सन्त-महिमा
प्रियप्राया वृत्तिर्विनयमधुरो वाचि नियम:
प्रकृत्या कल्याणी मतिरनवगीत: परिचय:।
पुरो वा पश्चाद् वा तदिदमविपर्यासितरसं
रहस्यं साधूनामनुपधि विशुद्धं विजयते॥
(भवभूति)
भगवान्के भक्त, भगवान्के प्यारे, भगवान्के तत्त्वको यथार्थत: जाननेवाले और भगवान्के ही स्वरूपभूत प्रात:स्मरणीय पूज्यचरण सन्त-महात्माओंकी महिमा कौन गा सकता है। उनके अनन्त कल्याण-गुणोंका बखान कौन कर सकता है। परन्तु उनकी स्मृति अन्त:करणको पवित्र करती है, उनके आदर्श चरित्रोंका मनन हृदयको विशुद्ध भगवद्भावसे भर देता है और उनका गुणगान जिह्वाको पवित्र करके उसमें भगवद्गुणगानकी योग्यता प्रदान करता है—इन्हीं परम लाभोंकी ओर दृष्टि जानेसे सन्तोंकी कुछ चर्चा करनेका साहस हुआ है। सन्तजन ऐसी कृपा करें, जिसके प्रभावसे इन पंक्तियोंके लेखकका चित्त उनके प्रियतम श्रीभगवान्के चरणोंमें कुछ अनुराग करना सीखे।
सन्त कौन हैं?
श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान्ने अपने प्रिय भक्तोंके निम्नलिखित चालीस लक्षण बतलाये हैं। ये लक्षण जिन पुरुषोंमें हों, वे ही सन्त हैं; इन्हींका कुछ न्यूनाधिकरूपसे ‘गुणातीत’ और ‘स्थितप्रज्ञ’ आदि नामोंसे गीतामें वर्णन है।
१—किसी भी जीवसे द्वेष न होना।
२—सबके साथ मैत्रीभाव रखना।
३—बिना किसी भेदभावके दु:खी जीवोंपर दया करना।
४—भगवान्के सिवा किसी वस्तुमें ‘मेरापन’ न रहना।
५—शरीर-मन-वाणीमें कहीं ‘मैंपन’ न होना।
६—सुख-दु:खमें समबुद्धि रहना।
७—अपना बुरा करनेवालेके प्रति, उसे दण्ड देनेकी सामर्थ्य होनेपर भी, चित्तमें क्रोध न करना और भगवान्से उसका भला चाहना।
८—अनुकूल और प्रतिकूल वस्तु या स्थितिकी प्राप्तिमें सन्तुष्ट रहना।
९—चित्तका निरन्तर परमात्माके साथ योगयुक्त रहना।
१०—मन-इन्द्रियोंको जीत लेना।
११—परमात्मामें दृढ़ निश्चय होना।
१२—मन और बुद्धिको सर्वभावसे भगवान्के अर्पण कर देना।
१३—अपने किसी भी आचरणसे किसी भी जीवको उद्विग्न न करना।
१४—किसीके द्वारा कैसा भी व्यवहार होनेपर कभी उद्विग्न न होना।
१५—सांसारिक वस्तुओंकी प्राप्तिमें हर्ष न मानना।
१६—दूसरेकी उन्नतिमें डाह न होना।
१७—परमात्माको नित्य अपने साथ समझकर सदा निर्भय रहना।
१८—किसी भी अवस्थामें अशान्त न होना।
१९—किसी भी वस्तुकी अपेक्षा न होना।
२०—मन-वाणी-शरीरसे पवित्र रहना।
२१—अहितके त्याग और हितके ग्रहणमें चतुर होना।
२२—सबसे उदासीन—निरपेक्ष रहना।
२३—मानसिक व्यथाका सर्वथा अभाव।
२४—आसक्ति और कर्तापनके अभिमानसे कोई भी कर्म आरम्भ न करना। सब कर्मोंका आरम्भ परमात्माकी लीलासे होता है, ऐसा मानना।
२५—अनुकूलकी प्राप्ति और प्रतिकूलके विनाशमें हर्ष न होना।
२६—प्रतिकूलकी प्राप्ति और अनुकूलके विनाशमें द्वेष न होना।
२७—किसी भी स्थितिमें शोक न होना।
२८—किसी भी वस्तुकी कामना न होना।
२९—शुभ और अशुभ कर्मोंका फल त्याग कर देना।
३०—शत्रु-मित्रमें समभाव रखना।
३१—मानापमानमें समानभाव रखना।
३२—सर्दी-गरमीमें समबुद्धि रहना।
३३—सुख-दु:खको समान समझना।
३४—किसी भी पदार्थमें आसक्ति न रहना।
३५—निन्दा-स्तुतिको समान मानना।
३६—वाणीसे सत्-चर्चाके सिवा और कोई बात न करना, मनसे सदा भगवान्के स्वरूपका मनन करते रहना।
३७—शरीरनिर्वाहके लिये जो कुछ भी मिल जाय, उसीमें सन्तुष्ट रहना।
३८—घर-द्वारको अपना न मानना।
३९—सदा परमात्मामें स्थिरबुद्धि रहना।
४०—श्रद्धापूर्वक और मेरे परायण होकर भागवत-धर्मरूपी अमृतका सदा सेवन करना।
ये सब गुण सिद्ध सन्तमें स्वाभाविक होते हैं और साधक इनको प्राप्त करनेके प्रयत्नमें लगा रहता है; परन्तु यह नहीं समझना चाहिये कि सन्तमें इतने ही परिमितसंख्यक गुण हैं। सत्यस्वरूप परमात्मामें नित्य स्थित होनेके कारण सन्तकी अन्दर-बाहरकी चेष्टा और क्रिया एक-एक सद्गुण और सदाचार ही है; वस्तुत: सन्त सद्गुणोंके भण्डार होते हैं, उपर्युक्त चालीस गुण तो उन अनन्त सद्गुणोंके साररूप बतलाये गये हैं और भी संक्षेपमें कहें तो यों कह सकते हैं, जिनमें निम्नलिखित छ: लक्षण हों, वे पुरुष निश्चय ही सन्त हैं—१-नित्य सत्य परमात्म-स्वरूपमें या भगवत्प्रेममें अचल स्थिति, २-सर्वत्र समदृष्टि, जीवमात्रमें आत्मोपम प्रेम, ३-राग-द्वेष, काम-क्रोध और लोभ-अभिमानादि मानसिक दोषोंका और मान-बड़ाई-प्रतिष्ठाकी इच्छाका सर्वथा अभाव, ४-स्वाभाविक ही समस्त प्राणियोंके हितमें रति, ५-शान्ति, सरलता, शम, दम, शीतलता, त्याग, सन्तोष, दया, अहिंसा, सत्य, निर्भयता, अनासक्ति, निष्कामता, निरहंकारता, निर्ममता, स्वाधीनता, निर्मलता, क्षमा, सेवा, तप आदि सद्गुण और सदाचारोंका पूर्ण विकास और ६-हर एक स्थितिमें अखण्ड असीम आनन्द!
सन्तोंके हृदयमें पाप-तापके लिये स्थान नहीं है, उनके आचरणोंमें किसी प्रकारका भी दोष नहीं आ सकता। अज्ञान, असत्य, दम्भ, कपट, स्तेय, व्यभिचार आदि दुराचार उनके समीप भी नहीं रह पाते। उनका सरल जीवन सर्वथा सदाचारमय, दिव्य आदर्श गुणोंसे युक्त, सबको सुख पहुँचानेवाला तथा सबका हित करनेवाला होता है; वे जहाँ रहते हैं, जहाँ विचरते हैं, वहीं मंगल-सन्देश देते हैं, मंगलमय वायुमण्डल तैयार करते हैं और सबको मंगलमय बना देते हैं।
सन्तोंकी पहचान
यद्यपि सन्तके लिये शास्त्रोंमें इस प्रकारके अनेक लक्षणोंका निर्देश मिलता है, तथापि वस्तुत: सन्त समस्त लक्षणोंसे ऊपर उठे हुए होते हैं। किसी भी लक्षणके द्वारा कोई भी विषयी पुरुष सन्तको कभी नहीं पहचान सकता। प्रथम तो जिसने जिस वस्तुकी उपलब्धि ही नहीं की, वह केवल उसका नाम सुनकर ही कैसे उसके असली-नकली होनेका निर्णय कर सकता है। जिसने हीरा देखा ही नहीं, वह हीरे और काँचके अन्तरको कैसे समझ सकता है। सन्तोंके लक्षणोंमें कई तो ऐसे हैं, जो स्वसंवेद्य हैं और कई ऐसे हैं जिनके स्वरूपका यथार्थ निर्णय स्वयं उनका आचरण करनेवाले केवल अनुभवी पुरुष ही कर सकते हैं, विषयी पुरुष अपनी विविध दोषमयी, विषयासक्तिसे भ्रमित और मोहसे आवृत मलिन बुद्धिके तराजूपर उनको नहीं तौल सकता। वह जिस बातको अपनी विपरीत और अज्ञानभरी दृष्टिसे दोष समझेगा, सम्भव है, वही सन्तका आदर्श गुण हो। ऑपरेशन करते हुए डॉक्टरकी क्रियामें, बच्चों और शिष्योंको वत्सलतापूर्ण हृदयसे धमकाते हुए माता-पिता और सद्गुरुकी शिक्षामें और कराहते हुए रोगीको कुपथ्य न देनेमें अज्ञ पुरुष निर्दयताका आरोप कर सकते हैं; परन्तु क्या यह वास्तविक दया नहीं है? इसी प्रकार अन्यान्य गुणोंकी बातें हैं। मूर्ख मनुष्य यदि अनाज तौलनेके एक बड़े काँटेके एक पलड़ेपर बहुमूल्य हीरा रखकर और उसे सेर-दो-सेरके वजनका भी न पाकर उसको किसी भी कामका न समझे तो इससे जैसे हीरेकी कीमत कुछ भी कम नहीं हो जाती, इसी प्रकार असन्तकी मलिन बुद्धि न तो सन्तको पहचान सकती है और न उसके किसी निर्णयसे सन्तका यथार्थ स्वरूपनिर्देश ही होता है। दूसरी बात एक यह भी है कि भोले-भाले नर-नारियोंको ठगनेके लिये दम्भी मनुष्य भी सन्तोंका-सा स्वाँग रचकर लोगोंको धोखा दे सकता है, बाहरी आचरणकी नकल करना कोई बड़ी बात नहीं। यद्यपि सत्य, चेतन और ज्ञानस्वरूप परमात्मामें नित्यस्थित लोक-हित-निरत सन्तके बाहरी आचरणोंमें और दम्भीके सन्तों-जैसे बनावटी आचरणोंमें बहुत बड़ा भेद रहता है, तथापि उस भेदको पहचानना हर एक मनुष्यका कार्य नहीं है। योग-सिद्धिप्राप्त या भगवत्प्रेरित सन्त पुरुष ही उस महत्त्वपूर्ण भेदको जानते हैं। अतएव किसी भी बाहरी लक्षणसे सन्त-असन्तका निर्णय करना असम्भव नहीं तो कम-से-कम महान् कठिन तो अवश्य ही है। विषयी पुरुषोंके लिये तो असम्भव ही है।
सन्तोंका यथार्थ परिचय सन्तकृपासे ही मिल सकता है। किन्तु पहलेसे ही किसी-न-किसी दोषको खोज निकालनेकी बुरी इच्छासे—जिनपर दोषारोपण हो सके, ऐसे छिद्रोंको ढूँढ़नेकी नीयतसे ही जो सन्तके पास जाता है या सन्तका सेवन करता है, उसको सन्तका यथार्थ परिचय मिलना और सन्तकृपाको प्राप्त करना बहुत ही कठिन है। श्रद्धा, सेवा और जिज्ञासासे ही मनुष्यको सन्तकृपाकी प्राप्ति हो सकती है। इतना होनेपर भी अकारण कृपालु सन्तोंका अज्ञात संग भी कभी व्यर्थ नहीं जाता; उस अज्ञात सत्संगसे, जिस महान् कल्याण-कल्पतरुका भगवत्प्रेमरूपी अमल फल है, उसका अक्षय बीज तो हृदयक्षेत्रमें पड़ ही जाता है, जो अनुकूल वातावरण पाकर उगता है और फूलता-फलता है।
सन्त भगवान्के किस गुप्त संकेतको पाकर कब किस प्रकारका आचरण करते हैं, इस बातको साधारण लोग नहीं समझ सकते; लोकोत्तर पुरुषोंके कार्य भी लोकोत्तर ही हुआ करते हैं, साधारण बुद्धिसे उनका समझना और अनुकरण करना सम्भव नहीं होता। इसीलिये श्रुति-वाक्योंमें गुरु शिष्यसे कहते हैं—
यान्यनवद्यानि कर्माणि।
तानि सेवितव्यानि।
नो इतराणि।
यान्यस्माकॸसुचरितानि।
तानि त्वयोपास्यानि।
नो इतराणि।
(तैत्तिरीयोपनिषद् १।११।२)
‘शास्त्रोक्त निर्दोष कर्मोंका ही आचरण करना चाहिये, शास्त्रविरुद्धका नहीं। हमलोगोंमें भी जो सुन्दर आचरण हैं, तुम्हें उन्हींका अनुकरण करना चाहिये, अन्य निन्दित आचरणोंका नहीं।’
वस्तुत: सन्तोंका एक भी आचरण किंचित् भी दोषयुक्त नहीं होता, वह स्वाभाविक ही सत्य ज्ञानसे ओतप्रोत और लोकहितके उद्देश्यसे आचरित होता है, हम उसे अपनी अदूरगामिनी विपरीत दृष्टिके कारण ही दूषित या निन्दित मान लेते हैं! एक महात्माने मुझको एक कहानी सुनायी थी—
सन्तकी आश्चर्य-कहानी
किसी एक नगरमें राजकन्याका विवाह था, मंगलके बाजे बज रहे थे। उसी नगरमें एक सिद्ध महात्मा रहते थे। महात्मा बाजोंकी आवाज सुनकर राजदरबारमें गये। राजासे यह मालूम होनेपर कि राजकन्याका विवाह है, उन्होंने कन्याको देखना चाहा। राजाने कन्याको बुलाया। राजकन्याने आकर महात्माके चरणोंमें प्रणाम किया। महात्माने न मालूम किस अभिप्रायसे उसको नखशिख देखकर राजासे कहा—‘इस लड़कीका हमसे विवाह कर दो।’ राजा तो सुनते ही सहम गया; बुद्धिमान् था, महलमें जाकर एक जोड़ी बहुमूल्य मोती लाया। मोतीका आकार मुर्गीके अण्डे-जितना था और उनसे शारदीय पूर्णिमाके चन्द्रमाकी-सी ज्योति छिटक रही थी। राजाने नम्रतासे कहा—‘भगवन्! हमारे कुलकी रीति है—जो इस तरहके १०८ मोतियोंका हार कन्याको देता है, उसीसे हम कन्याका विवाह करते हैं।’ महात्माने निर्विकार चित्तसे, पर उत्साहसे कहा—‘हाँ, हाँ, तुम्हारी कुलकी प्रथा तो पूरी होनी ही चाहिये। ये दोनों मोतीके दाने मुझे दे दो, इसी नमूनेके एक सौ आठ मोती मैं ला देता हूँ। परन्तु खबरदार! तबतक लड़कीको किसी दूसरेसे ब्याह न देना।’ राजाने सोचा था, महात्मा मोतीकी बात सुनकर निराश हो लौट जायँगे; परन्तु यहाँ तो दूसरी ही बात हो गयी। राजा जानता था—महात्मा ऊँचे दर्जेके सिद्ध पुरुष हैं, उनकी आज्ञा न माननेसे अमंगल हो सकता है; अतएव राजाने दोनों मोती उनको दे दिये और कहा—‘भगवन्! आगे लग्न नहीं है, आप जल्दी लौटियेगा।’ राजाने सोचा, ‘ऐसे मोती कहीं मिलेंगे नहीं; महात्मा सच्चे पुरुष हैं, लौट ही आयेंगे। तब लड़कीका विवाह निर्दिष्ट राजकुमारके साथ कर दिया जायगा।’ राजाने विवाह स्थगित कर दिया। महात्मा मोतीके दाने झोलीमें डालकर चल दिये!
तीन दिन हो गये। महात्मा समुद्रके किनारे बैठे कमण्डलु भर-भर समुद्रका जल बाहर उलीच रहे हैं। उन्हें खाना-पीना-सोना कुछ भी स्मरण नहीं है। न थकावट है न विषाद है; न निराशा है न विराम है। एक लगनसे कार्य चल रहा है। महात्माकी अमोघ क्रियासे प्रकृतिमें हलचल मची। अन्तर्जगत्में क्षोभ उत्पन्न हो गया। समुद्रदेव ब्राह्मणका रूप धरकर बाहर आये। पूछा, ‘भगवन्! यह क्या कर रहे हैं?’ समाधिसे जगे हुएकी भाँति उनकी ओर देखकर सहज सरलतासे महात्मा बोले—‘एक सौ आठ मोतीके दाने चाहिये। समुद्रमें पानी नहीं रहेगा, तब मोती मिल जायँगे।’ ब्राह्मणने कहा—‘समुद्र क्या इसी तरहसे और इतना जल्दी बिना पानीका हो जायगा?’
‘हाँ, हाँ, हो क्यों नहीं जायगा। पानी तो उलीच ही रहे हैं, दो दिन आगे-पीछे होगा। अपनेको कौन-सी जल्दी पड़ी है।’
‘अगर समुद्र आपको मोती दे दे तो?’
‘तो फिर क्या हमारा समुद्रसे कोई वैर है जो हम उसे बिना पानीका बनायेंगे?’
‘अच्छा, तो लीजिये।’
समुद्रकी एक तरंग आयी और मोतियोंका ढेर लग गया। महात्माने झोलीसे दोनों मोती निकाले। उनसे ठीक मिला-मिलाकर १०८ मोती चुनकर झोलीमें डाल लिये और चलनेके लिये उठ खड़े हुए! ब्राह्मणवेशधारी समुद्रने कहा, ‘भगवन्! कुछ मोती और ले जाइये न?’ महात्मा बोले—‘हमें संग्रह थोड़े ही करने हैं। जरूरत थी, उतने ले लिये। अब हम व्यर्थ बोझ क्यों ढोयें।’
महात्माने आकर राजाको बुलाया और पहलेके दो दाने समेत ११० मुर्गीके अण्डे-जैसे पूनमके चाँद-से चमकते मोतीके दाने राजाके सामने रख दिये। राजा आश्चर्यचकित हो गया। महात्माके परम सिद्ध होनेका उसे पूर्ण विश्वास हो गया। उसने सोचा, ‘ऐसे विलक्षण शक्तिशाली पुरुषसे लड़कीका विवाह करनेमें लड़कीको तो किसी दु:खकी सम्भावना है नहीं, परन्तु इनसे कुछ काम और क्यों न ले लिया जाय।’ राजाकी एक दूसरे बड़े राजासे शत्रुता थी; वह राजा तो मर गया था, उसका छोटा कुमार था। इसने सोचा, ‘शत्रुका बीज भी अच्छा नहीं; महात्माके हाथों यह कण्टक दूर हो जाय तो अच्छा।’ यह सोचकर राजाने कहा—‘भगवन्! मोती तो बड़े अच्छे आप ले आये। एक काम और है, अमुक राज्यके राजकुमारका सिर आनेपर लड़कीका ब्याह होगा, ऐसा प्रण है। अतएव यदि हो सके तो आप इसके लिये चेष्टा करें।’ महात्माने कहा—‘अरे, इसमें कौन बड़ी बात है, अभी जाता हूँ।’ महात्माजी उस राज्यमें गये। राजमातासे मिले। राजमाताने महात्माका नाम सुन रखा था, इससे उसने बड़ी अच्छी आवभगत की। इन्होंने कहा—‘माई! हम तो एक कामसे आये हैं, तुम्हारे कुमारका हमें सिर चाहिये। हमने एक राजासे कहा था—अपनी कन्याका ब्याह हमसे कर दो; उसने कहा है कि अमुक राजकुमारका सिर ला देंगे, तब विवाह होगा। अत: तुम हमें अपने लड़केका सिर दे दो।’ एकलौता लड़का था और वही राज्यका अधिकारी था। महात्माके वचन सुनकर राजमाताके प्राण सूख गये। परन्तु हृदयमें श्रद्धा थी; उसको विश्वास था कि सच्चे महात्मासे किसीका कोई अकल्याण नहीं हो सकता। उसने कहा—‘भगवन्! लड़केका सिर मैं कैसे उतारूँ। आप इस लड़केको ही ले जाइये।’ महात्मा बोले—‘यह और अच्छी बात है; उसने तो सिर ही माँगा था, हम तो पूरा ले जाते हैं। फिर सिर उतारकर हमें क्या करना है।’
‘भगवन्! इसे मैं आपके हाथोंमें सौंप रही हूँ।’
‘हाँ, हाँ, भगवान् सब मंगल करेंगे।’
राजकुमारको लेकर महात्मा अपनी नगरीमें लौटे और राजमहलमें जाकर बोले—‘लो, यह समूचा राजकुमार! अब पहले विवाह करो; खबरदार! जबतक विवाह न हो, लड़केको छूना मत।’ राजाने आनन्दमग्न होकर कहा—‘ठीक है, भगवन्! ऐसा ही होगा।’ महात्माने कहा—‘तो बस, अब देर न करो!’
विवाहमण्डप रचा हुआ था ही। चौकी बिछायी गयी। महात्माजी दूल्हा बने। कन्या आयी। कन्याको महात्माने एक बार फिर नखशिख देखा। अकस्मात् बोल उठे—‘अरे! उस राजकुमारको तो यहाँ बुलाओ!’ राजकुमार बुलाया गया। महात्माने उसे कन्याके बगलमें खड़ा कर दिया। फिर दोनोंको एक बार नखशिख देखकर बोले—‘भई! जोड़ी तो यही सुन्दर है। राजा! बस, अभी इस राजकुमारसे राजकुमारीका ब्याह कर दो। खबरदार, जो जरा भी चीं-चपट की।’ राजा नहीं न कर सका। राजकुमारीका विवाह शत्रु राजकुमारसे हो गया। महात्माके विचित्र आचरणका रहस्य अब राजाकी समझमें आया, राजाका मन पलट गया। शत्रु मित्र हो गया! महात्मा अपनी कुटियापर जाकर पूर्ववत् धूनी तपने लगे।
इस कहानीसे यह मालूम हो गया होगा कि सन्त पुरुषकी क्रियाएँ किसी अज्ञात उद्देश्यसे बड़ी विलक्षण हुआ करती हैं, उनकी क्रियाओंसे उनकी स्थितिका पता लगाना बहुत ही कठिन होता है। तथापि आजकलके जमानेमें—जहाँ लोग नाना प्रकारसे ठगे जा रहे हैं—विशेष सावधानी रखना ही उत्तम है। श्रद्धा और सेवा करके सत्संग करना चाहिये और जिन सन्त पुरुषके संगसे अपनेमें दैवी सम्पदाकी वृद्धि, भगवान्की ओर चित्तवृत्तियोंका प्रवाह, शान्ति और आनन्दकी वृद्धि प्रतीत हो, उन्हींको सन्त मानकर उनसे विशेष लाभ उठाना चाहिये। अपनी बुद्धि जिनको सन्त स्वीकार न करे, उनकी निन्दा तो नहीं करनी चाहिये; परन्तु अपने उनसे कोई गुरु-शिष्यका सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये। निन्दा तो इसलिये नहीं कि प्रथम तो किसीकी भी निन्दा करना ही बहुत बुरा है; दूसरे, हम सन्तका बाहरी आचरणसे निर्णय भी नहीं कर सकते और गुरु-शिष्यका सम्बन्ध इसलिये नहीं कि श्रद्धारहित और दोषबुद्धियुक्त ऐसे सम्बन्धसे कोई लाभ नहीं होता।
सन्त और चमत्कार
अहिंसा-सत्यादि यम-नियमोंकी पूर्ण प्रतिष्ठाके साथ ही परमात्माके स्वरूपमें सम्पूर्णतया स्थित होनेके कारण सन्तोंके जीवनमें अलौकिक योगविभूतियोंका प्रकट होना कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। भगवान् स्वयं शुद्ध सत्त्वमयी और कल्याणमयी नित्य अनन्त दिव्य विभूतियोंसे सम्पन्न हैं। उनका ‘ऐश्वर-योग’ प्रसिद्ध है और ऐसी सिद्धियाँ हेय भी नहीं हैं। संसारके प्राचीन और अर्वाचीन सभी धर्मोंके सन्त पुरुषोंके जीवनमें योगविभूतियोंका होना न्यूनाधिक रूपमें पाया जाता है। अवश्य ही सत्यके साथ-साथ संसारमें मिथ्या, दम्भ, धूर्तता भी रहती ही है और पाखण्डीलोग अपने स्वार्थसाधनके लिये नकली सिद्धियाँ दिखलाकर अथवा लोगोंकी आँखोंमें धूल झोंककर अपना निकृष्ट व्यवसाय भी चलाते ही हैं। पर इससे योगविभूतियोंको दूषित नहीं कहा जा सकता। तथापि इतना अवश्य कहा जा सकता है कि अणिमादि सिद्धियाँ और ऐसी ही अन्यान्य योगविभूतियोंका प्राप्त करना सन्तजीवनका उद्देश्य कदापि नहीं है। सन्तकी महाविभूति तो भगवान्के साथ पूर्णतया एकात्मभाव है। इसीके लिये साधकदशामें सन्त अपने जीवनको महान् त्याग, वैराग्य और प्रचण्ड तपस्याकी आगमें तपाता रहता है और इस परम सत्यको उपलब्ध करनेके बाद इसीमें रमकर तदाकार हो जाता है। सिद्धियाँ आनुषंगिक रूपमें आती हैं तो वह न तो इनको कोई महत्त्व देता है, न इनकी प्राप्तिकी इच्छा करता है, न इनका प्रदर्शन करके देहपिण्डकी और मिथ्या नामकी पूजा ही करवाना चाहता है; क्योंकि वह जानता है सिद्धियोंमें सन्तभाव नहीं है, बल्कि सिद्धियाँ तो साधनमें महान् विघ्नरूप हैं और परमार्थपथसे गिरा देती हैं और ये सिद्धियाँ राक्षसोंमें भी हो सकती हैं।
जो लोग सिद्धियोंका प्रदर्शन करके नाम-रूपकी पूजा कराना चाहते हैं, वे तो सन्त हैं ही नहीं। बल्कि आजकल तो बहुत लोग ऐसे भी मिल सकते हैं, जिनको यथार्थ योगविभूतियाँ भी प्राप्त नहीं हैं, जो केवल धोखा देनेकी कलामात्र जानते हैं और उसीके सहारे भोले लोगोंको ठगते हैं। सन्तका महान् चमत्कार तो उसका नित्य सत्य अखण्ड ईश्वरमय जीवन है, जिस जीवनके दर्शन, कथन, श्रवण और परिचय—सभी आश्चर्यमय हैं।
आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेन-
माश्चर्यवद् वदति तथैव चान्य:।
आश्चर्यवच्चैनमन्य: शृणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥
सन्तोंके स्वभावमें विभिन्नता
सिद्ध सन्तोंकी स्वरूपस्थिति एक-सी होनेपर भी व्यावहारिक जगत्में उनके स्वभावमें बहुत ही विभिन्नता रहती है। जो सन्त जिस देशमें, जिस परिस्थितिमें, जिस शिक्षा-दीक्षामें, जिस वातावरणमें प्रकट हुए हैं और पले हैं, प्राय: उसीके अनुसार उनका स्वभाव भी होता है। कोई अत्यन्त एकान्त-सेवी, निवृत्तिपरक होकर लोकालयसे सर्वथा अपनेको अलग रखना चाहते हैं, कोई दिन-रात विभिन्न प्रकारके लोगोंमें रहकर उनकी सहायता करते, उन्हें मार्ग बतलाते, अन्याय-अत्याचारका सामना करते और सत्य-धर्मकी प्रतिष्ठा करनेमें लगे रहते हैं। एकान्तवासी सन्त भी कम लोक-सेवा नहीं करते। एकान्त स्थानमें उनका दिन-रात भगवान्के साथ आत्मासे ही नहीं—शरीर-मन-वाणीसे भी संयोग रहना जगत्के लिये बहुत ही कल्याणकारी होता है। उनका अस्तित्व ही जगत्के लिये बहुत बड़ा आश्वासन और महान् लाभ है। लोकालयमें रहनेवाले सन्तोंमें गृहस्थ, संन्यासी दोनों ही होते हैं और गृहस्थोंमें भी स्वभाव तथा रुचिभेदके अनुसार कोई त्यागमार्गी और कोई अत्यागमार्गी होते हैं—कोई विषयोंके स्वरूपत: त्यागकी शिक्षा देते हैं तो कोई राग-द्वेष-त्यागपूर्वक वशमें किये हुए मन-इन्द्रियोंसे भगवत्प्रीत्यर्थ विषय-सेवनकी सम्मति देते हैं और तदनुसार ही दोनोंकी अपनी रहनी-करनीमें भी अन्तर होता है। ऐसे सन्त सभी देशों, सभी जातियों, सभी धर्मों और सभी सम्प्रदायोंमें प्राय: सभी युगोंमें होते आये हैं।
सन्त-जगत्में उपर्युक्त निवृत्ति और प्रवृत्तिपरक सन्तोंके सिवा कुछ ऐसे सन्त भी होते हैं, जिनके बाह्य आचरण बाल, जड, उन्मत्त या पिशाचवत् होते हैं। इन्हीं लोगोंको अवधूत आदि नामोंसे कहा जाता है। ऐसे लोग प्राय: शिक्षा नहीं देते, अपनी मौजमें रहकर ही जगत्की अनुपम सेवा करते रहते हैं। इनमेंसे कई देखनेमें बहुत ही घृणित आचरणवाले होनेपर भी अपनी सन्निधिमात्रसे लोगोंका अपार कल्याण कर देनेकी शक्ति रखते हैं। अवश्य ही बहुत-से पाखण्डी लोग भी बाहरसे इन लोगों-जैसा वेष बनाकर जगत्को ठगा करते हैं, परन्तु इससे उन विधि-निषेधके परे पहुँचे हुए महात्माओंके निर्मल साधुचरित्रपर कोई कलंक नहीं आ सकता। जो लोग धन, स्त्री और पूजा-प्रतिष्ठाके लिये इन लोकोत्तर पुरुषोंकी नकल करके, अपने वर्णाश्रमविहित सन्ध्या-पूजन, माता-पिताका सेवन, परिवार-पालन, यज्ञ-दान, देश और धर्मकी सेवा, खान-पानकी शुद्धि एवं शास्त्रीय आचार-विचार आदिको छोड़कर म्लेच्छवत् मनमाना आचरण करते हैं, वे तो नरकगामी ही होते हैं।
अवश्य ही विधि-निषेधके ऊपर ऐसे उच्च स्तरमें पहुँच जानेपर परमात्माके सत्यस्वरूपमें इतनी प्रगाढ़ तल्लीनता हो जाती है कि समस्त नियमोंके बन्धन अपने-आप टूट जाते हैं; वहाँका नियम ही स्वाभाविक स्वच्छन्दता है। परन्तु उस स्थितिके पहले जान-बूझकर शास्त्र और सदाचारके आवश्यक बन्धनोंको तोड़नेवालेकी तो वही दशा होती है, जो नदीके उस पार भूमिपर उतरे हुए पथिककी देखा-देखी नदीकी बीच धारामें नौकाको छोड़ देनेवालेकी होती है। सन्तशिरोमणि प्रेममयी गोपियोंके सम्बन्धमें उद्धवजी कहते हैं—
आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां
वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्।
या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा
भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्॥
(श्रीमद्भा० १०। ४७। ६१)
‘अहो! इन गोपियोंकी चरणरजको सेवन करनेवाली वृन्दावनमें उत्पन्न हुई गुल्म, लता और ओषधियोंमेंसे मैं कुछ भी हो जाऊँ (जिससे इन महाभागाओंकी चरणरज मुझे भी प्राप्त हो)। क्योंकि इन गोपियोंने बहुत ही कठिनतासे त्याग किये जानेवाले स्वजनोंको और आर्यपथको त्यागकर भगवान् मुकुन्दके मार्गको पाया है, जिनको श्रुतियाँ अनादिकालसे खोज रही हैं (परन्तु पाती नहीं)।’
यह ‘आर्यपथत्याग’ उन कृष्णमयी गोपिकाओंके द्वारा ही हो सकता है, जो घर-संसारकी दुस्त्यज ममताको सर्वथा छोड़कर, समस्त मोहके परदोंको फाड़कर अनन्यरूपसे सर्वथा-सर्वदा और सर्वत्र मुरलीमनोहर श्रीकृष्णमें ही रमण करती थीं। जिनके जीवनका प्रत्येक क्षण भगवान्में रमण करनेके लिये ही सुरक्षित था, उन नित्य परमात्मयोगमें अखण्डरूपसे स्थित श्रीगोपीजनोंकी दिव्य लीलाओंकी नकल करनेवाले विषयी मनुष्य तो गहरे पतनके समुद्रमें गिरकर डूबते ही हैं!
गुप्त सन्त और उनके कार्य
अधिकांश सच्चे सन्त प्राय: अपनेको लोगोंमें प्रकट न करके ही जगत्में विचरण किया करते हैं। सन्तपरम्पराके परम प्रसिद्ध चिरंजीवी सन्त आज भी हैं और वे हमलोगोंके बीचमें आते भी हैं; पर हम उन्हें पहचान नहीं सकते। भिन्न-भिन्न स्तरोंमें भगवान्का कार्य करनेवाले ऐसे हजारों सन्त पृथ्वीपर हैं, जो लोकचक्षुसे परे रहकर अपना महत् कार्य कर रहे हैं। कहते हैं कि सन्तजगत्में सब कार्य नियमपूर्वक होते हैं। नये सन्तोंकी दीक्षा, पुरानोंके द्वारा विभिन्न कार्योंका सम्पादन, सन्तजगत्में शासन, नवीन कार्योंकी सूचना, जगत्के विपत्तिनिवारणकी व्यवस्था, प्रकृतिकी क्रियाओंद्वारा यथायोग्य दण्डविधान आदि महत्त्वपूर्ण कार्य सिद्ध सन्तोंके एक सुसंगठित मण्डल और उनकी विभिन्न अनेक शाखाओंद्वारा सदा संचालित होते रहते हैं। ऐसे सन्तोंके सर्वोपरि संचालक परम सद्गुरु भगवान् शंकर हैं, जो रुद्ररूपसे जगत्का संहार और सुन्दर शिवरूपसे सदा कल्याण करते रहते हैं और उनकी अधीनतामें अनेक सिद्ध-महात्मा सन्त-पुरुष निरन्तर भगवल्लीलामें सहायक होकर भगवदाज्ञानुसार कार्य कर रहे हैं। इन सन्तोंको कुछ लेना है नहीं, पूजा करवानी नहीं, ख्याति और प्रशंसासे कोई सरोकार नहीं और लोगोंका प्रशंसापात्र न होनेसे इनका कोई नुकसान होता नहीं; फिर ये क्यों किसी बहिर्वेषमें जगत्के लोगोंके सामने प्रकट होकर अपना परिचय दें। हाँ, अधिकारी पुरुषको इनमेंसे किन्हीं-किन्हींके दर्शन आज भी होते हैं, हो सकते हैं। कहा जाता है कि देवर्षि नारद, सनकादि, भगवान् दत्तात्रेय, शुकदेव, मैत्रेय आदि प्राचीन और शंकराचार्य, रामानुजाचार्य तथा गोरखनाथ, भर्तृहरि, गोपीचन्द, कबीर, नानक, तुलसीदास, ज्ञानदेव, समर्थ गुरु रामदास आदिसे लेकर रामकृष्ण परमहंस, विजयकृष्ण गोस्वामी प्रभृति अर्वाचीन अनेक सन्तोंके दर्शन आज भी उनके अन्तरंग भक्तोंको होते हैं। इसमें कोई आश्चर्यकी बात भी नहीं है। यह तो सिद्ध सन्तमण्डलकी बात रही। अस्तु, इन सन्तोंके सिवा छिपे हुए ऐसे अनेक सन्त हैं—जो विविध स्थानोंमें कार्य करते हुए हमलोगोंमें रह रहे हैं—जो अज्ञातरूपसे इस मण्डलकी दृष्टि और शासनसूत्रमें बँधे रहनेपर भी विभिन्न स्थानोंमें अप्रकटरूपसे साधन कर रहे हैं। अतएव यह नहीं समझना चाहिये कि जितने और जो हमलोगोंकी जानकारीमें हैं, वे और उतने ही सन्त हैं। सन्तोंके लिये यह कोई आवश्यक बात नहीं है कि वे संसारमें प्रसिद्ध हों ही। वरं प्रसिद्ध उनमेंसे बहुत थोड़े ही होते हैं और साथ ही यह भी याद रखना चाहिये कि सन्तकी प्रसिद्धि पाये हुए अनेक पुरुष वस्तुत: सन्त होते भी नहीं। उनका केवल सन्तका ऊपरी बानामात्र होता है। मन असन्त तथा विषयी ही होता है। ऐसे लोगोंसे संसारकी बहुत बुराई होती है। ये धर्मसंचालनके कार्यमें अयोग्य होते हुए भी जब उसमें अनधिकार प्रवेश कर बैठते हैं, तब अपने हृदयके विकारों और व्याधियोंको ही जगत्में फैलाते हैं और अपने सम्पर्कमें आनेवाले नर-नारियोंके जीवनोंको पापमय, फलत: दु:ख और अशान्तिपूर्ण बनानेमें सहायक होते हैं। सच्चे सन्त अधिकांश अप्रकट ही रहते हैं, उनकी कोई ख्याति या प्रसिद्धि नहीं होती। ऐसे सच्चे सन्तोंको पाने और उन्हें पहचाननेके लिये सन्त-साधनाका आश्रय करना परम आवश्यक है। सन्तोचित साधनोंका—उपर्युक्त गीतोक्त चालीस साधनोंका अभ्यास करनेसे—ज्यों-ज्यों हमारे अन्दर उन गुणोंका विकास होगा, त्यों-ही-त्यों हम सन्त और सन्तकृपाके अधिकारी होंगे। कठिनता तो यह है कि हम सन्तोंके चमत्कारोंको ही पूजते हैं, उनकी साधनाको नहीं—जिसके बिना हम यथार्थ लाभसे वंचित ही रह जाते हैं।
सन्तभावकी प्राप्तिके साधन
भगवान् या भगवान्के प्रेमकी प्राप्ति ही मनुष्यजीवनका उद्देश्य है और जो इस उद्देश्यमें सफल हो चुके हैं, वे ही सन्त हैं। अतएव इस सन्तभावकी प्राप्तिमें ही मनुष्य-जन्मकी सार्थकता है। इसकी प्राप्तिके अनेक उपाय शास्त्रों और सन्तोंने बतलाये हैं, परन्तु इनमें प्रधान दो ही हैं।—१—भगवान्की नित्य असीम कृपाका आश्रय और २—लक्ष्य-प्राप्तिके लिये दृढ़ निश्चय और अटल विश्वासके साथ किया जानेवाला पुरुषार्थ!
भक्तिमार्गी साधक दोनोंमेंसे एकका अथवा दोनोंका साधन कर सकते हैं। परन्तु ज्ञानमार्गी प्राय: दूसरेका ही करते हैं। योग तो दोनोंमें ही आवश्यक है। जबतक चित्तवृत्तिका अपने इष्टमें योग नहीं होता, तबतक साधनमें सफलता मिल ही नहीं सकती। उपर्युक्त दोनों उपायोंमें भक्तिमार्गीको पहला अधिक प्रिय होता है; वह अपने पुरुषार्थका भरोसा नहीं करता और वैसा करनेमें वह अपनेमें एक अभिमानका दोष आता देखकर सिहर उठता है। साथ ही उसकी यह भी धारणा होती है कि जीवके पुरुषार्थसे भगवान्का मिलना असम्भव है; वे तो स्वयं कृपा करके जब अपना दर्शन देकर कृतार्थ करना चाहते हैं, तभी जीव उनके दर्शन पा सकता है। इसीलिये वह उनकी कृपापर विश्वास करके तन-मन-धनसे उनके शरणापन्न हो जाता है। परन्तु इसका यह तात्पर्य नहीं कि वह सब क्रियाओंको त्यागकर चुपचाप हाथ-पर-हाथ रखकर बैठ जाता है या आलसीकी भाँति तानकर सोता है। वह पुरुषार्थ नहीं करता—इसका अर्थ यही है कि वह पुरुषार्थका अभिमान अपने अन्दर नहीं उत्पन्न होने देता, परन्तु अपने तन-मन-धन—सबको भगवान्का समझकर अनवरत उनकी सेवामें तो लगा ही रहता है, क्षणभर भी स्वच्छन्द विश्राम नहीं लेता। वस्तुत: वही परम पुरुषार्थी होता है, जो अपनेको भगवान्के परतन्त्र मानकर यन्त्रवत् उनकी सेवामें लगा रहता है। जो मनुष्य यह कहता है कि मैं भगवान्के शरणापन्न हूँ, मुझे तो उन्हींकी कृपाका भरोसा है, परन्तु जो भगवान्के आज्ञानुसार सेवा नहीं करता, वह या तो स्वयं धोखेमें है या दूसरोंको धोखा दे रहा है। शरणागतिमें साधनका या पुरुषार्थका अथवा यों कहें कि अभिमानयुक्त कर्मका सर्वथा अभाव है; क्योंकि शरणागतिके साधकको साधन या पुरुषार्थका आश्रय नहीं होता, परन्तु उसमें भगवत्सेवारूप कर्मका कभी अभाव नहीं होता। भगवत्सेवाके लिये तो उसका सब कुछ समर्पित ही है। परन्तु ऐसे भक्तको भी ज्ञानकी आवश्यकता है, ज्ञानकी सुदृढ़ नींवपर ही भक्तिकी विशाल और मनोहर अट्टालिका खड़ी हो सकती है और ज्ञानमें प्रेम तो है ही। अतएव यद्यपि इन दोनोंका समन्वय है, तथापि एककी प्रधानतामें दूसरा छिपा-सा रहता है। इससे वह स्पष्ट व्यक्त नहीं होता।
गीतोक्त निष्कामकर्मयोग तो अहैतुकी सक्रिय भक्तिका ही एक रूपान्तरमात्र है। निष्कामकर्मयोगी कर्ममें आसक्ति और फलकी चाह न रखकर सब कुछ भगवान्के लिये ही करता है। वह समझता है कि कर्ममें ही मेरा अधिकार है, फलमें कदापि नहीं। सब साधनोंके एकमात्र परमफल तो भगवान् ही होने चाहिये, फिर मैं भगवदर्थ कर्म करनेसे वंचित क्यों रहूँ। यह समझकर वह ममता, आसक्ति और आशा-निराशाको छोड़कर मन-बुद्धि आदिको भगवान्के अर्पण कर नित्य-निरन्तर भगवान्का स्मरण करता हुआ भगवान्की पूजाके लिये ही अपने जिम्मे आये हुए कर्मोंका सुचारुरूपसे नि:संग होकर उत्साहपूर्वक सम्पादन करता रहता है।
तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधानात्मक पतंजल्युक्त क्रियायोगका भी भक्तियोगमें समावेश हो जाता है। भक्ति-साधनामें होनेवाले नाना प्रकारके कष्टोंको भक्त सत्कारपूर्वक सहन करता है, भगवान्की सेवामें प्राणतक देनेमें वह आनन्दका अनुभव करता है और प्रारब्धवश प्राप्त हुए प्रत्येक भीषण-से-भीषण संकटको वह भगवत्प्रसाद समझकर उसका सुखपूर्वक स्वागत करता है—यह उसका परम तप है। वह सदा-सर्वदा भगवद्गुणानुवादके पढ़ने-सुननेमें तथा भगवान्के नाम-जपमें अपनेको लगाये रखता है—यह उसका स्वाध्याय है और ईश्वरके अनन्य शरण तो वह है ही। अवश्य ही पतंजल्युक्त क्रियायोगका पृथक् साधन भी सन्तभावकी प्राप्तिमें प्रधान उपाय हो सकता है, परन्तु उसमें भी ज्ञान और भक्तिका सम्मिश्रण है ही। बहुत-से साधक अष्टांगयोग और षडंग हठयोगका साधन करते हैं और वह है भी बहुत ठीक; परन्तु ये सारे साधन उपर्युक्त दूसरे साधनमें आ जाते हैं।
यद्यपि सबके लिये एक-से ही साधन समानरूपसे उपयोगी नहीं हो सकते, तथापि नीचे कुछ ऐसे उपाय लिखे जाते हैं, जिनके साधन करनेसे सन्तभावकी प्राप्तिमें बहुत कुछ सहायता मिल सकती है।
१—शुद्ध सत्य कमाईका परिमित और नियमित लघु भोजन करना।
२—मीठी सत्य वाणी बोलना।
३—सबकी यथायोग्य सेवा करना, परन्तु मनमें ममत्व और अभिमान न आने देना।
४—शिष्य न बनाना।
५—पूजा-प्रतिष्ठा और ख्यातिसे यथासाध्य बचना।
६—तर्क-वितर्क, वाद-विवाद, खण्डन-मण्डन और कलह न करना।
७—अपने इष्ट और साधनको ही सर्वोपरि मानना, परन्तु दूसरेके इष्ट और साधनको न नीचा समझना, न उनकी निन्दा करना।
८—शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदिको सदा शुद्ध आध्यात्मिक वायुमण्डलमें रखनेकी चेष्टा करना। यथासाध्य इनको भगवत्सम्बन्धी कार्योंमें ही लगाये रखना।
९—भगवान्को सर्वत्र, सर्वदा विराजित देखना।
१०—प्रतिदिन कम-से-कम दो घण्टे एकान्तमें भगवान्का ध्यान करना, भगवान्से भगवद्भावको पानेकी सच्ची प्रार्थना करना और ऐसा अनुभव करना मानों भगवान्की पवित्र शक्ति मेरे अन्दर प्रवेश कर रही है और मेरा हृदय पवित्रसे और पवित्रतम होता जा रहा है और अज्ञान, अहंता, ममता, राग-द्वेषादि दोषोंका नाश होकर उनके स्थानपर दैवी गुणोंका विकास बड़ी तेजीसे हो रहा है।
११—काम, क्रोध, लोभ, दम्भ, दर्प, वैर, ईर्ष्या आदि मानसिक दोषोंको अपने अन्दर जगह देनेसे इनकार कर देना, इनको जरा भी आदर न देना और पद-पदपर इनका तिरस्कार करना। याद रखना चाहिये कि ये सब दोष हमारी लापरवाही अथवा अज्ञात वा ज्ञात अनुमतिसे ही हमारे अन्दर रह रहे हैं। जिस दिन हमारा आत्मा बलपूर्वक इनको अन्दर रहनेसे रोक देगा, उस दिनसे इनका अन्दर रहना कठिन हो जायगा। बार-बार तिरस्कारपूर्ण धक्के खा-खाकर आखिर ये हमारे अन्दरसे सदाके लिये चले जायँगे।
१२—मन जहाँ-जहाँ दौड़ता है और मनमानी करता है, इसमें प्रधान कारण हमारी कमजोरी ही है। वस्तुत: आत्माकी दृष्टिसे या अनन्तशक्ति परमात्माका सनातन अंश होनेके कारण—जीवमें अपार शक्ति है; उस आत्मिक या ईश्वरीय शक्तिके सामने मन-इन्द्रिय आदिकी शक्ति तुच्छ और नगण्य है। बल्कि मन-इन्द्रियादिमें जो शक्ति है, वह आत्माकी ही दी हुई है। शक्तिका मूल उत्स और एकमात्र भण्डार तो आत्मा ही है। वह आत्मा यदि अपने स्वरूपको सँभालकर, उसमें प्रतिष्ठित होकर बलपूर्वक मन-इन्द्रियादिको आज्ञा दे दे कि ‘खबरदार, अब तुम असत् विषयोंको अपने अन्दर नहीं रख सकते’ तो फिर इनकी ताकत नहीं कि ये इन विषयोंको अपनेमें स्थान दे सकें। इसलिये मन-इन्द्रियोंको सदा आत्माका अनिवार्य आदेश देते रहना चाहिये। पूर्वाभ्यासवश आत्मासे अनुमति पानेकी इनकी चेष्टा एक-ही-दो बारके आदेशसे नष्ट नहीं हो जायगी। परन्तु जब-जब ये अनुमति माँगें, तभी तब इनसे स्पष्टतया कह देना चाहिये कि ‘तुम हमारे अधीन हो—तुम्हें हमारे आज्ञानुसार चलना ही होगा’ और इन्हें बड़ी सावधानीसे निरन्तर भगवान्में लगाये रखना चाहिये।
१३—अपने इष्ट-मन्त्रका या भगवन्नामका स्मरण-चिन्तन जितना अधिक-से-अधिक हो सके, श्रद्धा और विश्वासपूर्वक करना चाहिये।
१४—जहाँतक हो सके, स्त्रियोंसे मिलना-जुलना बन्द कर देना चाहिये। सन्तभावको चाहनेवाली स्त्रियाँ भी पुरुषोंसे अनावश्यक और अधिक न मिलें।
१५—यथासाध्य सांसारिक वस्तुओंका संग्रह कम-से-कम करना चाहिये और संगृहीत वस्तुओंपर एकमात्र परमात्माका ही अधिकार मानना चाहिये।
सन्तभावकी प्राप्तिमें विघ्न
सन्तभावकी प्राप्तिमें प्रधान विघ्न है—कीर्तिकी कामना। स्त्री-पुत्र, घर-द्वार, धन-ऐश्वर्य और मान-सम्मानका त्याग कर चुकनेवाला पुरुष भी कीर्तिकी मोहिनीमें फँस जाता है। कीर्तिकी कामनाका त्याग तो दूर रहा, स्थूल मान-प्रतिष्ठाका त्याग भी बहुत कठिन होता है। जिस मनुष्यकी साधनधारा चुपचाप चलती है, उसको इतना डर नहीं है; परन्तु जिसके साधक होनेका लोगोंको पता चल जाता है, उसकी क्रमश: ख्याति होने लगती है, फिर उसकी पूजा-प्रतिष्ठा आरम्भ होती है, स्थान-स्थानपर उसका मान-सम्मान होता है और इस पूजा प्रतिष्ठा तथा मान-सम्मानमें जहाँ उसका तनिक भी फँसाव हुआ कि पतन आरम्भ हो जाता है। इन्द्रियाँ प्रबल हैं ही—मान-सम्मान तथा पूजा-प्रतिष्ठामें जहाँ इन्द्रियोंको आराम पहुँचानेवाले भोग भक्तोंद्वारा समर्पित होकर इन्द्रियोंको उपभोगार्थ मिलने लगे, वहीं उनकी भोग-वासना और भी विशेष जाग्रत् होकर प्रबल हो उठती है, इन्द्रियाँ मनको खींचती हैं, मन बुद्धिको—और जहाँ बुद्धि अपने परम लक्ष्य परमात्माको छोड़कर विषय सेवन परायण इन्द्रियोंके अधीन हो जाती है, वहीं सर्वनाश हो जाता है। अतएव सन्तभावकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करनेवाले साधकोंको बड़ी ही सावधानीके साथ ख्याति, मान-सम्मान, पूजा-प्रतिष्ठा आदिसे अपनेको बचाये रखना चाहिये। इन सबको अपने साधनमार्गमें प्रधान विघ्न समझकर इनका विषवत् त्याग करना चाहिये। यह बात याद रखनी चाहिये कि विषयी पुरुषोंकी मनोवृत्तिसे साधककी मनोवृत्ति सर्वथा विपरीत होती है। विषयी धन-ऐश्वर्य, मान-यश आदिके प्रलोभनमें पड़ा रहता है तो साधक इनके त्याग या इनसे अलिप्त रहनेमें ही अपना कल्याण समझता है।
ऐसे साधकोंके भक्तों और अनुयायियोंको भी चाहिये कि वे सन्त-सेवा—गुरुभक्तिके नामपर भ्रमवश इन्द्रियोंकी भूख बढ़ानेवाले मोहक भोग उनके चरणोंपर चढ़ाकर उनके लिये विलास-सामग्रियोंका संग्रह करके उन्हें पवित्र मर्यादित सन्त-जीवनसे गिरानेकी चेष्टा न करें। सन्त और गुरुका सम्मान और उनकी पूजा करना शिष्यका परम कर्तव्य है और उसके लिये लाभदायक भी है; परन्तु उनकी सच्ची पूजा उसी कार्यमें है जो उनके लिये हानिकर नहीं है और जो आध्यात्मिक उन्नतिमें सहायक होनेके कारण हृदयसे उनका इच्छित है। जो मान-सम्मान और पूजा-प्रतिष्ठाके लिये ही सन्तका बाना धारण करता है, वह तो सन्त ही नहीं है। इसलिये सच्चे साधक सन्त मान-सम्मान और पूजा-प्रतिष्ठाकी इच्छा क्यों करने लगे। यदि भ्रमवश करते हैं तो वह उनके साधनमें विघ्नरूप होनेके कारण उनके लिये महान् हानिकर है। अतएव भक्त और शिष्योंको सन्त और गुरुके लिये विलास-सामग्री जुटानेमें आत्मसंयमसे काम लेना चाहिये; क्योंकि विलास-सामग्रीसे सन्तका यथार्थ सम्मान कभी नहीं होता। बल्कि त्यागी महात्माको भोगपदार्थ देना या भोगपदार्थके लिये उनके मनमें लालच उत्पन्न करनेकी चेष्टा करना तो उनका अपमान या तिरस्कार ही करना है। शरशय्यापर पड़े हुए वीर-शिरोमणि भीष्मके लटकते हुए मस्तकके लिये रूईका तकिया नहीं शोभा देता, उसके लिये तो अर्जुनके तीक्ष्ण बाणोंका तकिया ही प्रशस्त और योग्य है। इसी प्रकार सन्त-महात्माओंका यथार्थ सम्मान उनके आज्ञापालनमें, उनके आदर्श चरित्रके अनुकरणमें और उनके वेषके अनुरूप ही उनकी सेवा करनेमें है। पहुँचे हुए सन्त-महात्मा पुरुष कभी भक्तोंका अत्यन्त आग्रह देखकर उनकी प्रसन्नताके लिये किसी वैध भोग-सामग्रीको स्वीकार कर लेते हैं, जो निषिद्ध न होनेपर भी उनके स्वरूपके अनुरूप शोभा देनेवाली नहीं है, तो इससे उनका अवश्य ही कुछ भी बनता-बिगड़ता नहीं; वे तो अपने स्वरूपके विपरीत वस्तुको स्वीकार करके अपने सन्त-स्वभावका ही सुन्दर परिचय देते हैं। परन्तु उनकी देखा-देखी साधक सन्त यदि वैसा करने लगते हैं तो उनकी बड़ी हानि हो सकती है। अतएव साधक सन्तोंको इस विघ्नसे बचे रहना चाहिये।
विलास-सामग्री, मान-सम्मान और पूजा-प्रतिष्ठाका त्याग करनेपर भी इनके त्यागसे होनेवाली कीर्तिकी कामना तो किसी-न-किसी अंशमें साधकके मनमें प्राय: रह ही जाती है। इसीलिये सच्चे सन्तलोग त्यागका भी त्याग कर देना चाहते हैं, उनके लिये त्यागकी स्मृति भी रसहीन हो जाती है। इस प्रकार जिन सन्त-महात्माओंने मान-बड़ाई, पूजा-प्रतिष्ठाके साथ ही कीर्ति-कामनाका भी कतई त्याग कर दिया है, वे ही यथार्थ सन्त हैं। साधक-सन्तोंके लिये इस कीर्ति-कामनारूपी प्रधान विघ्नके त्यागकी तो आवश्यकता है ही, छोटे-छोटे निम्नलिखित विघ्नोंसे भी उन्हें बचे रहना चाहिये। ये छोटे विघ्न भी आश्रय पानेसे आगे चलकर बड़े हो जाते हैं और साधकको लक्ष्यच्युत करके उसका सर्वनाश कर देते हैं—
१—सभा-समितियोंमें शामिल होना और अनावश्यक अखबार पढ़ना।
२—किसी भी मनुष्यविशेष, स्थानविशेष या वस्तुविशेषमें विशेषरूपसे ममता होना।
३—मठ या आश्रमादिकी स्थापना करना।
४—साधनमें आलस्य, दीर्घसूत्रता, प्रमाद, अश्रद्धा, अविश्वास और निश्चयकी कमी।
५—शास्त्रार्थ करना।
६—अपनेको सन्त समझना और दूसरोंको असन्त।
७—दूसरोंके दोष देखना और उन्हें प्रकट करना।
८—किसी भी मनुष्यका अपमान करना और किसीकी निन्दा करना।
९—परचर्चा।
१०—नाटक-सिनेमा आदि देखना—असत् साहित्य पढ़ना।
११—अशास्त्रीय कार्यमें रुचि।
१२—बड़ोंका असम्मान।
१३—किसी भी जीवसे घृणा करना।
१४—विपत्तिमें घबराकर और सम्पत्तिमें हर्षसे फूलकर कर्तव्यको भूल जाना।
१५—जगत्के विषयोंकी प्राप्तिमें जीवनकी सफलता समझना और इस सफलतामें भगवान्की कृपाका या किसी साधन-सिद्धिका अनुभव करना।
१६—किसी कारणवश किसी कार्यके अकस्मात् सिद्ध हो जानेपर या किसी बातके सत्य हो जानेपर अपनेको सिद्ध मानना और लोगोंको चमत्कार दिखलानेकी इच्छा करना।
सन्तसे जगत्का उपकार और सन्त-महिमा
सन्तका जीवन ही जगत्के कल्याणके लिये होता है; अतएव उनका जगत् पर जितना उपकार है, उतना और किसीका भी नहीं है। उनका लोकसेवाव्रत और उनका यथार्थ विश्वप्रेम जगत्में जिस कल्याणकी सुधाधारा बहाता रहता है, वह धारा यदि कभी सूख गयी होती तो अबतक सारा जगत् सर्वथा राक्षसोंका भयानक नरकागार बन गया होता। देवासुरयुद्ध चलता है, कभी-कभी असुरोंकी विजय होती है, राक्षसोंका अभ्युदय भी होता है; परन्तु सन्तोंका अस्तित्व और उनका अनवरत कल्याण-वितरण राक्षसोंको स्थायी नहीं होने देता। सन्त जब निरुपाय-से हो जाते हैं या स्वयं अपनी तप:शक्तिसे कार्य न लेकर भगवान्से काम लेना चाहते हैं, तब सन्तोंके रक्षणार्थ स्वयं भगवान्को अवतीर्ण होना पड़ता है; वस्तुत: भगवान्के अवतारमें प्रधान हेतु ‘साधु-परित्राण’ ही है। सन्त जगत्में जिन विशुद्ध सात्त्विक परमाणुओंको फैलाते रहते हैं, उसीसे सत्त्वगुण और सदाचारकी रक्षा होती है। सन्त प्रत्यक्ष भगवान्के विग्रह हैं। भगवान्से मिलना बहुत कठिन है, परन्तु सन्त हमसे मिलनेके लिये ही संसारमें—हमलोगोंके बीचमें रहते हैं—इससे ये हमारे लिये भगवान्से बढ़कर उपादेय हैं; क्योंकि ये संसारसे सर्वथा पृथक् रहकर भी—प्रपंचसे सर्वथा उदासीन होनेपर भी हमारे बहुत ही निकट रहते हैं और हमें हाथ पकड़कर वैकुण्ठधाममें पहुँचा देते हैं। यही तो इनका सबसे बड़ा चमत्कार है। सन्तोंकी वेषभूषा, उनकी भाषा-भंगी, उनकी शिक्षा-दीक्षाकी ओर न देखकर उनकी नित्य समता, बुद्धिमत्तापूर्ण असाधारण सरलता और प्रभुमय जीवनसे सबको लाभ उठाना चाहिये। सन्त विश्वके सूर्य हैं, उसके प्राण हैं, उसके आकाश हैं, उसके हृदय हैं, उसके अवलम्बन हैं, उसके आत्मीय हैं और उसके आत्मा हैं। वे स्वयं सब समय परमात्मामें स्थित रहते हुए ही, प्रत्येक प्रतिकूलतामें साक्षात् आत्मस्वरूप अनुकूलताका स्वाभाविक अनुभव करते हुए ही, जगत्के प्राणियोंकी दु:खदायिनी प्रतिकूलताको अनुकूलतामें परिणत करनेके लिये प्रयत्नवान् रहते हैं, उनकी वाणीसे अमर ज्ञानामृत झरता है, उनके नेत्रोंसे प्रेमकी शीतल सुखद ज्योति निकलती है, उनके मस्तिष्कसे जगत्का कल्याण प्रसूत होता है, उनके हृदयसे आनन्दकी धारा बहती है। जो उनके सम्पर्कमें आ जाता है, वह पाप-तापसे मुक्त होकर महात्मा बन जाता है। वे जिस देशमें रहते हैं, वह देश पुण्यतीर्थ बन जाता है; वे जो उपदेश करते हैं, वह पावन शास्त्र हो जाता है; वे जिन कर्मोंको करते हैं, वे ही कर्म सत्कर्म समझे जाते हैं।
तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि, सुकर्मीकुर्वन्ति कर्माणि, सच्छास्त्रीकुर्वन्ति शास्त्राणि।
(नारदभक्तिसूत्र ६९)
वह देश धन्य है, जहाँ ये रहते हैं; वह माता धन्य है, जिसकी कोखसे ये प्रकट होते हैं; वह मनुष्य धन्य है, जो इनके सम्पर्कमें आता है; वह वाणी धन्य है, जो इनका स्तवन करती है और वे कान धन्य हैं; जिनको इनके उपदेशामृत पान करनेका अवसर मिलता है।
कुलं पवित्रं जननी कृतार्था
वसुन्धरा पुण्यवती च तेन।
अपारसंवित्सुखसागरेऽस्मिँ-
ल्लीनं परे ब्रह्मणि यस्य चेत:॥
(स्कन्दपुराण)
सन्तोंकी महिमा गाते हुए स्वयं भगवान् कहते हैं कि ‘जो अकिंचन, जितेन्द्रिय, शान्त, समबुद्धि सन्तपुरुष मुझको लेकर ही सन्तुष्ट है, उसके लिये सब ओर आनन्द-ही-आनन्द है। मुझमें ही चित्तको सदा लगाये रखनेवाला ऐसा पुरुष मुझको छोड़कर ब्रह्माका पद, इन्द्रपद, चक्रवर्ती राज्य, पातालादिका राज्य,योगकी सिद्धियाँ और मोक्ष भी नहीं चाहता। इसीलिये हे उद्धव! तुम-जैसे सन्त भक्त मुझको जितने प्यारे हैं, उतने मेरे आत्मस्वरूप साक्षात् ब्रह्मा, शंकर, बलभद्रजी, लक्ष्मी और अपना आत्मा भी प्यारे नहीं हैं। मैं ऐसे निरपेक्ष, शान्त, निर्वैर और समदर्शी सन्तकी चरणरजसे अपनेको पवित्र करनेके लिये सदा ही उसके पीछे-पीछे फिरा करता हूँ—
निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम्।
अनुव्रजाम्यहं नित्यं पूयेयेत्यङ्घ्रिरेणुभि:॥
(श्रीमद्भा०११।१४।१६)