी जितनी चिन्ता तुमको है, उतनी मुझको तो कभी हो ही नहीं सकती। मैं इस बातको यथार्थत: जान लेता तो फिर क्यों तुमसे कुछ माँगकर अपना अविश्वास प्रकट करता? फिर तो मैं तुम्हारा प्रेमपूर्वक अनन्यचिन्तन ही करता; तुम कल्याणमय जो कुछ भी करते, उसमें मेरा परम कल्याण ही तो होता। अनुभवी भक्त कहा करते हैं कि तुम्हारी अपार अहैतुकी नित्य दयाका रहस्य न जाननेके कारण ही मनुष्य तुमसे दयाकी भीख माँगता है—तुम्हारे सहज कल्याणकारी परम सुहृद्-स्वरूपपर विश्वास न होनेके कारण वह तुमसे भोग-सुख और मुक्तिके आनन्दकी कामना करता है। तुम्हारे प्रति पूरा भरोसा न होनेके कारण ही साधक अपनी पारमार्थिक माँग तुम्हारे सामने रखता है। हे प्रभो! मेरे इस अज्ञान और अविश्वासका, मेरी इस अश्रद्धा और अनास्थाका नाश कर दो—जिससे मैं केवल तुम्हारे चिन्तनपरायण ही हो रहूँ। तुम्हारे चिन्तनको छोड़कर मुझे अन्य किसी वस्तुकी आवश्यकता ही न हो—स्मृति ही न हो!’

इन भावोंकी प्रार्थना साधकको सच्चे हृदयसे श्रद्धा-विश्वासके साथ प्रतिदिन एकान्तमें करनी चाहिये।

(१०) साधकको सदा आत्मनिरीक्षण करते रहना चाहिये। चित्तमें बुरे और अपवित्र विचारोंका अभाव और विषयचिन्तनमें क्रमश: कमी होने लगे; भगवान‍्में अहैतुकी प्रीति, निष्कामभाव, शान्ति, एकाग्रता, आनन्द, सन्तोष, समता, प्रेम आदि गुणोंका प्रादुर्भाव होने लगे तो समझना चाहिये कि उन्नति हो रही है। जबतक ऐसा न हो, तबतक यही मानना चाहिये कि अभी यथार्थ साधनाके सत्य पथपर चलना आरम्भ नहीं हुआ है। यह याद रखना चाहिये कि असत् विचार ही पारमार्थिक अवनतिका और सत् विचार ही पारमार्थिक उन्नतिका प्रधान कारण है। पुराने असत् विचार नष्ट हों, नये न पैदा हों—इसके लिये सावधानीके साथ असत्-संगका सब प्रकारसे त्याग करना चाहिये और सत् विचारोंकी जागृति, उत्पत्ति और वृद्धिके लिये सत्संग, सत् -ग्रन्थोंका स्वाध्याय, सत्-चर्चा, सदाचारका पालन, सत्-कर्म आदि उपाय करने चाहिये। असत् विचारोंके और असत् कर्मोंके बढ़नेमें प्रधान कारण विषयचिन्तन है। अतएव जहाँतक बन सके, विषयचिन्तनको चित्तसे हटानेकी साधकको भरपूर चेष्टा करनी चाहिये। चित्त जितना-जितना ही विषयचिन्तनसे रहित होगा और भगवच्चिन्तनमें लगेगा, उतना-उतना ही साधक परमार्थके पावन पथपर अग्रसर होता रहेगा।

११—चित्तको प्रशान्त और भगवदभिमुखी बनानेके लिये प्रतिदिन कुछ समयतक नियमपूर्वक भगवान‍्का ध्यान अवश्य करना चाहिये।

पहले ध्येय वस्तुका स्वरूप निश्चय कर लें, इसीको धारणा कहते हैं; फिर उस ध्येयस्वरूपमें चित्तको एकाग्र करके उसीमें चित्तनिरोध करनेकी चेष्टा करें।

ध्येयस्वरूप अपनी-अपनी रुचिके अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकारके हो सकते हैं। यहाँ ध्यानकी सुगमताके लिये कुछ ध्येयस्वरूप लिखे जाते हैं। वस्तुत: ध्येयस्वरूप एक ही परमात्माके हैं। एक ही परमात्माके अनेक लीलास्वरूप हैं। इनमें छोटे-बड़े या शुद्ध-अशुद्धकी कल्पना अपना अपराध है। अपनी-अपनी रुचिके अनुसार जिनका मन जिस स्वरूपमें लगे, उनको उसी स्वरूपका ध्यान करना चाहिये।

(१) एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही समस्त विश्वमें व्याप्त हैं, यह सारा विश्व भी उन्हींमें है—यह निश्चय करके विचारके द्वारा अपने ‘अहं’ को इस व्यष्टि शरीरसे अलग करके विश्वात्मा समष्टिमें उसकी स्थापना कर दे और फिर विचारके द्वारा समष्टिकी व्यापक दृष्टिसे देखे कि समस्त विश्व एक मुझमें ही बसा हुआ है; जितने भी जड-चेतन जीव हैं, सब मुझमें हैं और मैं समानरूपसे उन सबमें व्याप्त हूँ। जगत् मुझमें कल्पित है, केवल यह द्रष्टा आत्मा ही सत्य है। कल्पना कीजिये कि जैसे एक छोटे कमरेका आकाश जब सर्वव्यापी महान् आकाशके साथ अपनी अभिन्नताका अनुभव करता है, तब उसे यह मालूम होता है कि सब कमरे ही नहीं, समस्त देश एक मुझमें ही बसे हुए हैं और सब कमरोंमें—छोटी-से-छोटी कोठरीमें भी मैं ही व्याप्त हूँ। वैसे ही समस्त जगत‍्में एकमात्र अपने आत्माका ही विस्तार देखे। यद्यपि आकाशका उदाहरण सच्चिदानन्दघन परमात्माके लिये ठीक बैठता नहीं; क्योंकि आकाश पंच महाभूतोंमें एक भूत है; वह प्रकृतिका कार्य है, परिच्छिन्न है, सीमित है, जड है और विनाशी है। परमात्मा सभी बातोंमें आकाशसे अत्यन्त विलक्षण हैं। परन्तु पांचभौतिक सृष्टिमें सबकी अपेक्षा अधिक विस्तृत और महान् आकाश ही है, अतएव समझनेके लिये आकाशका ही उदाहरण ठीक माना जाता है।

फिर द्रष्टारूप इस समष्टि आत्मामें दीखनेवाले इस जगद्रूप कल्पित दृश्यका भी अभाव कर दे। एक परमात्माके अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं; जगत् नहीं, जगत‍्को विषय करनेवाली इन्द्रियाँ नहीं, मन नहीं, चित्त नहीं, बुद्धि नहीं, अहंकार नहीं, बस, एकमात्र परमात्मा ही हैं। उन परमात्माका बोध भी परमात्माको ही है। वे परमात्मा सत्स्वरूप हैं, चेतनस्वरूप हैं, आनन्दस्वरूप हैं। वे सत् , चित् और आनन्दसे अभिन्न हैं और उनकी इतनी घनता है कि अन्य किसीके लिये वहाँ तनिक भी गुंजाइश ही नहीं है। इस प्रकार करते-करते मन-बुद्धि आदि सहित समस्त दृश्योंको और दृश्योंके साथ ही इन दृश्योंके देखनेवाले द्रष्टाकी कल्पनाको भी छोड़ दे; क्योंकि द्रष्टा पुरुषकी सिद्धि वहीं होती है, जहाँ अभावरूप या भावरूप कोई दृश्य होता है; जहाँ दृश्यका सर्वथा अभाव है, वहाँ पुरुष द्रष्टा नहीं है। वहाँ जो कुछ है, वह अचिन्त्य है, अनिर्वचनीय है। इस प्रकार जबतक वृत्ति इस सच्चिदानन्दघन अचिन्त्य ब्रह्ममें (शून्यमें नहीं) तदाकार हुई रहे, तबतक अचिन्त्यका ध्यान करे; जब इससे वृत्ति हटे, तब फिर द्रष्टा—समष्टि सच्चिदानन्दघन बन जाय। इस प्रकार निराकार व्यापक परमात्माका और अचिन्त्य ब्रह्मका ध्यान किया जा सकता है।

(२) सारा संसार परमात्मासे भरा है, यहाँ जो कुछ भी दीखता है, सब परमात्माका ही विस्तार है—इस प्रकारकी भावना इस जगत‍्के तीनों लोकोंके पदार्थोंमें करे। जो कुछ भी वस्तु देखने-सुननेमें आती है, वह परमात्माका स्वाँग है; परमात्मा ही उन वस्तुओंके रूपमें प्रकाशित है। जैसे एक ही स्वर्ण भिन्न-भिन्न गहनोंके रूपमें प्रकट है, जैसे एक ही मिट्टी नाना प्रकारके बर्तनोंके रूपमें व्यक्त हो रही है, वैसे ही सारा संसार एक ही परमात्मासे पूर्ण है। सोना और मिट्टी तो केवल उपादानकारण हैं, उनके गहने और बर्तन बनानेवाले सुनार और कुम्हाररूप निमित्तकारण दूसरे हैं; परन्तु परमात्मा तो जगत‍्के अभिन्न-निमित्तोपादानकारण हैं। स्वयं ही बने हैं और अपने-आपसे ही बने हैं। भगवान‍्ने स्वयं कहा है—

मत्त: परतरं नान्यत् किंचिदस्ति धनंजय।

मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥

(गीता ७।७)

‘हे धनंजय! मेरे सिवा जगत‍्में और कुछ भी नहीं है, यह सारा जगत् सूतमें सूतके मणियोंकी भाँति मुझमें गुँथा हुआ है।’

यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन।

न तदस्ति विना यत् स्यान्मया भूतं चराचरम्॥

(गीता १०।३९)

‘हे अर्जुन! सब भूतोंकी उत्पत्तिका मूल कारण (बीज) भी मैं ही हूँ। ऐसा कोई भी चराचर प्राणी नहीं है, जो मेरे बिनाका हो। तात्पर्य यह कि सब मेरा ही स्वरूप है।’

योगीश्वर महात्मा कविने कहा है—

खं वायुमग्निं सलिलं महीं च

ज्योतींषि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन्।

सरित्समुद्रांश्च हरे: शरीरं

यत् किंच भूतं प्रणमेदनन्य:॥

(श्रीमद्भा० ११।२।४१)

‘वे (प्रेमी भक्तगण) आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, नक्षत्र, चराचर जीव, दिशाएँ, वृक्ष-लतादि, नदियाँ, समुद्र—यहाँतक कि प्राणिमात्रको भगवान् हरिका शरीर समझकर सबको प्रणाम करते हैं। वे श्रीहरिसे भिन्न कुछ भी नहीं देखते।’

इस प्रकार समस्त चराचरमें भगवान‍्को देखे। जिधर जिस वस्तुमें मन जाय, वहीं वह वस्तु भगवान् ही हैं—ऐसी निश्चित दृढ़ धारणासे विश्वरूप भगवान‍्का ध्यान किया जा सकता है।

भगवान् विष्णुका ध्यान

(१)

प्रात:कालका समय है। सुन्दर, सुरम्य गंगाजीका पवित्र तट है। भगवान् श्रीविष्णु आकाशमें भूमिसे लगभग तीन हाथ ऊपर खिले हुए सहस्रदल लाल कमलपर खड़े हैं। उनके चारों ओर करोड़ों सूर्योंका प्रकाश छा रहा है; परन्तु साथ ही वह करोड़ों चन्द्रमाओंके समान शीतल और शान्तिप्रद है। भगवान‍्का रूप परम शान्त और अत्यन्त दर्शनीय है। भगवान‍्की किशोर अवस्था है। भगवान‍्का नीलकमलके समान दिव्य श्याम शरीर है। भगवान‍्के चरणतलोंमें ऐश्वर्यसूचक वज्र, अंकुश, ध्वजा, कमल आदिके चिह्न हैं। भगवान‍्के चरणोंकी मनोहर अँगुलियोंमें स्थित उभरे हुए उज्ज्वल अरुणवर्ण परम शोभायमान दसों नखरूपी चन्द्रमाओंकी दिव्य कान्ति भक्तोंके हृदयका अज्ञानान्धकार दूर कर रही है। जिनके धोवनके जलसे बनी हुई परम पवित्र पतितपावनी गंगाजीको सिरपर धारणकर श्रीशिवजी परम कल्याणरूप—यथार्थ शिव हो गये और जो ध्यान करनेवालोंके पापरूपी पहाड़ोंको विदीर्ण करनेके लिये वज्रके समान हैं, वे कमलपत्र-जैसे कोमल और प्रकाशमान् भगवान‍्के चरणकमल बड़े ही मनोहर हैं। भगवान‍्के चरणोंमें सुन्दर नूपुर सुशोभित हो रहे हैं। कमलनयना श्रीलक्ष्मीजी सदा अपनी ऊरुओंपर धारण करके अपने कोमल करकमलोंसे जिनका लालन करती हैं, जन्म-मरणके भयका नाश करनेवाले भगवान‍्के वे दोनों जानु (घुटने) परम सुन्दर हैं। भक्तराज गरुड़जी जिनको बड़े आदर और यत्नसे अपने कन्धोंपर धारण करनेमें अपना परम सौभाग्य मानते हैं, वे अलसीके पुष्पोंके समान सुहावनी श्यामवर्ण, नीलमणिके समान चमकदार और नीलकमलके समान कोमल भगवान‍्की जंघाएँ परम मनोहर हैं, जो स्वाभाविक ही कमरमें कसे हुए कमलपुष्पके परागके समान पीतवर्णके दिव्य रेशमी वस्त्रसे ढकी हुई हैं। वह पीतपट अपनी उज्ज्वल आभाके साथ ही कटितटपर शोभायमान सुन्दर दिव्य रत्न-जटित करधनीकी दिव्य प्रकाशमयी कान्तिसे विशेषरूपसे प्रकाशित हो रहा है। जिससे उत्पन्न हुए सर्वलोकमय कमलकोषसे आत्मयोनि श्रीब्रह्माजी प्रकट हुए और जो भुवनकोषके स्थानस्वरूप भगवान‍्के दिव्य उदरमें स्थित है, वह भगवान‍्की गम्भीर घुमावसे युक्त नाभि अत्यन्त ही सुन्दर है। वह नाभि जब श्वासके चढ़ने-उतरनेसे फड़कती है, तब ऐसा लगता है मानों जो विश्व नाभिसे निकला, वह पुन: उसीमें समा रहा है। भगवान‍्का वक्ष:स्थल बहुत चौड़ा और अत्यन्त चमकदार है, जो दिव्य रत्नहारोंकी कान्तिमयी किरणोंसे और भी प्रकाशित हो रहा है। भगवान‍्के हृदयपर परम कान्तिमय विशद हार विहार कर रहा है। लक्ष्मीजीकी स्वर्णवर्ण मनोहर कान्तिसे आलोकित भगवान‍्का सुन्दर श्याम वक्ष:स्थल दर्शन करनेवाले पुरुषोंके मनको प्रसन्न और नयनोंको आनन्दित करता है। भगवान‍्का मनोहर कण्ठ आत्मतत्त्वमयी निर्मल कौस्तुभमणिकी सिंहके कन्धेपर रहनेवाली केसरकी-सी कान्तिसे सुशोभित है। गलेमें तुलसीमंजरीसे युक्त रमणीय दिव्य पुष्पमालाएँ घुटनोंतक लटक रही हैं, इन पुष्पमालाओंके दिव्य पुष्पोंकी मधुर सुगन्ध चारों ओर फैलकर सबको सुखी कर रही है। मन्दरगिरिका मन्थन करनेवाली भगवान‍्की जानुपर्यन्त लम्बी सुन्दर चार भुजाएँ हैं। उन भुजाओंमें अत्यन्त उज्ज्वल रत्नोंके बाजूबन्द और मणिमय कंकण सुशोभित हैं। ऊपरकी भुजाओंमेंसे दाहिनीमें उज्ज्वल प्रकाशकी नीलाभायुक्त किरणोंसे झलमलाता हुआ सहस्र अरोंसे युक्त असह्यतेज सुदर्शन चक्र है, बायींमें दिव्य श्वेत शंख है; नीचेकी दाहिनी भुजामें भगवान‍्की प्यारी कौमोदकी गदा है और बायींमें सुन्दर हलके रक्त-वर्णका कमल विराजमान है। भगवान‍्का मुनिमन-मोहन प्रसन्न मुखारविन्द अत्यन्त ही सुन्दर है। कानोंमें हिलते हुए मणिमय मंजुल मकराकृति कुण्डलोंकी दिव्य स्वर्णवर्ण झलकसे भगवान‍्के नीलश्याम तेजोमय अनमोल गोल कपोल परम मनोहर छवि धारण कर रहे हैं। भगवान‍्की सुन्दर नुकीली नासिका नासामणिकी शोभासे सुशोभित है। कुन्दकली-जैसी सूक्ष्म दन्तपंक्तिके एक-एक दाँतसे श्वेत तेज निकल रहा है, जो अधर और होठकी रक्तवर्ण आभाके साथ मिलकर अत्यन्त ही सुन्दर दिखायी दे रहा है। परम उदार भगवान‍्की मन्द-मन्द मुसकान जीवके अनादिकालीन शोकका सर्वथा नाश करती है। कमलकुसुमके समान अरुणवर्ण दोनों नेत्र मीनके समान सुशोभित हैं, जिनकी कोरोंसे दया, प्रेम, आनन्द और शान्तिका नित्य विकास हो रहा है। भगवान‍्की सुस्निग्ध हास्ययुक्त चितवन घोर त्रयतापको हरकर परमानन्द दे रही है। भगवान‍्की टेढ़ी भ्रुकुटीकी सुन्दरता बरबस मनको हर रही है। भगवान‍्के विशाल ललाटपर दिव्य रक्त कुंकुमका ऊर्ध्वपुण्ड्र शोभा पा रहा है। भगवान‍्के सिरपर काली-काली घुँघराली अलकोंकी अपूर्व शोभा है। सिरपर रत्नजटित परम प्रकाशमय किरीट-मुकुट शोभा पा रहा है। भगवान‍्के सब अंगोंसे—रोम-रोमसे एक दिव्य तेज निकल रहा है और भगवान‍्की परम अलौकिक अंग-गन्धसे सारा आकाश भरा है। भगवान‍्के मुखमण्डलके चारों ओर एक विशेष तेजोमण्डल है।

(२)

क्षीरसागरके अन्दर एक ऐसा सुरम्य स्थान है—जहाँ ऊपर-नीचे, आस-पास तो क्षीर-जल है, बीचमें एक महान् प्रकाश छाया हुआ है। वहाँ भगवान् शेषजी विराजमान हैं। शेषभगवान‍्के मनोहर एक हजार सिर हैं, हजार फनोंके ऊपर हजार मणिमय मुकुट हैं और उनके कमलनालके समान चिकने सफेद रंगके शरीरपर नील वस्त्र शोभित हो रहा है। ऐसे शेषजीकी गोदमें भगवान् विष्णु आधे लेटे हुए विराजमान हैं। आपके सिरपर शेषजीके हजार फनोंका छत्र हो रहा है। भगवान‍्के शरीरका सुन्दर नील आभायुक्त श्यामवर्ण है। भगवान‍्के दोनों चरण-कमल किंचित् उन्नत हैं। चरणोंकी मनोहर अँगुलियाँ अरुणवर्णके नखोंकी किरण-कान्तिसे सुशोभित हो रही हैं। आपके चरणोंमें नूपुर हैं। आपके दोनों ऊरु हाथीकी सूँड-जैसे हैं, परन्तु अत्यन्त कोमल और उज्ज्वल हैं। दोनों जानु परम मनोहर हैं। सुन्दर कटितटपर स्वर्ण-रत्नजटित करधनी है। गम्भीर नाभि है, उदर त्रिवलीसे युक्त है और उसका आकार पीपलके पत्तेके समान है। विशाल वक्ष:स्थलमें श्रीवत्स और प्रभाशाली कौस्तुभ विराजमान हैं। कण्ठ शंखके समान सुन्दर है। गलेमें दिव्य पुष्पमाला मणिमय रत्नहार हैं। कन्धेपर ब्रह्मसूत्र है। भगवान‍्की चारों भुजाएँ घुटनोंतक लम्बी और विशाल हैं। चारों भुजाओंमें शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित हैं; भुजाओंमें बाजूबन्द और कंकण सुशोभित हो रहे हैं। भगवान‍्के दोनों कन्धे ऊँचे हैं और वे कौस्तुभमणिकी प्रभासे प्रकाशित हो रहे हैं। भगवान‍्का प्रसन्न मुख परम सुन्दर है, भगवान‍्की हास्ययुक्त चितवन बड़ी ही मनोहर है। भौंहें ऊँची और सुन्दर हैं। भगवान‍्के सुन्दर गोल कपोल और अरुण अधर देखने ही योग्य हैं। भगवान‍्की दन्तपंक्तियाँ परम मनोहर और प्रकाशयुक्त हैं। भगवान‍्के कानोंमें मकराकृति सुन्दर कुण्डल हैं। भगवान‍्का ललाट परम प्रकाशमय और विशाल है। ललाटपर मनोहर तिलक है। भगवान‍्के घुँघराले बाल परम सुन्दर हैं। मस्तकपर मणिमण्डित किरीट है। निर्मल चित्तवाले सुनन्द, नन्द, सनक आदि पार्षद; ब्रह्मा, रुद्र आदि देव; मरीचि आदि ऋषि; प्रह्लाद, नारद, भीष्म आदि भक्तजन स्तुतियाँ कर रहे हैं। श्री, पुष्टि, वाणी, कान्ति, कीर्ति, तुष्टि, इला, ऊर्जा, विद्या आदि शक्तियाँ भगवान‍्की सेवा कर रही हैं। श्रीलक्ष्मीजी भगवान‍्के चरण दबा रही हैं। भगवान‍्की मूर्ति परम शान्त, परम तेजोमय और परम सुन्दर है।

ऊपर भगवान् विष्णुके दो स्वरूपोंके ध्यान लिखे गये हैं। और भी अनेक प्रकारके ध्येयस्वरूप हैं। साधकको उपर्युक्त ध्येयस्वरूप भगवान‍्के एक-एक अंगका ध्यान करके उनका विधिवत् मानस-पूजन करना चाहिये और ऐसा दृढ़ अनुभव करना चाहिये कि मानों श्रीभगवान् प्रसन्न होकर अपने चरणोंमें मुझे स्थान दे रहे हैं और भगवान‍्की कृपासे मैं समस्त पाप-तापोंसे मुक्त होकर परम कल्याणको प्राप्त हो गया हूँ।

भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान

(१)

सन्ध्याका समय है, सूर्य देवता अस्ताचलको जा रहे हैं, गौएँ और बछड़े वनसे लौट रहे हैं। भगवान‍्के लौटनेका समय जानकर प्रेममूर्ति गोपियाँ अपने-अपने घरोंसे बाहर निकलकर भगवान‍्की प्रतीक्षामें खड़ी हैं, दूरसे भगवान‍्की वंशीध्वनि सुनायी दे रही है, बड़ी ही आतुरताके साथ वे तन-मनकी सुध भूलकर व्याकुल हुई भगवान‍्के आनेकी बाट देख रही हैं। दर्शनकी लालसाने उनके नेत्रोंको पलकहीन, चित्तको समस्त संसारी वासनाओंसे शून्य और हृदयको प्रेमसे परिपूर्ण कर दिया है। इतनेमें ही भगवान् श्रीकृष्ण बछड़ोंके दलके साथ मुरली बजाते हुए पधारते हैं। भगवान् श्रीकृष्णके रोम-रोमसे अतुलित मनोहर प्रकाश निकल रहा है, उनके अंगकी दिव्य गन्ध सब ओर फैल रही है। भगवान‍्का कृष्ण आभायुक्त नील-नीरदवर्ण श्याम शरीर है; चरणोंसे लेकर शिखापर्यन्त प्रत्येक अंगसे सौन्दर्य-सूर्यकी मनोहर किरणें निकल रही हैं। जिस अंगकी ओर दृष्टि जाती है, नेत्र वहीं अटक जाते हैं। भगवान‍्की आयु लगभग सात वर्षकी है, परन्तु वे किशोर-अवस्थाके जान पड़ते हैं। उनके चरणकमल बड़े ही सुन्दर हैं। भगवान् श्रीकृष्ण मधुर मुरली बजाते और सुन्दर तालके अनुसार थिरक-थिरककर नाचते हुए बड़ी मनोहर चालसे चले आ रहे हैं। नाचनेमें उनके जब चरण उठते हैं, तब चरणोंके मनोहर नील-श्यामवर्ण तेज:पुंजपर चरणतलोंका अरुणवर्ण प्रकाश पड़नेसे नील और अरुण प्रकाशोंका मिश्रण एक महान् रमणीय प्रकाशके रूपमें एक अनोखी छवि दिखला रहा है। उसपर चरण-नखोंकी अपूर्व श्वेतप्रकाशमयी अरुण आभा पड़ रही है। भगवान‍्के जानु परम सुन्दर हैं। कटितटपर पीताम्बरकी काछनी काछी है। चरणोंमें नूपुरका शब्द हो रहा है। भगवान‍्के गलेकी दिव्य वनमालाएँ, रत्नहार और गुंजाकी माला नाचनेमें इधर-उधर डुलकर परम शोभाको प्राप्त हो रही है। मनोहर गोल कपोलोंपर काली-काली अलकावली बिखर रही है। भगवान् एक हाथसे मुरलीको अधरोंपर लगाये, दूसरे हाथकी अँगुलियोंसे मुरलीके रन्ध्रोंमें सुर भर रहे हैं। मुरलीके सुरोंके साथ भगवान‍्के नृत्यकी ताल बराबर मिल रही है। पृथ्वीपर टिके हुए चरणोंसे ब्रजवीथिकी धूलिमें उनके वज्र, अंकुश, ध्वजा आदि चिह्न अंकित हो रहे हैं। भगवान‍्के नील-श्याम शरीरपर दिव्य सुवर्णवर्ण पीतपट ऐसा मालूम होता है मानों श्याम घन-घटामें इन्द्रधनुषका मण्डल शोभायमान हो; भगवान‍्के कानोंमें सुन्दर दिव्य-कान्ति रत्नोंके कुण्डल हैं, उनमें भगवान‍्ने रक्तकमलके छोटे-छोटे फूल खोंस रखे हैं। नाचनेमें जब कुण्डल हिलते हैं, तब उन कुण्डलोंका उज्ज्वल प्रकाश रक्तकमलोंपर पड़ता है, जिससे एक अपूर्व शोभा हो रही है। भगवान‍्के प्रकाशमय चपल नेत्रोंसे प्रेम और माधुर्यकी परम शान्तिमयी और आनन्दमयी ज्योति निकल रही है, जो मुनियोंके चित्तको भी बलात् आकर्षित कर लेती है। भगवान‍्की टेढ़ी भौंहें देखनेवालोंके चित्तको सदाके लिये हर लेती हैं। भगवान‍्का मुखमण्डल परम मनोहर है। अरुणवर्णके सुन्दर अधर और ओष्ठ हैं। मुरली बजाते हुए भगवान् जो मन्द-मन्द मधुर हँसी हँसते हैं और उस दुर्लभ हास्यछटाके साथ जब नेत्रोंकी प्रेम-कटाक्षमयी आकर्षणी शक्ति मिल जाती है, तब तो उसे देखकर बड़े-बड़े तपस्वियों, परम देवताओं और महान् संयमी ब्रह्मनिष्ठ ऋषियोंका चित्त भी चंचल हो उठता है। भगवान‍्का शंखके समान सुन्दर गला है। विचित्र-विचित्र धातुओंके विविध रंगों और कोमल नव-पल्लवोंसे सुसज्जित भगवान‍्का नटवर-वेश परम दर्शनीय है। भगवान‍्की भुजाओंमें स्वर्ण-रत्नमय बाजूबन्द और कंकण शोभायमान हैं। कटितटमें छोटी-छोटी स्वर्णघण्टियोंसे युक्त विद्युत्प्रभा-सी रत्नजटित करधनी है। भगवान‍्की नासिकाके अग्रभागमें सुन्दर गजमुक्ताकी लटकन अपूर्व कलासे नाच रही है। नयी बेंतका बना फूलोंसे गुँथा हुआ एक गोल चक्र भगवान‍्ने अपनी बायीं भुजामें डालकर कन्धेपर धारण कर रखा है। दाहिने कन्धेपर पीला प्रकाशमय दुपट्टा है, जिसके दोनों छोर आगे-पीछे दोनों ओरसे बायीं तरफको ले जाकर कमरके पास बाँधे हुए हैं। भगवान‍्के विशाल उज्ज्वल ललाटपर गोरोचनका ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक है, उसमें छोटी-छोटी मणियाँ चिपकायी हुई हैं। सिरपर काले-काले घुँघराले केश हैं। भगवान् मोरपंखोंका सुन्दर मुकुट धारण किये हुए हैं, जिसपर मोरपंखोंका चँदवा लगा है और आगे सुन्दर कलँगी लगी है। भगवान् चारों ओरसे विचित्र वेशधारी ग्वालबालकोंसे घिरे हुए हैं। सभी बालक परमानन्दमें मग्न हुए उछलते और नाचते-कूदते हुए चले आ रहे हैं और गोपियाँ भगवान‍्की इस छटाको देखकर प्रेम और आनन्दके सागरमें डूब रही हैं।

(२)

यमुनाजीका तट है, मनोहर वृक्षलताओं और सुगन्धित पुष्पोंसे वनकी शोभा बढ़ रही है, गौ और बछड़े इधर-उधर बिखरे हुए हरी घास चर रहे हैं। एक सुन्दर कदम्बके वृक्षतले मनोहर स्फटिकशिलापर भगवान् श्रीकृष्ण त्रिभंगी छटासे खड़े हैं। बायें चरणपर दाहिने चरणकी आँटी दिये हैं। दाहिना अरुण चरणतल वज्र, ध्वजा, अंकुश आदि चिह्नोंसे सुशोभित दिखायी दे रहा है। करोड़ों सूर्योंके समान भगवान‍्का तेज:पुंज दिव्य शरीर है और वह प्रकाश करोड़ों चन्द्रमाओंके समान शीतल है; भगवान‍्का सुन्दर कृष्णाभायुक्त नीलवर्ण है। भगवान‍्के मनोहर चरण हैं। चरणोंमें नूपुर शोभित हैं। भगवान‍्के दोनों जानु और जंघाओंकी शोभा अवर्णनीय है; भगवान‍्ने दिव्य रेशमी पीतवस्त्र धारण कर रखा है। कटितटमें सुन्दर रत्नोंकी करधनी है। भगवान‍्का त्रिवलीयुक्त परमोदार उदर और गम्भीर नाभि सुशोभित हैं, भगवान् कदम्बपुष्प और तुलसीसे युक्त दिव्य वनपुष्पोंकी माला धारण किये हैं। वक्ष:स्थलपर रत्न और मुक्ताओंके हार हैं। गलेमें गुंजाकी माला है। भगवान‍्के गलेमें पीला दुपट्टा है, जिसके दोनों छोर सामनेकी तरफ दोनों ओरको फहरा रहे हैं। भगवान‍्की नन्हीं-नन्हीं लम्बी भुजाओंमें बाजूबन्द और कड़े शोभित हैं। भगवान‍्का मुखकमल परम सुन्दर है। मन्द-मन्द मुसकराते हुए भगवान् मुरली बजा रहे हैं। भगवान‍्के कानोंमें दिव्य पुष्पोंके कुण्डल हैं। मस्तकपर रत्नोंका किरीटमुकुट है, जिसमें मयूरपिच्छ खोंसा हुआ है। भगवान‍्के सुन्दर घुँघराले बाल हैं। चारों ओर गोपालबाल खड़े हैं और भगवान‍्की ओर टकटकी लगाये देख रहे हैं, सभी प्रेममुग्ध और आनन्दमग्न हैं।

(३)

दिव्य द्वारकामें भगवान् श्रीकृष्ण किशोररूपमें सर्वरत्नोपशोभित रमणीय स्वर्णसिंहासनपर विराजमान हैं, भगवान‍्का दिव्य कृष्ण-आभायुक्त नीलिमामय श्यामवर्ण है। पूर्णचन्द्रके समान मुखमण्डल है। मस्तकपर मयूरपिच्छयुक्त मुकुट सुशोभित है। वनमाला धारण किये हुए हैं। कानोंमें रत्नोंके कुण्डल, भुजाओंमें बाजूबन्द और गलेमें रत्नहार है। वक्ष:स्थलपर श्रीवत्स और देदीप्यमान कौस्तुभमणि शोभित हैं। परम रमणीय लावण्ययुक्त कलेवर है, पीतवस्त्र धारण किये हैं, मन्द-मन्द मुसकरा रहे हैं, अरुणवर्ण अधरोंपर वंशी विराज रही है। त्रिभुवन-मोहिनी सर्ववेदमयी वेणुध्वनि हो रही है। भगवान‍्के चार भुजाएँ हैं, ऊपरके दोनों हाथोंमेंसे एकमें स्फटिकमयी अक्षमाला है और दूसरेसे अभयदान दे रहे हैं। नीचेके दोनों हाथोंसे मुरली बजा रहे हैं। कमल-सदृश सुन्दर और मोहन नेत्र हैं। अपने अद्वितीय सौन्दर्यसे विश्वको मोहित कर रहे हैं। स्वर्णकान्तिमयी कमला हाथोंमें मनोहर वीणा और कमल लिये भगवान‍्की बायीं ओर खड़ी उनके चरणोंमें दृष्टि जमाये हुए हैं। रुक्मिणी, सत्यभामा, कालिन्दी, जाम्बवती, नाग्नजिती, सुनन्दा, मित्रविन्दा, सुलक्षणा—पट्टरानियाँ भगवान‍्की सेवा कर रही हैं। सोलह हजार एक सौ रानियाँ भी भगवान‍्की सेवामें लगी हैं। भगवान‍्के मस्तकपर चन्द्रमण्डलसदृश श्वेतच्छत्र सुशोभित है। नारदादि मुनिगण तथा इन्द्रादि देवगण भगवान‍्को नमस्कार और उनका स्तवन कर रहे हैं।

(४)

परम दिव्य और रमणीय वृन्दावनमें सुन्दर कदम्ब-काननकी पवित्र स्वर्णभूमिमें सर्वविध रत्नोंसे निर्मित विचित्र मण्डपमें रसराज भगवान् श्रीकृष्ण महाभावस्वरूपा श्रीमती राधिकाजीके साथ मनोहर रत्न-सिंहासनपर विराजमान हैं। उनकी अंगप्रभा करोड़ों सूर्योंके समान अनुपम प्रकाशयुक्त और करोड़ों चन्द्रमाओंके समान शीतल है। भगवान् श्रीकृष्णका सुन्दर नव-नील नीरदके समान श्यामवर्ण है और श्रीराधिकाजीका स्वर्णाभायुक्त गौरवर्ण है। भगवान् पीताम्बर धारण किये हैं और श्रीमतीजी नीलाम्बर। दोनोंके शरीर दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हैं। भगवान् श्रीकृष्णका दक्षिण चरणकमल रत्नपूर्ण रत्नघटपर अधिष्ठित है और दूसरा वाम चरणकमल दिव्य रक्तकमलपर। इस प्रकार श्रीराधिकाजीका दक्षिण चरणकमल मुक्तापूर्ण स्वर्णघटपर है और वाम चरणकमल नीलकमलपर। हजारों गोपियाँ नाना प्रकारसे दोनोंकी परिचर्या कर रही हैं। भगवान् श्रीकृष्णके दक्षिण करकमलमें मुरली है और बायाँ करकमल श्रीराधिकाजीके कण्ठदेशपर स्थित है। श्रीराधिकाजीका दाहिना करकमल श्रीभगवान‍्के जानुपर रखा है और बायें हस्तकमलमें पुष्पोंका हार है। आस-पास रंग-बिरंगी अनेक गौएँ खड़ी हैं, जो भगवान‍्के मुखमण्डलकी ओर मुग्धदृष्टिसे देख रही हैं।

(५)

कुरुक्षेत्रका रणक्षेत्र है। सेनाएँ सुसज्जित खड़ी हैं। कौरवसेना पितामह भीष्मके सेनापतित्वमें व्यूहाकार खड़ी है और पाण्डवसेना धृष्टद्युम्नके सेनापतित्वमें व्यूहरचनायुक्त है। दोनों ओर बड़े-बड़े वीर हैं। पाण्डवोंकी सेनामें सबसे प्रमुख एक रथ है, रथके चार पहिये हैं, रथके अग्रभागमें एक लम्बी ध्वजा है, ध्वजापर श्रीहनुमान‍्जी विराज रहे हैं, रथमें सुन्दर चार सफेद घोड़े जुते हैं। अगले हिस्सेमें भगवान् चतुर्भुज श्रीकृष्ण बैठे हैं। उनके एक हाथमें घोड़ोंकी लगाम है, दूसरेमें सुन्दर चाबुक, तीसरेमें दिव्य पांचजन्य शंख है और चौथेसे अर्जुनको गीताका उपदेश करते हुए भाँति-भाँतिके संकेतोंसे समझा रहे हैं। भगवान‍्के तेज:पुंज नीलश्याम अंगकी आभा कवचको भेदकर बाहर निकल रही है। रथके पिछले हिस्सेमें कवच-कुण्डलधारी रणसज्जासे सुसज्जित अर्जुन उदास बैठे हैं, गाण्डीव धनुष बगलमें पड़ा है। तरकशोंका भाथा पीछे कन्धेपर है। मुँह उदास है और बड़ी ही उत्सुकतासे भगवान‍्के मुखमण्डलकी ओर देखते हुए वे ध्यानसे भगवान‍्की वाणी सुन रहे हैं। भगवान् मुसकराते हुए नाना प्रकारकी मुखाकृतिसे और दिव्य वाणीसे तथा हाथके संकेतसे अर्जुनको उपदेश कर रहे हैं। भगवान‍्के श्रीअंगसे दिव्य सुगन्ध निकल रही है। भगवान‍्के नयनकमलोंसे स्नेह, ज्ञान और प्रकाशकी मिश्रित धारा निकल रही है। भगवान‍्के गलेमें दिव्य रत्नहार है। मस्तकपर किरीट-मुकुट है, कानोंमें मकराकृति कुण्डल हैं। सिरपर घुँघराले काले बाल हैं। भगवान‍्की लगभग सोलह वर्षकी किशोर अवस्था है और अनुपम सौन्दर्य उनके रोम-रोमसे प्रस्फुटित हो रहा है।

उपर्युक्त पाँच प्रकारके श्रीकृष्णके ध्यानोंमेंसे अपनी-अपनी रुचिके अनुसार प्रेमपूर्वक भगवान‍्का नियमित ध्यान करके लाभ उठाना चाहिये।

भगवान् श्रीरामका ध्यान

(१)

अयोध्यापुरीमें महाराज दशरथजीका सुन्दर महल है, जो सोनेका बना हुआ है और बहुमूल्य मणियों तथा रत्नोंसे जड़ा है। उसके मनोहर चमकते हुए आँगनमें घुटनोंके बल चलनेवाले सच्चिदानन्दघन बालरूप श्रीरामजी विराजमान हैं। उनका नीलकमल, नीलमेघ और नीलकान्तमणिके समान सुन्दर, कोमल, सरस और प्रकाशमय श्यामवर्ण है, भगवान‍्का स्वरूप ऐसा सुन्दर है कि उनके एक-एक अंगपर करोड़ों कामदेवकी शोभा निछावर है। भगवान‍्के नेत्र नीलकमलके समान सुन्दर हैं, भगवान‍्की ठोड़ी और नासिका परम मनोहर हैं। लाल-लाल अधरोंके बीच सुन्दर दाँतोंकी पाँती अनुपम छवि दे रही हैं मानों अरुणकमलके बीच अत्यन्त शुभ्रवर्ण कुन्दकलीकी दो-दो पंक्तियाँ हों। हरित आभायुक्त नीलवर्णमें अरुण आभायुक्त भगवान‍्के प्रकाशमय कपोल बड़े ही सुन्दर लगते हैं। सुन्दर कानोंमें स्वर्ण और रत्नोंके कुण्डल सुशोभित हैं, मस्तकपर सुन्दर तिलक है, काली घुँघराली अलकावली है। विशाल वक्ष:स्थलपर मनोहर वनमाला और बघनखा सुशोभित हैं। शंखके समान तीन रेखावाले गलेमें रत्नोंके तथा मोतियोंके हार शोभा पा रहे हैं। सुन्दर करकमलोंमें कंकण धारण किये हुए हैं। पीली झगुली पहने हुए हैं। भगवान‍्के लाल-लाल चरणोंमें अंकुश, ध्वजा, कमल और वज्रके मनोहर चिह्न हैं तथा अत्यन्त मनोहर ध्वनि करनेवाले नूपुर शोभायमान हैं। भगवान‍्की कमरमें सुन्दर करधनी है। भगवान् शोभाके समुद्र हैं। भाइयोंके साथ खेल रहे हैं और दर्पणमें अपने प्रतिबिम्बको देख-देखकर प्रसन्न होते और किलकारी मारते हैं।

(२)

अयोध्यापुरीके परम सुन्दर राजदरबारमें सुन्दर स्वर्णसिंहासनपर भगवान् श्रीरामचन्द्रजी विराजमान हैं। उनका नीलमणि और तमालवृक्षके समान नेत्रोंको आनन्द देनेवाला सुन्दर श्यामवर्ण है। सुन्दरताकी सीमा हैं। करोड़ों कामदेवकी उपमा उनके सौन्दर्यसे नहीं दी जा सकती। भगवान् वाम चरणको सिंहासनपर मोड़े बैठे हैं और दाहिना चरण नीचे लटकता हुआ बहुत ही कोमल, दिव्य, गहरे लाल रंगके मखमली तकियेपर टिका है। भगवान‍्के अरुणाभ चरणतलके साथ मखमलके लाल रंगका अद‍्भुत मिश्रण हो रहा है। उसपर हरिताभ नीलवर्णकी मनहरनी प्रभा पड़ रही है। भगवान‍्के चरणतलमें वज्र, ध्वजा, अंकुश, कमल आदिके स्पष्ट चिह्न हैं। भगवान‍्के चरणोंमें रत्नजटित दिव्य नूपुर हैं। भगवान‍्के घुटने और जंघाएँ परम सुन्दर हैं। भगवान् कटितटपर सुन्दर दिव्य पीताम्बर धारण किये हैं, जो ऐसा मालूम होता है मानों मरकतमणिके ढेरपर बिजली अपने चंचल स्वभावको छोड़कर छा रही हो। पीत धोतीपर कटिमें पीत रंगका एक दुपट्टा कसा है, उसमें सुन्दर तरकश बँधा है। सुन्दर स्वर्णरत्नमयी करधनी है। भगवान‍्का उदार उदर तीन रेखाओंसे युक्त परम सुन्दर है। गम्भीर नाभि है। चौड़ी छातीपर भगवान् रत्नोंके और गजमुक्ताओंके हार धारण किये हुए हैं। शंखके जैसा सुन्दर गला है। गलेमें मणियोंकी, दिव्य वन-पुष्पोंकी और नवीन तुलसीदलकी लम्बी मालाएँ सुशोभित हैं। भगवान‍्के सिंहके-से विशाल और ऊँचे कन्धे हैं। अतुलित बलवाली भुजाओंमें भाँति-भाँतिके ज्योतिर्मय कंकण पहने हैं। हाथोंमें मनोहर धनुष-बाण लिये हैं। जनेऊकी अपूर्व शोभा है। जरीकी किनारी और छोरोंसे सुशोभित दुपट्टा भगवान‍्के अंगपर फहरा रहा है। भगवान‍्के मुखमण्डलकी अपूर्व छटा है। परम सुन्दर ठुड्डी है। लाल-लाल अधर-ओष्ठ हैं। भगवान् जब मुसकराते हैं, तब उनके शुभ्र सुन्दर दाँत ऐसे शोभित होते हैं मानो किसी अरुणवर्ण कमलकोशके भीतर बिजलीके रंगमें डुबोये हुए अति सुन्दर पद्मरागके शिखर विराजते हों। भगवान‍्के अरुणाभ गोल कपोल परम सुन्दर हैं, नासिकाकी नोक चित्तको चुरानेवाली है, नासाके बीचमें गजमुक्ताकी लटकन है। विशाल मनोहर कानोंमें स्वर्णरत्नमय मकराकृति कुण्डल हैं। भगवान‍्की बाँकी भ्रुकुटि है; शोभाशील, प्रेम और आनन्दके भण्डार अरुण कमलदलके समान उनके मनोहर नेत्र हैं, जिनसे कृपा और सुन्दरताकी आह्लादकारिणी और मोहिनी प्रकाशधारा बह रही है। भगवान‍्के विशाल प्रकाशमय मस्तकपर ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक सुशोभित है। सिरपर अत्यन्त रमणीय स्वर्ण-रत्नोंसे निर्मित तेज:पुंज परम सुन्दर मुकुट है। उसके नीचे काले घुँघराले घने केश हैं, जो कानोंतक विचित्र ढंगसे सँवारे हुए हैं। भगवान‍्के सारे शरीरपर चन्दनकी खोरी लगी है। भगवान‍्के अंग-प्रत्यंगोंमें करोड़ों कामदेवोंकी छवि छा रही है। अंगसे दिव्य सुगन्ध निकल रही है। भगवान‍्के वामभागमें जगज्जननी सीताजी विराजमान हैं, जो नीलवस्त्र तथा सब अंगोंमें परम उज्ज्वल आभूषण धारण किये हैं। श्रीलक्ष्मणजी, भरतजी और शत्रुघ्नजी चँवर, व्यजन और छत्रको लिये भगवान‍्की सेवामें खड़े हैं। श्रीचरणोंमें बैठे हुए महावीर हनुमान‍्जी भगवान‍्के नेत्रोंकी ओर अनिमेष दृष्टिसे देख रहे हैं और भगवान‍्के दाहिने चरणको दबा रहे हैं तथा मुनिमण्डली स्तुति कर रही है।

(३)

प्रात:कालका सुहावना समय है, वन और उपवनोंमें रंग-बिरंगे पुष्प खिल रहे हैं, बड़ी अच्छी मौसिम है। अयोध्यापुरीमें सरयूजीके पवित्र तटपर भगवान् श्रीरामजी अपने भाइयों तथा मित्रोंके साथ फाग खेल रहे हैं। भगवान् रामकी अनुपम छवि देखकर सबके हृदयमें प्रेम उमड़ रहा है। भगवान‍्का शरीर श्याम तमाल या नीलमेघके समान श्यामवर्ण है। भगवान‍्के चरणतल अरुणवर्ण हैं। उनका ऊपरका हिस्सा श्यामवर्ण है। नखोंकी कान्ति करोड़ों चन्द्रमाओंके प्रकाशके समान है। भगवान‍्के चरणतलमें कमल, वज्र, ध्वजा और अंकुशादिकी रेखाएँ सुशोभित हैं। चरणोंमें मनोहर नूपुर हैं, जो अपनी सुमधुर ध्वनिसे मुनियोंका मन मोह लेते हैं। सुन्दर जानु हैं; उनकी जंघाएँ मरकतमणिके खम्भोंके समान सुन्दर और चिकनी हैं। कटिप्रदेशमें अति निर्मल पीताम्बर है। उसपर सोनेकी बनी हुई मणिजटित करधनी मनोहर शब्द कर रही है। प्रभुके उदर-प्रदेशमें मनोहर त्रिवली और अति सुन्दर गम्भीर नाभि है। भगवान् मनोहर रत्नोंके हार धारण किये हुए हैं; वक्ष:स्थलमें भृगुलताका चिह्न उनकी ब्रह्मण्यता और क्षमाशीलताका परिचय दे रहा है। गलेमें सुगन्धित सुन्दर वनमाला है। विशाल भुजाओंमें कंकण और बाजूबन्द सुशोभित हैं। भुजाएँ स्थूल, जानुपर्यन्त लम्बी और अपार बलशालिनी हैं, जो सदा भक्तोंका भयभंजन करनेके लिये तैयार रहती हैं। भगवान‍्की ठुड्डी बड़ी ही मनोहर है। मनोहर अरुणवर्ण होठोंके बीचमें दाँतोंकी पंक्ति ऐसी जगमगा रही है मानो अरुण कमलके बीचमें गज-मुक्ताओंकी दो मनोहर पंक्तियाँ हों। भगवान‍्के कपोल बड़े सुन्दर हैं, कानोंमें रत्नजटित कुण्डल, मनोहर मस्तकपर तिलक और सिरपर किरीट सुशोभित है। भगवान‍्के कन्धेपर पीत जनेऊ शोभित हो रहा है। भगवान‍्की भ्रुकुटि बाँकी है और चितवन भक्तोंपर कृपा करनेवाली और मुनियोंके भी मनको हरनेवाली है। भगवान‍्के समस्त शरीरसे तेजकी धाराएँ निकल रही हैं। मस्तकके चारों ओर शुभ्रवर्ण तेजोमण्डल है। भगवान‍्के अंग-अंगमें अतुलित शोभा छा रही है। भगवान् हाथोंमें पिचकारी लिये फाग खेल रहे हैं; नगर-निवासीगण करताल, मृदंग, झाँझ, ढोल, डफ और नगाड़े बजा रहे हैं, सुन्दर और सुहावनी शहनाइयाँ बज रही हैं। मनोहर गान गाये जा रहे हैं। वीणा और बाँसुरीकी सुमधुर ध्वनि हो रही है। आकाशमें देवताओंके विमान छाये हैं और सब बड़े हर्षसे दिव्य पुष्पोंकी वर्षा कर रहे हैं।

(४)

परम रमणीय अयोध्या नगरीमें रत्नोंका बना हुआ एक बहुत ही सुन्दर विशाल मण्डप है। उसके चारों ओर सुन्दर सुगन्धित पुष्पोंकी वन्दनवार बँधी है। दिव्य पुष्पोंका बहुत सुन्दर विशाल चँदोवा है। उसमें पुष्पक विमान है और उस विमानपर एक दिव्य मनोहर सिंहासन है। सिंहासनपर भगवान् श्रीराम आदिशक्ति श्रीजानकीजीके साथ विराजमान हैं। देवता, असुर, वानर और मुनिगण सब अलग-अलग दल बनाये विमानमें खड़े भगवान‍्की स्तुति कर रहे हैं। लक्ष्मणसहित तीनों भाई और श्रीहनुमान‍्जी भगवान् श्रीरामजी और श्रीजानकीजीकी सेवामें लगे हैं। भगवान‍्का नीलमेघके समान श्याम शरीर है, जिसपर हरे प्रकाशकी आभा पड़ रही है। भगवान‍्के सारे शरीरपर शुभ्र चन्दन लगा है। मंजुल श्याम शरीरपर दिव्य पीताम्बर बड़ा ही सुन्दर जान पड़ता है मानो नील मेघपर चन्द्रमाकी चाँदनी देखकर बिजली छिपना छोड़कर स्थिररूपसे दमक रही हो। भगवान‍्का समस्त शरीर सुचिक्‍कण, सुगन्धमय और प्रकाशका पुंज है। भगवान‍्के पद्मरागमणिके समान मनोहर और कोमल चरणतलोंमें ध्वजा, अंकुश, वज्र और कमल आदिके शुभ चिह्न हैं। भगवान‍्के चरणोंके अँगूठे और अँगुलियाँ परम सुन्दर हैं, उनपर अरुणवर्णके नखोंकी ज्योति जगमगा रही है। चरणोंमें मनोहर नूपुर हैं। जंघाएँ कदली-खम्भको भी मात करनेवाली चिकनी, कोमल और स्थूल हैं, जो हाथीके बच्चेकी सूँड़का मानमर्दन करती हैं। घुटने ऐसे सुन्दर हैं मानो कामदेवके तरकशका निचला भाग हो। कटितटमें सुवर्ण और मणियोंकी बनी हुई करधनी है और पीताम्बर कसा है, उसीमें तरकश बँधा है। उदरकी तीन रेखाएँ और गम्भीर नाभि परम सुन्दर हैं। हृदयमें मोतियोंकी मनोहर माला है। गलेमें वनमाला और पवित्र यज्ञोपवीत शोभायमान है। कन्धे सिंहोंके-से स्थूल हैं। शंखसदृश तीव्र रेखावाले गलेकी छवि बड़ी ही प्यारी लगती है। मुखकी मनोहरता अवर्णनीय है। उसे देखते ही अनुपम आनन्द होता है। वह छवि करोड़ों कामदेवोंकी छविको भी हरनेवाली है। प्रभुके लाल-लाल होठोंके बीचमें अनुपम दन्तावली सुशोभित है। मनोहर मुसकान मनको वरजोरीसे हर लेती है। सुन्दर ठोड़ी, मनोहर गोल कपोल और तोतेकी चोंच-सी सुन्दर नासिका बड़े ही मनोहर हैं। भगवान‍्के नेत्र कमलका मान मर्दन करनेवाले हैं तथा चितवन अति मनोहर अमृतकी वृष्टि करती है। कानोंमें सुन्दर कुण्डल हैं। सिरपर काले घुँघराले केश हैं। भगवान‍्की बाँकी भ्रुकुटि है। मस्तकपर कुंकुमके तिलक हैं। सिरपर हीरे और मणियोंके जड़े हुए सुवर्ण-मुकुटकी कान्ति सम्पूर्ण लोकोंको प्रकाशित कर रही है। भगवान‍्का कोटि-कोटि सूर्योंका-सा प्रकाश है और उनमें करोड़ों चन्द्रमाओंकी-सी सुशीलता है।

(५)

मन्दाकिनीजीके तीरपर मनोहर चित्रकूट पर्वतपर कल्पवृक्षके नीचे सुन्दर स्फटिक-शिलापर भगवान् श्रीरामजी और श्रीसीताजी विराजमान हैं। श्रीलक्ष्मणजी दूर खड़े पहरा दे रहे हैं। भगवान् नखसे शिखातक परम सुन्दर और दर्शनीय हैं। सुन्दर श्याम शरीर है। वक्ष:स्थल और कन्धे विशाल हैं। गलेमें वनमाला है। वल्कल-वस्त्र पहने हैं, मुनियोंका-सा वेश है, नेत्र बड़े ही मनोहर और कृपाके समुद्र हैं। जटाओंका मुकुट अत्यन्त सुन्दर है। मनोहर मुखमण्डल करोड़ों चन्द्रमाओंकी छविको भी मलिन कर रहा है। करकमलोंमें सुन्दर धनुष-बाण और कटिप्रदेशमें तरकश बँधा है! गौरवर्ण परम तेजस्वी श्रीलक्ष्मणजी भी इसी भाँति सुशोभित हैं।

और भी अनेक प्रकारके भगवान् श्रीरामजीके ध्यान करनेयोग्य स्वरूप हैं। उपर्युक्त पाँचोंमेंसे अपनी-अपनी रुचिके अनुसार साधक किसी भी स्वरूपका ध्यान कर सकते हैं।

भगवान् शिवका ध्यान

(१)

हिमालयमें गौरीशंकर पर्वतके ऊपर एकान्त तथा पुण्यमय पवित्र वनमें एक सुन्दर और विशाल देवदारुवृक्षके नीचे सुन्दर शिलामयी वेदिकापर बाघका चर्म बिछाये देव-देव श्रीमहादेव समाधिमग्न विराज रहे हैं। उनके चारों ओर प्रकाशका एक मण्डल छाया है। मुखमण्डल असाधारण तेजसे पूर्ण है। शरीर श्वेत कर्पूरवर्ण है, परन्तु उसमें कुछ अरुणिमा छायी है। भगवान् पद्मासनसे बैठे हैं। शरीरका ऊपरी भाग अचल, सरल और समुन्नत है। दोनों कन्धे समानरूपसे स्थिर हैं। दोनों हाथोंको गोदमें रखे हुए हैं। दाहिने हाथपर बायाँ हाथ है। हथेलियोंकी सुन्दर लालिमा छिटक रही है। जान पड़ता है लाल कमल विकसित हो रहा है। बायें कन्धेपर भूरे भालूका चर्म है, जिसका एक छोर दाहिने कटितटके पाससे नीचेकी ओर लटक रहा है; दूसरा छोर पीठपर है। भगवान‍्के गलेमें गजमुक्ताओंकी माला है। वक्ष:स्थलपर वनमाला और एकमुखी रुद्राक्षोंकी माला है। नीलकण्ठकी अपूर्व शोभा है। भगवान‍्का मुखमण्डल परम सुन्दर है। नासिका परम मनोहर है। कानोंमें रुद्राक्षकी दुहरी माला सुशोभित है। तीनों नेत्र नासिकाके अग्रभागको लक्ष्य करके स्थिर हो रहे हैं। तीसरे नेत्रसे समुज्ज्वल ज्योति निकल रही है, जो नीचेकी ओर इधर-उधर छिटक रही है। गलेमें और हाथोंमें सर्पोंके आभूषण हैं, मस्तकपर भस्मका त्रिपुण्ड्र शोभित है और चन्द्रमाने अपनी निर्मल प्रभासे मस्तकको जगमगा दिया है। जटाजूट सर्पोंके द्वारा चूड़ाके समान समुन्नतभावसे बँधा हुआ है। सारे शरीरपर भस्मके तिलक हैं। सम्पूर्ण वायु सर्वतोभावसे देहके अन्दरसे ऊपर उठकर कपालदेशमें निरुद्ध है, जिससे वे आडम्बरशून्य जलपूर्ण गम्भीर बादल, तरंगहीन महासागर या निर्वात देशमें स्थित कम्पनहीन शिखाधारी समुज्ज्वल दीपकके समान स्थिर हैं। भगवान् शिवका परम दर्शनीय और सुन्दर स्वरूप अत्यन्त शोभा पा रहा है। भाग्यवान् नन्दी समाधिमग्न भगवान‍्की समाधि निर्विघ्न बनाये रखनेके लिये दूर खड़े पहरा दे रहे हैं।

(२)

परम रमणीय कैलास पर्वतपर एक बहुत ऊँचा विशाल वटका वृक्ष है, जो पद्मरागमणियों-जैसे फलोंसे समुज्ज्वल हो रहा है। यह वृक्ष मरकतमणिमय विचित्र पत्तोंसे सुशोभित है। ऐसे वट-वृक्षके नीचे भगवान् शंकर विराजमान हैं। उनका वर्ण सफेद फिटकरी या किंचित् लालिमायुक्त चाँदीके समान है। मृगचर्मका आसन है और भालूका काला चर्म लपेटे हुए हैं। हाथोंमें और गलेमें साँपोंके आभूषण हैं। चार सुन्दर हाथोंमें—एकमें सुन्दर जपमाला, दूसरेमें अमृतका कलश, तीसरे और चौथेमें विद्या तथा ज्ञानमुद्रा हैं। वक्ष:स्थलपर नागका यज्ञोपवीत है और ललाटपर भस्मका त्रिपुण्ड्र तथा चन्द्रमा सुशोभित हैं। नाना प्रकारके आभूषण पहने हैं। तीन नेत्र हैं। परम शोभनीय स्वरूप है।

(३)

सुन्दर बहुत-से दलोंवाले विशाल किंचित् अरुण रंगके पवित्र कमलपर भगवान् शंकर पद्मासन लगाये बैठे हैं। भगवान‍्का शरीर सुन्दर स्फटिकमणिके समान है। शान्तमूर्ति हैं। पाँच मुख हैं। प्रत्येक मुखमें तीन नेत्र हैं। दस हाथ हैं। दाहिने पाँच हाथोंमें क्रमश: शूल, वज्र, खड्ग, परशु और अभयमुद्रा हैं। बायें पाँचों हाथोंमें नाग, पाश, घण्टा, प्रलयाग्नि और अंकुश सुशोभित हैं। व्याघ्रचर्म पहने हुए हैं। पैरों और हाथोंमें नाना प्रकारके आभूषण हैं। गलेमें मणियोंकी माला, रत्नोंके हार और नागमाला हैं। नागका यज्ञोपवीत पहने हैं। मस्तकपर भस्मका त्रिपुण्ड्र है। ललाटपर अर्धचन्द्र और सिरपर सुन्दर मुकुट है। परम मनोहर छवि है।

(४)

आशुतोष भगवान् शंकर रक्तदल पद्मपर विराजित हैं। भवानी पार्वतीजी वामभागमें विराजित हैं। सुन्दर चार भुजाओंमें जपमाला, शूल, नर-कपाल और खट्वांग सुशोभित है। सिरपर जटाजूट है। उसपर सर्पोंका बनाया हुआ मुकुट है, ललाटपर अर्धचन्द्र सुशोभित है। बाघम्बर पहने हैं। नीलकण्ठ हैं। पास ही नन्दी स्थित है। अत्यन्त सुन्दर मूर्ति है। करोड़ों बालसूर्योंके समान भगवान‍्के शरीरकी कान्ति है।

भगवान् शंकरजीके अन्य बहुत-से ध्यान-स्वरूप हैं। उपर्युक्त चारोंमेंसे अपनी रुचि और प्रसन्नताके अनुसार किसी भी स्वरूपका ध्यान करना चाहिये।

किसी भी स्वरूपका ध्यान किया जाय, करना चाहिये बड़ी लगनके साथ नियमितरूपसे। ऐसा ध्यान होना चाहिये जिसमें अपने ध्येयस्वरूप भगवान‍्के सिवा संसारका और अपना कुछ भी ज्ञान न रह जाय। जब ऐसी स्थिति होगी, तब एक विलक्षण सुख और परम शान्तिका अनुभव होगा। इतना आनन्द उमड़ेगा कि फिर ध्यान छोड़ना दु:खजनक मालूम होगा और बार-बार ध्यान करनेके लिये चित्तमें लोभ बढ़ जायगा। ध्येयस्वरूप निराकार हो या साकार, परमात्माके सिवा सम्पूर्ण दृश्य-प्रपंचका सर्वथा अभाव हो जानेपर ही ध्यानावस्थाकी पूर्णता समझी जा सकती है। इस अवस्थामें निराकारके ध्यानमें विशुद्ध चेतन और बोधस्वरूप आनन्दकी जागृति रहती है और साकारके ध्यानमें ध्येयस्वरूप इष्टदेवका आनन्दमय परम शान्तिप्रद साक्षात्कार होता रहता है, इसलिये इस स्थितिमें लय या शून्य अवस्था नहीं होती। कुछ लोग लय या शून्य स्थितिको ही ध्यान मान लेते हैं, परन्तु वह भूल है। ऐसी अवस्था तो प्रतिदिन तम:पूर्ण सुषुप्ति कालमें होती ही है, परन्तु वह ध्यान नहीं है। ध्यानका फल है—ध्येयस्वरूप विज्ञानानन्दघन, सूक्ष्मातिसूक्ष्म, सर्वव्यापी, सर्वतश्चक्षु, सर्वाधार, सर्वरहित, अविद्यातीत, गुणातीत, सर्व-सद‍्गुणालंकृत, सर्वगुणशून्य, परम प्रकाशरूप, ज्ञानमय, प्रेममय—आनन्दमय, अज, अविनाशी, सत्य, नित्य-निरंजन, निरामय, निष्कल, निर्गुण, अनिर्वचनीय और अचिन्त्य परमात्माकी प्राप्ति। उस परमात्माका इन विशेषणोंसे संकेतमात्र होता है। वस्तुत: वह अपनी महिमासे आप ही महिमान्वित है। उसके स्वरूपका बोध उसीको है।