अखण्ड, पूर्ण और नित्य सुख
याद रखो—संसारमें सुख सभी चाहते हैं, परंतु किसीको पूर्ण अखण्ड स्थायी सुख नहीं मिलता। सुखके लिये भटकते-भटकते जीवन बीत जाता है और सुख आगे-से-आगे सरकता जाता है। इसका कारण यही है कि मनुष्य जिन प्राकृतिक वस्तुओंसे सुख चाहता है, उनमें वह पूर्ण अखण्ड स्थायी सुख है ही नहीं। अतएव यदि तुम सुख चाहते हो तो पूर्ण अखण्ड नित्य सत्य सुखस्वरूप भगवान्को भजो।
याद रखो—किसीको कोई वस्तु वहींसे मिलेगी, जहाँ वह होगी। हम बालूमेंसे तेल निकालना चाहें या जलमेंसे घी निकालना चाहें तो निराश ही होंगे; क्योंकि न बालूमें तेल है और न जलमें घी है। तेलके लिये तिल-सरसों आदि तिलहन पदार्थोंकी और घीके लिये दूधकी आवश्यकता होगी। इसी प्रकार पूर्ण, अखण्ड और नित्य सुख एकमात्र भगवान्में ही है; वे ही अनन्त सुखसागर हैं, अतएव यदि तुम सुख चाहते हो तो उन भगवान्को भजो।
याद रखो—भगवान्को भजनेका अर्थ यह है कि जिस प्रकार भोगोंकी इच्छासे तुमने भोगोंको आत्मसमर्पण कर रखा है, उसी प्रकार भगवान्को आत्मसमर्पण करो। भोगोंमें जैसी सहज स्वाभाविक प्रीति है, वैसी ही सहज स्वाभाविक प्रीति भगवान्में करो।
याद रखो—भगवान्के समान अकारण प्रीति करनेवाला सुहृद्, भली-बुरी सभी स्थितियोंमें आश्रय देकर अभय करनेवाला दयालु और कोई भी नहीं है। भगवान् सुहृद् होनेके साथ ही सर्वशक्तिमान् और सर्वज्ञ भी हैं। उनके प्रति आत्मसमर्पण करनेपर उनके प्रत्येक विधानमें उनकी परम मंगलमयताके दर्शन होंगे, उनका दिव्य स्पर्श प्राप्त होगा और इससे सारे दु:खोंका अवसान हो जायगा।
याद रखो—दु:ख-सुख किसी भी परिस्थितिमें, प्राणीमें या पदार्थमें नहीं हैं; वे हैं हमारे मनकी प्रतिकूल और अनुकूल भावनामें। हम जहाँ प्रतिकूलता पाते हैं, वहीं दु:खी हो जाते हैं और जहाँ अनुकूलता देखते हैं, वहाँ सुखका अनुभव करते हैं। ये दु:ख-सुख प्रतिकूलता-अनुकूलताकी कमी-बेशीके साथ ही घटते-बढ़ते हैं और प्रतिकूलता-अनुकूलताका भाव बदल जाने या न रहनेपर ये बदल जाते या नष्ट हो जाते हैं। आज जो वस्तु तुम्हें प्रतिकूलभाव होनेके कारण दु:खदायिनी दीखती हैं वे ही कल अनुकूलभाव होनेपर सुख देनेवाली बन जायँगी।
याद रखो—श्रीभगवान्के प्रति आत्मसमर्पण करनेपर तुम्हें सर्वत्र भगवान्की मंगलमयी, आनन्दमयी कृपाके दर्शन होंगे, उनके प्रत्येक विधानमें—जो फलरूपमें तुम्हें प्राप्त होता है—मंगलमयताके कारण अनुकूलताके दर्शन होंगे। प्रतिकूलता कहीं रहेगी ही नहीं और तुम हर हालतमें सुखी—परम सुखी हो जाओगे।
याद रखो—जगत् द्वन्द्वमय है। सुख-दु:ख, मान-अपमान, स्तुति-निन्दा, लाभ-हानि, प्रिय-अप्रिय, शुभ-अशुभ आदि परस्पर-विरोधी दो भावोंसे परिपूर्ण धारणा ही जगत् है। भगवान् एक हैं, सम हैं, सारे द्वन्द्वोंमें वे एक ही पूर्ण हैं, सारे द्वन्द्व उन्हींके आधारपर कल्पित हैं और सारे द्वन्द्वोंमें उन्हींका आत्मप्रकाश है या सारे द्वन्द्व उन्हींकी माया अथवा लीला हैं। हैं एकमात्र वे ही। अतएव उन्हें आत्मसमर्पण करनेपर इन द्वन्द्वोंके स्थानपर भगवान् या भगवान्की अभिन्नस्वरूपा लीलाके दर्शन होंगे। सुख-दु:ख दोनोंका ही सर्वथा अभाव हो जायगा और तुम उस आत्यन्तिक सुखको—जो द्वन्द्वातीत और भगवत्स्वरूप है—प्राप्त हो जाओगे। तुम्हारा जीवन धन्य तथा सफल हो जायगा। अतएव तुम ऐसा पूर्ण, अखण्ड और नित्य सुख चाहते हो तो सर्वात्मना भगवान्को ही भजो।