भगवान‍्की स्वरूप-सत्ता

याद रखो—तुम्हारे न मानने या न स्वीकार करनेसे सत्य-स्वरूप भगवान‍्की सत्ताका अभाव नहीं हो सकता। हाँ, तुम अपनी ओरसे उनकी सत्ता स्वीकार करके उनके आराधन-पूजनसे जो सीधा परम लाभ उठा सकते, उससे वंचित हो जाओगे। इसी प्रकार परलोक और कर्मफलको अपने अहंकारके कारण या भ्रान्त बहुमतसे अस्वीकार कर देनेपर भी न तो परलोक मिटेगा और न कर्मफलसे ही छुटकारा मिलेगा। अतएव बुद्धिमानी इसीमें है कि भगवान् को, परलोकको और अवश्यम्भावी कर्मफलको स्वीकार करो।

याद रखो—भगवान‍्को स्वीकार करनेपर भगवान‍्की सहायता प्राप्त करनेके लिये शुभकर्म होंगे, परलोकको तथा कर्मफलको माननेपर पापके परिणामरूप घोर दु:खकी सम्भावनासे पापकर्मसे बचकर तुम पुण्यकर्मोंमें लगोगे। भगवान्, परलोक और कर्मफलकी सत्ता यदि न भी हो तो भी तुम्हें लाभ ही होगा; क्योंकि तुम शुभकर्मोंके द्वारा सुख्याति और प्रतिष्ठा प्राप्त करोगे। हानि तो कुछ भी होगी ही नहीं, परंतु यदि तुम इनको नहीं मानोगे तो इस लाभसे भी वंचित रह जाओगे और यदि भगवान्, परलोक तथा कर्मफलकी सत्ता है, तब तो इनके न माननेपर तुम स्वेच्छाचारी और दुष्कर्म करनेवाले बनकर अपना इह-पर सभी बिगाड़ लोगे, तुम्हारी महती हानि होगी।

याद रखो—असली बात तो यह है कि भगवान्, परलोक तथा कर्मफल सत्य हैं ही! इन्हें मानकर इनका यथायोग्य सेवन करके तुम स्वयं तो परम लाभके भागी होओगे ही—अपने आचरणोंसे, अपने जीवनसे, अपने आदर्शसे दूसरोंको भी इस ओर लगानेमें समर्थ होओगे। वे अपने आदर्श आचरणसे दूसरोंको लगायेंगे, अतएव तुम विशुद्ध भगवद्भावसे प्रचार-प्रसारमें सफल निमित्त बननेका पुण्य और सौभाग्य प्राप्त करोगे।

याद रखो—जो स्वयं भगवान‍्की सेवामें लगा है तथा अपने आचरणसे दूसरोंको लगाता है, वह बड़ा भाग्यवान् है और वही प्राणियोंकी सच्ची सेवा करनेवाला है।

याद रखो—तुम यदि किसीको ऐसी मीठी चीज खिलाते हो—जिससेवह बीमार होकर मर जाता है तो तुम उसका उपकार-सेवा न करकेअपकारतथा कष्टदान ही करते हो। भोग सुखरहित दु:खालय और दु:खोंकी उत्पत्तिके स्थान हैं। (‘असुखम्,’ ‘दु:खालयम्’, ‘दु:खयोनय:’—गीता) अतएव जो भी व्यक्ति, वस्तु और परिस्थिति मनुष्यको परमानन्दस्वरूप भगवान‍्से हटाकर भोगोंमें लगाती है, वह उसके पतन, भयानक कष्ट, नरक-प्राप्ति और आत्म-विनाशमें कारण बनकर उसके साथ शत्रुताका काम करती है। अत: यदि तुम किसीको भगवान‍्में लगाते हो तो उसकी परम सेवा करते हो; क्योंकि इसीसे उसका भविष्य सुख-सौभाग्यमय पवित्र, उन्नत होगा और वह अविनाशी पदको प्राप्त होगा। एवं यदि तुम भगवान‍्से हटाकर भोगोंमें लगाते हो तो तुम उसके प्रति बहुत बड़ा अपराध करते हो; क्योंकि भोगासक्ति मनुष्यके सब प्रकारसे पतनका कारण है। इतना ही नहीं, यदि तुम अपनी चित्तवृत्तिको भी भगवान‍्से हटाकर भोगोंमें लगाते हो तो अपने साथ भी शत्रुताका ही बर्ताव करते हो; क्योंकि तुम ऐसा करके आप ही अपनेको पतन तथा विनाशके पथपर बढ़ाये ले जाते हो। अत: सावधानीके साथ ऐसा आचरण करो, जिससे तुम स्वयं भोगोंकी ओर न लगकर भगवान‍्की ओर अग्रसर हो सको और दूसरोंको भी भगवान‍्की ओर लगा सको। इसीमें तुम्हारा सौभाग्य है और इसीमें सच्ची लोकसेवा है।

याद रखो—भगवान्, परलोक तथा कर्मफलकी सच्ची सत्ताको स्वीकार करनेसे भगवान‍्में वृत्ति सुगमतासे लगती है, अतएव इन्हें स्वीकार करके इनसे लाभ उठाओ और अपना जीवन सफल करो।