असली सौन्दर्य
याद रखो—सौन्दर्य किसी बाहरी रूप-रंग, वेष-भूषा और साज-शृंगारमें नहीं है, यह सब तो काल्पनिक है। कहीं गौर-वर्ण सुन्दर माना जाता है तो कहीं कृष्ण-वर्ण। इसी प्रकार वेष-भूषा, साज-शृंगारमें भी सुन्दरताकी कल्पना भिन्न-भिन्न है। शरीरके अवयवोंकी सुन्दरताके विषयमें भी लोगोंकी पृथक्-पृथक् कल्पना है। विषयासक्तको विषयकामना बढ़ानेवाले अंग सुन्दर लगते हैं और विषय-विरक्तको वे ही अत्यन्त भयानक प्रतीत होते हैं।
याद रखो—वस्तुत: जिसका हृदय सुन्दर है, जिसके अन्तरमें विषय-विराग, त्याग, अहिंसा, प्रेम, करुणा, परदु:खकातरता, विनय, दया, नम्रता, सहिष्णुता, सेवा, संयम, साधुता, समता, शान्ति आदि सुन्दर विचार,भाव, गुण, भरे हैं, वही वस्तुत: सुन्दर है। ऐसे सुन्दर हृदयवाले पुरुष या स्त्रीकी मुखाकृतिमें; उसके नेत्रोंमें, उसके अंग-अंगमें भीतरके इन सुन्दर भावों—गुणोंका प्रकाश अपने-आप छा जाता है और वह देखनेवालोंके हृदयमें उसके भावोंकी न्यूनाधिकताके अनुपातसे इन गुणोंका प्रकाश करता है।
याद रखो—किसीको देखकर तुम डर जाते हो, किसीको देखकर निर्भय हो जाते हो; किसीको देखते ही क्रोध उत्पन्न होता है, किसीको देखकर क्षमाका उदय हो जाता है; किसीको देखकर कामके वश हो जाते हैं, किसीको देखते ही संयमकी सहज उत्पत्ति हो जाती है; यह सब इसीलिये होता है कि उसकी मुखाकृति आदिसे वैसे ही भावोंका प्रकाश हो रहा है।
याद रखो—जगत् त्रिगुणात्मक है, इसलिये सभीके अन्तरमें कम-ज्यादा सात्त्विक गुण भी है, तमोगुण भी है। देवता भी हैं, राक्षस भी हैं। तुम अपने सात्त्विक या तमाम गुणसे, देवभाव या आसुरभावसे किसीके अंदरके देवताको जगा देते हो, तो किसीके अंदरके असुरको जगा देते हो।
याद रखो—सुन्दर वह है जिसे देखते ही हमारे पापके विचार दब जायँ, लुप्त हो जायँ और पुण्यके विचार जग जायँ, बढ़ जायँ। देवता जगकर क्रियाशील हो जायँ और असुर-राक्षस दबकर मृतवत् हो जायँ।
याद रखो—जिसके हृदयमें आसक्ति, द्वेष, काम, क्रोध, लोभ, वैर, हिंसा, मोह, मद, अभिमान, विषमता, भोगपरायणता, अशान्ति आदि दुर्विचार, दुर्भाव और दुर्गुण भरे हैं, वह बाहरसे सुन्दर दीखनेपर भी, वेष-भूषासे सुसज्जित होनेपर भी वस्तुत: सुन्दर नहीं है, भयानक है। वह स्वयं सदा दोषोंका घर बना रहता है; क्योंकि उसके अंदरका असुर-राक्षस जगा हुआ सक्रिय हो रहा है और उसके सम्पर्कमें जो आता है, उसको भी वह अपनी नकली सुन्दरताके पर्देमें छिपे भयानक विचारभाव देकर उसे भी असुर-राक्षस बना देना चाहता है।
याद रखो—जिस सुन्दरताके साथ हमारे चरित्रकी पवित्रता, भावोंकी विशुद्धि और आचरणकी शुचिता है, वही सुन्दरता वास्तविक है। शेष समस्त सौन्दर्य यथार्थत: वैसा ही है, जैसा जहरसे भरा चमकता हुआ स्वर्णकलश। इस भयानक सुन्दरतासे अपनेको बचाओ और इसीलिये बाहरी रूप-रंग, वेष-भूषा, साज-शृंगारके चक्करमें न पड़कर विचारों, भावों और गुणोंको तथा उसीके अनुसार अपनी क्रियाको सुन्दर बनाओ। इससे शरीर स्वस्थ होगा, मन स्वस्थ होगा, बुद्धि स्वस्थ होगी; क्योंकि इसीसे स्वस्थ आत्माके शुभ दर्शन होंगे।
याद रखो—गंदे विचार, असद्भाव, दुर्गुण तथा दुष्कर्म स्वयं नरक हैं और नरकोंमें ले जानेवाले हैं। उनमें सर्वत्र गंदगी तथा कुरूपता भरी है, भले ही भ्रमसे वे कहीं बाहरसे स्वच्छ, सुन्दर प्रतीत होते हों।
याद रखो—भगवान् श्रीकृष्ण श्यामसुन्दर हैं—उनका बाहरी रंग गोरा नहीं, पर उनकी सुन्दरता सबको मोह लेती है, इसीलिये कि उनके बाहर-भीतर, सर्वत्र सदा परम कल्याणमय, नित्य नवीन सुन्दर दिव्य भगवत्ताका प्रकाश हो रहा है। इस श्यामप्रकाशमें डूब जाओ तो तुम भी बाहर-भीतरसे परम सुन्दर हो जाओगे—
‘ज्यों ज्यों डूबै स्याम रंग त्यों त्यों उज्ज्वल होय।’