भगवान् मंगलमय हैं

याद रखो—भगवान् मंगलमय हैं, उनका प्रेम अहैतुक है, उनकी दया सहज सर्वत्र व्यापिनी है, वे सर्वशक्तिमान् हैं, वे सर्वज्ञ हैं तथा नित्य निर्भ्रान्त हैं। तुम्हारे लिये जो कुछ भी विधान है, सब उनकी मंगलमयी इच्छारहित इच्छासे ही सम्पन्न होता है, अतएव उनकी इच्छा ही तुम्हारे लिये सदा-सर्वदा कल्याणकारिणी है।

याद रखो—तुम न सर्वज्ञ हो, न दूरदृष्टि हो, न अपने यथार्थ कल्याणके स्वरूप तथा साधनको ही निर्भ्रान्तरूपसे वास्तविक जानते हो; अतएव तुम अपने लिये जो कुछ सोचते हो, जो कुछ कल्याणका साधन निश्चय करते हो, वह ठीक वैसा ही है, यह निश्चित नहीं है। तुम्हारी भूल हो सकती है। हो सकता है तुम अपनी राग-द्वेषमयी अदूरदर्शिनी दृष्टिसे अहितको हित, अमंगलको मंगल, अकल्याणको कल्याण और असत्यको सत्य मानकर उसीकी इच्छा करके अपने ही हाथों अपना अनिष्ट कर लेते हो या करने लगते हो।

याद रखो—तुमसे भूल हो सकती है, भगवान‍्से नहीं; तुम भ्रमसे अपना अमंगल सोच या कर सकते हो, पर भगवान् कभी तुम्हारा अमंगल न सोच सकते हैं, न कर सकते हैं। तुम किसी बातमें अपना हित समझकर भी सीमित शक्ति होनेके कारण उसे नहीं कर सकते, पर असीम-शक्ति भगवान‍्के लिये सभी कुछ सहज सम्भव है। तुम्हारी इच्छा बदल भी सकती है, पर भगवान‍्की मंगलमयी इच्छा नित्य है। अतएव तुमको यही चाहिये कि तुम सब प्रकारसे, सब ओरसे सभी कार्योंमें अपने परम सुहृद् श्रीभगवान‍्की इच्छापर अपनेको छोड़कर निश्चिन्त हो जाओ।

याद रखो—भगवान‍्की इच्छापर अपनेको न छोड़कर यदि तुम अपनी स्वतन्त्र इच्छाके अनुसार भगवान‍्से काम कराना चाहते हो या करते हो तो इससे सिद्ध होता है कि भगवान‍्की सर्वज्ञता, सौहार्द तथा मंगलमयतापर तुम्हें विश्वास नहीं है और अपनी स्वतन्त्र इच्छाका उपयोग करके तुम अपने परम मंगल-परिणाममें—जो भगवान‍्की मंगलमयी इच्छाके अनुसार होनेवाला था—बाधक होते हो और अपने-आप ही अपना अमंगल करते हो।

याद रखो—भगवान‍्की अहैतुकी कृपा, प्रीति, सौहार्द, सर्वज्ञता आदिपर विश्वास करके तुम अपनी स्वतन्त्र इच्छाको छोड़कर भगवान‍्की इच्छापर निर्भर करते हो तो अपना सहज मंगल करते हो। अतएव सदा यही चाहो कि भगवान‍्की इच्छा पूर्ण हो। यह विश्वास रखो—देखनेमें कहीं भयानक या विनाशक होनेपर भी भगवान‍्की इच्छासे होनेवाला परिणाम, तुम्हें मिलनेवाला फल निश्चय ही तुम्हारे लिये परम कल्याणरूप होगा।

याद रखो—अनिच्छा या परेच्छासे जो कुछ भी फल तुम्हें प्राप्त होता है, वह भगवान‍्के मंगलविधानसे ही होता है। उसके विपरीत कभी इच्छा न करो, उसमें कभी असंतुष्ट मत होओ। वरं भगवान‍्का मंगल-प्रसाद समझकर उसे सिर चढ़ाओ। भगवान‍्से कभी कोई माँग करनी हो, कुछ चाहना हो तो बस, केवल यही माँगो, यही चाहो कि ‘मंगलमय भगवन्! तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो। तुम्हारी इच्छाके विपरीत मेरी कभी कोई इच्छा हो ही नहीं और कदाचित् कभी कुछ हो जाय तो उसे कभी पूरी मत करना।’

याद रखो—भगवत्सेवाकी बुद्धिसे, भगवान् जब जैसी सद‍्बुद्धि दें वैसा आचरण करो और फल केवल भगवान‍्की इच्छापर छोड़ दो। इससे तुम्हें सुख-शान्ति तो मिलेगी ही, भगवत्कृपासे भगवत्प्रेमकी प्राप्ति भी हो जायगी। तुम्हारा जीवन सफल हो जायगा।