चौबीस बड़े दोष

याद रखो—काम, लोभ, धनोपार्जनमें ही लगे रहना, तृष्णा, असंतोष, परिग्रह, स्तेय, असत्यभाषण, निन्दा, बहुत बोलना, परचर्चा, क्रोध, हिंसा, निर्दयता, चिन्ता, शोक, अहंकार, अभिमान, मद, प्रमाद, इन्द्रियोंकी दासता, मनकी गुलामी, कुसंगति और भजनका अभाव—ये चौबीस बड़े दोष हैं।

याद रखो—१. काम ज्ञानको हरण करके पापमें प्रवृत्त करता है; २. लोभसे बुद्धि मारी जाती है; ३. धनोपार्जनकी नित्य प्रवृत्तिसे मनुष्य असुर बन जाता है और धर्म, शान्ति, निर्भयता, सुख उसके जीवनसे चले जाते हैं; ४. तृष्णा सदा नवीन बनी रहकर जलाती रहती है; ५. असंतोष सदा मनुष्यको अभावका अनुभव कराता हुआ दु:खी रखता है; ६. परिग्रहकी वृत्ति सदा नयी-नयी चीजें बटोरनेकी चिन्तासे ग्रस्त रखती है; ७. स्तेय (चोरी) दूसरेका धन—स्वत्व अपहरण करनेका पाप कराता रहता है; ८. असत्य-भाषणसे वाणीका तेज नष्ट हो जाता है और लोगोंमें विश्वास उठ जाता है; ९. निन्दासे परदोष-दर्शनकी प्रवृत्ति होती, पराये पापोंका संग्रह होता तथा जिनकी निन्दा होती है, उनसे द्वेष-वैर बढ़ता है; १०. बहुत बोलनेसे वाणी-बलका क्षय होता और व्यर्थ समय नष्ट होता है; ११. परचर्चासे समय नष्ट होनेके साथ ही निन्दा-स्तुतिकी आदत पड़ती तथा राग-द्वेष बढ़ता है; १२. क्रोध मनुष्यको बेहोश करके राक्षस बना देता है; १३. हिंसा महापाप है और हिंसा करनेवालेकी सब हिंसा करते हैं; १४. निर्दयता मनुष्यको खूँखार पशु और पिशाच बना देती है; १५. चिन्ता हृदयमें सदा चिता-सी बनी धधकती तथा धधकाती रहती है; १६. शोकसे मनुष्य मोहग्रस्त होकर कर्तव्यशून्य हो जाता है; १७. अहंकार समस्त बन्धनोंका मूल है—शरीर तथा नामका अहंकार जीवको जन्म-मृत्युके चक्रमें घुमाता है; १८. अभिमान झूठे बड़प्पनकी सृष्टि करके दूसरोंका अपमान करवाता और नये-नये कलह-क्लेशकी सृष्टि करता है; १९. मद मनुष्यको बेहोश कर देता है—यह एक बुरा नशा होता है—जैसे धन-मद, पद-मद, विद्या-मद, जाति-मद, बुद्धि-मद आदि; २०. प्रमादसे मनुष्य करनेयोग्य कार्यका त्याग कर देता है और न करनेयोग्यको करने लगता है; २१. प्रमाद ही मृत्यु है; इन्द्रियोंकी दासता मन-बुद्धिकी पवित्रताको नष्ट करके उसे दुष्कर्मोंमें लगाती तथा बाहरी एवं भीतरी शक्तिका नाश करती है; २२. मनकी गुलामीसे मनुष्य उच्छृंखल होकर कुमार्गगामी होता और नित्य अशान्तिका भोग करता है; २३. कुसंगतिसे मनुष्यका सब ओरसे पतन हो जाता है, कुसंगसे जीवन बिगड़ जाता है और मनुष्य चिरकालतक नरकयन्त्रणा-भोगका साधन बटोरता रहता है और २४. भजनका अभाव तो मानव-जीवनको ही व्यर्थ कर देता है।

याद रखो—मानव-जीवन मिला ही है—भगवान‍्का भजन करनेके लिये। अतएव उपर्युक्त दोषोंसे बचते हुए भगवान‍्का भजन करो। सत्संगतिके साथ भजनमें प्रवृत्त हो जानेपर ये दोष अपने-आप हटने-मिटने लगते हैं। भगवान‍्के भजनमें ही मानवकी मानवता है।

याद रखो—भजन उसे कहते हैं—जिसमें जीवनके सारे कार्य भगवान‍्की सेवाके लिये होते हैं। मनसे भगवान‍्का चिन्तन तथा वाणीसे भगवान‍्के नाम-गुणोंका जप-कीर्तन-कथन करते हुए शरीरके द्वारा होनेवाले प्रत्येक कर्मसे भगवान‍्की ही पूजा-सेवा करनी चाहिये।