चार पुरुषार्थ

याद रखो—इस लोकमें सुख-सुविधा रहे, जीवन कष्टमय न रहे, सदाचार तथा सद्‍व्यवहार जीवनके स्वभावगत हो जायँ और मानव-जीवनके परम लक्ष्य मोक्षकी प्राप्ति हो जाय—इसलिये धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—चार पुरुषार्थ माने गये हैं। इन चारोंमें मोक्ष लक्ष्य है। मोक्षके लिये ही धर्मसंगत, धर्मानुमोदित अर्थ-कामका सेवन करना है।

याद रखो—‘अर्थ’ की सार्थकता इसीमें है कि उसके द्वारा धर्म-साधन हो, अभावग्रस्तोंके अभावकी पूर्ति हो तथा लोककी सच्ची सेवामें उसका उपयोग हो। नहीं तो अर्थ सर्वथा अनर्थरूप है। अर्थ यदि भोगवासनाकी तृप्तिमें लगता है तो वासना-अतृप्ति और पाप बढ़ते हैं। अर्थ यदि किसीके अहितमें लगता है तो वैर, हिंसा, दु:ख तथा नरकोंकी प्राप्ति होती है। अर्थका यदि सावधानीके साथ उचित रूपमें सदुपयोग न हो तो उससे चोरी, हिंसा, असत्य, दम्भ, काम, क्रोध, गर्व, मद, भेद, वैर, अविश्वास, स्पर्धा, स्त्री, जुआ तथा शराबका व्यसन—ये पंद्रह अनर्थ उत्पन्न होते हैं। प्रेम तथा स्नेह-सेवाके पात्र सम्बन्धियोंमें शत्रुता हो जाती है। अर्थके साथ भय तो लगा ही रहता है। चिन्ता तो अर्थकी नित्य संगिनी है—उपार्जनमें, रक्षणमें, बढ़ानेकी इच्छामें, व्यवहारमें तथा नाशमें चिन्ता रहती है। चिन्ताके साथ ही त्रास, परिश्रम और भ्रम भी लगे रहते हैं। अतएव अर्थको अनर्थरूप समझकर उसके संग्रहकी इच्छा न करो, जीवन-निर्वाहके लिये सुख तथा धर्मपूर्वक उपार्जन करो और उसका सद्‍व्यय करो।

याद रखो—अर्थकी भाँति ही ‘काम’ भी इन्द्रियतृप्तिके लिये नहीं है। वह भी जीवन-निर्वाह तथा मानव-जीवनके लिये आवश्यक कर्तव्योंकी पूर्तिके लिये ही है। धर्मके द्वारा नियन्त्रित अर्थ ही जैसे उपयोगी होता है, वैसे ही काम भी वही उपयोगी होता है, जो धर्मके द्वारा नियन्त्रित हो, धर्मरूप हो और जिसका लक्ष्य मोक्ष हो।

याद रखो—धर्मका भी लक्ष्य मोक्ष है। यही धर्मका सच्चा फल है। जिस धर्मसे केवल अर्थ-काम-भोगकी प्राप्ति होती है, वह तो व्यर्थ हैं; क्योंकि उससे अनित्य तथा दु:खमूलक पदार्थोंकी ही प्राप्ति होती है। वास्तवमें जितने भी भोग हैं, सब दु:खरूप तथा दु:खकी उत्पत्ति करानेवाले हैं। अतएव उसी धर्मका सेवन करो, जो विषयभोगोंमें वैराग्य उत्पन्न करा दे और मोक्षकी प्राप्तिमें परम सहायक हो।

याद रखो—जिससे अतृप्ति तथा तृष्णा बढ़ती हो, जिससे दिन-रात अशान्तिकी अग्निमें जलना पड़ता हो, जिससे नये-नये बन्धन होते हों, जिससे नये-नये दु:ख-क्लेशोंकी उत्पत्ति तथा वृद्धि होती हो, जिससे भगवत्-विमुखता होती हो और पापकर्मोंमें प्रवृत्ति बढ़ती हो—वह त्रिवर्ग—(अर्थ, धर्म, काम) किस कामका?

याद रखो—मोक्षविरोधी जो कुछ भी है, सभी त्याज्य तथा हेय है। अतएव धर्मविरुद्ध तथा वासना बढ़ानेवाले अर्थ एवं काममें तो रुचि रखनी ही नहीं चाहिये। ऐसे धर्मके लिये भी बहुत प्रयत्नशील नहीं होना चाहिये, जिससे केवल सम्पत्ति, भोग, सुन्दर शरीर, लौकिकी विद्या, लोककीर्ति और लम्बी आयु मिलती हो; क्योंकि मोक्षविरोधिनी होनेपर ये सभी वस्तुएँ परिणाममें दु:ख तथा बन्धन करनेवाली होती हैं और अनित्य तथा अपूर्ण होनेसे सदा ही चिन्ता तथा भयसे ग्रस्त रखती हैं।

याद रखो—मानव-जीवन अर्थकामोपभोगके लिये है ही नहीं। जहाँ जीवनमें केवल अर्थ और कामोपभोगकी लिप्सा जग जाती है, वहाँ धर्म नहीं रहता। इससे जीवन अधर्ममय, पापमय बन जाता है और पापका फल दु:ख, बन्धन तथा नरकयन्त्रणा है ही। किसी भी युक्ति, मत, बहुमतसे या अस्वीकार करनेसे जीव इस फल-भोगसे कभी बच नहीं सकता। बाध्य होकर उसे अपने दुष्कर्मका फल भोगना ही पड़ता है। मानव-जीवनका साध्य तो भगवत्प्राप्ति या मोक्ष ही है और जो साध्यकी प्राप्तिमें सहायक साधन हो, वही धर्म है और जो इस धर्ममें सहायक साधनरूप है, वही पुरुषार्थमें गण्य ‘अर्थ’ और ‘काम’ है। इसी दृष्टि तथा इसी निश्चयसे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—इस चतुर्विध पुरुषार्थका सम्पादन-सेवन करो।