भोग और संग्रह—बड़ी भूल

याद रखो—तुम्हारे पास धन-सम्पत्ति, प्राणी-पदार्थ, शरीर-स्वास्थ्य, शक्ति-सामर्थ्य, योग्यता-उपयोगिता—जो कुछ भी है, सब भगवान‍्का है और है सब भगवान‍्की सेवाके लिये ही। भगवान‍्की सेवामें लगनेमें ही उसकी सार्थकता है। तुमको ईमानदार और कर्तव्यपरायण समझकर इसी कामके लिये ये सारी वस्तुएँ सौंपी गयी हैं। पर तुम यदि अवसर मिलनेपर भी इनको भगवान‍्की सेवामें नहीं लगाते और अपनी वस्तु मानकर अपने भोगमें ही लगाते हो अथवा केवल संग्रह करके रखते हो तो, तुम केवल भूल ही नहीं करते, अपने कर्तव्यसे च्युत होते हो और एक चोरका काम करते हो। इसका परिणाम यह होगा कि ये वस्तुएँ तो तुमसे छिन ही जायँगी; क्योंकि तुम्हारी हैं नहीं एवं इस अपराधके कारण तुम दण्डके भागी बनोगे।

याद रखो—तुम यदि भगवान‍्की इन सारी वस्तुओंको भगवान‍्की मानते हो और यथासमय यथायोग्य भगवान‍्की सेवामें लगाते हो तो, भगवान‍्की अपनी वस्तु होनेपर भी, सहज आदर्श शीलस्वभाव भगवान् उसे तुम्हारी दी हुई मानकर तुम्हारे ऋणी हो जाते हैं और बदलेमें अपना सुदुर्लभ प्रेम अथवा आत्मस्वरूपतक दान कर देते हैं।

याद रखो—भगवान‍्की वस्तु भगवान‍्की सेवामें समर्पण करते समय या कर देनेके बाद कभी यह मत मानो कि ‘यह वस्तु मेरी थी, मैंने भगवान‍्की सेवामें समर्पण की है।’ यह तो तुम्हारा सौभाग्य है कि भगवान‍्की वस्तु तुम्हारे द्वारा भगवान‍्की सेवामें लगी; तुम्हें जिस कार्यके लिये वह सौंपी गयी थी, उसे उसी काममें लगानेका तुमको सुअवसर मिला।

याद रखो—जब तुम भगवान‍्की वस्तु ही भगवान‍्के अर्पण कर रहे हो, तब इसमें तुम्हारे लिये अभिमान करनेकी कौन-सी बात है? अतएव तुम किसी भी वस्तुको भगवान‍्की सेवामें लगाकर कभी तनिक भी अभिमान मत करो, कभी उसका कोई बदला या फल मत चाहो और जिसको दी है उसपर जरा भी अहसान मत करो। जब भी कुछ सेवामें समर्पण करो तब अभिमान छोड़कर विनम्रताके साथ सम्मानपूर्वक करो। वरं भगवान‍्ने ही उसके रूपमें उस वस्तुको स्वीकार किया है, इसलिये उसके कृतज्ञ बनो।

याद रखो—संसारकी किसी वस्तुमें ममता करना—उसे ‘मेरी’ मानना ही बेईमानी है और सारे अनर्थका, पापका तथा बन्धनका मूल है। तुम्हारी है नहीं, तुम्हारी रहेगी नहीं। तुम्हें तो भगवान‍्ने दया करके केवल कर्तव्यपरायण बनाने, सेवापरायण बनाने तथा इसी निमित्तसे भगवान‍्की सेवा करके उनका प्रेम या स्वरूप प्राप्त करनेके सहज साधनके रूपमें दी है। तुम यदि उसपर ममता करते हो तो, मानव-जीवनकी इस परम सफलतासे वंचित तो रहते ही हो, ममताके कारण पापाचरण करके अपनेको अधोगति एवं नरकका भागी बनाते हो।

याद रखो—जिस वस्तुकी, जहाँ, जब, जिसको आवश्यकता है और तुम्हारे पास वह वस्तु है तो, यह समझो कि भगवान् वहाँ, उस समय, उस प्राणी-परिस्थितिके रूपमें तुमसे अपनी वह वस्तु माँग रहे हैं और उसे स्वीकार करके तुम्हें धन्य बनाना चाहते हैं। अत: परम प्रसन्नताके साथ विनयपूर्वक उनकी वस्तु उन्हें देकर अपनेको सौभाग्यशाली समझो। भगवान‍्की वस्तु भगवान‍्की सेवामें अर्पण करनेमें तुम केवल निमित्त बनो, कर्ता नहीं। ऐसा कर सको तो सर्वोत्तम है।

याद रखो—तुम्हारी अपनी वस्तु तो अपनी आत्मा अथवा भगवान‍्के सुर-मुनि-सेवित पवित्र चरणारविन्द ही है। अन्यत्र सर्वत्रसे सारी समता समेटकर उसे केवल उन्हींके चरणोंमें लगा दो। उन्हींको अपना समझो। वे तुम्हारे हैं, सदा तुम्हारे रहेंगे और उनको पाकर तुम सदाके लिये संसारमें समता प्राप्त कर लोगे, सारे बन्धनोंसे मुक्त और कृतार्थ होकर परमानन्दरूप बन जाओगे।