आत्माका नित्य स्वरूप
याद रखो—जैसे शरीर कुमार, तरुण और वृद्धावस्थाको प्राप्त होता है, वैसे ही मृत्यु भी वास्तवमें शरीरकी ही एक अवस्थामात्र है। इस शरीर-आत्मवियोगको ही मृत्यु कहा जाता है, वास्तवमें मृत्यु कोई भयंकर वस्तु नहीं है। देहान्तरमात्र है। जैसे एक आदमी पुराने कपड़े त्यागकर नये कपड़े पहन लेता है, वैसे ही जीवात्मा (प्रकृतिस्थ पुरुष) एक देहको छोड़कर दूसरे देहमें जाता है। वस्तुत: आत्मा स्वरूपत: ज्यों-का-त्यों रहता है।
याद रखो—मृत्युसे तुम इसीलिये डरते हो कि तुमने पांचभौतिक शरीरको ही अपना रूप मान रखा है। शरीर जड है, वह माताके उदरमें बनता है और जो कभी बनता है, वह नष्ट होगा ही। उसका विनाश उसकी उत्पत्तिकी भाँति ही सहज स्वाभाविक है। तुम्हारा जो असली आत्मस्वरूप है वह तो नित्य है; कौमार, यौवन, जरा, व्याधि, मरण आदिसे सदा ही मुक्त है। इसलिये मृत्युसे डरनेका कोई कारण ही नहीं है। यह केवल अज्ञानमात्र है।
याद रखो—यह शरीरकी मृत्यु भी तभीतक होती है, जबतक जीव परिवर्तनशील और अनित्य प्रकृतिके परिणामोंमें स्थित होकर, उनमें मिथ्या तादात्म्य मानकर उन्हींको अपना स्वरूप मान रहा है। जिस क्षण तुम्हें यह भान हो जायगा—तुम यह जान लोगे कि ये सारे परिवर्तन प्रकृतिके परिणाममात्र हैं, मैं तो सदा निर्लिप्त इन सबका द्रष्टामात्र हूँ—उसी क्षण तुम जन्म-मृत्युके बन्धनसे मुक्त हो जाओगे। जो बन्धन वास्तवमें है नहीं, माना हुआ ही है।
याद रखो—यह प्रकृति और इसके परिणाम भी जिस स्वरूपमें तुम उन्हें देख रहे हो, उस स्वरूपमें यथार्थत: नहीं हैं। यह सब माया है या ये लीलामय प्रभुके खेलमात्र हैं। वे ही स्वयं खेल, खिलौना और खेलनेवाले बने यह सब लीला कर रहे हैं। जन्म भी उन्हींका एक लीलास्वरूप है और इसी प्रकार मृत्यु भी। मृत्युके रूपमें वही प्रकट होते हैं। तुम यदि इस बातको जानकर, मृत्युके स्वाँगमें आये हुए प्रियतम भगवान्को पहचानकर उनका आलिंगन करोगे तो मृत्युकी सारी भीषणता परम सुखरूपतामें परिणत हो जायगी। तुम भगवान्के साथ मिलकर परम धन्य और नित्य सुखी हो जाओगे। इसलिये मृत्युसे डरो मत, उसमें छिपे हुए भगवान्को देखो। देखते ही उन्हें पा जाओगे। जबतक तुम उन्हें न देखकर बाहरी सज्जाको देखते हो, तभीतक वे प्रत्यक्ष होनेपर भी तुमसे छिपे हैं, ज्यों ही तुमने उनको देखा—पहचाना कि फिर तो वे नित्य प्रत्यक्ष ही हैं। वे-ही-वे हैं—सर्वत्र, सर्वदा, सभी रूपोंमें, सभी अवस्थाओंमें और सभी नाम-रूपोंमें।
याद रखो—मानव-जीवनकी सफलता भी इसीमें है। मानव-जीवन मिला ही इसलिये है कि इसमें आकर जीव प्रकृतिके मिथ्या बन्धनसे मुक्त हो जाय, वह अपने स्वरूपको प्राप्त करके ‘जीव’ से नित्य आत्मा बन जाय। नित्य आत्मा तो सदा है ही, ‘जीव’ की मान्यता ही उसे अपने स्वरूपसे वंचित रख रही है। इसीसे वह नित्य स्वरूपमें स्थित होनेपर भी—स्वस्थ होनेपर भी अस्वस्थ ही है।
याद रखो—जो ‘प्रकृतिस्थ’ है—प्रकृतिमें स्थित है, वही अस्वस्थ है और जो आत्मस्वरूपमें स्थित है—आत्मस्थ है, वही स्वस्थ है। स्वस्थताकी पहचान है जगत्के समस्त प्राणी-पदार्थ, परिस्थितियोंमें समभावसे सदा एकमात्र परमात्माको देखना, परमात्माको उपलब्ध करना। विविध व्यवहार-स्थलोंमें व्यवहारभेद होते हुए भी एकमात्र नित्य अभिन्न परमात्माका अभिन्न स्पर्श प्राप्त करना। यह स्वस्थता ही मानव-जीवनका लक्ष्य है और इसीको प्राप्त करानेवाले विचार तथा क्रियाओंका नाम ही सच्ची साधना है।