भगवान‍्में विश्वास और आस्था

याद रखो—सुख चाहते हो पर पाते नहीं हो, इसका कारण है—चित्तकी अनवरत अशान्ति और अशान्तिका प्रधान कारण है—भगवान‍्में अविश्वास एवं अनास्था तथा भोगोंमें विश्वास और आस्था। भोग प्राकृतिक पदार्थ हैं, जो स्वाभाविक ही अपूर्ण, अनित्य और विनाशी हैं।

याद रखो—प्राकृतिक भोगोंसे शान्ति-सुख चाहनेवाला किसी भी स्थितिमें संतुष्ट नहीं हो सकता। आवश्यक प्राकृतिक भोग-पदार्थोंके अभावमें तो अशान्ति-दु:ख होता ही है, परंतु ज्यों-ज्यों प्राकृतिक भोग-पदार्थोंकी प्राप्ति होती है, त्यों-ही-त्यों भोगोंकी आवश्यकता, उन्हें प्राप्त करनेकी कामना—इच्छा बढ़ती चली जाती है। इतनी अनावश्यक आवश्यकताएँ बढ़ जाती हैं कि मनुष्य क्षणभरके लिये भी शान्तिका अनुभव नहीं कर सकता। शान्ति बिना सुख होनेका नहीं।

याद रखो—जितनी ही भोगोंकी आवश्यकता बढ़ती है, उतनी ही उन्हें प्राप्त करनेकी इच्छा तथा चेष्टा होती है और भोग-कामनासे मनुष्यका विवेक ढक जाता है। तब वह विवेक-भ्रष्ट होकर सहस्रों पथोंसे तथा बड़ी तीव्र गतिसे अध:पतनकी ओर जाता है।

याद रखो—विवेक-भ्रष्ट मनुष्य परिणामको भूल जाता है; किसका क्या फल होगा, यह सोचनेकी उसकी बुद्धिमें शक्ति नहीं रह जाती, वह सहज ही उन दुष्कर्मोंमें प्रवृत्त हो जाता है। जिनको वह स्वयं कभी बुरा समझता था और जो उसके जीवनको दुष्कर्ममय बना देते हैं।

याद रखो—जब बुद्धि भ्रष्ट होती है तब मनुष्यको सभी विपरीत दिखायी देने लगता है, उसकी बुरी चीजोंसे—बुरे कामोंसे केवल घृणा नहीं निकल जाती, वह उन्हें अपने कार्यकी सफलताके लिये आवश्यक मानता है, वरं उनको अपनानेमें गौरवका अनुभव करता है। इस दशामें उसकी अच्छी चीजोंमें, अच्छे कामोंमें, सत्पुरुषोंके संगमें, सत्-स्थानोंमें, अच्छी बातचीतमें, अच्छे अध्ययनमें और अच्छे वातावरणमें केवल रुचि ही नहीं हट जाती—ये सब उसे व्यर्थ मालूम होते हैं, वरं बुरे तथा त्याज्य प्रतीत होने लगते हैं; वह अच्छे सम्पर्कमें रहना ही पसंद नहीं करता।

याद रखो—ऐसा अच्छेको बुरा तथा बुरेको अच्छा माननेवाला विपरीतबुद्धि मनुष्य दु:खोंसे छूटनेके लिये अनवरत विचार करता है, कर्म करता है, पर करता है वही, जिससे दु:ख और भी बढ़ जाते हैं। उसकी अनियन्त्रित मन-इन्द्रियाँ निरन्तर सुखकी मिथ्या आशासे दु:खोत्पादक विषयोंके सेवनमें ही लगी रहती हैं। उसके जीवनमें अन्धकार, दुश्चिन्ता, अशान्ति, अधर्म आदि बढ़ते ही चले जाते हैं, जिनके मारे वह भौतिक असफलतामें तो मृत्युसे भी बढ़कर यन्त्रणाका अनुभव करता ही है, सफलतामें भी उसकी दुष्पूरणीय भोग-कामना, उसकी दुश्चिन्ता, अशान्ति, अधर्म और अधस्तरको बढ़ाती रहती है। इसी अशान्त, चिन्तामय तथा पापमय स्थितिमें उसकी आयुके दिन पूरे होते जाते हैं और वह मृत्युकालमें भी सैकड़ों-सहस्रों दुश्चिन्ताओं और दुर्भावनाओंमें फँसा हुआ, बड़ी ही भयानक पीड़ाका अनुभव करता हुआ पापका बोझ साथ लिये मर जाता है।

याद रखो—इस प्रकार मरनेवाले जीवकी बड़ी दुर्गति होती है, उसे बार-बार दु:ख-ताप तथा अज्ञानमय आसुरी योनिकी प्राप्ति होती है और तदनन्तर भीषण नरकयन्त्रणा भोगनी पड़ती है। मनुष्य-जीवनका यह परिणाम बड़ा ही भयानक तथा सर्वथा अवांछनीय है।

याद रखो—मनुष्य-जीवनकी सफलता इसीमें है कि मनुष्य मानव-जीवनके असली उद्देश्य भगवत्प्राप्तिका लाभ करे—वह सारी अशान्ति, सारी चिन्ता और सारे दु:खोंसे सर्वथा छूटकर परमानन्दमय चिन्मय भगवत्-स्थितिको प्राप्त करे। यह होगा भोगोंके प्रति वैराग्य और अनास्था होनेपर तथा भगवान‍्में अनुराग तथा विश्वास होनेपर।