आत्मा नित्य-शुद्ध-बुद्ध-सच्चिदानन्दस्वरूप
याद रखो—तुम विकारी और विनाशी क्षणभंगुर पांचभौतिक जड शरीर नहीं हो। तुम हो नित्य-शुद्ध-बुद्ध-सत्-चित्-आनन्दस्वरूप। जन्म-मृत्यु आदि विकार शरीरमें हैं—तुम आत्मामें नहीं हैं। जगत् प्रपंचरूप दृश्य असत् है और मायासे सत्-सा दीखनेपर भी उसकी अनित्यता—मरता तो प्रत्यक्ष है। तुम सत् और नित्य अमर हो। अपने स्वरूपको समझो और जगत्के सुख-दु:ख, लाभ-हानि आदि द्वन्द्वोंसे अतीत सदा आनन्दमय बने रहो।
याद रखो—जैसे स्वप्नमें देखे प्राणी-पदार्थ तथा अनुभूत सुख-दु:ख वास्तवमें असत् हैं, वैसे ही जाग्रत् के ये समस्त प्राणी-पदार्थ एवं सुख-दु:ख भी असत् हैं। ये सब अज्ञानके ही असत् परिणाम हैं। इनसे तुम आत्मस्वरूपका न कोई सम्बन्ध है और न इनके आने-जानेमें—उत्पत्ति-विनाशमें तुम्हारा कुछ बनता-बिगड़ता ही है।
याद रखो—भक्तोंकी अनुभूतिमें ये सब लीलामय भगवान्के लीला-समुद्रकी विविध मृदु—तीव्र लीलातरंगें हैं। स्वयं भगवान् ही लीलारूपमें अभिव्यक्त या लीलायमान हैं। अतएव इनमें सदा-सर्वदा भगवान्के मंगल-दर्शन करो और नित्य-निरन्तर लीलाके रूपमें प्रकट लीलामयके दर्शन कर परम सुखमय लीलानन्दका अनुभव करते रहो।
याद रखो—जन्म-मृत्यु, लाभ-हानि, सुख-दु:ख, मान-अपमान, स्तुति-निन्दा, मित्र-शत्रु, दिन-रात, सर्दी-गर्मी आदि सारे द्वन्द्व माया हैं या भगवान्की लीलाके ही विविध प्रकाश हैं। इनको या तो देखो ही मत अथवा देख-देखकर इनकी आड़में छिपे हुए परमप्रेमास्पद लीलामय प्रभुके नित्य प्रफुल्लित, नित्य मधुर-मृदु-हास्यसमन्वित मुखकमलके दर्शन कर परमानन्द-सागरमें डूबते-उतराते रहो।
याद रखो—जब तुम इस प्रकार सभी प्राणी-पदार्थोंमें, प्राकृतिक परिवर्तनोंमें, भावविचारोंमें केवल प्रियतम भगवान्का अनुभव करोगे, तब तुम्हारे लिये जगत्का रूप ही बदल जायगा। जहाँ इस समय तुम द्वन्द्वात्मक अनित्य विनाशी प्राणी-पदार्थोंको देखकर ममता-आसक्तिके कारण सुखी-दु:खी होते हो, वहाँ फिर तुम विविध खेलों तथा खेलनेवालोंके रूपमें अभिव्यक्त एक नित्य सत्य अविनाशी अपने आत्माके भी आत्मा नित्य सच्चिदानन्दमय भगवान्को देखोगे। तुम्हारा जीवन फिर विनाशी, भयविषादयुक्त, शोक-मोह-व्यथित नहीं रहेगा। वह बिलकुल बदल जायगा—अविनाशी अभय आनन्दमय नित्य-सत्य, नित्य परम मधुर, नित्य नव सौन्दर्यसम्पन्न भगवान्के लीलाभिनयके एक आनन्दस्वरूप अभिनेताके रूपमें।
याद रखो—इस संसारको कोई असत् न भी माने तो भी इस अनित्य परिवर्तनशील संसारमें कुछ भी नित्य और स्थिर तो है ही नहीं। इस अवस्थामें यहाँ कोई भी किसी नित्य और स्थिर वस्तुकी या स्थितिकी आशा रखेगा, तो वह सदा निराश ही रहेगा। यहाँकी आशा परम दु:खदायिनी है। यहाँ कभी किसीकी कोई आशा कभी पूर्णरूपसे सफल हुई ही नहीं, न कभी हो ही सकती है। तुम एक आशा करोगे तो उस एकसे हजारों-हजारों आशाएँ फूट-फूटकर निकलेंगी और तुम उनके पाशमें इतने जकड़े जाओगे कि फिर उनसे छूटना ही अत्यन्त कठिन हो जायगा। अभी यही तो हो रहा है। हजारों-हजारों आशा-पाशोंसे आबद्ध मनुष्य उनकी पूर्तिके लिये विवेक-भ्रष्ट होकर काम-क्रोधपरायण हो रहा है और प्रत्याशित वस्तुस्थितिकी प्राप्तिके लिये अन्यान्य-असत् साधनोंको अपनाकर दु:खभारको उत्तरोत्तर बढ़ा रहा है। अतएव मिथ्या अनित्य सुखोंकी आशाका सर्वथा त्याग करो। संसारकी असारता और दु:खमयता, अनित्यता और असत्यताका अनुभव करो। अपने नित्य-सत्य-आनन्द-चेतनस्वरूपमें स्थित होओ या लीलामय भगवान् लीलाभिनयके अभिनेता बनकर भगवदानन्दको प्राप्त करो।