भोगसुखकी असत्ता
याद रखो—भोगोंमें सुख वैसे ही नहीं है जैसे पानीमें घी नहीं है, बालूमें तेल नहीं है, मृगतृष्णाके मैदानमें जल नहीं है और अग्निमें शीतलता नहीं है। अत: जो कोई भी भोगोंसे सुखकी आशा रखता है, उसे सदा निराश ही रहना पड़ता है। तथापि मनुष्य मोहमें पड़कर भोगोंमें सुखकी सम्भावना मानकर उनके अर्जन तथा सेवनमें लगा रहता है और फलस्वरूप नित्य नये-नये रूपोंमें दु:खोंसे—तापोंसे जलता रहता है।
याद रखो—भोगकी वासना मनुष्यके विवेकका हरण कर लेती है, इसलिये वह अपने भले-बुरे भविष्यको भूलकर किसी भी साधनसे—चाहे वह सर्वथा निषिद्ध तथा समस्त मंगलोंका नाश करनेवाला ही क्यों न हो—इच्छित भोग प्राप्त करनेकी चेष्टा करता है और इसके परिणामस्वरूप बीचमें ही नयी विपत्तियोंसे घिर जाता है तथा उनसे बचनेके लिये फिर-फिर नये-नये कष्टसाध्य कुकृत्य करने लगता है। इससे विपत्तियोंका, पापोंका और तापोंका ताँता कभी टूटता ही नहीं।
याद रखो—भोगवासनावाले मनुष्यको कभी कुछ इच्छित भोग मिल जाता है तो उसका लोभ और भी बढ़ जाता है, साथ ही वह सफलताके गर्वमें फूलकर सबका तिरस्कार करने लगता है। लोभ और गर्व—दोनों ही उसको पुन: बुरे-बुरे कर्मोंमें लगाकर पतनकी ओर ले जाते हैं।
याद रखो—भोगवासनावाला मनुष्य सदा चिन्ताग्रस्त रहता है। इच्छित भोग प्राप्त न होनेपर तो चिन्ता उसे रहती ही है। प्राप्त होनेपर उसकी चिन्ता और भी बढ़ जाती है; क्योंकि ज्यों-ज्यों उसकी भोगकामना पूरी होती है, त्यों-ही-त्यों वह कामनाकी आग—अग्निमें घीकी आहुति पड़नेपर अग्निके अधिक भड़क उठनेकी तरह—और भी भड़क उठती है, इसीके साथ उसकी चिन्ताकी आग भी बढ़ती है, जिससे उसकी भीतरी जलन और भी बढ़ जाती है। वह खुद उससे सदा जला करता है और अपने समीप रहनेवालोंको भी द्वेष, द्रोह, क्रोध, वैर, हिंसा—जो कामनाके साथ-साथ पनपते और बढ़ते रहते हैं—के द्वारा जलाया करता है।
याद रखो—अग्नि जितनी बड़ी होती है, उतनी ही उसकी गरमी दूर-दूरतक जाती है। इसी प्रकार कामनाकी अग्नि जितनी बढ़ी हुई होती है, उतनी ही अधिक वह अपनेको तथा अपने सम्पर्कमें आनेवाले पार्श्ववर्तियोंको जलाती है। इतना ही नहीं, कुछ भी सम्बन्ध न रखनेवालोंको भी कभी-कभी उससे बड़ा संताप मिलता है।
याद रखो—यह कामनाकी अग्नि विषयोंकी प्राप्तिसे नहीं बुझती, इसे बुझानेके लिये तो वैराग्यरूपी धूल और भगवत्प्रेमरूपी अजस्र अमृत-जलधारा चाहिये। वह वैराग्य तभी प्राप्त होगा, जब भोगोंमें दु:खोंके दर्शन होंगे। भोग सुखरहित, दु:खालय और दु:खयोनि ही हैं, पर भ्रमवश-मोहवश उनमें सुखकी मान्यता हो रही है और जैसे शराबके नशेमें चूर मनुष्य गंदे नालेमें पड़ा हुआ भी अपनेको सुखी बतलाता है, वैसे ही उसे भोगोंमें सुखोंकी मिथ्या अनुभूति होती है। शराबीका जैसे वह प्रलाप होता है, वैसे ही उसका भी प्रलाप होता है। इस मोह-मदके नाशके लिये आवश्यक है—भोगोंके नग्नस्वरूपके दर्शन, जो भगवत्कृपासे संतोंकी वाणीद्वारा कराये जाते हैं। भोगोंका यथार्थ स्वरूप दीखनेपर तो उनसे वैराग्य हुए बिना रहेगा ही नहीं। तभी असली सुख-स्वरूप भगवान्की ओर चित्तकी गति होगी। अतएव संतोंका संग प्राप्त करनेकी चेष्टा करो।
याद रखो—सत्संग न मिलनेपर दूसरा साधन है मोहभंगका—जो सहज ही देर-सबेर प्राप्त होता ही है—वह है भयानक दु:खोंका आक्रमण। भगवान्के मंगलविधानसे प्रकृति स्वयं यह कार्य करती है। यह होनेपर चेत हो जाता है, आँखें खुल जाती हैं और मनुष्य भगवान्की ओर लगनेका प्रयास करता है।