वर्णाश्रम-धर्म

चारों वर्णोंके धर्म

भगवान् श्रीकृष्ण भक्तवर उद्धवजीसे कहते हैं—

शम, दम, तप, शौच, सन्तोष, क्षमा, कोमलता, मेरी भक्ति, दया और सत्य—ये ब्राह्मण-वर्णके स्वभाव हैं। तेज, बल, धैर्य, शूरवीरता, सहनशीलता, उदारता, पुरुषार्थ, स्थिरता, ब्रह्मण्यता (ब्राह्मण-भक्ति) और ऐश्वर्य—ये क्षत्रिय-वर्णके स्वभाव हैं। आस्तिकता, दानशीलता, दम्भहीनता, विप्रपरायणता और लगातार धन-संचय करते रहना—ये वैश्य-वर्णके स्वभाव हैं। ब्राह्मण, गौ और देवताओंकी निष्कपटभावसे सेवा करना और उसीसे जो कुछ मिल जाय, उसमें संतुष्ट रहना—ये शूद्र-वर्णके स्वभाव हैं। × × × × अहिंसा, सत्य, अस्तेय, काम, क्रोध और लोभसे रहित होना और प्राणियोंकी प्रिय-हितकारिणी चेष्टामें तत्पर रहना—ये सभी वर्णोंके धर्म हैं।

ब्रह्मचारीके धर्म

अब चारों आश्रमोंमें पहले ब्रह्मचारीके धर्म बतलाते हैं—

जातकर्म आदि संस्कारोंके क्रमसे उपनयन-संस्कारद्वारा दूसरा जन्म पाकर द्विज-कुमार (ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य-वर्णका बालक)इन्द्रियदमनपूर्वक गुरुगृहमें वास करता हुआ गुरुद्वारा बुलाये जानेपर वेदका अध्ययन करे। ऐसे ब्रह्मचारीको चाहिये कि मूँजकी मेखला, मृगचर्म, दण्ड, रुद्राक्ष, ब्रह्मसूत्र, कमण्डलु और आप-से-आप बढ़ी हुई जटाओंको धारण करे, वस्त्रोंको (शौकीनीके लिये) न धुलवाये, रंगीन आसनपर न बैठे तथा कुशाओंको धारण करे। स्नान, भोजन, होम, जपके समय मौन रहे; नख तथा कक्ष एवं उपस्थके बालोंको भी न कटवाये। पूर्ण ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए स्वयं कभी वीर्यपात न करे और यदि असावधानतावश स्वप्नादिमें कभी हो जाय तो जलमें स्नान करके प्राणायामपूर्वक गायत्रीका जप करे। प्रात:काल और सायंकाल दोनों समय मौनावलम्बनपूर्वक गायत्रीका जप करते हुए पवित्रता और एकाग्रताके साथ अग्नि, सूर्य, आचार्य, गौ, ब्राह्मण, गुरु, वृद्धजन और देवताओंकी उपासना और सन्ध्योपासन करे। आचार्यको साक्षात् मेरा ही स्वरूप समझे, उसका कभी भी निरादर न करे और न कभी साधारण मनुष्य समझकर उसकी किसी बातकी उपेक्षा या अवहेलना ही करे; क्योंकि गुरु सर्वदेवमय होता है। सायंकाल और प्रात:काल दोनों समय जो कुछ भिक्षा मिले अथवा और भी जो कुछ प्राप्त हो, गुरुके आगे रख दे और फिर उनके आज्ञानुसार उसमेंसे लेकर संयमपूर्वक उपभोग करे। आचार्यके जाने, लेटने, बैठने और ठहरनेमें सदा अति नम्रतासे हाथ जोड़े हुए साथ ही रहे और अति नीचके समान सदा उनकी सेवा-शुश्रूषामें लगा रहे। इस प्रकार सब प्रकारके भोगोंसे दूर रहकर जबतक विद्या समाप्त न हो जाय, अखण्डित ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करता हुआ वह गुरुकुलमें रहे। यदि स्वर्गादि लोक अथवा जहाँ मूर्तिमान् वेद रहते हैं, उस ब्रह्मलोकमें जानेकी इच्छा हो तो नैष्ठिक ब्रह्मचर्य लेकर यावज्जीवन वेदाध्ययन करनेके लिये गुरुको अपना शरीर समर्पण कर दे। उस ब्रह्म-वर्चस्वी निष्पाप बाल-ब्रह्मचारीको चाहिये कि अग्नि, गुरु, आत्मा और समस्त प्राणियोंमें अभिन्न भावसे मेरी उपासना करे। गृहस्थाश्रममें न जानेवाला ब्रह्मचारी स्त्रियोंका दर्शन, स्पर्श, उनसे वार्तालाप तथा हँसी-मसखरी आदि कभी न करे तथा न किसी भी नर-मादा प्राणियोंको विषय-रत होते दूरसे भी देखे। हे यदुकुलनन्दन! शौच, आचमन, स्नान, सन्ध्योपासन, सरलता, तीर्थसेवन, जप, अस्पृश्य, अभक्ष्य और अवाच्यका त्याग; समस्त प्राणियोंमें मुझे देखना तथा मन, वाणी और शरीर-संयम—ये धर्म सभी आश्रमोंके हैं। इस प्रकार नैष्ठिक ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाला अग्निके समान तेजस्वी होता है; तीव्र तपके द्वारा उसकी कर्म-वासना दग्ध हो जानेके कारण चित्त निर्मल हो जानेसे वह मेरा भक्त हो जाता है और अन्तमें मेरे परमपदको प्राप्त होता है। यदि अपने इच्छित शास्त्रोंका अध्ययन समाप्त कर चुकनेपर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करनेकी इच्छा हो तो गुरुको दक्षिणा देकर उनकी अनुमतिसे स्नान आदि करे अर्थात् समावर्तन-संस्कार करके ब्रह्मचर्य-आश्रमको छोड़ दे। श्रेष्ठ ब्रह्मचारीको चाहिये कि ब्रह्मचर्य-आश्रमके उपरान्त गृहस्थ अथवा वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश करे अथवा यदि विरक्त हो तो संन्यास ले ले। इस प्रकार एक आश्रमको छोड़कर अन्य आश्रमका अवश्य ग्रहण करे; मेरा भक्त होकर अन्यथा आचरण कभी न करे अर्थात् निराश्रम रहकर स्वच्छन्द व्यवहारमें प्रवृत्त न हो।

गृहस्थके धर्म

जो गृहस्थाश्रममें प्रवेश करना चाहे, वह अपने अनुरूप निष्कलंक कुलकी तथा अवस्थामें अपनेसे छोटी, अपने ही वर्णकी कन्यासे विवाह करे अथवा अपनेसे नीचे-नीचेके वर्णोंमेंसे भी विवाह कर सकता है।

यज्ञ करना, पढ़ना और दान देना—ये धर्म तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तीनोंके लिये विहित है; किन्तु दान लेना, पढ़ाना और यज्ञ कराना—ये केवल ब्राह्मण ही करे। किन्तु प्रतिग्रह (दान लेना) तप, तेज और यशका विघातक है; इसलिये ब्राह्मण पढ़ाने और यज्ञ करानेसे ही जीविका निर्वाह करे अथवा यदि इनमें भी (परावलम्बन और दीनता आदि) दोष दिखलायी दे तो केवल शिलोञ्छवृत्तिसे* ही रहे। यह अति दुर्लभ ब्राह्मण-शरीर क्षुद्र विषय-भोग आदिके लिये नहीं है। इसके द्वारा तो यावज्जीवन कठिन तपस्या और अन्तमें अनन्त आनन्दरूप मोक्षका सम्पादन होना चाहिये। इस प्रकार सन्तोषपूर्वक शिलोञ्छ-वृत्तिसे रहकर अपने अति निर्मल महान् धर्मका निष्कामतासे आचरण करता हुआ जो ब्राह्मणश्रेष्ठ सर्वतोभावेन मुझे आत्मसमर्पण करके अनासक्तभावसे अपने घरमें ही रहता है, वह अन्तमें परमशान्तिरूप मोक्ष-पदको प्राप्त करता है। जो कोई मेरे आपत्तिग्रस्त ब्राह्मण भक्तका कष्टसे उद्धार करते हैं, उनको मैं भी समुद्रमें डूबते हुएको नौकाके समान शीघ्र ही सम्पूर्ण विपत्तियोंसे बचा लेता हूँ।

धीर और विचारवान् राजाको चाहिये कि पिताके समान सम्पूर्ण प्रजाकी और स्वयं अपनी भी उसी प्रकार आपत्तिसे रक्षा करे जिस प्रकार कि यूथपति गजराज अपने यूथके अन्य हाथियों और स्वयं अपने-आपको भी (अपनी ही बुद्धि और बल-विक्रमसे) विपत्तियोंसे बचाता है। ऐसा धर्मपरायण नरपति इस लोकमें सम्पूर्ण दोषोंसे मुक्त होकर अन्तसमयमें सूर्य-सदृश प्रकाशमान् विमानपर बैठकर स्वर्गलोकको जाता है और वहाँ इन्द्रके साथ सुख-भोग करता है।

जिस ब्राह्मणको अधिक अर्थकष्ट हो, वह या तो वणिक्-वृत्तिके द्वारा व्यापार आदिसे उसको पार करे अथवा खड्गधारणपूर्वक क्षत्रियवृत्तिका अवलम्बन करे; लेकिन किसी भी दशामें नीच-सेवा रूप श्ववृत्तिका आश्रय न ले। क्षत्रियको यदि दारिद्रॺसे कष्ट हो तो या तो वैश्यवृत्ति या मृगया (शिकार) और या ब्राह्मण-वृत्ति (पढ़ाने)-से कालयापन करे किन्तु नीच-सेवाका आश्रय कभी न ले। इसी प्रकार आपत्तिग्रस्त वैश्य शूद्रवृत्तिरूप सेवाका और शूद्र प्रतिलोम (उच्चवर्णकी स्त्रीमें नीचवर्णके पुरुषसे उत्पन्न) जातिके कारु (धुना) आदिकी चटाई आदि बुननेकी वृत्तिका आश्रय ले। (ये सब विधान आपत्कालके लिये ही हैं।) आपत्तिसे मुक्त होनेपर लोभपूर्वक नीचवृत्तिका अवलम्बन कोई न करे।

गृहस्थ पुरुषको चाहिये कि वेदाध्ययन, स्वधा (पितृ-यज्ञ), स्वाहा (देव-यज्ञ), बलिवैश्वदेव तथा अन्न-दानादिके द्वारा मेरे ही रूप देव, ऋषि, पितर और अन्य समस्त प्राणियोंकी यथाशक्ति पूजा करता रहे। स्वयं प्राप्त अथवा शुद्धवृत्तिके द्वारा उपार्जित धनसे तथा अपने द्वारा जिनका भरण-पोषण होता हो, उन लोगोंको कष्ट न पहुँचाकर न्यायपूर्वक यज्ञादि शुभ कर्म करता रहे। अपने कुटुम्बमें ही आसक्त न हो जाय, बड़ा कुटुम्बी होकर प्रमादवश भगवद्भजनको न भुलाये। बुद्धिमान् विवेकीको उचित है कि प्रत्यक्ष प्रपंचके समान स्वर्गादिको भी नाशवान् जाने। यह पुत्र-स्त्री-कुटुम्ब आदिका संयोग मार्गमें चलनेवाले पथिकोंके संयोगके समान आगमापायी है। निद्रावश होनेपर स्वप्नके समान जन्म-जन्मान्तरमें ऐसे नाना संयोग-वियोग होते रहते हैं। ऐसा विचार करके मुमुक्षु पुरुषको चाहिये कि घरमें अतिथिके समान ममता और अहंकारसे रहित होकर रहे, आसक्तिवश उसमें लिप्त न हो जाय। गृहस्थोचित कर्मोंके द्वारा मेरा यजन करता हुआ मेरी भक्तिसे युक्त होकर चाहे घरमें रहे, चाहे वानप्रस्थ होकर वनमें बसे अथवा यदि पुत्रवान् हो तो (स्त्रीके पालन-पोषणका भार पुत्रको सौंपकर) संन्यास ले ले। किन्तु जो गृहमें आसक्त है, पुत्रैषणा और वित्तैषणासे व्याकुल है, स्त्री-लम्पट, लोभी और मन्दमति है, वह मूढ़ ‘मैं’ और ‘मेरा’ इस मोह-बन्धनमें बँध जाता है। वह सोचता है—‘अहो! मेरे माता-पिता बूढ़े हैं, स्त्री बाला (छोटी अवस्थाकी) है, बाल-बच्चे हैं; मेरे बिना ये अति दीन, अनाथ और दु:खी होकर कैसे जियेंगे? इस प्रकार गृहासक्तिसे विक्षिप्तचित्त हुआ यह मूढ़-बुद्धि विषय-भोगोंसे कभी तृप्त नहीं होता और इसी चिन्तामें पड़ा रहकर एक दिन मरकर घोर अन्धकारमें पड़ता है।

वानप्रस्थके धर्म

जो वानप्रस्थ होना चाहे, वह अपनी स्त्रीको पुत्रोंके पास छोड़कर अथवा अपने ही साथ रखकर शान्तचित्तसे अपनी आयुके तीसरे भागको वनमें रहकर ही बिताये। वह वनके शुद्ध कन्द, मूल और फलोंसे ही शरीर-निर्वाह करे, वस्त्रके स्थानपर वल्कल धारण करे अथवा तृण, पर्ण और मृग-चर्मादिसे काम निकाल ले। केश, रोम, नख, श्मश्रु (मूछ-दाढ़ी) और शरीरके मैल* आदिको बढ़ने दे, दन्तधावन न करे, जलमें घुसकर नित्य त्रिकाल स्नान करे और पृथ्वीपर सोये। ग्रीष्ममें पंचाग्नि तपे, वर्षामें खुले मैदानमें रहकर अभ्रावकाशव्रतका पालन करे तथा शिशिर-ऋतुमें कण्ठ-पर्यन्त जलमें डूबा रहे—इस प्रकार घोर तपस्या करे। अग्निसे पके हुए अन्नादि अथवा काल पाकर स्वयं पके हुए (फल आदि)-से निर्वाह करे। उन्हें कूटनेकी आवश्यकता हो तो ओखलीमें अथवा पत्थरसे कूट ले या दाँतोंसे ही चबा-चबाकर खा ले। अपने उदर-पोषणके लिये कन्द-मूलादि स्वयं ही संग्रह करके ले आये; देश, काल और बलको भलीभाँति जाननेवाला मुनि दूसरेके लाये हुए पदार्थ ग्रहण न करे (अर्थात् मुनि इस बातको जानकर कि अमुक पदार्थ कहाँसे लाना चाहिये, कितनी देरतकका खानेसे हानिकारक न होगा और कौन-कौन पदार्थ अपने अनुकूल हैं—स्वयं ही कन्द-मूल-फल आदिका संचय करे; देश-कालादिसे अनभिज्ञ अन्य जनोंके लाये पदार्थोंके सेवनसे व्याधि आदिके कारण तपस्यामें विघ्न होनेकी आशंका है)। समयानुसार प्राप्त हुए वन्य कन्द-मूल आदिसे ही देवताओं और पितरोंके लिये चरु और पुरोडाश निकाले। वानप्रस्थ होकर वेदविहित पशुओंद्वारा मेरा यजन न करे। हाँ, वेद-वेत्ताओंके आदेशानुसार अग्निहोत्र, दर्श, पूर्णमास और चातुर्मास्यादिको पूर्ववत् करता रहे। इस प्रकार घोर तपस्याके कारण (मांस सूख जानेसे) कृश हुआ वह मुनि मुझ तपोमयकी आराधना करके ऋषि-लोकादिमें जाकर फिर वहाँसे कालान्तरमें मुझको प्राप्त कर लेता है। जो कोई इस अति कष्ट-साध्य मोक्ष-फलदायक तपको क्षुद्र फलों (स्वर्गलोक, ब्रह्मलोक आदि)-की कामनासे करता है, उससे बढ़कर मूर्ख और कौन होगा। जब यह नियमपालनमें असमर्थ हो जाय और बुढ़ापेसे शरीर काँपने लगे, तब अपने शरीरमें अग्नियोंको आरोपित करके, मुझमें चित्त लगाकर अर्थात् मेरा स्मरण करता हुआ उस (अपने शरीरसे ही प्रकट हुई) अग्निमें शरीरको भस्म कर दे। यदि पुण्य-कर्म-विपाकसे किसीको अति दु:खमय होनेके कारण नरक-तुल्य इन लोकोंसे पूर्ण वैराग्य हो जाय तो आहवनीयादि अग्नियोंको त्यागकर संन्यास ग्रहण कर ले। ऐसे विरक्त वानप्रस्थको चाहिये कि वेदविधिके अनुसार (अष्टकाश्राद्ध और प्राजापात्य-यज्ञसे) यजन करके अपना सर्वस्व ऋत्विज‍्को दे दे और अग्नियोंको अपने प्राणमें लय करके निरपेक्ष होकर स्वच्छन्द विचरे। इस विचारसे कि ‘यह हमारे लोकको लाँघकर परमधामको जायगा’ स्त्री आदिके रूपसे देवगण ब्राह्मणके संन्यास लेते समय विघ्न किया करते हैं (अत: उस समय सावधान रहना चाहिये)।

संन्यासीके धर्म

संन्यासीको यदि वस्त्र धारण करनेकी आवश्यकता हो तो एक कौपीन और एक ऊपरसे ओढ़नेको—बस, इतना ही वस्त्र रखे और आपत्कालको छोड़कर दण्ड और कमण्डलुके अतिरिक्त और कोई वस्तु अपने पास न रखे। पहले देखकर पैर रखे, वस्त्रसे छानकर जल पिये, सत्यपूत वाणी बोले और मनसे भलीभाँति विचारकर कोई काम करे। मौनरूप वाणीका दण्ड, निष्क्रियतारूप शरीरका दण्ड और प्राणायामरूप मनका दण्ड—ये तीनों दण्ड जिसके पास नहीं है, वह केवल बाँसका दण्ड ले लेनेमात्रसे (त्रिदण्डी) संन्यासी थोड़े ही हो जायगा। जातिच्युत अथवा गोघातक आदि पतित लोगोंको छोड़कर चारों वर्णोंकी भिक्षा करे। अनिश्चित सात घरोंसे माँगे, उनसे जो कुछ मिल जाय, उसीसे सन्तुष्ट रहे। बस्तीके बाहर जलाशयपर जाकर जल छिड़ककर स्थल-शुद्धि करे और समयपर यदि कोई और भी आ जाय तो उसको भी भाग देकर बचे हुए सम्पूर्ण अन्नको चुपचाप खा ले (आगेके लिये बचाकर न रखे)। जितेन्द्रिय, अनासक्त, आत्माराम, आत्मप्रेमी, आत्मनिष्ठ और समदर्शी होकर अकेला ही पृथ्वीतलपर विचरे। मुनिको चाहिये कि निर्भय और निर्जन देशमें रहे और मेरी भक्तिसे निर्मल-चित्त होकर अपने आत्माका मेरे साथ अभेदपूर्वक चिन्तन करे। ज्ञाननिष्ठ होकर अपने आत्माके बन्धन और मोक्षका इस प्रकार विचार करे कि इन्द्रिय-चांचल्य ही बन्धन है तथा उनका संयम ही मोक्ष है। इसलिये मुनिको चाहिये कि छहों इन्द्रियों (मन एवं पाँच ज्ञानेन्द्रियों)-को जीतकर समस्त क्षुद्र कामनाओंका परित्याग करके अन्त:करणमें परमानन्दका अनुभव करके निरन्तर मेरी ही भावना करता हुआ स्वच्छन्द विचरे। केवल भिक्षाके लिये ही पुर, ग्राम, गोष्ठ और यात्रियोंमें जाता हुआ पुण्य-देश (तीर्थ-स्नानादि), नदी, पर्वत, वन और आश्रमादियुक्त भूखण्डमें विचरता रहे। भिक्षा भी अधिकतर वानप्रस्थियोंके यहाँसे ही ले; क्योंकि शिलोञ्छवृत्तिसे प्राप्त हुए अन्नके खानेसे बहुत शीघ्र ही शुद्ध चित्त और निर्मोह हो जानेसे (जीवन-मुक्तिकी) सिद्धि हो जाती है। इस नाशवान् दृश्य-प्रपंचको कभी वास्तविक न समझे; इसमें अनासक्त रहकर लौकिक और पारलौकिक समस्त कामनाओं (काम्य-कर्मों)-से उपराम हो जाय। मन, वाणी और प्राणका संघातरूप यह सम्पूर्ण जगत् मायामय ही है—ऐसे विचारद्वारा अन्त:करणमें निश्चय करके स्व-स्वरूपमें स्थित हो जाय और फिर इसका स्मरण भी न करे।

जो ज्ञाननिष्ठ विरक्त हो अथवा मेरा अहैतुक (निष्काम) भक्त हो, वह आश्रमादिको उनके चिह्नोंसहित छोड़कर वेद-शास्त्रके विधि-निषेधके बन्धनसे मुक्त होकर स्वच्छन्द विचरे। वह अति बुद्धिमान् होकर भी बालकोंके समान क्रीड़ा करे, अति निपुण होकर भी जडवत् रहे, विद्वान् होकर भी उन्मत्त (पागल)-के समान बातचीत करे और सब प्रकार शास्त्र-विधिको जानकर भी पशुवृत्तिसे रहे। उसे चाहिये कि वेदविहित कर्मकाण्डादिमें प्रवृत्त न हो और उसके विरुद्ध होकर पाखण्ड अथवा स्वेच्छाचारमें भी न लग जाय तथा व्यर्थके वाद-विवादमें पड़कर कोई पक्ष न ले बैठे। वह धीर पुरुष अन्य लोगोंसे उद्विग्न न हो और न औरोंको ही अपनेसे उद्विग्न होने दे; निन्दा आदिको सहन करके कभी चित्तमें बुरा न माने और इस शरीरके लिये पशुओंके समान किसीसे वैर न करे। एक ही परमात्मा समस्त प्राणियोंके अन्त:करणमें स्थित है; जैसे एक ही चन्द्रमाके भिन्न-भिन्न जलपात्रोंमें अनेक प्रतिबिम्ब पड़ते हैं, उसी प्रकार सभी प्राणियोंमें एक ही आत्मा है।

कभी समयपर भिक्षा न मिले तो दु:ख न माने और मिल जाय तो प्रसन्न न हो; क्योंकि दोनों ही अवस्थाएँ दैवाधीन हैं। प्राणरक्षा आवश्यक है, इसलिये आहारमात्रके लिये चेष्टा भी करे; क्योंकि प्राण रहेंगे तो तत्त्व-चिन्तन होगा और उसके द्वारा आत्मस्वरूपको जान लेनेसे मोक्षकी प्राप्ति होगी। विरक्त मुनिको उचित है कि दैववशात् जैसा आहार मिल जाय—बढ़िया या मामूली, उसीको खा ले; इसी प्रकार वस्त्र और बिछौना भी जैसा मिले, उसीसे काम चला ले। ज्ञाननिष्ठ परमहंस शौच, आचमन, स्नान तथा अन्य नियमोंको भी शास्त्र-विधिकी प्रेरणासे न करे, बल्कि मुझ ईश्वरके समान केवल लीलापूर्वक करता रहे। उसके लिये यह विकल्परूप* प्रपंच नहीं रहता, वह तो मेरे साक्षात्कारसे नष्ट हो चुका; प्रारब्धवश जबतक देह है, तबतक उसकी प्रतीति होती है। उसके पतन होनेपर तो वह मुझमें ही मिल जाता है।

(अबतक सिद्ध ज्ञानीके धर्म कहे, अब जिज्ञासुके कर्तव्य बताते हैं—) जिस विचारवान‍्को इन अत्यन्त दु:खमय विषय-वासनाओंसे वैराग्य हो गया है और मेरे भागवत-धर्मोंसे जो अनभिज्ञ है, वह किन्हीं ‘विरक्त’ मुनिवरको गुरु मानकर उनकी शरणमें जाय। उन गुरुदेवको मेरा ही रूप जानकर वह अति आदरपूर्वक भक्ति और श्रद्धासे तबतक उनकी सेवा-शुश्रूषामें लगा रहे जबतक कि उसको ब्रह्मज्ञान न हो जाय तथा उनकी कभी किसीसे निन्दा न करे। जिसने काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य—इन छ: शत्रुओंको नहीं जीता, जिसके इन्द्रियरूपी घोड़े अति प्रचण्ड हो रहे हैं, तथा जो ज्ञान और वैराग्यसे शून्य है, तथापि दण्ड-कमण्डलुसे पेट पालता है, वह यतिधर्मका घातक है और अपनी इन्द्रियोंके अधिष्ठाता देवताओंको, अपनेको और अपने अन्त:करणमें स्थित मुझको ठगता है; वासनाके वशीभूत हुआ वह इस लोक और परलोक दोनों ओरसे मारा जाता है।

सबके धर्म

शान्ति और अहिंसा यति (संन्यासी)-के मुख्य धर्म हैं, तप और ईश्वर-चिन्तन वानप्रस्थके धर्म हैं, प्राणियोंकी रक्षा और यज्ञ करना गृहस्थके मुख्य धर्म हैं तथा गुरु-सेवा ही ब्रह्मचारीका परम धर्म है। ऋतुगामी गृहस्थके लिये भी ब्रह्मचर्य, तप, शौच, सन्तोष और भूत-दया—ये आवश्यक धर्म हैं और मेरी उपासना करना तो मनुष्यमात्रका परम धर्म है। इस प्रकार स्वधर्म-पालनके द्वारा जो सम्पूर्ण प्राणियोंमें मेरी भावना रखता हुआ अनन्यभावसे मेरा भजन करता है, वह शीघ्र ही मेरी विशुद्ध भक्ति पाता है। हे उद्धव! मेरी अनपायिनी (जिसका कभी ह्रास नहीं होता, ऐसी) भक्तिके द्वारा वह सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी और सबकी उत्पत्ति, स्थिति और लयके आदि कारण मुझ परब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार स्वधर्मपालनसे जिसका अन्त:करण निर्मल हो गया है और जो मेरी गतिको जान गया है, ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न हुआ वह शीघ्र ही मुझको प्राप्त कर लेता है। वर्णाश्रमाचारियोंके धर्म, आचार और लक्षण ये ही हैं; इन्हींका यदि मेरी भक्तिके सहित आचरण किया जाय तो ये परम नि:श्रेयस (मोक्ष)-के कारण हो जाते हैं। हे साधो! तुमने जो पूछा था कि स्वधर्मका पालन करता हुआ भक्त पुरुष किस प्रकार मुझको प्राप्त होता है सो यह सब मैंने तुमसे कह दिया।

(श्रीमद्भागवत, एकादश स्कन्ध)