वर्णाश्रमधर्म और ब्राह्मण
हिन्दू-सनातनधर्मका लक्ष्य और साधन
हिन्दू-सनातनधर्मके अनुसार मनुष्यदेहका चरम लक्ष्य ‘परम कल्याणरूप परमात्मा’ को प्राप्त करना है। सनातनधर्मकी प्रत्येक चेष्टा इसी लक्ष्यकी प्राप्तिके लिये है, परन्तु उसका यह अर्थ नहीं है कि वर्तमान जीवनसे या इहलोककी ओरसे सनातनधर्म उदासीन है। ऋषियोंने धर्मका लक्षण बतलाते हुए कहा है कि जिससे (इस लोकमें) अभ्युदय और (परलोकमें) परम कल्याणकी सिद्धि हो, वह धर्म है—
यतोऽभ्युदयनि:श्रेयससिद्धि: स धर्म:।
(वै० द० २)
अभ्युदय सब प्रकारसे हो—शरीर स्वस्थ और व्यसनहीन हो, मन सरल और शुद्ध हो, आचरण पवित्र हो, बुद्धि निर्मल और स्थिर हो, गृह आवश्यक धन-धान्यसे पूर्ण हो, कुल-शील-मान—सभी यथायोग्य शुद्ध और सराहनीय हों। यह सब होते हुए ही जीवनका लक्ष्य भगवत्प्राप्ति रहे और क्रमश: लक्ष्यकी ओर बढ़ते-बढ़ते अधिकार और योग्यतानुसार प्राप्त त्यागके द्वारा परिणाममें ‘परम कल्याणरूप भगवान्’ की प्राप्ति हो जाय। इस प्रकार जीवके जीवन-प्रवाहकी अनादिकालीन धाराका परब्रह्मरूप महासागरमें सदाके लिये विलीन हो जाना ही मनुष्य-जीवनका उद्देश्य है। इस उद्देश्यकी सुचारुरूपसे सिद्धि होनेके लिये धर्मके दो विभाग किये गये—एक वर्णधर्म—और दूसरा आश्रमधर्म। वर्णधर्म समाज-जीवनका सुन्दर संगठन करके उसकी भलीभाँति रक्षा करता है और आश्रमधर्म व्यक्तिगत जीवनको धर्मके पवित्र आदर्शपर प्रतिष्ठित करके उसकी सुव्यवस्था करता है और उसको सामाजिक संगठनमें एवं पारिवारिक सुव्यवस्थामें सहायक बनाकर अर्थात् लौकिक अभ्युदयमें स्वाभाविक ही अग्रसर करता हुआ क्रमश: चरम लक्ष्य नि:श्रेयस—परब्रह्मकी ओर ले जाता है। इन दोनों धर्मोंका परस्पर अंगांगिभावसे घनिष्ठ सम्बन्ध होनेके कारण ही इनका एक नाम ‘वर्णाश्रमधर्म’ है। हिन्दूधर्मका तत्त्व समझनेके लिये वर्णाश्रमधर्मका तत्त्व समझना आवश्यक है। वास्तवमें यह वर्णाश्रमधर्म ही हिन्दूधर्म है। हिन्दूका व्यक्तिगत व्यवहार, उसकी समाजनीति, उसकी अर्थनीति, उसकी राजनीति, उसकी परमार्थनीति—सभी इसी वर्णाश्रमधर्मपर प्रतिष्ठित हैं। सच पूछा जाय तो शताब्दियोंसे लगातार आक्रमण-पर-आक्रमण सहकर भी आज जो हिन्दूजाति जीवित है, इसका प्रधान कारण यह वर्णाश्रमका सुदृढ़ दुर्ग ही है। इस बातको याद रखना चाहिये कि इस वर्णाश्रमधर्मकी रक्षा ही हिन्दूधर्मकी रक्षा है और वर्णाश्रमधर्मका विनाश ही हिन्दूधर्मका विनाश है।
अंग्रेजीके ‘रिलिजन’ (Religion) शब्दसे हमारे इस व्यापक धर्मका बोध नहीं होता। ‘रिलिजन’ का अर्थ सामाजिक और व्यक्तिगत कुछ खास-खास विश्वासों और उपासनापद्धतियोंतक ही सीमित है। परन्तु वर्णधर्म तो व्यष्टि और समष्टिरूपमें समस्त मनुष्यजीवनके प्रत्येक क्षणको और उसकी प्रत्येक चेष्टाको कल्याणके साथ गूँथकर उत्तरोत्तर अभ्युदय और नि:श्रेयस—भगवत्प्राप्तिकी ओर ले जाता है। ‘रिलिजन’ इस व्यापक वर्णाश्रमरूप महान् शरीरका एक अंगमात्र है।
वर्णाश्रम
आश्रमधर्मका मूल वर्णधर्म है और यह वर्णधर्म भगवान्के द्वारा रचित है। स्वयं भगवान्ने कहा है—
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:।
‘गुण और कर्मोंके विभागसे चारों वर्ण, (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) मेरे ही द्वारा रचे हुए हैं।’ भारतके दिव्य-दृष्टिप्राप्त त्रिकालज्ञ महर्षियोंने इस सत्यको प्रत्यक्षरूपसे प्राप्त किया और इसी सत्यपर समाजका निर्माण करके उसे सुव्यवस्थित, शान्ति-शीलमय, सुखी, कर्मप्रवण, स्वार्थदृष्टिशून्य और सुरक्षित बना दिया। सामाजिक सुव्यवस्थाके लिये मनुष्योंके चार विभागकी सभी देशों और सभी कालोंमें आवश्यकता हुई है और सभीमें चार विभाग रहे और रहते भी हैं; परन्तु इस ऋषियोंके देशमें वे जिस सुव्यवस्थितरूपसे रहे, वैसे कहीं नहीं रहे।
अब इन चार विभागोंकी उपयोगितापर थोड़ा विचार कीजिये। समाजमें धर्मकी स्थापना और रक्षाके लिये और समाज-जीवनको सुखी बनाये रखनेके लिये, जहाँ समाजकी जीवनपद्धतिमें कोई बाधा उपस्थित हो, वहाँ प्रयत्नके द्वारा उस बाधाको दूर करनेके लिये, कर्मप्रवाहके भँवरको मिटानेके लिये, उलझनोंको सुलझानेके लिये और धर्मसंकट उपस्थित होनेपर समुचित व्यवस्था देनेके लिये परिष्कृत और निर्मल मस्तिष्ककी आवश्यकता है। धर्मकी और धर्ममें स्थित समाजकी भौतिक आक्रमणोंसे रक्षा करनेके लिये बाहुबलकी आवश्यकता है। मस्तिष्क और बाहुका यथायोग्य रीतिसे पोषण करनेके लिये धनकी और अन्नकी आवश्यकता है और उपर्युक्त कर्मोंको यथायोग्य सम्पन्न करानेके लिये शारीरिक परिश्रमकी आवश्यकता है।
इसीलिये मनुष्य-समाज-जीवनका मस्तिष्क ‘ब्राह्मण’ है, बाहु क्षत्रिय है, ऊरु वैश्य है और चरण शूद्र है। ये चारों एक ही समाज-शरीरके चार अत्यावश्यक अंग हैं और एक-दूसरेकी सहायतापर सुरक्षित और जीवित हैं। घृणा या अपमानकी तो बात ही क्या है, इनमेंसे किसीकी तनिक भी अवहेलना नहीं की जा सकती। न इनमें नीच-ऊँचकी ही कल्पना करनी चाहिये। अपने-अपने स्थान और कार्यके अनुसार चारों ही बड़े हैं। ब्राह्मण ज्ञानबलसे, क्षत्रिय बाहुबलसे, वैश्य धनबलसे और शूद्र जनबलसे बड़ा है—और चारोंकी ही पूर्ण उपयोगिता है। इनकी उत्पत्ति भी एक ही भगवान्के शरीरसे हुई है। ब्राह्मणकी उत्पत्ति भगवान्के श्रीमुखसे, क्षत्रियकी बाहुसे, वैश्यकी ऊरुसे और शूद्रकी चरणोंसे हुई है—
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्य: कृत:।
ऊरू तदस्य यद् वैश्य: पद्भ्यां शूद्रोऽजायत॥
परन्तु इनका यह अपना-अपना बल न तो स्वार्थसिद्धिके लिये है और न किसी दूसरेको दबाकर स्वयं ऊँचा बननेके लिये ही है। समाज-शरीरके आवश्यक अंगोंके रूपमें इनका योग्यतानुसार कर्मविभाग है और यह है केवल धर्मके पालने-पलवानेके लिये ही। ऊँच-नीचका भाव न होकर यथायोग्य कर्मविभाग होनेके कारण ही चारों वर्णोंमें एक शक्ति-सामंजस्य (Balance of Power) रहता है। कोई भी किसीकी न अवहेलना कर सकता है, न किसीके न्याय्य अधिकारपर आघात कर सकता है। इस कर्मविभाग और कर्माधिकारके सुदृढ़ आधारपर रचित यह वर्णधर्म ऐसा सुव्यवस्थित है कि इसमें शक्ति-सामंजस्य अपने-आप ही रहता है। इसपर फिर ऋषियोंने प्रत्येक वर्णके कर्मोंका अलग-अलग स्पष्ट निर्देश करके तो सबको अपने-अपने धर्मका निर्विघ्न पालन करनेके लिये और भी सुविधा कर दी है और स्वकर्मका पूरा पालन होनेसे शक्ति-सामंजस्यमें कभी बाधा आ ही नहीं सकती।
यूरोपादि देशोंमें स्वाभाविक ही मनुष्य-समाजके चार विभाग रहनेपर भी निर्दिष्ट नियम न होनेके कारण शक्ति-सामंजस्य नहीं है। इसीसे कभी ज्ञानबल सैनिकबलको दबाता है और कभी जनबल धनबलको परास्त करता है। भारतीय वर्णविभागमें ऐसा न होकर सबके लिये पृथक्-पृथक् कर्म निर्दिष्ट हैं।
ब्राह्मण
ऋषिसेवित वर्णधर्ममें ब्राह्मणका पद सबसे ऊँचा है; वह समाजके धर्मका निर्माता है, उसीकी बनायी हुई विधिको सब मानते हैं। वह सबका गुरु और पथप्रदर्शक है; परन्तु वह धन-संग्रह नहीं करता, न दण्ड ही देता है, न भोगविलासमें ही रुचि रखता है। स्वार्थ तो मानो उसके जीवनमें है ही नहीं। धनैश्वर्य और पदगौरवको धूलके समान समझकर वह फलमूलोंपर निर्वाह करता हुआ सपरिवार शहरसे दूर वनमें रहता है। दिन-रात तपस्या, धर्मसाधन और ज्ञानार्जनमें लगा रहता है, अपने तपोबलके प्रभावसे दुर्लभ ज्ञाननेत्र प्राप्त करता है और उस ज्ञानकी दिव्यज्योतिसे सत्यका दर्शन करके उस सत्यको बिना किसी स्वार्थके सदाचारपरायण साधुस्वभाव पुरुषोंके द्वारा समाजमें वितरण कर देता है। बदलेमें कुछ भी चाहता नहीं। समाज अपनी इच्छासे जो कुछ दे देता है या भिक्षासे जो कुछ मिल जाता है, उसीपर वह बड़ी सादगीसे अपनी जीवनयात्रा चलाता है। उसके जीवनका यही धर्ममय आदर्श है।
क्षत्रिय
क्षत्रिय सबपर शासन करता है। अपराधीको दण्ड और सदाचारीको पुरस्कार देता है। दण्डबलसे दुष्टोंको सिर नहीं उठाने देता और धर्मकी तथा समाजकी दुराचारियों, चोरों, डाकुओं और शत्रुओंसे रक्षा करता है। क्षत्रिय दण्ड देता है, परन्तु कानूनकी रचना स्वयं नहीं करता। ब्राह्मणके बनाये हुए कानूनके अनुसार ही वह आचरण करता है। ब्राह्मणरचित कानूनके अनुसार ही वह प्रजासे कर वसूल करता है और उसी कानूनके अनुसार प्रजाहितके लिये व्यवस्थापूर्वक उसे व्यय कर देता है। कानूनकी रचना ब्राह्मण करता है और धनका भण्डार वैश्यके पास है। क्षत्रिय तो केवल विधिके अनुसार व्यवस्थापक और संरक्षकमात्र है।
वैश्य
धनका मूल वाणिज्य, पशु और अन्न—सब वैश्यके हाथमें है। वैश्य धन उपार्जन करता है और उसको बढ़ाता है, किन्तु अपने लिये नहीं। वह ब्राह्मणके ज्ञान और क्षत्रियके बलसे संरक्षित होकर धनको सब वर्णोंके हितमें उसी विधानके अनुसार व्यय करता है। न शासनपर उसका कोई अधिकार है और न उसे आवश्यकता ही है; क्योंकि ब्राह्मण और क्षत्रिय उसके वाणिज्यमें कभी कोई हस्तक्षेप नहीं करते, स्वार्थवश उसका धन कभी नहीं लेते, वरं उसकी रक्षा करते हैं और अपने ज्ञानबल और बाहुबलसे ऐसी सुव्यवस्था करते हैं कि जिससे वह अपना व्यापार सुचारुरूपसे निर्विघ्न चला सकता है। इससे उसके मनमें कोई असन्तोष नहीं है और वह प्रसन्नताके साथ ब्राह्मण और क्षत्रियका प्राधान्य मानकर चलता है और मानना आवश्यक भी समझता है; क्योंकि इसीमें उसका हित है। वह खुशीसे राजाको कर देता है, ब्राह्मणकी सेवा करता है और विधिवत् आदरपूर्वक शूद्रको भरपूर अन्न-वस्त्रादि देता है।
शूद्र
अब रहा शूद्र। शूद्र स्वाभाविक ही जनसंख्यामें अधिक है। शूद्रमें शारीरिक शक्ति प्रबल है, परन्तु मानसिक शक्ति कुछ कम है। अतएव शारीरिक श्रम ही उसके हिस्सेमें रखा गया है और समाजके लिये शारीरिक शक्तिकी बड़ी आवश्यकता भी है। परन्तु उसकी शारीरिक शक्तिका मूल्य किसीसे कम नहीं है। शूद्रके जनबलके ऊपर ही तीनों वर्णोंकी प्रतिष्ठा है। यही आधार है। पैरके बलपर ही शरीर चलता है। अतएव शूद्रको तीनों वर्ण अपना प्रिय अंग मानते हैं। उसके श्रमके बदलेमें वैश्य प्रचुर धन देता है, क्षत्रिय उसके धन-जनकी रक्षा करता है और ब्राह्मण उसको धर्मका—भगवत्प्राप्तिका मार्ग दिखाता है; न तो स्वार्थसिद्धिके लिये कोई वर्ण शूद्रकी वृत्ति हरण करता है, न स्वार्थवश उसे कम वेतन देता है और न उसे अपनेसे नीचा मानकर किसी प्रकारका दुर्व्यवहार ही करता है। सब अपनी उन्नतिके साथ उसकी उन्नति करते हैं और उसकी उन्नतिमें अपनी उन्नति और अवनतिमें अपनी अवनति समझते हैं। ऐसी अवस्थामें जनबलयुक्त शूद्र सन्तुष्ट रहता है।
परस्पर सहयोग
चारोंमें कोई किसीसे ठगा नहीं जाता, कोई किसीसे अपमानित नहीं होता। एक ही घरके चार भाइयोंकी तरह एक ही घरकी सम्मिलित उन्नतिके लिये चारों भाई अपने-अपने पृथक्-पृथक् आवश्यक कर्तव्य-पालनमें लगे रहते हैं। यों चारों वर्ण परस्पर—ब्राह्मण धर्मस्थापनके द्वारा, क्षत्रिय बाहुबलके द्वारा, वैश्य धनबलके द्वारा और शूद्र शारीरिक श्रमबलके द्वारा एक-दूसरेकी सेवा करते हुए समाजकी शक्ति बढ़ाते हैं। न तो सब एक-सा कर्म करना चाहते हैं और न अलग-अलग कर्म करनेमें कोई ऊँच-नीच भाव ही मनमें लाते हैं। इसीसे उनका शक्ति-सामंजस्य (Balance of Power) रहता है और धर्म उत्तरोत्तर बलवान् और पुष्ट होता है। यह है वर्णधर्मका स्वरूप।
जन्म और कर्मसे वर्ण
इस प्रकार गुण और कर्मके विभागसे ही वर्णविभाग बनता है, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि मनमाने कर्मसे वर्ण बदल जाता है। वर्णका मूल जन्म है और कर्म उसके स्वरूपकी रक्षामें प्रधान कारण है। इस प्रकार जन्म और कर्म दोनों ही वर्णमें आवश्यक हैं। केवल कर्मसे वर्णको माननेवाले वस्तुत: वर्णको मानते ही नहीं। वर्ण यदि कर्मपर ही माना जाय, तब तो एक दिनमें एक ही मनुष्यको न मालूम कितनी बार वर्ण बदलना पड़ेगा। फिर तो समाजमें कोई शृंखला या नियम ही नहीं रहेगा। सर्वथा अव्यवस्था फैल जायगी, परन्तु भारतीय वर्णधर्ममें ऐसी बात नहीं है। यदि केवल कर्मसे वर्ण माना जाता तो महाभारत-युद्धके समय ब्राह्मणोचित कर्म करनेको तैयार हुए अर्जुनको क्षत्रियधर्मका उपदेश गीतामें भगवान् नहीं करते। मनुष्यके पूर्वकृत शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार ही उसका विभिन्न वर्णोंमें जन्म हुआ करता है।
स्वधर्म
जिसका जिस वर्णमें जन्म होता है, उसको उसी वर्णके निर्दिष्ट कर्मोंका आचरण करना चाहिये; क्योंकि वही उसका ‘स्वधर्म’ है और स्वधर्मका पालन करते-करते मर जाना भगवान् श्रीकृष्णने कल्याण-कारक बतलाया है—‘स्वधर्मे निधनं श्रेय:।’ साथ ही परधर्मको ‘भयावह’ भी बतलाया है। यह ठीक ही है; क्योंकि सब वर्णोंके स्वधर्मपालनसे ही सामाजिक शक्ति-सामंजस्य रहता है और तभी समाज-धर्मकी रक्षा और उन्नति होती है। स्वधर्मका त्याग और परधर्मका ग्रहण व्यक्ति और समाज दोनोंके लिये ही हानिकर है। खेदकी बात है कि आजकल वर्णधर्मके प्रति हमलोगोंकी आस्था कम हो रही है और हमलोग मनमाना आचरण करनेमें जरा भी नहीं हिचकते। इसका बुरा परिणाम भी हाथों-हाथ प्रत्यक्ष हो रहा है। इस बुराईसे बचनेके लिये हमें वर्णधर्मके पालनकी अत्यन्त आवश्यकता है।
ब्राह्मणका महत्त्व
वर्णधर्ममें शीर्ष-स्थानीय है ब्राह्मण। दु:खका विषय है कि आज ब्राह्मणके विनाशके लिये भी चारों ओर परोक्ष और अपरोक्षरूपसे चेष्टा हो रही है! शास्त्रोंने ब्राह्मणकी बड़ी ही महिमा गायी है। शास्त्र कहते हैं कि ब्राह्मणकी उत्पत्ति विराट् पुरुषके या भगवान् श्रीकृष्णके मुखसे हुई है। मनु महाराजका कहना है—
उत्तमांगोद्भवाज्ज्यैष्ठ्याद् ब्रह्मणश्चैव धारणात् ।
सर्वस्यैवास्य सर्गस्य धर्मतो ब्राह्मण: प्रभु:॥
तं हि स्वयंभू: स्वादास्यात्तपस्तप्त्वाऽऽदितोऽसृजत् ।
हव्यकव्याभिवाह्याय सर्वस्यास्य च गुप्तये॥
यस्यास्येन सदाश्नन्ति हव्यानि त्रिदिवौकस:।
कव्यानि चैव पितर: किं भूतमधिकं तत:॥
भूतानां प्राणिन: श्रेष्ठा: प्राणिनां बुद्धिजीविन:।
बुद्धिमत्सु नरा: श्रेष्ठा नरेषु ब्राह्मणा: स्मृता:॥
ब्राह्मणेषु च विद्वांसो विद्वत्सु कृतबुद्धय:।
कृतबुद्धिषु कर्तार: कर्तृषु ब्रह्मवेदिन:॥
उत्पत्तिरेव विप्रस्य मूर्तिर्धर्मस्य शाश्वती।
सा हि धर्मार्थमुत्पन्नो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥
ब्राह्मणो जायमानो हि पृथिव्यामधिजायते।
ईश्वर: सर्वभूतानां धर्मकोशस्य गुप्तये॥
सर्वस्वं ब्राह्मणस्येदं यत् किंचिज्जगतीगतम्।
श्रैष्ठ्येनाभिजनेनेदं सर्वं वै ब्राह्मणोऽर्हति॥
(मनुस्मृति १। ९३—१००)
परमात्माके सब अंगोंमें उत्तम अंग मुखसे ब्राह्मण उत्पन्न हुआ है, सबसे पहले जन्मा है, वेदको धारण करता है। इसलिये धर्मका अनुशासन करनेमें ब्राह्मण ही सारी सृष्टिका प्रभु है। देवताओंको हव्य और पितरोंको कव्यकी प्राप्ति होगी और उससे सम्पूर्ण जगत्की रक्षा होगी, इस उद्देश्यसे स्वयम्भू ब्रह्माने तप करके सबसे पहले अपने मुखसे ब्राह्मणकी सृष्टि की। जिनके मुखसे देवता सदा हव्य (हवनीय सामग्री) तथा पितर कव्य (श्राद्धादिमें दिये हुए अन्नादि) ग्रहण करते हैं—खाते हैं, उन ब्राह्मणोंसे बढ़कर श्रेष्ठ, भला और कौन हो सकता है? सृष्ट पदार्थोंमें स्थावरोंकी अपेक्षा प्राणधारी श्रेष्ठ हैं, प्राणियोंमें बुद्धिपूर्वक जीवन चलानेवाले श्रेष्ठ हैं, बुद्धिजीवियोंमें मनुष्य श्रेष्ठ है और मनुष्योंमें ब्राह्मण सबसे श्रेष्ठ हैं। ब्राह्मणोंमें विद्वान्, विद्वानोंमें शास्त्रानुसार कर्मोंको जाननेवाले और जाननेवालोंमें करनेवाले श्रेष्ठ हैं। इनसे भी वे श्रेष्ठ हैं, जो ब्रह्मको जानते हैं। ब्राह्मणके शरीरकी उत्पत्ति ही धर्मकी सनातन मूर्तिमान् अवस्था है। वह धर्मके आचरण और मोक्षकी प्राप्तिके लिये ही उत्पन्न होता है। ब्राह्मण धर्मके खजानेकी रक्षाके लिये जन्मसे ही पृथ्वीमें सबके ऊपर स्वामी होकर उत्पन्न होता है और सब प्राणियोंका प्रभु माना जाता है। तीनों लोकोंमें जो कुछ भी सम्पत्ति है, वह सब ब्राह्मणकी है। परमात्माके मुखसे जन्म ग्रहण करने तथा सबसे श्रेष्ठ होनेके कारण ब्राह्मण ही सब पदार्थोंको ग्रहण करनेयोग्य है।
भीष्मपितामह धर्मराज युधिष्ठिरसे कहते हैं—
पितॄणां देवतानां च मनुष्योरगरक्षसाम्।
पुराप्येते महाभागा ब्राह्मणा वै जनाधिप॥
(महा०, अनु० ३३। १५)
हे राजन्! महाभाग ब्राह्मण पूर्वकालसे ही पितरोंके, देवताओंके, मनुष्योंके, सर्पोंके और राक्षसोंके पूज्य हैं।
परिवादं च ये कुर्युर्ब्राह्मणानामचेतस:।
सत्यं ब्रवीमि ते राजन् विनश्येयुर्न संशय:॥
(महा०, अनु० ३३। १८)
हे राजन्! जो मूर्ख मनुष्य ब्राह्मणोंकी निन्दा करते हैं, मैं सत्य कहता हूँ कि वे नष्ट हो जाते हैं; इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है।
श्रेयान् पराजयस्तेभ्यो न जयो जयतां वर॥
(म०, अ० ३३। २३)
हे महाविजयी! ब्राह्मणोंसे हार जाना अच्छा है, परन्तु उनको हराना अच्छा नहीं है।
परिवादो द्विजातीनां न श्रोतव्य: कथंचन।
आसीताधोमुखस्तूष्णीं समुत्थाय व्रजेच्च वा॥
न स जातो जनिष्यद्वा पृथिव्यामिह कश्चन।
यो ब्राह्मणविरोधेन सुखं जीवितुमुत्सहेत् ॥
(म०, अ० ३३। २५-२६)
ब्राह्मणोंकी निन्दा कभी नहीं सुननी चाहिये। यदि कहीं ब्राह्मण-निन्दा होती हो तो वहाँ या तो नीचा सिर करके चुपचाप बैठा रहे अथवा वहाँसे उठकर चला जाय। इस पृथ्वीपर ऐसा कोई भी मनुष्य नहीं जन्मा है और न जन्मेगा ही, जो ब्राह्मणोंसे विरोध करके सुखसे जीवन बितानेका उत्साह कर सके।
ततो राष्ट्रस्य शान्तिर्हि भूतानामिव वासवात् ।
जायतां ब्रह्मवर्चस्वी राष्ट्रे वै ब्राह्मण: शुचि:॥
(म०, अ० ३४। ३)
प्राणी जैसे मेघके देवता इन्द्रसे शान्ति पाते हैं, उसी प्रकार राष्ट्रको ब्राह्मणोंसे शान्ति मिलती है। अतएव तेरे देशमें ब्रह्मतेजस्वी और पवित्र ब्राह्मण उत्पन्न हों।
आगे चलकर पितामहने ब्राह्मण-सेवाका महत्त्व और ब्राह्मण-निन्दाका विस्तारसे वर्णन करते हुए अन्तमें युधिष्ठिरसे कहा है—
तान् पूजयस्व सततं दानेन परिचर्यया।
यदीच्छसि महीं भोक्तुमिमां सागरमेखलाम्॥
(म०, अ० ३५। २२)
अतएव यदि तू इस सागररूप कटिमेखलावाली पृथ्वीपर सुखसे राज्य करना चाहता है तो सदा दान और सेवाके द्वारा ब्राह्मणोंकी पूजा किया कर!
श्रीमद्भागवतमें महाराज पृथु कहते हैं—
यत्सेवयाशेषगुहाशय: स्वराड्
विप्रप्रियस्तुष्यति काममीश्वर:।
तदेव तद्धर्मपरैर्विनीतै:
सर्वात्मना ब्रह्मकुलं निषेव्यताम्॥
(४।२१।३९)
जिन ब्राह्मणोंकी सेवासे ब्राह्मणोंके प्रेमी सर्वान्तर्यामी स्वप्रकाश भगवान् सन्तुष्ट होते हैं, भागवत-धर्ममें तत्पर तुम भी नम्रतापूर्वक शरीर, मन और वाणीसे उन ब्राह्मणोंके कुलकी सेवा करो।
स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण अपने पुत्र प्रद्युम्नसे कहते हैं—
ब्राह्मणप्रतिपूजायामायु: कीर्तिर्यशो बलम्।
लोके लोकेश्वराश्चैव सर्वे ब्राह्मणपूजका:॥
त्रिवर्गे चापवर्गे च यश: श्रीरोगशान्तिषु।
देवतापितृपूजासु संतोष्याश्चैव नो द्विजा:॥
(महा०, अनु० १५९। ९-१०)
ब्राह्मणोंकी पूजा करनेसे आयु, कीर्ति, यश और बल बढ़ते हैं। इसीसे लोक और लोकेश्वर सभी ब्राह्मणोंकी पूजा करते हैं। धर्म, अर्थ, काम—इस त्रिवर्गको और मोक्षको प्राप्त करनेमें, यश, लक्ष्मीकी प्राप्ति और रोग-शान्तिमें तथा देवता और पितरोंकी पूजामें ब्राह्मणोंको सन्तुष्ट करना चाहिये।
ब्राह्मण प्रसन्न होकर जो भी आशीर्वाद देते हैं, वही पूर्ण स्वस्त्ययन है। श्रीयशोदाजी महर्षि गर्गसे कहती हैं—
आशिषं कर्तुमर्हन्ति प्रसन्नमनसा शिशुम्।
पूर्णं स्वस्त्ययनं सद्यो विप्राशीर्वचनं ध्रुवम्॥
(ब्रह्मवैवर्त०,श्रीकृष्ण-जन्मखण्ड,अध्याय१३)
हे भगवन्! आप प्रसन्न मनसे इस बालक (कृष्ण)-को आशीर्वाद दीजिये। ब्राह्मणोंका आशीर्वाद निश्चय ही पूर्ण स्वस्त्ययनरूप तत्काल फल देनेवाला है। पूर्ण आध्यात्मिक ग्रन्थ गीतामें भी ब्राह्मण-पूजाको तप बतलाया है।
इस प्रकार ब्राह्मणोंके माहात्म्यसे शास्त्र भरे हैं, कितने वचन उद्धृत किये जायँ, परन्तु यह स्मरण रखना चाहिये कि ब्राह्मणका यह महत्त्व बनावटी नहीं है। ब्राह्मणका स्वरूप ही महत्त्वपूर्ण है। उसका जीवन तपस्वी जीवन है। उसका जन्म ही तप, धर्म तथा मोक्षके लिये होता है। सांसारिक सुख और भोगोंकी ओर तो ब्राह्मण देखता ही नहीं।
ब्राह्मणस्य हि देहोऽयं क्षुद्रकामाय नेष्यते।
कृच्छ्राय तपसे चेह प्रेत्यानन्तसुखाय च॥
(श्रीमद्भा० ११। १७। ४२)
यह ब्राह्मणशरीर क्षुद्र विषयभोगोंके लिये नहीं है, यह तो जीवनभर कठिन तपस्या और अन्तमें आत्यन्तिक सुखरूप मोक्षकी प्राप्तिके लिये है।
इसीका मिलता-जुलता श्लोक बृहद्धर्मपुराणमें आया है—
ब्राह्मणस्य तु देहोऽयं न सुखाय कदाचन।
तप: क्लेशाय धर्माय प्रेत्य मोक्षाय सर्वदा॥
(उत्तरखण्ड २। ४४)
ब्राह्मणका देह विषयसुखके लिये कदापि नहीं है; यह तो सदा-सर्वदा तपस्याका क्लेश सहने, धर्मका पालन करने और अन्तमें मुक्तिके लिये ही उत्पन्न होता है।
ब्राह्मणके लक्षण
ब्राह्मणोंके लक्षणोंके सम्बन्धमें शास्त्र कहते हैं—शम, दम, तप, शौच, सन्तोष, क्षमा, कोमलता, भगवद्भक्ति, दया और सत्य ब्राह्मणके स्वाभाविक धर्म हैं (श्रीमद्भागवत ११। १७। १६)। शम, दम, तप, शौच, क्षमा, कोमलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकबुद्धि ब्राह्मणके कर्म हैं। (श्रीमद्भगवद्गीता १८। ४२)। ब्राह्मणको जातकर्मादि संस्कारोंके द्वारा संस्कृत, परम पवित्र, वेदाध्ययनमें तत्पर, सन्ध्या-वन्दन१, स्नान२, जप३, हवन४, देवपूजा५ और अतिथिसत्काररूप६ षट्कर्मपरायण, शौचाचारशील, ब्रह्मनिष्ठ, गुरुप्रिय और सर्वदा सत्यमें रत रहना चाहिये (महाभारत)। जीवनभर आलस्य छोड़कर अपने-अपने आश्रमके अनुकूल वेदोक्त और स्मार्त कर्म करने चाहिये। जिनमें इन्द्रियोंकी आसक्ति शीघ्र होती है, ऐसे कर्मोंमें और शास्त्रविरुद्ध कर्मोंमें कभी न लगना चाहिये। धन होनेपर या न होनेपर भी धनसंचयकी चेष्टा ब्राह्मण कभी न करे। इच्छापूर्वक किसी भी इन्द्रियके विषयमें आसक्त न हो; इन्द्रिय स्वभावसे ही किसी विषयमें आसक्त हो जायँ तो उनको वहाँसे हटा ले। वेदके विरुद्ध कुछ भी उपार्जन न करे। नित्य सावधानीके साथ वेदोक्त धर्मका आचरण करे। ब्राह्मणको गाने-बजाने आदिसे अथवा शास्त्रविरुद्ध कर्मोंसे तथा संकटकी दशामें भी बहुत-सा धन मिलता हो, तो भी वैसा धन पानेकी चेष्टा न करे। स्वाध्यायके विरोधी सभी कर्मोंका त्याग कर दे। गृहस्थ ब्राह्मण अपनी आयु, कर्म, धन, विद्या और कुलके अनुकूल ही वेष, वाणी और बुद्धिसे काम लेता हुआ जगत्में विचरे। नित्य पंचमहायज्ञ करे (मनुस्मृति)। प्रतिदिन नियमानुसार सन्ध्या-वन्दनादि नित्यकर्म अवश्य ही करे। यदि कोई ब्राह्मण मोहवश सन्ध्या-वन्दनादि नहीं करता तो देवता तथा पितर उसके द्वारा की हुई पूजा या श्राद्धादिको ग्रहण नहीं करते। ब्राह्मण जबतक जिये, त्रिकालसन्ध्या करता ही रहे। जो ब्राह्मण ऐसा करते हैं, वे सूर्यके समान तेजस्वी होते हैं। उनके चरणस्पर्शसे पृथ्वी पवित्र होती है, तीर्थ शुद्ध होते हैं और पाप धुल जाते हैं (ब्रह्मवैवर्त)। ब्राह्मणको नित्य गायत्रीका जप करना चाहिये। गायत्री ब्राह्मणोंका जीवन है।
ब्राह्मणका कठोर तपोमय जीवन
ब्राह्मणकी जीविकाके सम्बन्धमें शास्त्र कहते हैं—वेद पढ़ना-पढ़ाना, यज्ञ करना-कराना और दान देना तथा लेना—ब्राह्मणके ये छ: कर्म बताये गये हैं। इनमें यज्ञ कराना, वेद पढ़ाना और दान लेना—ये तीन ब्राह्मणकी आजीविकाके लिये हैं। ब्राह्मणको ऐसी आजीविका बिलकुल नहीं करनी चाहिये, जिसमें किसी भी जीवका किसी प्रकार भी अनिष्ट हो अथवा किसीको जरा-सी भी पीड़ा हो। आपत्कालमें भी ब्राह्मण ऐसी वृत्ति न करे। सुख चाहनेवाला ब्राह्मण अपना और अपने कुटुम्बका सादगीसे निर्वाह हो सके, इतने ही धनमें परम सन्तोष माने। अधिक धन पानेकी लालसा न करे। सन्तोष ही सुखका मूल है और असन्तोष ही दु:खका। ब्राह्मणको ऋत, अमृत, मृत, प्रमृत और सत्यानृतद्वारा अपनी जीविका चलानी चाहिये; परन्तु श्ववृत्ति (नौकरी, शूद्रवृत्ति) कभी नहीं करनी चाहिये। जमीनपर बिखरे हुए अनाजके दानोंको बटोरकर उससे काम चलानेका नाम शिलवृत्ति है। इसीका नाम ऋत है। बिना माँगे जो कुछ मिल जाये, उसे अमृतवृत्ति कहते हैं। भीख माँगकर जीवननिर्वाह करना मृतवृत्ति कहलाता है। खेतीको प्रमृतवृत्ति और व्यापारको सत्यानृतवृत्ति कहते हैं। ऋत सर्वोत्तम और अमृत उत्तम वृत्ति है। मृत—भिक्षावृत्ति भी ब्राह्मणके लिये विधेय है। बल्कि वैश्योंकी व्यापारवृत्ति और कृषिवृत्तिकी अपेक्षा ब्राह्मणोंके लिये भिक्षावृत्ति उत्तम है। इन वृत्तियोंद्वारा जीवननिर्वाह करनेवाले ब्राह्मण चार श्रेणियोंमें विभक्त हैं—कुशूलधान्यक, कुम्भीधान्यक, त्र्यहैहिक और अश्वस्तनिक। तीन वर्षतक निर्वाह हो सके, इतने अन्नकी कोठी भर रखनेवाला ब्राह्मण कुशूलधान्यक, सालभर या छ: महीनेके निर्वाहयोग्य अन्नकी छोटी कोठी भर रखनेवाला कुम्भीधान्यक, तीन दिनके निर्वाहयोग्य अन्नका संग्रह करनेवाला त्र्यहैहिक और केवल आजभरके निर्वाहके लिये संग्रह करनेवाला अश्वस्तनिक कहलाता है। इन चारों प्रकारके संग्रही ब्राह्मणोंमें पहलेकी अपेक्षा अगला उत्तरोत्तर श्रेष्ठ है; अश्वस्तनिक सर्वश्रेष्ठ है।
इस वर्णनसे पता चलता है कि ब्राह्मणोंका जीवन कितना तप:पूर्ण और कठोर साधनामय है। ऐसे क्लेशसहिष्णु ब्राह्मणोंकी जितनी महिमा गायी जाय, उतनी ही थोड़ी है। शास्त्रोंमें ब्राह्मणोंके लिये और भी अनेक वैध और निषिद्ध कर्मोंका तथा आचरणोंका उल्लेख है। वस्तुत: ब्राह्मणधर्म इतना कठोर दायित्वपूर्ण है कि उसके पालनमें पद-पदपर सावधानीकी आवश्यकता होती है। यह असिधाराव्रत है। एक ओर जहाँ ब्राह्मण सबका प्रभु और नियन्त्रणकर्ता है, दूसरी ओर वह स्वाभाविक ही सबके हितमें रत है और इस सर्वभूतहितकी इच्छासे ही अपने ही बनाये नियमोंके कठोर बन्धनमें वह इतना बँधा है कि जरा-सी भूलमें ही अपने स्वरूपसे च्युत हो जाता है। इसीसे उसकी इतनी महिमा है।
यह स्मरण रखना चाहिये कि धर्म ही हिन्दूजातिका प्राण है और उस धर्मके संचालनका समस्त भार ब्राह्मणके कन्धोंपर है और हमें यह मुक्तकण्ठसे स्वीकार करना चाहिये कि ब्राह्मणने इस भारको बड़ी ही जिम्मेवारीके साथ वहन किया है। तपोमूर्ति स्वार्थशून्य ब्राह्मणका ऋण केवल हिन्दूसमाजपर ही नहीं है, सारे संसारपर है; क्योंकि उसके उपार्जित ज्ञानसे समस्त संसारने लाभ उठाया है। वस्तुत: जगत्को ज्ञानका प्रकाश देनेवाला यह त्याग और तपकी मूर्ति ब्राह्मण ही है।
आज भी ब्राह्मणप्रदत्त ज्ञानालोकसे ही संसारका ज्ञानभण्डार प्रकाशित है। हिन्दूजातिका तो प्राण ही यह ब्राह्मणत्व है, जिसने युगों और शताब्दियोंसे नाना प्रकारके कष्टोंको सहनकर इस हिन्दूसंस्कृतिकी रक्षा की है। भगवान् श्रीकृष्णके प्राकट्यका कारण बतलाते हुए भगवान् शंकराचार्य गीताभाष्यके उपोद्घातमें कहते हैं कि जगत्की स्थितिको सुरक्षित रखनेकी इच्छासे आदिकर्ता नारायण श्रीविष्णुभगवान् भूलोकके ब्रह्मा (ब्राह्मण)-के ब्राह्मणत्वकी रक्षा करनेके लिये श्रीवसुदेवजीसे श्रीदेवकीजीके गर्भमें दिव्य सौन्दर्य-माधुर्यपूर्ण श्रीकृष्ण-रूपमें प्रकट हुए। ब्राह्मणत्वकी रक्षामें ही वैदिक धर्मकी रक्षा है; क्योंकि वर्णाश्रमके भेद उसीके अधीन हैं—
जगत: स्थितिं परिपिपालयिषु: स आदिकर्ता नारायणाख्यो विष्णुर्भौमस्य ब्रह्मणो ब्राह्मणत्वस्य रक्षणार्थं देवक्यां वसुदेवादंशेन कृष्ण: किल सम्बभूव। ब्राह्मणत्वस्य हि रक्षणेन रक्षित: स्याद् वैदिको धर्मस्तदधीनत्वाद् वर्णाश्रमभेदानाम्।
खेद है कि आज हिन्दूसन्तान ही मोहवश अपने जीवनाधार ब्राह्मणत्वको भस्मकर उसके भस्मावशेषपर जातीय-जीवनकी सुन्दर सुखपूर्ण अट्टालिका निर्माण करनेका स्वप्न देख रहा है! अपने ही हाथों अपनी समाधिके लिये जमीन खोद रहा है! भगवान् इस मोहनिशाका शीघ्र अन्त करें।
लोग कहेंगे कि ‘जिस ब्राह्मणकी यह महिमा है, वह ब्राह्मण आज कहाँ है, आज तो ब्राह्मण-शरीरका प्राणहीन कंकालमात्र रह गया है।’ ठीक है, आदर्श ब्राह्मण आज बहुत ही कम दृष्टिगोचर होते हैं। वे आज शक्ति-सामंजस्यके अभावसे पर्वत-कन्दराओंमें जा छिपे हैं; परन्तु गम्भीरतासे ध्यान देनेपर ज्ञात होगा कि अन्य वर्णोंकी अपेक्षा आज भी ब्राह्मणोंमें त्याग और तप अधिक है। यदि हम इस बचे-खुचे त्याग-तपको बचाकर बढ़ा सकेंगे तो कंकालमें पुन: प्राण आ जायँगे और हम उसकी शक्तिमयी और तेजोमयी मूर्तिको देखकर पुन: अपनेको सुरक्षित पायेंगे। ब्राह्मण मरा नहीं है, मरेगा भी नहीं। वह छिपा है, दबा है, उसे साधना करके प्रकाशमें लाना होगा। इसका उपाय है ब्राह्मणत्वका सम्मान, ब्राह्मणत्वको पुन: स्वरूपप्रतिष्ठित करनेका आयोजन। ब्राह्मणोंको चाहिये कि धन, वैभव, विलासिता और फैशनका मोह छोड़कर अपने स्वरूपको सँभालें। उनका गौरव त्यागपूर्ण ब्राह्मणत्वमें है न कि जमींदारों या धनी व्यवसायियोंका अनुकरण करके अधिक खर्चीला और भड़कीला परन्तु दु:ख तथा अशान्तिपूर्ण जीवन बनानेमें। उनका आदर्श त्याग है, न कि भोग। प्रभुत्व है, न कि दासत्व। भोगी मनुष्य इन्द्रियविषयोंका दास होता है, यह सर्वसम्मत सिद्धान्त है।
ब्राह्मणत्वकी रक्षा कर्तव्य
अन्यान्य तीनों वर्णोंको ऐसा प्रयत्न करना चाहिये कि जिससे ब्राह्मणोंके ब्राह्मणत्वकी रक्षा हो, ब्राह्मणोंमें ब्राह्मणत्वके प्रति ममता उत्पन्न हो, वे ब्राह्मण कहलानेमें गौरव समझें और ब्राह्मणके नाते ही उनकी आजीविका सुखपूर्वक चल जाय। यह कभी न सोचें कि पूर्वकालके ब्राह्मण पूज्य थे, आजके नहीं हैं। हम पूछते हैं कि यदि ब्राह्मण गिरे हैं तो क्या क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र धर्मपथपर अग्रसर हुए हैं? दूसरे-दूसरेके धर्मकी ओर न देखकर अपनी ओर देखिये; तब पता लगेगा कि आपकी क्या दशा है।
यह पहले कहा जा चुका है कि हिन्दूधर्मकी रक्षा ब्राह्मणधर्मकी रक्षामें है। यदि ब्राह्मण अपने कर्मको छोड़कर वकील, डॉक्टर, व्यापारी या नौकरी-पेशेवाले बन जायँगे तो ब्राह्मणधर्मका पालन कौन करेगा? आज जो ब्राह्मण संस्कृत पढ़ना छोड़कर अंग्रेजी पढ़ते हैं और धीरे-धीरे पाश्चात्य संस्कृतिके ढाँचेमें ढले जा रहे हैं, उसमें कालप्रभाव और पाश्चात्य प्रभुत्वका प्रभाव तो है ही, साथ ही दो प्रधान कारण और हैं। एक है आजीविकाकी कठिनाई और दूसरा संस्कृतज्ञ कर्मकाण्डी त्यागी ब्राह्मणोंकी उपेक्षा। प्राचीन कालके अनुसार आज ब्राह्मण वनोंमें नहीं रह सकते। कोई रहना भी चाहें तो उन्हें न तो जमीन मिल सकती है और न इच्छानुसार फल-फूल और मूल ही। शिलोञ्छवृत्तिके लिये भी अन्न नहीं मिलता। कारण आज न तो ब्राह्मण-शासनका अनुगमन करनेवाले ब्राह्मण-भक्त क्षत्रिय राजा हैं और न ऐसे वैश्य-शूद्र ही हैं। गाँवों और नगरोंमें रहनेसे कुछ कुसंग और कुछ परिस्थितिवश आजके ब्राह्मणोंकी आवश्यकताओंका बढ़ जाना भी अस्वाभाविक नहीं है। ऐसी स्थितिमें उनकी आजीविकाकी व्यवस्था न हो तो बाध्य होकर उन्हें दूसरी ओर ताकना पड़ता है। यही कारण है कि कुछ काल पहलेके धर्माभिमानी महान् पण्डितराजोंके पुत्र-पौत्र आज विदेशी भाषा सीखकर ब्राह्मण-संस्कृतिका उपहास करने लगे हैं। दूसरी बात है ब्राह्मण पण्डितोंके सम्मानमें कमी होना। आज लोग जितना अंग्रेजी पढ़े-लिखे डिग्रीधारी लोगोंका आदर करते हैं, उतना सीधे-सादे संस्कृतज्ञ पण्डितका नहीं करते। जिसमें धन और मान दोनोंकी कमी नजर आती हो, उससे चिपटे रहना भला, कौन पसन्द करेगा? (यद्यपि आजकल अंग्रेजीके बी० ए०, एम० ए० पास बेकारोंकी संख्या भी बहुत जोरसे बढ़ रही है।) इसीसे आज शास्त्रज्ञ ब्राह्मणोंकी संख्या क्रमश: घट रही है। अतएव तीनों वर्णोंको चाहिये कि सच्चे मनसे ब्राह्मणोंका आदर-सम्मान करें। उनके अभावोंकी पूर्ति और उनकी आजीविकाके लिये प्रयत्न करें। कुछ काल पूर्वतक देवताओंके अनुष्ठान, यज्ञादि कर्म, श्रीहरिकथा तथा पर्वोंपर दान तथा ब्राह्मण-भोजनादिकी प्रथा थी, जिससे धर्म-साधनके साथ-ही-साथ ब्राह्मणोंकी आजीविका चलती थी। राजसभाओंमें पण्डित ब्राह्मणोंका सम्मान था। लोग हृदयसे ब्राह्मणोंको पूजते थे। इसीसे उस समय ब्राह्मण बने रहनेमें उनको सुख मालूम होता था। अब क्रमश: उन प्रथाओंका ह्रास हो रहा है, परन्तु इसका फल उत्तम नहीं होगा। देवताओंके सकाम अनुष्ठानोंसे हमारी संस्कृतिकी बड़ी रक्षा होती है, श्रद्धा बढ़ती है और शास्त्रोंका अनुसरण होता है; अतएव सब लोगोंको ब्राह्मणोंके द्वारा पाठ या मन्त्रादिके द्वारा देवताओंकी यथायोग्य पूजा-उपासना अवश्य करवानी चाहिये। जगह-जगह विद्वान् ब्राह्मणोंके द्वारा श्रीहरिकथाकी व्यवस्था करवानी चाहिये, ब्राह्मण-भोजनका आयोजन करना चाहिये और सच्चे मनसे ब्राह्मणधर्मपर आरूढ़ रहनेवाले ब्राह्मणोंका खूब ही सम्मान करना चाहिये। यह याद रखना चाहिये कि बड़े-से-बड़े धनी, व्यवसायी, जज, वकील, डॉक्टर ब्राह्मणकी अपेक्षा धर्मकी दृष्टिसे ब्राह्मणधर्मपर आरूढ़ भिक्षाजीवी ब्राह्मण बहुत ही उत्तम और सर्वथा पूज्य है। अतएव ब्राह्मणोंको नीची दृष्टिसे न देखकर उनका हृदयसे सम्मान करना चाहिये। उनके त्यागकी—उनकी वृत्तिकी खूब प्रशंसा करनी चाहिये। ब्राह्मणोंकी सेवामें जिसका तन, मन, धन लगे उसको अपना अहोभाग्य मानना चाहिये—यह याद रखना चाहिये।
अविद्वांश्चैव विद्वांश्च ब्राह्मणो दैवतं महत् ।
प्रणीतश्चाप्रणीतश्च यथाग्निर्दैवतं महत् ॥
श्मशानेष्वपि तेजस्वी पावको नैव दुष्यति।
हूयमानश्च यज्ञेषु भूय एवाभिवर्धते॥
एवं यद्यप्यनिष्टेषु वर्तन्ते सर्वकर्मसु।
सर्वथा ब्राह्मणा: पूज्या: परमं दैवतं हि तत् ॥
(मनु० ९।३१७—३१९)
अग्निको चाहे वेदमन्त्रोंसे प्रकट किया हो चाहे दूसरी तरहसे वह जैसे महान् देवता है, वैसे ही ब्राह्मण विद्वान् हो या अविद्वान्, वह महान् देवता है। तेजस्वी अग्नि श्मशानमें भी दूषित नहीं होता तथा यज्ञोंमें हवन करनेपर फिर बढ़ जाता है। ऐसे ही ब्राह्मण सब प्रकारके छोटे काम करनेपर भी सर्वथा पूज्य हैं; क्योंकि वे परम देवता हैं।
ब्राह्मणसे प्रार्थना
अन्तमें ब्राह्मणके चरणोंमें विनम्र प्रार्थना है—हे भूदेव! सनातन-धर्मकी रक्षाका भार भगवान्ने तुम्हारे हाथोंमें दिया है, तुम उसे सँभाले रहो। दूसरोंके प्रमादको देखकर तुम प्रमाद मत करो। तुम क्षमा और त्यागकी मूर्ति हो, अपने स्वरूपको स्मरण करो और साधना करके उसपर प्रतिष्ठित हो जाओ। यह मत समझो कि तुम वकील, बैरिस्टर, मजिस्ट्रेट या सेठ नहीं हो तो तुम्हारा दर्जा नीचा है; तुम भिक्षाजीवी हो तो धनियोंसे नीचे हो। तुम्हारा त्याग सदा ऊँचा है और ऊँचा रहेगा। अपने धर्ममें, अपनी संस्कृतिमें और अपनी वृत्तिमें गौरव-बुद्धि करो। लोभका अवश्य त्याग करो, दुष्ट प्रतिग्रहसे जरूर बचो; पर शुद्ध दान या दक्षिणा ग्रहण करनेमें अपना अपमान कभी न समझो। उसे तो तुम यजमान और दाताके कल्याणके लिये ग्रहण करते हो। ब्राह्मणत्वके निदर्शक आचार-व्यवहार, वेश-भूषा और कार्यकलापमें अपनेको धन्य समझो। जो लोग तुम्हारी वृत्तिको नीचा समझते हैं, वे स्वयं नीचे हैं। तुम्हारे स्वरूपका उन्हें ज्ञान नहीं है। उनकी भड़कीली पोशाकों, उनके खर्चीले जीवन और उनके राजसी-तामसी ठाटकी माया-मरीचिकासे मोहित मत हो। तुम्हारे त्यागमें ही तुम्हारी महिमा है। भौतिक धन-रत्न तुम्हारे त्यागरूपी परम धनके सामने सर्वथा तुच्छ हैं, नगण्य हैं। वह समय याद करो, जब बड़े-बड़े सम्राटोंके रत्नमणिमय मुकुट तुम्हारी चरणधूलिसे अभिषिक्त होनेमें अपना गौरव समझते थे। लोग चाहते थे तुम कुछ ग्रहण करके उनके धनको धन्य करो, सेवा स्वीकार करके उनके जीवनको सफल करो; परन्तु तुम उनके धनकी तथा सेवाकी ओर ताकते ही न थे। यही तुम्हारी महानता थी! इसपर पुन: प्रतिष्ठित होओ! तुम सबके पथप्रदर्शक हो, तुम जगद्गुरु हो। भगवान् मनु कहते हैं।
एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन:।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवा:॥
(२। २०)
इस देशमें उत्पन्न ब्राह्मणसे पृथ्वीके सब मनुष्य अपने-अपने सदाचारको सीखें।
अपने इस स्वरूपका स्मरण करो, हिन्दू-सनातनधर्मकी अपने तपोबलसे पुन: सुप्रतिष्ठा कर दो, भारतवर्षके लुप्त गौरवको पुन: प्राप्त करा दो और अपने ज्योतिर्मय ज्ञानालोकसे जगत्के समस्त अन्धकारको दूर कर दो। हे पवित्र ब्राह्मण, तुम्हारे पुनीत चरणोंमें यही सादर विनय है।