भोगोंमें सुखकी भ्रान्ति
याद रखो—जबतक तुम्हारा मुख भोगोंकी ओर है, तबतक तुम्हारा एक पग भी आगे चलना भोगोंकी ओर ही होता है, भगवान्की ओर नहीं। किसीको उत्तराखण्डमें बद्रीनाथको जाना है, पर उसका मुख है दक्षिणके मद्रासकी ओर, तो वह जबतक अपना मुख मोड़कर उत्तरकी ओर नहीं कर लेगा, तबतक वह बद्रीनाथजीसे विपरीत दिशामें ही चलेगा और अधिक-से-अधिक दूर होता चला जायगा। इसी प्रकार भोगोंकी ओर मुख किये चलनेवाले मनुष्यका जीवन भगवान्से दूर-दूर हटता चला जाता है।
याद रखो—भोगोंमें सुख है, ऐसी भ्रान्ति धारणा और इसके कारण उदय हुई भोगोंमें आसक्ति भगवान्की ओर तुमको नहीं मुड़ने देती। तुम मुड़ना चाहते हो, जरा-सा मुँह फिरानेकी चेष्टा करते हो, पर वह भोगासक्ति तुम्हारे फिरते मुखको पकड़कर तुरंत भोगोंकी ओर कर देती है, तुम्हारा मुख भगवान्की ओर नहीं मुड़ पाता।
याद रखो—एकान्तवास, तीर्थनिवास आदि तुम्हारे सहायक अवश्य हैं, परंतु असली चीज तो है—भोगोंमें आत्यन्तिक अनासक्ति, जो भगवान्की ओर मुड़नेकी प्रधान साधना है। जब तुम्हारा मुख भगवान्की ओर अच्छी तरहसे मुड़ जायगा, जब तुम्हारा प्रत्येक पदसंचार भगवान्की ओर होगा और ज्यों-ज्यों तुम भगवान्की ओर बढ़ोगे त्यों-ही-त्यों तुम्हारा उत्साह, तुम्हारी उत्कण्ठा, तुम्हारी आगे बढ़नेकी शक्ति बढ़ती जायगी। भगवान्के पथमें सहज ही रहनेवाली दैवी सम्पत्ति, शान्ति, समता, वैराग्य, प्रेम तथा संतजनोंकी सत्संगति तुम्हें मिलती रहेगी। तुम्हारी विलक्षण प्रगति होगी भगवान्की ओर। तुम द्वन्द्व-दु:खोंसे छूटकर निराशा, चिन्ता, भय, विषाद, कामना, वासना आदिसे मुक्त होकर परम सुखी हो जाओगे।
याद रखो—जबतक तुम भगवान्को पीठ दिये भोगोंकी ओर मुख किये चलते रहोगे; तबतक तुम्हें सुख-शान्ति कभी नहीं मिलेगी। जितना-जितना अधिक तुम भोगोंकी ओर अग्रसर होओगे स्वाभाविक ही भोग-मार्गमें स्थिति, भोग-क्षेत्रसे उदित भोगोंकी सहज परिणामरूपा निराशा, भय, विषाद, चिन्ता, राग, द्वेष, वैर, अशान्ति, द्रोह, दम्भ, परिग्रह, हिंसा, कामना, वासना, ममता आदि दुर्गुण-दुर्विचारोंसे घिरे रहकर सदा-सर्वदा दु:ख-सागरमें डूबे रहोगे। जहाँ-जहाँ तुम सुखकी आशासे जाओगे, वहीं तुम्हें भयानक दु:खराशिके दर्शन होंगे; क्योंकि वहाँ भोग-राज्यमें यही वस्तुएँ हैं। भोग-राज्यमें फँसा मनुष्य कितनी ही शान्तिकी, सुखकी, वैराग्यकी, निष्कामभावकी चर्चा करे, वह कभी भी शान्ति-सुखको प्राप्त नहीं हो सकता। अशान्ति-दु:ख उसके नित्य संगी बने रहेंगे। अतएव जैसे भी हो, भगवान्की ओर मुड़ जाओ। जबरदस्ती ही मुड़ जाओ।
याद रखो—मन-बुद्धि भगवान्के समर्पित हो जायँ और वे सदा केवल भगवान्में ही लगे रहें—तभी पूर्णत: सुदृढ़रूपसे भगवान्की ओर मुख हो जाना समझा जाता है। पर ऐसा न हो, तबतक बार-बार मन-बुद्धिको भगवान्के साथ जोड़ते रहो। भगवान्के नाम, गुण, रूप, तत्त्वका चिन्तन-मनन-विचार करते रहो। भोगोंसे आत्यन्तिक और आन्तरिक अनासक्ति और भगवान्में पूर्ण तथा दृढ़ आत्यन्तिक आन्तरिक आसक्ति ही प्रधान साधन है।