आत्मविस्मृति
याद रखो—तुम्हारी वही दशा है जो हरी-हरी घास खानेमें और बकरीके साथ सहवास करनेमें लगे हुए कुछ ही समय बाद कसाईके छूरेके नीचे आनेवाले बकरेकी होती है। तुम इस समय अपनी रुचिके अनुसार खान-पान, मौज-शौक, बाल-बच्चे, कुटुम्ब-परिवार, धन-ऐश्वर्य, पद-अधिकार, उन्नति-उत्थान और विकास-प्रकाश आदि अनेकों प्रवृत्तियोंमें लगे हुए एक क्षणके लिये भी आत्मविचारके लिये समय नहीं पा रहे हो; पर यह निश्चय समझो—तुमको बिना ही जताये, तुम्हारी आवश्यक-से-आवश्यक महत्त्वपूर्ण प्रवृत्तिका कुछ भी खयाल न करते हुए मृत्युदेवता सहसा आ जायँगे और तुम्हारी सारी प्रवृत्तियोंका समूलोन्मूलन कर डालेंगे।
याद रखो—कसाईका बकरा पशु है, वह यह नहीं समझता कि कुछ ही क्षणों पूर्व उसके सामने ही उसीके सदृश मोटा-ताजा एक बकरा तेज छूरीके घाट उतारा गया है, वही दशा तुम्हारी भी होनेवाली है। वह अज्ञानी है, पशु है, पर तुम तो मनुष्य हो। तुम्हें तो यह ज्ञान होना चाहिये कि जैसे मेरा एक सम्बन्धी बन्धु अभी मौतके विकराल गालमें चला गया है, वैसे ही मुझको भी जाना पड़ेगा और उस समय यहाँके ‘मैं’ तथा ‘मेरे’ कहलाने या माने जानेवाले तमाम पदार्थोंसे सारा सम्बन्ध टूट जायगा।
याद रखो—बुद्धिमान् मनुष्य वही है जो यह जानता है कि जन्मके साथ ही मेरी मृत्युका भी जन्म हो चुका है और वह प्रतिक्षण मरा जा रहा है। मृत्युका अन्तिम स्पर्श उसे निश्चय ही समाप्त कर देगा। अत: उसे अगले जन्मके लिये या जन्म-मृत्युके चक्रसे सदाको छूट जानेके लिये तैयार रहना और सुफल उपाय करना है।
याद रखो—तुम्हारा यह जन्म तुम्हारे अनादि विशाल जन्म-ग्रन्थका अध्यायमात्र है। तुम्हारा शरीर मृत्यु-मालाका ही एक मनका है। यह तुम्हारा स्वरूप नहीं है। तुम्हारा असली स्वरूप इससे नित्य विलक्षण है। जन्म-मृत्यु, जरा-व्याधिका शिकार तो यह प्राकृतिक शरीर ही होता है, नित्य चेतन आत्मा नहीं। तुम नश्वर शरीर नहीं, नित्य चेतन आत्मा हो। सच्चिदानन्दघन परमात्माके सनातन अंश हो। अपने इस भगवद्-अंश-स्वरूप या आत्म-स्वरूपकी विस्मृतिके कारण ही अपनेको जन्म-मरणशील शरीर मानकर जन्म-मरणके अनिवार्य; पर मिथ्या चक्रमें फँस रहे हो।
याद रखो—तुम्हें मानव-शरीर इसीलिये मिला है कि तुम अपने उस असली परमार्थस्वरूपको पहचानो—अपने सनातन सत्य जीवनको उपलब्ध करो। जो तुम्हारा स्वरूप है, पर तुम तो इतने आत्मविस्मृत हो रहे हो—इतने बाह्य प्रकृतिगत होकर—प्रकृतिको ही अपना स्वरूप मानकर उसीमें स्थित हो रहे हो कि जिसके कारण तुम्हारे अंदर अपने यथार्थ स्वरूपको जानने-समझनेका कभी प्रश्न ही नहीं उत्पन्न होता। ‘तुम कौन हो, कहाँसे आये हो, शरीर तथा नामके साथ तुम्हारा क्या सम्बन्ध है; यहाँके ममता-आसक्तिके प्राणी-पदार्थोंसे तुम्हारा क्या सम्पर्क है और वह क्यों है? शरीर छूटनेके बाद तुम्हें कहाँ जाना है’—इत्यादि जिज्ञासा तुम्हारे हृदयमें कभी उत्पन्न ही नहीं होती। यह कितना बड़ा महामोह है। इसी मोहके वश हुए तुम अपने सारे बुद्धि-विवेकको जो मनुष्यको पशुसे पृथक् करता है—पशुत्वकी प्राप्तिमें ही नहीं—पिशाच और राक्षस बननेकी प्रवृत्तिमें लगाये हुए हो और इसीमें जीवनकी सार्थकता मान रहे हो।
याद रखो—तुम्हारी यह स्थिति तुम्हारे लिये ऐसे भविष्यका निर्माण कर रही है, जो घोर अन्धकारमय, अनन्त नरकमय, दु:खमय, मृत्युमय और अशान्तिमय है। अतएव जल्दी चेत करो। विवेकको अपने विनाशमें न लगाकर सच्चे विकासमें लगाओ। अपने परमात्मांश-स्वरूपको—आत्मस्वरूपको समझो और मानव-जीवनको सफल करो।