भगवान्की कृपासे मनुष्य-शरीरकी प्राप्ति
याद रखो—मनुष्य-शरीर भगवान्की अहैतुकी कृपासे ही मिला है। बड़े-से-बड़े ऐश्वर्य-वैभव तथा शक्ति-सामर्थ्यवाले देवता और असुर भी मनुष्य-देहकी आकांक्षा करते हैं; क्योंकि परमात्माकी प्राप्तिका—जो जीव-जीवनका एकमात्र लक्ष्य है—मनुष्य-देह ही परम साधन है। भगवत्प्राप्ति ही परम पुरुषार्थ है और इस परम पुरुषार्थकी प्राप्तिका अधिकार देकर ही अनादिकालसे भटकते हुए जीवको भगवान्ने मनुष्य-देह दिया है।
कबहुँक करि करुना नर देही।
देत ईस बिनु हेतु सनेही॥
याद रखो—इस मानव-शरीरका सदुपयोग इसीमें है कि एकमात्र भगवत्प्राप्तिके लिये ही मन-तनसे सारे विचार तथा कर्म किये जायँ। न कर्मोंमें आसक्ति रहे, न उनके फलमें। भोग जीवनका लक्ष्य न हो, भगवान् ही लक्ष्य हों; और इस लक्ष्यकी सिद्धिके लिये समस्त दैवी गुणोंका आश्रय लेकर भगवान्के मंगलविधानमें विश्वास रखते हुए और इसलिये प्रत्येक परिस्थितिमें सुखका अनुभव करते हुए शान्त जीवन बिताया जाय और अन्तमें भगवान्की उपलब्धि हो जाय।
याद रखो—इस मनुष्य-शरीरको जो लोग नश्वर भोगोंकी प्राप्ति एवं भोगके लिये काम-क्रोध-लोभ, मान-मद-अहंकार, ईर्ष्या-वैर-हिंसाआदिमें ही लगाये रखते हैं, वे यहाँ आजीवन दु:ख उठाते हैं—अनन्त चिन्ताओंसे घिरे रहते हैं और नये-नये पाप बटोरकर पुन: महान् दु:खमय योनियोंमें चले जाते हैं। यह मनुष्य-शरीरके दुरुपयोगका विषम परिणाम है।
याद रखो—संसारमें जितने प्राणी हैं, सभीमें भगवान् भरे हैं, वे सब भगवान्की ही विविध अनन्त अभिव्यक्तियाँ हैं। अतएव सबमें भगवान्को देखते हुए, किसी भी प्राणीका जरा भी अहित न करके, सबके कल्याणकी भावना करते हुए भगवत्प्राप्तिके मार्गपर अग्रसर होते चले जाओ, पर यह निरन्तर समझते रहो कि ये सब यात्राके साथीमात्र हैं। इनसे यहाँका जो सम्बन्ध है, वह यथार्थ नहीं है। अत: इनके साथ इनके हितका निर्दोष व्यवहार करो—सबकी यथासाध्य सेवा करो। कहीं भी, किसीमें भी न तो आसक्ति करो और न किसीसे द्वेष ही करो। भगवत्-सेवाकी शुद्ध भावना रखो। फिर तुम्हारा प्रत्येक कर्म ही भगवान्की पूजा बन जायगा और तुम्हारा जीवन सफल हो जायगा।
याद रखो—मानव-जीवनकी सफलता ऊँचा अधिकार, विपुल धन-वैभव, संसारमें अपार यश-कीर्ति और बड़ी-से-बड़ी जागतिक सफलताकी प्राप्तिमें नहीं है। यदि ये सब परिस्थितियाँ और पदार्थ भगवान्से विमुख करनेवाले हैं तो इनका प्राणघातक मीठे विष या मित्र बनकर धोखेसे मार डालनेवाले शत्रुकी भाँति त्याग या विनाश ही श्रेयस्कर है। मनुष्य-जीवनकी सच्ची सफलता है उसका प्रत्येक क्षण भगवान्की सेवामें समर्पित होनेमें, प्रत्येक श्वासके भगवान्की स्मृतिमें डूबे रहनेमें।
याद रखो—वे ही सब प्राणी, पदार्थ, परिस्थितियाँ तुम्हारा वास्तविक हित करनेवाली हैं; जिनसे तुम्हें भगवत्प्राप्तिके साधनमें उत्साह, शक्ति, सहायता, सहयोग और प्रकाश मिलता हो, उन्हींका आश्रय तथा यथावश्यक संग्रह करना चाहिये। यही सत्संग है। शेष तो सभी कुसंग हैं, जो सब प्रकारसे हानिकारक होनेके कारण सर्वथा त्याज्य हैं; अतएव सावधानीके साथ जीवनको भगवान्में ही लगाये रखो। वस्तुत: यही मानवता है। यही सच्चा विकास है।