श्रीशत्रुघ्नजी
महामना श्रीशत्रुघ्नजी भगवान् श्रीरामचन्द्र, भरत, लक्ष्मण तीनोंसे छोटे थे। श्रीसुमित्राजीके पुण्यवान् पुत्र थे। इनके सम्बन्धमें रामायणमें जो कुछ वर्णन आया है, उससे यही पता लगता है कि श्रीशत्रुघ्नजी बहुत थोड़ा बोलनेवाले, अत्यन्त तेजस्वी, वीर, सेवापरायण, रामदासानुदास, चुपचाप काम करनेवाले, सच्चे सत्पुरुष थे। श्रीलक्ष्मण और श्रीशत्रुघ्न दोनों ही भाइयोंने अपना जीवन परम पवित्र सेवामें बिताया, परन्तु लक्ष्मणकी सेवासे भी शत्रुघ्नकी सेवाका महत्त्व एक प्रकारसे अधिक है। श्रीलक्ष्मण श्रीरामके सेवक हैं, परन्तु शत्रुघ्न तो श्रीरामसेवक भरतजीके चरणसेवक और साथी हैं। छायाकी भाँति उनके साथ रहते और चुपचाप आज्ञानुसार सेवा किया करते हैं। ये बड़े संकोची हैं, अपनी ओरसे कभी किसी कामके बीचमें नहीं बोलते। किसीपर क्रोध नहीं करते, अपनी ओरसे आगे होकर कुछ भी नहीं करते। सेवकोंके सेवकका यही तो धर्म है।
श्रीशत्रुघ्नजीके अपनी ओरसे बोलनेके विशेष अवसर दो मिलते हैं। प्रथम, जब श्रीभरतजी ननिहालसे आकर माता कैकेयीसे मिलते हैं और कैकेयी पाषाणहृदया बनकर महाराज दशरथकी मृत्यु और श्रीराम-लक्ष्मणके वन जानेका विवरण सुनाती है और कहती है कि बेटा! यह सब मैंने तेरे ही लिये किया है—
तात बात मैं सकल सँवारी।
भै मंथरा सहाय बिचारी॥
तब भरत शोकाकुल होकर विलाप करते और आवेशमें आकर माताको भला-बुरा कहने लगते हैं। शत्रुघ्न भी माताकी कुटिलतापर अत्यन्त क्षुब्ध हैं, शरीरमें आग लग रही है, परन्तु उनका तो बोलनेका कुछ अधिकार है नहीं।
सुनि सत्रुघ्न मातु कुटिलाई।
जरहिं गात रिस कछु न बसाई॥
इसी समय कुबरी मन्थरा सज-धजकर वहाँ आती है। वह भरतको अपनी ही प्रकृतिके अनुसार स्वार्थी और राज्यलोभी समझती है। वह समझती है कि भरतके लिये राज्यका सारा सामान मैंने ही बनाया है, वह मुझे इनाम देगा, इसीलिये बनठन कर आती है।
हँसती-उछलती सजी-धजी कुबरीको देखकर शत्रुघ्नजी क्रोधको नहीं सँभाल सके—
लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई।
बरत अनल घृत आहुति पाई॥
हुमगि लात तकि कूबर मारा।
परि मुह भर महि करत पुकारा॥
कूबर टूटेउ फूट कपारू।
दलित दसन मुख रुधिर प्रचारू॥
सुनि रिपुहन लखि नखसिख खोटी।
लगे घसीटन धरि धरि झोंटी॥
उपयुक्त इनाम मिल गया। दयामय भरतजीने मन्थराको छुड़ा दिया।
दूसरे, श्रीराम अयोध्याके सिंहासनपर आसीन हैं, तीनों भाई सेवा और धर्मयुक्त शासनमें सहायता करते हैं। एक समय तपस्वियोंने आकर श्रीरामचन्द्रसे लवणासुरके अत्याचारोंका वर्णन करते अपना दुखड़ा सुनाया और उसे मारनेके लिये प्रार्थना की। दुष्टदर्पहारी शिष्टरक्षक भगवान् श्रीरामने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और दरबारमें पूछा कि ‘लवणासुरको वध करनेका श्रेय तुमलोगोंमें कौन लेना चाहते हैं? वहाँकी समृद्धिका अधिकारी कौन होना चाहते हैं। भरत या शत्रुघ्न?’
श्रीभरतने कहा कि ‘मैं लवणासुरका वध कर सकता हूँ’ इसपर शत्रुघ्नजीने प्रार्थना की कि ‘प्रभो! श्रीभरतजी बहुत काम कर चुके हैं। आपके वनवासके समय इन्होंने अयोध्याका पालन किया, अनेक प्रकार दु:ख सहे, नन्दीग्राममें कुशकी शय्यापर सोये, फल-मूलका आहार किया, जटा रखी, वल्कल पहने, सब कुछ किया। अब मेरी प्रार्थना है कि मेरे रहते इन्हें युद्धके लिये न भेजकर मुझे ही आज्ञा दीजिये।’
शत्रुघ्नजीके इन वचनोंको सुनकर श्रीरामने उनका प्रस्ताव स्वीकार करते हुए कहा—‘भाई! तुम्हीं जाकर दैत्यका वध करो, मैं तुम्हें मधु-दैत्यके सुन्दर नगरका राजा बनाता हूँ।’ श्रीराम जानते थे कि शत्रुघ्न दुष्ट राक्षसका वध करना चाहते हैं, उन्हें राज्यका लोभ नहीं है। इसलिये पहलेसे ही कह दिया कि ‘श्रीवसिष्ठ आदि ऋषि मन्त्र और विधिपूर्वक तुम्हारा अभिषेक करेंगे। मैं जो कुछ कहूँ सो तुम्हें स्वीकार करना चाहिये; क्योंकि बालकोंको गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन करना ही उचित है।’
इसपर वीर्य-सम्पन्न श्रीशत्रुघ्नजी बड़े ही संकोचमें पड़कर धीरेसे कहने लगे—‘महाराज! बड़े भाइयोंके रहते राजगद्दीपर बैठना मैं अधर्म समझता हूँ, जब भरतजी महाराज लवणासुरको मारनेके लिये कह रहे थे तब मुझे बीचमें नहीं बोलना चाहिये था। मेरा बीचमें बोलना ही मेरे लिये इस दुर्गतिका कारण हुआ। अब आपकी आज्ञाका उल्लंघन करना भी मेरे लिये कठिन है; क्योंकि आपसे मैं यह धर्म कई बार सुन चुका हूँ।’
इसके बाद शत्रुघ्नजी लवणासुरपर चढ़ाई करते हैं, रास्तेमें श्रीवाल्मीकिजीके आश्रममें ठहरते हैं, उसी रातको सीताके दोनों कुमारोंका जन्म होता है, जिससे शत्रुघ्नको बड़ा हर्ष होता है। फिर जाकर लवणासुरका वध करके वहाँ बारह वर्ष रहकर श्रीराम-दर्शनार्थ लौटते हैं। आते समय पुन: श्रीवाल्मीकिके आश्रममें ठहरते हैं और लव-कुशके द्वारा मुनिरचित रामायणका गान सुनकर आनन्दमें लोट-पोट हो जाते हैं, अयोध्या आकर सबसे मिलते हैं, पुन: श्रीरामकी आज्ञासे मधुपुरी लौटकर धर्मपूर्वक शासन करते हैं।
इनके जीवनसे भी मर्यादाकी बड़ी शिक्षा मिलती है।