दान-भजन आदि भगवान‍्की प्रीतिके लिये ही

याद रखो—तुम जो कुछ भी दान करते हो, किसीकी कुछ सहायता करते हो, भगवान‍्का भजन करते हो और ध्यान करते हो—यह सब तभी विशुद्ध रहेंगे, जब इन्हें लोगोंको दिखानेकी अथवा जनानेकी भावना तुम्हारे मनमें बिलकुल ही नहीं रहेगी।

याद रखो—दान देना चाहिये, जिसको देना चाहते हो उसके लाभ तथा अपने संतोषके लिये, सहायता करनी चाहिये किसी दु:खीका दु:ख मिटानेके लिये और अपने संतोषके लिये, इसी प्रकार भगवान‍्का भजन-ध्यान भी करना चाहिये भगवान‍्के प्रीतिसम्पादन तथा अपने परमार्थसाधनके लिये, पर यदि तुम्हारे मनमें अपने ये कार्य दूसरोंको दिखानेकी बात आती है तो तुम अपने उद्देश्यसे गिर जाते हो। फिर इनसे वास्तविक सिद्धि या सफलता नहीं मिलती।

याद रखो—जो काम दूसरोंको दिखाने या जाननेके लिये किये जाते हैं, उनमें उद्देश्य हो जाता है दिखाना और जानना ही। जब दूसरे लोग नहीं देखते या नहीं जान पाते, तब तुम उन कार्योंके करनेमें शिथिलता करने लगते हो और आगे चलकर तो करना ही छोड़ देते हो। अतएव उन कार्योंमें पवित्रता नहीं रह जाती।

याद रखो—अपने-आपको अपने प्रति ईमानदार रहनेकी बड़ी आवश्यकता है। भगवान् तो धोखा खाते नहीं, तुम स्वयं ही अपने-आपको धोखा देकर कर्म या साधनके वास्तविक फलसे वंचित रह जाते हो। इसलिये उचित यह है कि तुम जो कुछ भी दान करो, दान ग्रहण करनेवाला भी उसे न जाने तो सर्वोत्तम, नहीं तो कम-से-कम दूसरा तो जाने ही नहीं। इसी प्रकार सहायताके करनेमें भी ध्यान रखो और भजन-ध्यानमें दूसरोंको दिखाने-जनानेकी भावना होनी ही नहीं चाहिये। ये तो अन्तरके धन हैं और निरन्तर अन्तरमें अर्जित और संचित होते रहने चाहिये। केवल तुम जानो और तुम्हारे भगवान् जानें, तीसरेसे कोई मतलब नहीं।

याद रखो—किसी सार्वजनिक सहायताके कार्यमें भी, जहाँतक बने, अपना दान प्रकट न करनेका विचार रखो। किसी संस्थाद्वारा सहायता करवानी हो तो उसमें भी सम्भव हो तो अपना नाम प्रकाशित मत होने दो। इससे दानका मूल्य बढ़ जायगा और अधिक-से-अधिक विशुद्धि होगी।

याद रखो—तुम जो कुछ भी देते हो, वह भगवान‍्की ही चीज है और जिसको देते हो वह भी भगवान‍्का ही रूप है। अतएव अभिमान छोड़कर भगवान‍्की चीज भगवान‍्को अर्पण करनेमें अपना सौभाग्य समझो और अर्पणबुद्धिसे ही दान करो।

याद रखो—दान, सहायता और भजन-ध्यान भगवान‍्की प्रीतिके लिये ही होनी चाहिये। अन्य लोगोंको दिखाने अथवा अन्य किसी सदुद्देश्यको लेकर इन्हें करना भी लाभदायक ही है; पर इनका असली विशुद्धरूप और असली भगवत्प्रीतिरूप फल तो तभी रहता और प्राप्त होता है, जबकि ये गुप्तरूपसे हों और केवल भगवत्प्रीति-सम्पादनके लिये ही हों।