शरण-साधन
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद्व्रतं मम॥
‘जो एक बार भी शरण होकर कह देता है कि मैं आपका हूँ, उसे मैं सब भूतोंसे अभय कर देता हूँ। यह मेरा व्रत है।’
ये शब्द मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके हैं। श्रीरामचन्द्रजीकी प्रतिज्ञा प्रसिद्ध है ‘राम एक बार जो कह देते हैं, बस वही करते हैं, दूसरी बार उसे बदलते नहीं—रामो द्विर्नाभिभाषते।’
उपर्युक्त भगवद्वाक्यके अनुसार एक बार भी जो भगवान्की शरण हो जाता है, उसीको भगवान् अपना लेते हैं और अभय कर देते हैं।
शरण होनेवाले साधकके लिये यह आवश्यक नहीं है कि वह अन्य साधनोंके द्वारा पहले निष्पाप हो ले और फिर भगवान्की शरणमें जाय। न यही जरूरी है कि वह उत्तम वर्ण, उत्तम कुल, उत्तम गुण और उत्तम आचारोंसे सम्पन्न हो। कोई भी, कैसा भी क्यों न हो, भगवान् सभीको अपनी कल्याणमयी गोदमें आश्रय देनेको सदा तैयार हैं। बस, दो ही बात होनी चाहिये—एक तो भगवान्में और उनकी शरणागत-वत्सलतामें पूरा विश्वास और दूसरी अपनेको सब ओरसे असहाय—सारे सहारोंसे रहित दीन-हीन मानकर, किसी भी दूसरी ओर न ताककर निर्भरताके साथ उनके श्रीचरणोंमें डाल देनेकी सच्ची लालसा।
भगवान्की कृपा और शरणागत-वत्सलतापर विश्वास जबतक न होगा, तबतक एकमात्र उनके चरणोंका आश्रय पकड़नेमें हिचक रहेगी। जहाँ सन्देह है, वहाँ निर्भरता नहीं हो सकती। इसलिये पहली बात है—विश्वास और दूसरी बात है अन्य सारे अवलम्बनोंके प्रति अनास्था; फिर पाप तो भगवान्की शरणमें आते ही वैसे ही नष्ट हो जायँगे जैसे सूर्योदयकी सूचनासे ही अन्धकारका नाश हो जाता है। जैसे सूर्यके सामने कभी अन्धकार आ नहीं सकता, वैसे ही शरणागतके समीप पाप नहीं आ सकते। रही ताप या दु:खोंकी बात—सो जब परम आनन्दमय प्रभुकी शरण प्राप्त हो जाती है, तब वहाँ ताप रह ही कैसे सकते हैं? ताप तो विषयोंको आश्रय करके ही रहते हैं और विषयोंके आश्रयी नर-नारियोंको ही सदा जलाया करते हैं। जिन्होंने भगवान्का आश्रय ले लिया है, वे तो उस परम शान्ति और अचल शीतलताके साम्राज्यमें जा पहुँचते हैं, जहाँ दु:ख-तापके लिये प्रवेशका अधिकार ही नहीं है।
नीच महापापी हो चाहे,
चाहे हो अति हीन मलीन।
भीषण नरक-कुंडका कीड़ा
पड़ा सड़ रहा हो अति दीन॥
जो शरण्य स्वामीको अपना
एकमात्र रक्षक पहचान।
जा पड़ता सत्वर चरणोंमें
सच्चे मनसे अपने जान॥
नहीं देखते जाति-पाँतिको,
नहीं देखते पापाचार।
शील-मान-कुल नहीं देखते,
नहीं देखते कुव्यवहार॥
केवल मनके भाव और
नीयतपर देते हैं प्रभु ध्यान।
रख लेते तुरंत निज आश्रय
उसको अपना निज-जन जान॥
अपने हाथों बड़े स्नेहसे
पाप-ताप-मल धोते आप।
अपने हाथों गले लगाकर
हर लेते सारा संताप॥
मिल जाती फिर पूर्ण विमल मति
पराशान्ति अति परमानन्द।
करुणावरुणालय नित निज
सेवामें रखते आनँदकन्द॥
शरणागत भक्तके न शोक रह सकता है न विषाद, न दु:ख न ताप, न चिन्ता न भय। उसे कुछ करना भी नहीं पड़ता। सब काम भगवत्कृपाकी शक्तिसे अपने-आप हो जाते हैं। शरणागतिमें कोई शर्त नहीं, कोई कैद नहीं। बस, एक ही शर्त है—एकमात्र भगवान्को ही परम आश्रय जानकर उनकी शरण हो जाना—पुकारकर कह देना—‘नाथ! मैं केवल तुम्हारा हूँ, तुम्हारे चरणोंपर आ पड़ा हूँ। दीन-हीन हूँ, पापी-अपराधी हूँ, साधनहीन मलिनमति हूँ, पर तुम्हारा हूँ; एकमात्र तुम्हारी ही कृपापर निर्भर हूँ’ फिर तो भगवान् उसे निहाल कर देते हैं—अपनी सेवामें नियुक्त कर लेते हैं। भगवत्कृपासे वह उस आनन्दको अनायास ही पा जाता है जो अनिर्वचनीय है। भगवान् स्वयं घोषणा करके कहते हैं—
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥
‘सब धर्मोंको छोड़कर तुम एकमात्र मेरी शरणमें आ जाओ। मैं तुम्हें सब पापोंसे छुड़ा दूँगा। तुम चिन्ता न करो।’