भगवान्का मंगल विधान
याद रखो—तुम सर्वनियन्ता, सर्वलोकमहेश्वर, सदा सर्वसुहृद् भगवान्के मंगल विधानको नहीं बदल सकते। यह सम्भव है—तुम्हारी अदूरदर्शिनी दृष्टिसे तुम्हें उस विधानका मंगलमय स्वरूप न दीखता हो। तुम्हारा तो इतना ही काम है कि तुम अपने दृष्टिकोणके अनुसार परिणामपर विचार करते हुए भगवत्कृपासे जब जिस कर्मके सम्पादनकी कर्तव्यताका बोध हो, तब उसके सम्पादनमें यथाशक्ति यथाबुद्धि लग जाओ।
याद रखो—कर्तव्यपालनमें विशुद्ध भगवत्कृपाका आश्रय होना चाहिये और होनी चाहिये राग-द्वेषसे रहित तथा परिणाममें सबका मंगल चाहनेवाली निर्मल बुद्धि। यदि कहीं मनमें राग-द्वेष आ गया, किसीके अमंगलकी भावना आ गयी तो फिर उस कर्तव्यका सम्पादन यथार्थरूपसे नहीं होगा। राग-द्वेष तथा पर-अहितकी भावना मन-बुद्धिमें आते ही ‘विवेक’ नष्ट हो जाता है। फिर रागके प्रत्येक प्राणी, पदार्थ, परिस्थितिमें गुण-बुद्धि और द्वेषके प्रत्येक प्राणी, पदार्थ,परिस्थितिमें दोष-बुद्धि हो जाती है एवं पर-अमंगलकी कामना पुष्ट होकर सत्कर्मका प्रयोग भी असत् उद्देश्यकी सिद्ध कराने लगती है। इस प्रकार पुण्य भी पाप बन जाता है अतएव सावधान रहो।
याद रखो—तुम्हारा काम होना चाहिये केवल भगवत्प्रीतिके लिये—भगवत्पूजारूप उचित कर्म करना। न कर्मके पूर्ण होनेमें आसक्ति होनी चाहिये और न कर्मके अनुकूल फलमें आसक्ति होनी चाहिये। जो कर्म कर्मासक्ति एवं फलासक्तियुक्त होते हैं, उन्हें आसक्ति निश्चितरूपसे दूषित कर देती है।
याद रखो—भगवान्की प्रीतिके लिये कर्म करनेवाला ही यथार्थरूपसे कर्तव्यपालन कर सकता है; क्योंकि उसकी बुद्धि राग-द्वेषरहित, निर्मल तथा बहुशाखावाली न होकर अव्यभिचारिणी भगवन्निष्ठ होती है। वह जो कुछ भी सोचता-करता है, सब भगवान्की परितुष्टिके लिये, उनकी अर्चनाके रूपमें करता है। कर्म पूरा हो, न हो; फल अनुकूल हो, प्रतिकूल हो—इस ओर उनकी दृष्टि नहीं रहती। उसकी दृष्टि रहती है, केवल और केवल अपनी विशुद्ध निष्ठाकी ओर—उसकी बुद्धिमें कहीं भी राग-द्वेष तो नहीं आ गया, कोई सीमित स्वार्थ तो नहीं आ गया, कहीं ‘अहं’ तथा ‘मम’ की पूजा तो नहीं होने लगी और कहीं किसी प्रकारसे भी भगवत्पूजाकी विस्मृति तो नहीं हो गयी? इसका वह बड़ी सावधानीसे ध्यान रखता है; क्योंकि यही पतन है।
याद रखो—भगवत्पूजाके लिये भगवत्प्रीत्यर्थ स्वधर्मरूप कर्तव्य-पालनमें लगा हुआ पुरुष किसीका कभी अनिष्ट—अहित तो कर ही नहीं सकता, किसीके अहितकी कल्पना भी अपने मनमें कभी नहीं कर सकता। यही विशुद्ध भगवत्सेवारूप कर्मकी कसौटी है।