आनन्दकी स्वाभाविक चाह
याद रखो—मनुष्य स्वाभाविक ही आनन्द चाहता है और वह अपनी समझसे दिन-रात आनन्दकी प्राप्तिके उपाय ही सोचता है और उसीके लिये कार्य करता है। अनुकूल उपायोंका अवलम्बन करता है और विघ्नोंको हटाने-मिटानेका प्रयास करता है; पर इस बातको नहीं जानता कि वास्तविक स्थायी और नित्य आत्यन्तिक आनन्द कहाँ है। वह अपनी विषयासक्त सीमित बुद्धिसे इस जगत्में धन, ऐश्वर्य, कीर्ति, सम्मान, पुत्र, स्त्री, पूजा, पद और अधिकार आदिमें ही सौन्दर्य तथा आनन्द है—ऐसा दृढ़ विश्वास कर बैठा है, अतएव इन्हींके अर्जन, रक्षण तथा संवर्धनमें लगा है।
याद रखो—जो वस्तु अपूर्ण है, नाश होनेवाली है, जो मृत्युके अधीन है, वह कभी न तो वस्तुत: सुन्दर होती है और न आनन्द देनेवाली ही। वह तो सदा ही असुन्दर और दु:खरूप है।
याद रखो—पता नहीं, किस अनादिकालसे यह जीव भगवद्विमुख होकर—अपने आत्मस्वरूपको भूलकर माया-मोहमें फँस रहा है और अनित्य तथा दु:खपूर्ण दु:खयोनि संसारके प्राणिपदार्थ-परिस्थितियोंको प्राप्त करके आनन्द-लाभ करनेके लिये प्रयत्नशील है। यह जो आत्मस्वरूपकी विस्मृति है, यही क्षणभंगुर शरीर और नामोंमें अहंबुद्धि—अर्थात् यह मैं हूँ और शरीर तथा शरीर-सम्बन्धी वस्तुओंमें ममत्व-बुद्धि अर्थात् ये मेरे हैं—ऐसी भ्रान्ति उत्पन्न करती और बढ़ाती हैं। इसी कारण मनुष्य शरीरकी स्वस्थतामें अपनेको स्वस्थ, कृशता यास्थूलतामें अपनेको कृश या स्थूल, शरीरके नाशमें अपना नाश मानता है और इसी कारण यह शरीर और नामके सम्बन्धों—स्त्री, पति, पुत्र, घर, धन, पद, अधिकार, मान आदिके नाशमें मेरी वस्तुओंका नाश और इनकी प्राप्ति तथा रक्षामें मेरी वस्तुओंकी प्राप्ति तथा रक्षा मानता है।
याद रखो—इस प्रकार शरीर एवं नामको ‘मैं’ और इनके सम्बन्धी अनुकूल प्राणी-पदार्थों तथा परिस्थितियोंको ‘मेरा’ माननेवाला मनुष्य सदा ही चोट-पर-चोट खाता रहता है, वह सदा ही आनन्दके बदले घोर दु:ख, शान्तिके बदले अशान्ति, अमरताके बदले नित्य-मृत्यु और तृप्तिके बदले सदा अतृप्ति प्राप्त करता है।
याद रखो—ऐसा मनुष्य जीवनभर चिन्ताग्रस्त और भ्रमित—अशान्तचित्त रहता है। कभी किसी अवस्थामें वह निश्चिन्त और सुस्थिर-शान्तचित्त नहीं रह सकता। साथ ही भोगकामनाकी पूर्तिके लिये भोगासक्तिवश नये-नये पाप करता है, लोगोंसे द्वेष-द्रोह करता है, क्रोध-हिंसा करता है, छल-कपट करता है, असत्य और अन्यायका आश्रय लेता है और मरते क्षणतक दु:खी रहता हुआ पापोंका संग्रह करके मृत्युका ग्रास बन जाता है।
याद रखो—इस प्रकार जिसकी पाप-चिन्तामयी मृत्यु होती है, वह मृत्युके पश्चात् बहुत बड़ी कड़ी यमयन्त्रणा भोगता है। बार-बार अधम आसुरी योनियोंमें जाता है और वहाँ भाँति-भाँतिके संतापकी आगमें जलता रहता है।
याद रखो—मनुष्य-जीवनका यह ध्येय तो है ही नहीं; वरं उसके असली ध्येयका—भगवत्प्राप्ति या आत्मस्वरूप-स्थितिका बाधक है। अतएव इस परिणामको प्राप्त करानेवाले अहं-ममजनित पापकर्मोंका परित्याग करके नित्य-निरन्तर सावधानीके साथ उन साधनोंका आश्रय ग्रहण करो, जिनसे मानव-जीवनके असली ध्येयकी प्राप्ति हो। वास्तविक लक्ष्योंको प्राप्त करके जीव कृतकृत्य हो जाय। मानव-जन्म सफल हो जाय।