ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्—एक हैं
याद रखो—भगवान् एक हैं। वही ब्रह्म हैं, वही परमात्मा हैं, वही भगवान् हैं। तत्त्वत: एक होनेपर भी उनकी साधनामें भेद है। अद्वैतज्ञानसे ब्रह्मकी प्राप्ति होती है। योगसे परमात्मा मिलते हैं। भक्तिसे भगवान् मिलते हैं, पर जिनको ‘प्रियतम’ रूपसे भगवान्को प्राप्त करना है, उनके लिये एकमात्र प्रेम ही परम साधन है।
याद रखो—ज्ञानके साधनमें नित्यानित्य वस्तुका विचार, वैराग्य, शम-दम-तितिक्षा-उपरति-श्रद्धा-समाधानरूप षट् सम्पत्ति और मोक्षकी तीव्र इच्छा आवश्यक है। तदनन्तर श्रवण, मनन, निदिध्यासनादिसे उदित ब्रह्माकारवृत्तिके द्वारा प्रपंचका परिहार करके ब्रह्ममें स्थिति प्राप्त करना होता है। परमात्माकी प्राप्तिमें यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि, इस अष्टांगयोगकी साधना आवश्यक है। भगवान्की प्राप्तिमें भगवद्गुणानुवादका श्रवण-कीर्तन, भगवान्के निर्मल चरित्रोंका चिन्तन, भगवान्के पवित्र नामोंका जप-कीर्तन, नवधा भक्तिके साथ ही सत्संग, भजन एवं भगवान्के दर्शनकी तीव्र एवं अनन्य इच्छा परम साधन है और ‘प्रियतम’ रूपसे भगवान्की प्राप्तिमें भजन आदिके साथ ही त्यागप्रसूत और त्यागपूत ‘प्रेम’ परमावश्यक साधन है।
याद रखो—प्रेमकी मूल भित्ति त्याग है। त्यागके बिना प्रेमका प्रादुर्भाव नहीं होता। किसी वस्तु, पदार्थ, परिस्थिति, आश्रम या कर्मका त्याग आवश्यक नहीं है। त्याग होना चाहिये, स्व-सुख इच्छाका। इहलोक, परलोक तथा दिव्य लोकादिके भोग-सुखोंकी ही नहीं, मोक्ष-सुखकी इच्छाका लेश भी प्रेममें बाधक है। जिसमें केवल प्रियतमके सुखकी ही एकमात्र सहज अभिलाषा और चेष्टा है, अन्य किसी प्रकारकी किसी भी वासनाकी कल्पना भी नहीं है। इस प्रकार लोक-परलोकके भोग तथा कैवल्य मोक्षकी वासनासे शून्य प्रियतमके सुखार्थ समस्त भोगत्यागका उपभोग ही प्रेम है। यह प्रेम हृदयकी वस्तु होता है, बाहर दिखानेकी नहीं। यह गुणरहित, कामनारहित, नित्य, अविच्छिन्न, सूक्ष्मतर, अनुभवरूप और क्षण-क्षणमें उत्तरोत्तर बढ़नेवाला होता है। इस प्रेम-समुद्रमें मधुरतम भावोंकी अनन्त विचित्र सरल-वक्र तरंगें उछलती रहती हैं। प्रेमास्पद प्रियतमका सुख-साधन ही उन सारी तरंगोंका मूल कारण और परम उद्देश्य रहता है।
याद रखो—यह प्रेम परम दुर्लभ है, परंतु प्रेमीजनोंकी कृपासे अति सुलभ भी है। प्रेमीजन वे ही हैं, जो भुक्ति-मुक्तिकी अभिलाषाका त्याग करके प्रियतम यन्त्रीके हाथके खिलौने बने उनके इच्छानुसार क्रीड़ा कर रहे हैं। जिनमें अपने लिये अपनी स्मृति ही नहीं रह गयी है, ऐसे प्रेमीजनोंकी कृपा प्राप्त करनी चाहिये। यह कृपा मिलती है उन प्रेमीजनोंकी परम त्यागपूर्ण, परम भावमयी एवं परमपावन रस-साधनाका अनुसरण करनेसे।
याद रखो—प्रेमीके प्रियतम भगवान् सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा होते हुए भी प्रेमीके लिये नित्य-सत्य-परमानन्द-सौन्दर्य-माधुर्य-निधि, अचिन्त्यानन्त-अनिर्वचनीय दिव्य परस्परविरुद्ध गुणधर्माश्रयस्वरूप नित्य-निरन्तर प्रेमरसास्वादन करने तथा करानेमें प्रवृत्त रहते हैं। सर्वलोकमहेश्वर सर्वतन्त्रस्वरूप होते हुए भी प्रेमीके लिये प्रेमाधीन रहते हैं और प्रेमीजनको अपना प्रेमास्पद बना लेते हैं।